NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जीएचएमसी चुनाव: तेलंगाना के चुनावी इतिहास में एक चिंतनीय मोड़ 
ये अभी भी शुरुआती लक्षण हैं, लेकिन जीएचएमसी चुनाव के नतीजे निर्वाचन क्षेत्रों के 'मुस्लिम सीट' और 'हिंदू सीट' की स्थायी लेबलिंग के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते है। चिंता की बात ये है कि अगर भारत में यह एक नई और सामान्य धारणा है, तो अलग मतदाताओं के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग... ' 
नीलांजन मुखोपाध्याय
09 Dec 2020
Translated by महेश कुमार
gd

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के चुनाव नतीजे तेलंगाना के चुनावी इतिहास और भारतीय जनता पार्टी का दक्षिणी भारत में एक महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभरने का खास क्षण है। इस चुनाव का राजनीतिक प्रभाव भारत के अन्य हिस्सों में भी महसूस किया जाएगा, क्योंकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाली ताकतों को जनता के इस फैसले से बढ़ावा मिलेगा। 

इन नतीजों से कई निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, लेकिन इन नतीजों की सबसे मनहूस बात ये है कि बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति राज्य के लोगों के बीच एक गहरी पैठ बना रही है जिसे तेलंगाना राष्ट्र समिति ने दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत से जीता था। क्षेत्रीय पार्टी ने पिछले साल भी लोकसभा चुनावों में काफी हद तक अपनी बढ़त बनाए रखी थी और 17 में से नौ सीटें जीती थी, जबकि भाजपा ने 4 सीटें जीतीं थी। कांग्रेस हाशिए पर चली गई और संसदीय चुनावों में केवल तीन सीटें जीतीं थी, जबकि पार्टी ने जीएचएमसी में सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल की है।

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि मेयर पद को पाने के लिए अब टीआरएस को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन के समर्थन पर निर्भर रहना होगा। नतीजतन, भाजपा अपने इस तर्क को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगी कि उसके विरोधी या तो मुसलमानों का 'तुष्टिकरण' करते हैं, या ऐसे नेताओं का साथ देते हैं जो मुख्यधारा के धर्मनिरपेक्ष दलों के भीतर 'दबाव समूहों' के रूप में निरअर्थक काम करते हैं। ये नेता, भाजपा के बड़े नेताओं के मुताबिक, ऐसे  दलों से हैं जो विशेष रूप से मुस्लिम पहचान की राजनीति की रक्षा करते हैं और समुदाय की खास सुरक्षा सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं। एआईएमआईएम नेता, असदुद्दीन ओवैसी की गिनती कुछ ऐसे ही नेताओं में की जाती है।

जीएचएमसी चुनावों में भाजपा की सीटें 4 से बढ़कर 48 हो गई जो अपने आप में एक नाटकीय वृद्धि है, हिंदुत्ववादी बयानबाजी करना, पुराने हैदराबाद निर्वाचन क्षेत्रों में अपने आधार को  एआईएमआईएम के बराबर रखना जहां खासकर मुसलमानों की भारी उपस्थिति है अपने आप में  उल्लेखनीय है। जबकि एआईएमआईएम हमेशा से अल्पसंख्यक अधिकारों और उनकी चिंता करने वाली  मुसलमानों के प्रमुख तबकों की समर्थित पार्टी रही है, भाजपा का धर्म के आधार पर प्रचार अभियान और उसको मिला समर्थन जुड़वां शहर में एक हिंदू वोट बैंक के उद्भव का संकेत है।  इसका मतलब यह है कि यदि मुसलमान अपनी खुद की एक पार्टी बना सकते हैं, तो हिंदुओं के पास भी ऐसी पार्टी होनी चाहिए जो समुदाय के हितों की बेजा नक़ल करती हो, जिसमें हिंदुओं की गूंज सुनाई दे। 

गौरतलब बात यह है कि भाजपा ने लाल बहादुर नगर और सिकंदराबाद जोन के वार्डों में से लगभग दो-तिहाई सीटें जीती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने यहां दिसंबर 2019 में अपने समर्थकों की एक रैली को संबोधित किया था।

जुलूस इस क्षेत्र के कई इलाकों से गुजरा, जो एक विधानसभा क्षेत्र भी है। शहर में ताकत के प्रदर्शन ने आरएसएस के उस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति बिना किसी विश्वास की परवाह किए पहले हिंदू है। संघ के संगठन के पास इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से कैडर का एक ठोस नेटवर्क भी है, जिसे एआईएमआईएम के पीछे मुस्लिम लामबंदी के हवाले से तैयार किया जाता है। 

