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बाइडेन का पैकेज और उसकी सीमाएं
बाइडेन का पैकेज बेशक सदाशयतापूर्ण है और उसे विकसित देशों के वामपंथ का समर्थन हासिल है। लेकिन, इस वामपंथ को तीसरी दुनिया के देशों की दुर्दशा के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील होने की भी जरूरत है।
प्रभात पटनायक
22 Apr 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
बाइडेन का पैकेज और उसकी सीमाएं
Image Courtesy: National Herald

अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का 19 खरब (1.9 ट्रिलियन) डालर का बचाव पैकेज, अमरीकी अर्थव्यवस्था में और उसके साथ ही विश्व अर्थव्यवस्था में भी, नये प्राण फूंकने के लिए सबसे महत्वाकांक्षी कदमों में से एक है। 

यह पैकेज ट्रम्प के पिछले साल के 20 खरब (2 ट्रिलियन) डालर के पैकेज और उसके बाद 2020 के दिसंबर में घोषित 900 अरब डालर के पैकेज के ऊपर से आया और सिर्फ महामारी से राहत ही मुहैया कराने की कोशिश नहीं करता है बल्कि अमरीका में एक नया आर्थिक उछाल भी शुरू करना चाहता है। उम्मीद की जाती है कि इसका असर सारी दुनिया पर ही पड़ेगा और आयात पर लगाए गए उन संरक्षणवादी कदमों के बावजूद पड़ेगा, जो डोनाल्ड ट्रम्प के राज में अमरीका में लागू किए गए थे। इससे, जीडीपी के अनुपात के रूप में अमरीका का राजकोषीय घाटा भी बढक़र, दूसरे विश्व युद्घ के बाद के अपने इतिहास की अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच जाने वाला है।

पूंजीवादी दुनिया में दूसरे विश्व युद्घ के बाद के लंबे उछाल को, राजकोषीय उपायों के जरिए शासन के सक्रिय हस्तक्षेप के जरिए ही बनाए रखा गया था। बहरहाल, ऐसे उछाल को बनाए रखना आगे चलकर असंभव हो गया क्योंकि इस बीच वित्तीय पूंजी वैश्विक स्तर पर सचल हो गयी। 

इस तरह, राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किए जाने वाले खर्च की भरपाई के लिए, राजकोषीय घाटों का तथा अमीरों पर कर लगाने का सहारा लिए जाने पर, इस वित्तीय पूंजी का सामान्यीकृत विरोध निर्णायक हो गया। आखिर, वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी का सामना अब ऐसे राष्ट्रीय राज्यों से हो रहा था, जिन्हें उसकी मन-मर्जी के मुताबिक चलना होता था क्योंकि वे ऐसा नहीं करते तो उनके यहां से पूंजी का पलायन भडक़ सकता था। 

दूसरे शब्दों में अगर कोई राष्ट्रीय-राज्य सक्रिय राजकोषीय हस्तक्षेप पर बजिद रहता तो, वित्तीय पूंजी उस देश से उडक़र कहीं अन्यत्र चली जाती।

बहरहाल, अमरीका बहुत हद तक इस दबाव से बरी रहा है। इसकी वजह यह है कि उसकी मुद्रा को ‘सोने के समकक्ष’ और इसलिए, अपनी संपदा जमा कर के रखने के लिए सुरक्षिम माध्यम माना जाता रहा है। यह स्थिति अमरीका से पूंजी के बड़े पैमाने पर किसी भी पलायन का रास्ता बंद करती है। 

लेकिन, अमरीका के मामले में शासन के बढ़े हुए खर्चे से निकली मांग, रिसकर विदेश तक पहुंच जाती है और इस तरह जहां एक ओर उस पर बाहर का कर्जा चढ़ता जाता है, तो दूसरी ओर, उससे देश के बजाए विदेश में रोजगार पैदा होता है। और यह तथ्य अपने आप में शासन के राजकीय हस्तक्षेप को रोकने का काम करता था।

 ट्रम्प ने ठीक इसीलिए संरक्षणवाद शुरू किया था ताकि अमरीकी अर्थव्यवस्था के राजकोषीय उत्प्रेरण से, खुद उनके देश के अंदर ही रोजगार पैदा हों न कि दूसरे देशों में। बहरहाल, इस तरह के संरक्षण के बावजूद, अमरीकी अर्थव्यवस्था में हाल में लाए गए वित्तीय उत्प्रेरण ने, अमरीका के व्यापार घाटे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। इसका अर्थ यह है कि अब भी मांग का दूसरे देशों के लिए उल्लेखनीय तरीके से ‘रिसाव’ हो रहा है। यह गौरतलब है कि बाइडेन ने इस सब के बावजूद, अमरीकी अर्थव्यवस्था को राजकोषीय उत्प्रेरण देने का चुनाव किया है और कम से कम फिलहाल संरक्षणवाद में कोई बढ़ोतरी किए बिना ही यह उत्प्रेरण देने का चुनाव किया है।

