NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
भारत बंद: ‘उड़ीसा में न्यूनतम समर्थन मूल्य ही अब अधिकतम मूल्य है, जो हमें मंज़ूर नहीं’
किसानों के आन्दोलन से उत्साहित उड़ीसा के किसान भी अब राज्य के ‘सबसे बड़े’ बंद की तैयारियों में जुटे हुए हैं। पश्चिम उड़ीसा कृषक समन्वय समिति के नेता लिंगाराज प्रधान कहते हैं, यहाँ के किसान भी अब एक मजबूत मंडी व्यवस्था और सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य चाहते हैं। 
रवि कौशल
24 Sep 2021
Bharat Bandh
प्रतीकात्मक तस्वीर। चित्र साभार: ट्रिब्यून इंडिया 

संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 27 सितंबर को अखिल-भारतीय बंद की घोषणा की गई है। बंद को 19 राजनीतिक पार्टियों, 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और कई अन्य संगठनों द्वारा समर्थन दिया जा रहा है। न्यूज़क्लिक ने किसानों की बदहाली, कृषि कानूनों के खिलाफ उनके विरोध और उड़ीसा में बंद की तैयारियों को समझने के लिए पश्चिम उड़ीसा कृषक समन्वय समिति के नेता लिंगाराज प्रधान से फोन पर बातचीत की। कुछ संपादित अंश:

रवि कौशल: उड़ीसा दिल्ली से न सिर्फ भौगोलिक रूप से काफी दूर है बल्कि यह कल्पना के स्तर पर भी उससे काफी भिन्न है क्योंकि यहाँ के लोगों को राज्य में किसानों की स्थिति के बारे में बेहद कम जानकारी है। ऐसे में हम जानना चाहेंगे कि उड़ीसा के किसान इन तीन कृषि कानूनों का विरोध क्यों कर रहे हैं?

लिंगाराज प्रधान: हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि हरित क्रांति का लाभ पंजाब और हरियाणा के किसानों को मिला है। बिहार और उड़ीसा जैसे राज्य अपने कृषि बुनियादी ढाँचे को विकसित कर पाने में असफल रहे हैं। जब हम पंजाब और हरियाणा में सिंचित क्षेत्र को देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह वहां पर तकरीबन शत प्रतिशत है जहाँ पानी बेहद आसानी से उपलब्ध है। वहां पर शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ आपको यह देखने को मिले कि यहाँ पर सिंचाई संभव नहीं है। 

जबकि उड़ीसा में कुल सिंचित क्षेत्र सिर्फ 30% है, जिसका अर्थ है कि यहाँ के लोग सिर्फ गुजर-बसर करने के लिए खेती में लगे हुए हैं। वे बेहद गरीबी में अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के हालिया निष्कर्षों के मुताबिक, हमारे किसान झारखण्ड के बाद सबसे गरीब हैं। जब कभी भी वे कृषि क्षेत्र में संपन्नता के उदाहरण के लिए नजर दौड़ाते हैं तो उनके मन में पंजाब और हरियाणा की ही तस्वीर उभरती है, जहाँ मंडियों के जरिये फसल खरीद प्रणाली बेहद चाक-चौबंद है और सिंचाई की सुविधायें व्यापक स्तर पर उपलब्ध हैं।

तीन केन्द्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को अब दिल्ली की सीमाओं पर करते हुए 10 महीने पूरे हो चुके हैं। इसने उड़ीसा के किसानों के बीच में भी अभूतपूर्व जागरूकता का संचार किया है, जिन्हें अब महसूस होने लगा है कि यहाँ पर भी एक मजबूत मंडी व्यस्था होनी चाहिए। वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के तहत पिछले 20 वर्षों के अनुभव ने हमें यह दिखा दिया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ही अब अधिकतम मूल्य है, और खेती में लागत को वसूल कर पाने में बाजार पर निर्भरता अब खत्म हो चुकी है। ऐसे में अगर सरकार फसलों की खरीद के काम को अपने हाथ में नहीं लेती है तो किसानों के लिए खेती कर पाना कठिन हो जाएगा।

राज्य में तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष एक मजबूत मंडी व्यवस्था को सुनिश्चित करने और बेहतर सिंचाई सुविधाओं को लेकर है। 2003 से पहले उड़ीसा में मंडी व्यस्था का नामोनिशान नहीं था। किसान संगठनों के सामूहिक संघर्षों का ही यह नतीजा है जिसने सरकार को मंडी व्यवस्था को यहाँ पर लाने के लिए विवश कर दिया। हालाँकि, अभी भी यह अच्छी स्थिति में नहीं है।

इसलिए, यह एक वृहद स्तर पर आधारित संघर्ष है जिसमें सुरक्षित आय को सुनिश्चित करने और कृषि क्षेत्र में विविधता लाने का सवाल अहम बना हुआ है। दिल्ली की सीमाओं पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने देश भर के किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम किया है और वे अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

आरके: आप देश के सबसे पिछले जिलों में से एक में किसानों को संगठित कर रहे हैं। क्या आप उनमें कोई गुस्से का उबाल पनपते हुए देख पा रहे हैं, खासकर जब किसान सिर्फ एक फसल उगा रहे हैं और उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए कोई अन्य वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं हैं?