जबकि एल.बी. नगर क्षेत्र में भाजपा की जीत आरएसएस के नेटवर्क की वजह से हुई है, लेकिन सिकंदराबाद में जीत एक चुनावी ब्लॉक के उभरने का संकेत देती है जिसमें हैदराबाद के बाहर के लोगों का भी अच्छा-खासा समर्थन हासिल है- यहाँ तक कि तेलंगाना भी बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति का अनुमोदन करता दिखाई देता देते हैं। गौरतलब है कि भाजपा नेतृत्व ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे, 'गो वोकल फॉर लोकल' को बिल्कुल अलग ही संदर्भ में ले लिया और गृह मंत्री अमित शाह से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और कई केंद्रीय मंत्री मतदाताओं को रिझाने के लिए तैनात कर दिए गए। उदाहरण के लिए, यूपी के मुख्यमंत्री ने हैदराबाद के नाम को भाग्यनगर में बदलने की स्थानीय रूप से भावनात्मक मांग का इस्तेमाल किया, एक मांग जो अभी तक केवल फ्रिंज समूहों द्वारा उठाई जाती रही थी।

जीएचएमसी के परिणाम इस बात का संकेत भी देते हैं कि अब राज्य के गठन में टीआरएस की भूमिका के कारण उसे चुनावों में फायदा नहीं मिलेगा। ये परिणाम राजनीतिक दलों की उन राजनीतिक सीमाओं का भी संकेत देते हैं जो एक बड़े राज्य में से अलग राज्य बनाने की कवायद करते हैं। जबकि टीआरएस लंबे समय से तेलंगाना बनाने की वकालत का फायदा उठाती रही है लेकिन यह पहला चुनाव है जब लोग आंशिक रूप से सरकार के काम के आधार पर अपना मन बना रहे थे।

जब तक कुछ बदल नहीं जाता, तब तक तेलंगाना में भविष्य के राजनीतिक समीकरण उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की तरह रहने की संभावना है, जहां कांग्रेस के हाशिए पर जाने के कारण बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस के विकल्प के रूप में भाजपा का उदय हुआ है।

जीएचएमसी के परिणाम इस बात का भी संकेत देते हैं कि अब राज्य के गठन में इसकी भूमिका के कारण टीआरएस को चुनावी फायदा नहीं मिलेगा। ये परिणाम राजनीतिक दलों की उन सीमाओं का भी संकेत हैं जो एक बड़े राज्य में से अलग राज्य की कवायद हैं। जबकि टीआरएस लंबे समय से तेलंगाना के बनने की अपनी वकालत से राजनीतिक फायदा उठाता रहा है लेकिन यह पहला चुनाव था जहां लोग आंशिक रूप से सरकार के काम के आधार पर अपना मन बना रहे थे।

भाजपा को मुख्य रूप से टीआरएस की कीमत पर लाभ मिला है जो उपरोक्त दिए कारणों से हुआ है। लेकिन पार्टी की एआईएमआईएम के गढ़ में सेंध लगाने का असमर्थता पार्टी के   समर्थन में आई मजबूती का सुझाव देती है। एआईएमआईएम के प्रदर्शन को बिहार में, और पहले महाराष्ट्र में उसे मिले लाभ के चश्मे से देखा जाना चाहिए। पार्टी अब अगले साल पश्चिम बंगाल में होने चुनावों में लड़ने की रणनीति बना रही हैं।

इससे पता चलता है कि एआईएमआईएम अपनी ताक़त को बढ़ा रही है क्योंकि उसका मानना है कि मुस्लिम हितों को धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दलों के भीतर बने दबाव समूहों से संरक्षित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हर बार वे हिंदुओं के समर्थन खोने के प्रति ही चिंतित रहते हैं। इसके विपरीत, हाशिए वाली हिंदू जातियों के अलावा, उदाहरण के लिए, बिहार में अति-दलित जातियाँ, जिनकी आवाज़ ज्यादातर कोई भी पार्टी नहीं उठती है, एआईएमआईएम हिंदुओं के वोट की जगह उनका वोट चाहती है।

राजनीतिक दलों, सांसदों, विधानसभाओं और मंत्रालयों जैसी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व में लगातार गिरावट आई है, समुदाय की दुर्बलता और सामाजिक अलगाव ने मुस्लिमों के गैर-कुलीन तबकों को अलग बस्तियों में रहने पर मजबूर कर दिया है। यह घटना मुसलमानों की गरिमा और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर गैर-भाजपा दलों की दुविधा, अन्य राज्यों में एआईएमआईएम और इसी तरह की अन्य पार्टियों के 'मुस्लिम पार्टियां' बनने की स्थिति को मज़बूत करेगी।

