NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
भुखमरी के वेतन के लिए तुग़लकी फ़रमान जारी
श्रम मंत्री ने 178 रुपये राष्ट्रीय स्तर के दैनिक न्यूनतम वेतन की घोषणा कर दी है (यानी 4,628 रुपये मासिक वेतन) जो लेबर सम्मेलन की सिफ़ारिशों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के विपरीत है और स्वीकृत मानदंडों का लगभग एक चौथाई है।
सुबोध वर्मा
15 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
भुखमरी के वेतन

घटनाओं ने एक विचित्र मोड़ लेते हुए, मोदी सरकार में श्रम मंत्री, संतोष कुमार गंगवार ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में घोषणा की कि देश में अब नया न्यूनतम वेतन का स्तर 178 रुपये प्रति दिन होगा, इस हिसाब से पूरे महीने का वेतन लगभग 4,628 रुपये बैठता है।

यह घोषणा कई मायनों में विचित्र है किंतु सत्य भी है। सबसे पहले तो यह समझा जाना चाहिए कि किसी भी राष्ट्रीय स्तर के न्यूनतम वेतन (एनएफ़एलएमडब्ल्यू) की आधिकारिक घोषणा, केवल वैधानिक न्यूनतम मज़दूरी सलाहकार बोर्ड के साथ बैठक करने और इसे अनुमोदित करने के बाद ही की जानी चाहिए, जबकि श्रम मंत्री ने ऐसा नहीं किया है। इस मामले में अब तक इस तरह की कोई बैठक नहीं हुई है - फिर भी मंत्री ने बेतुकी घोषणा कर दी। वैसे भी यह घोषणा होने वाली थी क्योंकि इसमें हर दो साल में संशोधन किया जाता है। पिछली घोषणा जून 2017 में की गई थी। लेकिन बिना किसी नियत प्रक्रिया के?

दूसरी, जो इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि नई वेतन दर की घोषणा करते वक्त 2017 के मुक़ाबले मात्र 2 रुपये का इज़ाफ़ा किया है। दो साल में सिर्फ़ 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी? यह पिछले दो वर्षों में रही मुद्रास्फ़ीति की दर से काफ़ी कम है, जिसका अर्थ है कि वास्तविक रूप में, मज़दूरों के वेतन में गिरावट की गई है!

तीसरा, प्रति दिन 178 रुपये के वेतन की घोषणा सरकार की अपनी विशेषज्ञ समिति की सिफ़ारिश के ख़िलाफ़ भी जाती है जिसमें मासिक 375-447 रुपये की सिफ़ारिश की गई थी और (या 9,750- 11,622 प्रति माह) राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन प्रति माह की सिफ़ारिश थी। अनूप सत्पथी की अगुवाई वाली इस समिति को जनवरी 2018 में मोदी 1.0 सरकार के ही मंत्री द्वारा स्थापित किया गया था और जनवरी 2019 में इसने अपनी सिफ़ारिशें दे दी थीं। दरअसल न्यूनतम वेतन तय करने की सिफ़ारिश या अनुशंसित स्तर वास्तव में कैलोरी सेवन के मान को कम करके किया गया है जिसे 2,700 से 2,400 किलो कैलोरी कर दिया गया है, और मज़दूरों को गुमराह कर रही है। अब लग रहा है कि मोदी सरकार इसे और भी नीचे धकेलती नज़र आ रही है।

चौथी, और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मंत्री द्वारा बिना विचार की गई यह घोषणा, 2016 में 7वें वेतन आयोग द्वारा सुझाए गए न्यूनतम वेतन के मामले में मानदंड का लगभग एक चौथाई ही बैठता है। इसे पूरी तरह से अब तक के सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत मानक जिन्हें 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन द्वारा निर्धारित मानकों, निरंतर चले श्रम सम्मेलनों (विशेष रूप से 44वें, 45वें और 46वें सत्र) द्वारा दोहराया गया है, और इसे 1992 के प्रसिद्ध रेप्टाकोस ब्रेट मुक़दमे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया और उसे पूरक भी बनाया गया, ये मानदंड न्यूनतम मज़दूरी स्तर को अनिवार्य बनाते हैं जो कहते हैं 692 रुपये प्रति दिन या 18,000 रुपये प्रति माह वेतन होना चाहिए।

Minimum Wage In India.jpg

वास्तव में, देश के 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गंगवार की घोषणा की तुलना में वर्तमान न्यूनतम मज़दूरी का स्तर अधिक है।

कॉर्पोरेट लालच को बढ़ावा देना

एनएफ़एलएमडब्ल्यू एक ग़ैर-वैधानिक उपाय है - इसका मतलब यह है कि इसके द्वारा की गई सिफ़ारिश के तहत राज्य सरकारों को न्यूनतम मज़दूरी की अनुमति इससे नीचे नहीं दी जानी चाहिए। चूँकि श्रम संविधान की समवर्ती सूची में आता है, तो यह मुख्य रूप से राज्यों का मसला है जो न्यूनतम मज़दूरी निर्धारण से संबंधित है। केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों के लिए वेतन स्तर तय करती है। क़ानून के अनुसार, उन प्रकार के रोज़गार जो अनुसूचियों में सूचीबद्ध हैं, वे सरकारों द्वारा वेतन स्तर के निर्धारण के लिए खुले हैं। भारत में, 1,600 से अधिक नौकरियां वर्तमान में राज्यों और केंद्र सरकार के अनुसूचियों में सूचीबद्ध हैं। एनएफ़लएमडब्ल्यू विशेष रूप से ग़ैर-अनुसूचित नौकरियों के लिए वेतन स्तर की सिफ़ारिश करने के लिए है जिसकी संख्या हज़ारों में होती है।