एलपी: जैसा कि मैंने पहले जिक्र किया है सर्वेक्षण में उड़ीसा के किसान झारखण्ड के किसानों के बाद सबसे गरीब पाए गए हैं। पश्चिमी एवं दक्षिणी उड़ीसा में हम छोटे और सीमान्त किसानों के बीच में उत्तर भारत की तरफ पलायन करने की प्रवृत्ति पाते हैं। वे वहां पर ईंट भट्टों या कारखानों में बेहद मामूली दरों पर काम करते हैं जहाँ पर काम की स्थितियां बंधुआ मजदूरी करने के समान हैं। वे अपनी दुर्दशा से निश्चित तौर पर आक्रोशित हैं और किसानों के आंदोलन ने उन्हें अपने हालात पर विचार करने का अवसर प्रदान किया है।

आरके: उड़ीसा में बटाई पर खेती करने वालों की एक अच्छी-खासी आबादी है जिनके पास अपनी खुद की कोई जमीन नहीं है। ये तीन कृषि कानून उन्हें किस प्रकार से प्रभावित करेंगे?

एलपी: उड़ीसा में उन्हें (बटाई पर खेती करने वाले) भाग के तौर पर जाना जाता है। उड़ीसा सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि भाग कुल ग्रामीण आबादी का जो राज्य में कृषि पर निर्भर है, का 86% हिस्सा हैं। हमारे पास राज्य में इन बटाईदारों की रक्षा के लिए कोई कानून नहीं है, जैसा कि केरल और पश्चिम बंगाल में हमें देखने को मिलता है जहाँ पर वामपंथी पार्टियों का कभी शासन हुआ करता था। ये किसान कृषि कानूनों के सबसे बुरे शिकार होने जा रहे हैं। आज भी यदि कोई प्राकृतिक आपदा फसल को नुकसान पहुंचाती है तो उनके पास सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें सहकारी बैंकों या सोसाइटी से किसी प्रकार का ऋण नहीं मिल सकता है। खेती-बाड़ी पहले से ही घाटे का सौदा बन चुकी है। ऐसे में यदि ठेके पर खेती को लागू कर दिया जाता है तो ये किसान तो भूखे मर जायेंगे।

आरके: कृपया हमें राज्य में कमजोर खरीद तंत्र और खेती पर इसके प्रतिकूल प्रभाव के बारे में कुछ और जानकारी दीजिये।

पीएल: किसानों द्वारा अनवरत संघर्ष के बाद, उड़ीसा सरकार एक विकेंद्रीकृत खरीद प्रणाली के लिए राजी हुई, लेकिन यह व्यस्था सुदृढ़ नहीं है। हम दलहन और तिलहन पर एमएसपी दिए जाने की मांग करते आ रहे हैं। इस बीच राज्य सरकार द्वारा खरीद में बढ़ोत्तरी भी हुई है। 2003 में सरकार द्वारा जहाँ 10 लाख टन धान की खरीद की गई थी, वह पिछले सीजन में बढ़कर 70 लाख टन हो चुकी है। लेकिन सरकार सिर्फ धान की फसल को ही एमएसपी पर खरीद रही है। अब इससे एक दूसरा संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि अब हर कोई सिर्फ धान ही उगा रहा है क्योंकि उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन मिल रहा है। लेकिन सरकार का कहना है कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सारे चावल की खरीद नहीं कर सकती है।

उड़ीसा के किसान कपास भी उगाते हैं, विशेषकर कोरापुट, बलांगीर, कालाहांडी जैसे जिलों में। लेकिन इनकी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ तक कि कॉटन कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया तक यहाँ नहीं आता है। राज्य में कपास से जुड़े उद्योग पहले ही विलुप्त हो चुके हैं। इसलिये सरकार को अन्य फसलों पर भी एमएसपी को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। इसके बिना किसानों की आय में कोई ख़ास सुधार होने की गुंजाईश नहीं है।

आरके: संयुक्त किसान मोर्चा ने 27 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है। आपकी इसको लेकर कैसी तैयारियां चल रही हैं और आप इससे किस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे हैं?