ज्यादातर प्रेक्षकों के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसके स्वत:स्पष्ट निहितार्थ तो यही होंगे कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को उत्प्रेरण मिलेगा। ऐसा होगा, अमरीका में तथा दुनिया भर में मांग के बढऩे के चलते, भारत के निर्यातों के बढऩे से। फिर भी, दूसरे विश्व युद्घ के फौरन बाद के संदर्भ में, जब अमरीका में राज्य-उत्प्रेरित आर्थिक उछाल का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुगुणनकारी प्रभाव पड़ रहा था और मौजूदा संदर्भ में, एक बुनियादी अंतर है।

 अंतर यह है कि दूसरे विश्व युद्घ के फौरन बाद के दौर तक वित्त का वैश्वीकरण हुआ ही नहीं था जबकि आज वित्त का वैश्वीकरण हो चुका है।इसका एक नतीजा तो यही है कि आज हरेक देश की ब्याज की दरों का, अमरीका की ब्याज की दरों के साथ चलना जरूरी है। मिसाल के तौर पर अगर भारत में ब्याज की दर, अमरीका में ब्याज की दर तथा अमरीका में वित्तीय निवेश करने के मुकाबले भारत में वित्तीय निवेश करने के कल्पित जोखिम की क्षतिपूर्ति की राशि के योग से कम है, तो वित्तीय पूंजी भारत से उडक़र, अमरीका में ही चली जाएगी।

अब पिछले काफी समय से, जब अमरीका राजकोषीय सक्रियता से कतरा रहा था, वह अपनी मौद्रिक नीति के जरिए ही अर्थव्यवस्था को उत्प्रेरित करने की कोशिश कर रहा था और इस क्रम में उसने अपनी ब्याज की दरों को धकेलकर करीब-करीब शून्य पर पहुंचा दिया था। 

दूसरी ओर, वह अगर दोबारा राजकोषीय सक्रियता का रास्ता अपनाता है तो इसका अर्थ होगा अमरीका की ब्याज की दरों में कुछ बढ़ोतरी होना, जोकि होना वास्तव में शुरू भी हो चुका है। और इसका मतलब होगा, भारत जैसे देशों में भी ब्याज की दरों में इसी हिसाब से बढ़ोतरी होना। अमरीका में बांडों से होने वाली कमाई के बढऩे के चलते, भारतीय रिजर्व बैंक को अपने बांडों पर ब्याज की दरों को बढऩे से रोके रखने के लिए पहले ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 

लेकिन, समय गुजरने के साथ यह समस्या और बढ़ जाने वाली है। और ब्याज की दरों में बढ़ोतरी के साथ, निवेश और हतोत्साहित हो रहा होगा।आर्थिक गतिविधि की ऐसी कुंदता की एक वजह और है और वह है मुद्रास्फीति। इस मुद्दे पर अमरीका में इस समय जोर-शोर से बहस छिड़ी हुई है। मध्य-मार्ग से दक्षिणपंथ तक के दायरे में पडऩे वाले अनेक अर्थशास्त्री इसे लेकर चिंता जता रहे हैं कि अमरीकी अर्थव्यवस्था को अगर बाइडेन के प्रस्ताव की हद तक उत्प्रेरित किया जाता है, तो इससे अमरीका में मुद्रास्फीति भडक़ उठेगी। लेकिन, मध्य मार्ग से वामपंथ की ओर पडऩे वाले दायरे में आने वाले अर्थशास्त्री, मुद्रास्फीति की ऐसी आशंकाओं की हंसी उड़ाते हैं। बहरहाल, अचरज की बात है कि मुद्रास्फीति पर यह पूरी की पूरी बहस अकेले अमरीका पर ही केंद्रित रही है और इसमें इसकी संभावना की चर्चा ही नहीं की जा रही है कि अमरीका का उत्प्रेरण, अन्य देशों में भी मुद्रास्फीति पैदा कर सकता है। यह मुद्दा भारत के लिए और तीसरी दुनिया के अन्य ऐसे देशों के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण है, जो अमरीका तथा आम तौर पर विकसित पूंजीवादी देशों के लिए, भांति-भांति के प्राथमिक माल मुहैया कराते हैं।

इतना तो करीब-करीब तय ही है कि अमरीका के उत्पे्रेरण से प्राथमिक मालों की मांग और इसलिए उनकी कीमतों में बढ़ोतरी होगी। इसका शायद अमरीका की मुद्रास्फीति की दर के लिए कोई खास अर्थ नहीं हो, पर इससे भारत जैसे तीसरी दुनिया के प्राथमिक माल आपूर्तिकर्ताओं के यहां मुद्रास्फीति की दर में जरूर बढ़ोतरी हो जाएगी। और वैश्वीकृत वित्त के वर्तमान निजाम के अंतर्गत, प्राथमिक मालों में मुद्रास्फीति में इस तरह की बढ़ोतरी पर नीतिगत प्रत्युत्तर, दूसरे विश्व युद्घ के बाद के नियंत्रणकारी निजाम में ऐसी बढ़ोतरी का जो प्रत्युत्तर आया होता, उससे ठीक उल्टा होगा। मांग में अचानक बढ़ोतरी के चलते, प्राथमिक मालों की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उससे एक आदर्श स्थिति में तो राज्य की ओर से, ऐसे मालों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए अपने प्रयासों का विस्तार किया जाना चाहिए। और यह होना चाहिए, इस तरह के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी किए जाने के जरिए।