एक बेतुके और इतने कम न्यूनतम वेतन स्तर की घोषणा करके, श्रम मंत्री और मोदी सरकार ख़ुद उद्योगपतियों और नियोक्ताओं को संकेत भेज रहे हैं कि सरकार नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से श्रमिकों के हितों की रक्षा करने में दिलचस्पी नहीं रखती है। इसलिए सरकार जहां तक संभव हो नीचे के स्तर के वेतन को और नीचे ले जाने के लिए नियोक्ताओं को खुली छूट दे रही है। सरकार की इस सोच को - पश्चिमी नवउदारवाद से उधार लिया गया है – जिसके मुताबिक़ श्रम लागत में कटौती कर इसे त्वचा और हड्डियों के निचोड़ के स्तर तक ले जाया जा सकता है तो उत्पादन में वृद्धि को हासिल किया जा सकता है।

सरकार के इस दृष्टिकोण की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि मंत्री ने प्रेस कांफ़्रेंस को संबोधित करते हुए घोषणा की कि मोदी मंत्रिमंडल ने व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तों विधेयक संहिता को मंज़ूरी दे दी है, जो विधेयक 13 श्रम क़ानूनों को समाहित करने का प्रयास करता है जो नियोक्ताओं के लिए उनकी अनुकूलता को बनाए रखने में मदद करेगा, यानी क़ानून उनके मुताबिक़ काम करेगा। इससे पहले, 3 जुलाई को, कैबिनेट ने कई श्रम क़ानूनों में सुरक्षात्मक प्रावधानों को ख़त्म करते हुए, संहिता को वेतन पर भी मंज़ूरी दे दी है, जो एक समान संसोधन को समाहित करते है। इस प्रकार, श्रम क़ानूनों को कमज़ोर करना – जो भारतीय कॉरपोरेट वर्ग की लंबे समय से चली आ रही मांग थी - आख़िरकार संसद के इस सत्र में उसे पेश किया जाएगा। और, अपनी उत्तेजना को जारी रखते हुए आख़िर में मंत्री ने भुखमरी के नए स्तर के न्यूनतम वेतन की घोषणा कर दी।

सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) ने एक मज़बूत बयान में नई घोषणा की निंदा की है और इसे "राष्ट्रीय स्तर की आसान लूट" क़रार दिया है। सीटू अध्यक्ष तपन सेन ने बयान में कहा कि मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी की नई सरकार “कॉर्पोरेट को श्रम क़ानूनों के रूप में भुगतान करने की जल्दबाज़ी में है”, श्रम क़ानूनों को कमज़ोर करने और ऐसे निम्न स्तर पर न्यूनतम मज़दूरी को लाने से कॉर्पोरेट का मुनाफ़ा बढ़ेगा। सीटू ने इन क़दमों का देशव्यापी विरोध करने का आह्वान किया है। दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध भारतीय मज़दूर संघ, जो कि मोदी सरकार की समर्थक है, को एक बयान में यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि नया वेतन स्तर "अर्थहीन" है।

minimum wage
New Minimum Wage
Starvation Level Minimum Wage
Labour Minister
Santosh Kumar Gangwar
CITU
Modi government
BJP government
National Floor Level Minimum Wage
Minimum Wage Advisory Board

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?


बाकी खबरें

  • poverty
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता
    11 Mar 2022
    राष्ट्रवाद और विकास के आख्यान के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने रोटी और स्वाधीनता के विमर्श को रोटी बनाम स्वाधीनता बना दिया है।
  • farmer
    सुरेश गरीमेल्ला
    सरकारी इंकार से पैदा हुआ है उर्वरक संकट 
    11 Mar 2022
    मौजूदा संकट की जड़ें पिछले दो दशकों के दौरान अपनाई गई गलत नीतियों में हैं, जिन्होंने सरकारी कंपनियों के नेतृत्व में उर्वरकों के घरेलू उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया और आयात व निजी क्षेत्र द्वारा उत्पादन…
  • सोनिया यादव
    पंजाब : कांग्रेस की हार और ‘आप’ की जीत के मायने
    11 Mar 2022
    कांग्रेस को जो नुक़सान हुआ, उसका लगभग सीधा लाभ 'आप' को मिला। मौजूदा वक़्त में पंजाब के लोगों में नाराज़गी थी और इस कारण लोगों ने बदलाव को ही विकल्प मानते हुए आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया है।
  • विजय विनीत
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !
    11 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में विपक्ष के पास मुद्दों की भरमार रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव मोदी-योगी का जादू बेअसर नहीं कर सके। बार-बार टिकटों की अदला-बदली और लचर रणनीति ने स
  • LOOSERES
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: कई दिग्गजों को देखना पड़ा हार का मुंह, डिप्टी सीएम तक नहीं बचा सके अपनी सीट
    11 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की वापसी हो गई है, हालांकि इस प्रचंड जीत के बावजूद कई दिग्गज नेता अपनी सीट नहीं बचा पाए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License