पीएल: हमारे आंदोलन को 10 महीने पूरे हो चुके हैं और किसी भी चुनौती का मुकाबला कर सकने की इसकी दृढ़ता ने किसानों को बंद के प्रति उत्साहित कर दिया है। वे इसके लिए जी-जान से तैयारी कर रहे हैं क्योंकि कोरोनावायरस की दूसरी लहर अब खत्म हो चुकी है। हमें श्रमिकों की विभिन्न यूनियनों, ट्रांसपोर्टर्स यूनियनों, शिक्षकों, कर्मचारियों इत्यादि का समर्थन मिल रहा है। हम लोग बंद के बारे में लोगों को सूचित करने के लिए शहरों में जुलूस निकाल रहे हैं।

हाँ, यह सच है कि यह एक व्यापक बंदी होगी क्योंकि राजनीतिक दलों ने भी इसके लिए अपना समर्थन दिया है। कांग्रेस पहले ही अपने समर्थन को घोषित कर चुकी है। वामपंथी दल भी इसमें शामिल हैं। सत्तारूढ़ बीजू जनता दल ने खुले तौर पर बंद का समर्थन नहीं किया है, लेकिन इसको लेकर एक मौन समझ दिखती है। हमने देखा है कि सरकार अपने कार्यालयों, विद्यालयों और कालेजों एवं अन्य प्रतिष्ठानों को बंद रखने के आदेश देती है। इस बार भी ऐसा ही देखने को मिलेगा। राज्य अपने सबसे बड़े बंद में से एक का दीदार करने जा रहा है।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

 Bharat Bandh: ‘In Odisha, Minimum Support Price is Now Maximum Price, We Won’t Accept This’

Samyukta Kisan Morcha
Bharat Bandh
Lingaraj Pradhan
Farm Laws
minimum support price
farmers' protest
Odisha farmers

Related Stories

देशव्यापी हड़ताल: दिल्ली में भी देखने को मिला व्यापक असर

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन

मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ भारत बंद का दिखा दम !

क्यों मिला मजदूरों की हड़ताल को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

कृषि क़ानूनों के निरस्त हो जाने के बाद किसानों को क्या रास्ता अख़्तियार करना चाहिए

वे तो शहीद हुए हैं, मरा तो कुछ और है!

साम्राज्यवाद पर किसानों की जीत


बाकी खबरें

  • साइगॉन की यादों से वाबस्ता क्वाड
    एम. के. भद्रकुमार
    साइगॉन की यादों से वाबस्ता क्वाड
    28 Aug 2021
    किसी महाशक्ति की विश्वसनीयता अपने सहयोगियों के छोड़ देने से घट जाती है, शायद यही वजह है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर चीन के ख़िलाफ़ कमला हैरिस की टिप्पणी में सख़्त आक्रामकता नहीं थी।
  • Mohammed Yousuf Tarigami
    भाषा
    माकपा नेता तारिगामी ने अनुच्छेद 370 से संबंधित याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए अर्जी दी
    28 Aug 2021
    माकपा नेता ने कहा कि यदि मामलों की तत्काल सुनवाई नहीं की गई तो ‘‘आवेदक के साथ गंभीर अन्याय होगा।’’
  • 'प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई बंधन नहीं' : अदालत ने पत्रकार आसिफ़ नाइक के ख़िलाफ़ एफ़आईआर को लताड़ा
    अनीस ज़रगर
    'प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई बंधन नहीं' : अदालत ने पत्रकार आसिफ़ नाइक के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पर लताड़ा
    28 Aug 2021
    कोर्ट ने कहा, 'इसमें कोई दो राय नहीं है कि याचिकाकर्ता पेशे से पत्रकार है और उसका काम जानकारी इकट्ठा करना और उसे समाचार पत्र या किसी अन्य मीडिया में प्रकाशित करना है।'
  • विधानसभा कूच करती आंगनबाड़ी कार्यकर्तीयां; फोटो-सत्यम कुमार
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड: आंगनबाड़ी कार्यकर्ती एवं सेविका कर्मचारी यूनियन का विधानसभा कूच 
    28 Aug 2021
    “उत्तराखंड में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती को 7,500 रुपये, आंगनबाड़ी सहायिका को 3,750 रुपये और मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ती को 4,500 रुपये प्रति माह मानदेय सरकार की ओर से मिलता है जो मंहगाई के इस दौर में बहुत ही…
  • इकॉनमी में मांग की भरपाई कौन करेगा ?
    न्यूज़क्लिक टीम
    इकॉनमी में मांग की भरपाई कौन करेगा ?
    27 Aug 2021
    पिछले 30 साल से देश में सूट-बूट की अर्थनीति चल रही है। अमीर और अमीर हो रहे हैं वहीँ गरीब खाने को मोहताज़ हैं। देश में निम्न और मध्यम वर्ग के हालात ख़राब ही होते जा रहे हैं जो देश की अर्थव्यवस्था के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License