 लेकिन, वैश्वीकृत वित्त की दुनिया में, इसका नीतिगत प्रत्युत्तर तो यही होगा कि सार्वजनिक निवेश में तथा आमतौर पर सार्वजनिक खर्चों में कटौती कर दी जाए और इस तरह, आपूर्ति को बढ़ाने के बजाए, घरेलू मांग में ही कटौती की जाए, ताकि मुद्रास्फीति को अंकुश में रखा सके। संक्षेप में मौजूदा निजाम में तो प्राथमिक माल आपूर्तिकर्ता अर्थव्यवस्था पर कटौती ही थोपी जा रही होगी ताकि इसके लिए, संबंधित अर्थव्यवस्था में गतिविधि के स्तर और इसलिए वृद्घि दर पर भी, अंकुश लगाया जा सके।

इस तरह, भारत जैसी किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए, बाइडेन के पैकेज के चलते निर्यातों में कुछ बढ़ोतरी तो होगी, लेकिन इसके साथ ही साथ, आर्थिक गतिविधि के स्तर तथा वृद्घि दर में कुल मिलाकर संकुचन हो रहा होगा, ताकि घरेलू उपभोग को निचोडक़र, पर्याप्त मात्रा में प्राथमिक माल बचाए जा सकें, जिससे अतिरिक्त मांग के दबाव तथा इसलिए मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाया जा सके।

जाहिर है कि दूसरे विश्व युद्घ के बाद के उछाल के दौरान ऐसा नहीं होता था। तब राष्ट्र-राज्यों की सरकारें वित्तीय पंूजी के फरमान मानने के लिए मजबूर नहीं थीं। इसलिए, उस जमाने में जब प्राथमिक मालों की कीमतें बढ़ती थीं, तो इसके साथ ही संबंधित सरकारों द्वारा अपने इसके प्रयास तेज किए जाते थे कि ऐसे मालों की आपूर्ति बढ़ायी जाए और इसमें सरकार के निवेशों में बढ़ोतरी भी शामिल होती थी। तब सरकार के खर्चे में कमी के जरिए, घरेलू उपभोग में कटौती किए जाने का सवाल ही नहीं उठता था। इसीलिए, विश्व युद्घोत्तर दौर में वैश्विक आर्थिक उछाल का, भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर सिर्फ आर्थिक उत्प्रेरणकारी असर ही पड़ सकता था, न कि संकुचनकारी प्रभाव।

संक्षेप में यह बाइडेन का पैकेज इस अप्रामाणिक पूर्व-धारणा पर आधारित है कि, राजकोषीय उपायों से अर्थव्यवस्था को उत्प्रेरित करने की केन्सवादी नीति पर तब भी चला जा सकता है, जब केन्स की इस शर्त को अनदेखा किया जा रहा हो कि, ‘सबसे बढक़र वित्त को राष्ट्रीय होना चाहिए।’ यह अप्रामाणिक पूर्व-धारणा खुद इस विभ्रम से निकलती है कि वित्तीय पूंजी की आवाजाही पर कोई अंकुश लगाए बिना ही, समग्रता में विश्व अर्थव्यवस्था उस सुदीर्घ संकट से उबर सकती है, जिसमें नवउदारवादी पूंजीवाद ने उसे ठेल दिया है। दूसरे शब्दों में यह कि विश्व आर्थिक गतिविधि के स्तर के  लिए, वित्तीय पूंजी के वर्चस्व से वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन, यह तो हो सकता है कि अमरीका के हाथ वित्तीय पूंजी के वर्चस्व से बंधे हुए नहीं हों या यह भी हो सकता है कि उन्नत देशों के शासन आर्थिक गतिविधि का स्तर बढ़ाने के लिए आपस में तालमेल कर के काम कर सकते हों, लेकिन तीसरी दुनिया के देश इतने सौभाग्यशाली नहीं होंगे। होना तो यह चाहिए कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में ऐसा बदलाव किया जाए, जहां अब वैश्वीकृत हो चुकी वित्तीय पूंजी के सामने, राष्ट्र-राज्यों अपनी स्वायत्तता फिर से हासिल कर सकें, लेकिन बाइडेन का पैकेज तो बस यह मानकर चलता है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में रहते हुए, ऐसे केन्सवादी मांग प्रबंधन पर लौटा जा सकता है, जिससे सभी देशों को फायदा होगा।

बाइडेन का पैकेज बेशक सदाशयतापूर्ण है और उसे विकसित देशों के वामपंथ का समर्थन हासिल है। लेकिन, इस वामपंथ को तीसरी दुनिया के देशों की दुर्दशा के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील होने की भी जरूरत है। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Biden’s Package -- Well-Meaning but Will Accentuate Global Divide

Biden package
IMF
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Global Inequalities

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