मुस्लिम समुदाय के भीतर पैदा की जा रही समरूपता और इसका इन दलों के पीछे जाना, भाजपा को मुस्लिम इकट्ठा हो रहे के कुप्रचार को बढ़ाने में मदद करेगा। ये अभी भी शुरुआती संकेत हैं, लेकिन जीएचएमसी के नतीजे निर्वाचन क्षेत्रों की 'मुस्लिम सीटों' और 'हिंदू सीटों' की स्थायी लेबलिंग की दृष्टि को आगे बढ़ाता है। चिंता की बात यह है कि अगर भारत में यह एक सामान्य बात है, तो विशिष्ट संख्या में आरक्षित सीटों के अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को उठाया जा सकता है। 

हिंदू राष्ट्रवादियों ने दशकों पहले संविधान सभा में बहस के दौरान धर्म के आधार पर सीटों के आरक्षण की मांग का विरोध किया था, लेकिन आज की राजनीति औरर हालत में भाजपा इस दृष्टिकोण की प्रशंसक हो सकती है। इसके लिए मुस्लिमों का तिरस्कार और उन्हे नीचा दिखाना जारी रहेगा। 

लेखक और पत्रकार, मुखोपाध्याय की पुस्तकों में नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स और द आरएसएस: आइकन्स ऑफ द इंडियन राइट शामिल हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

GHMC Polls: A Watershed Moment in Telagana’s Electoral History

Telangana
GHMC 2020
haiderabad
BJP
TRS
Asaduddin Owaisi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • हिमाचल : सीटू ने सरकार से टैक्सी व अन्य निजी परिवहन सेवाओं में कार्यरत लोगों की आर्थिक मदद की मांग की
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल : सीटू ने सरकार से टैक्सी व अन्य निजी परिवहन सेवाओं में कार्यरत लोगों की आर्थिक मदद की मांग की
    02 Jun 2021
    सीटू राज्य कमेटी ने कोरोना के कारण मासिक किस्त न चुका पाने वाले संचालकों की गाड़ियों को सरकारी, निजी बैंकों व फाइनेंस कम्पनियों द्वारा जब्त करने के घटनाक्रम की कड़ी निंदा की है व इसे अमानवीय करार दिया…
  • rbi
    अजय कुमार
    आरबीआई तो सरकार को बचा रहा है लेकिन क्या सरकार भी आरबीआई को बचा रही है?
    02 Jun 2021
    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 99,122 करोड़ रुपये भारत सरकार को अपने सरप्लस से देने का एलान किया है। ...जिस तरह से नोटबंदी के लिए आरबीआई को पूरी तरह से अनसुना कर फैसला लिया गया, उसी तरह का संबंध सरकार और…
  • बिहार : पंचयती चुनाव टले लेकिन पंचायतों की ज़िम्मेदारी अधिकारियो को सौंप जाने को लेकर विपक्ष का विरोध
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : पंचयती चुनाव टले लेकिन पंचायतों की ज़िम्मेदारी अधिकारियों को सौंप जाने को लेकर विपक्ष का विरोध
    02 Jun 2021
    बिहार में कोरोना संक्रमण को देखते हुए पंचायत चुनाव को टाल दिया गया है। लेकिन बिहार सरकार के इस निर्णय को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है सरकार आपद में अवसर देखकर सारी शक्ति अपने पास ले…
  • सोनिया यादव
    यूपी: कस्तूरबा विद्यालयों में 9 करोड़ का कथित घोटाला, बेसिक शिक्षा मंत्री की बर्ख़ास्तगी की मांग
    02 Jun 2021
    कोरोना संकट के दौरान राज्य में जब ये स्कूल बंद थे, तब भी सरकारी अधिकारी खर्च दिखाकर पैसे निकालते रहे। कुल 18 कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के खातों से साल 2020-21 के सत्र के लिए तकरीबन 9 करोड़…
  • अवनि बंसल
    काफ़ी नहीं है रामदेव की माफ़ी, दंडनीय अपराध है उनका एलोपैथी पर दिया बयान
    02 Jun 2021
    अवनि बंसल लिखती हैं योग गुरू और व्यापारी बाबा रामदेव ने हाल में एलोपैथी को खारिज़ करते हुए विवादास्पद बयान दिया था। लेकिन अपने बयान से वापस जाते हुए सिर्फ़ माफ़ी मांगना ही काफ़ी नहीं है। अवनि बंसल उन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License