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जीडीपी पर आईटी सेल का ऐसा झूठ कि आप माथा पकड़ कर बैठ जाएं  
जीडीपी के माइनस में पहुंच जाने पर अर्थव्यवस्था के मोर्च पर बुरी तरह घिरी सरकार का बचाव किस तरह किया जाए? इसलिए अब यह तर्क गढ़ा जा रहा है कि जीडीपी-जीडीपी कुछ नहीं होती, इसका घटना-बढ़ना सब बकवास है और अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों के चौंचले हैं।
अजय कुमार
09 Sep 2020
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“जब आप टूथपेस्ट खरीदते हैं तो जीडीपी बढ़ती है लेकिन किसी गरीब से दातून खरीदते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती। ”

 ऐसे झूठे गढ़े गए तर्क आईटी सेल द्वारा सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म पर फैलाए जा रहे हैं। दरअसल इस बार जीडीपी नकारात्मक यानी माइनस में चली गई है। -23.9%. अब इसे लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से सवाल पूछे जा रहे हैं। उसकी आलोचना हो रही है। पहले ही कोरोना से ठीक ढंग से न निपटने और बेरोज़गारी को लेकर सरकार सवालों के घेरे में है। यही वजह है कि अब सरकार का बचाव किस तरह किया जाए। तो अब यही तर्क गढ़ा जा रहा है कि जीडीपी-जीडीपी कुछ नहीं होती, सब बकवास है। अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों के चौंचले हैं।

 व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों पर सर्कुलेट हो रहे इस मैसेज में किसी का नाम नहीं है, लेकिन आज ऐसे तर्क किसे और क्यों गढ़ने की ज़रूरत आन पड़ी है यह सभी बखूबी समझ सकते हैं। इस संदेश में अंत में अपनी मूल संस्कृति की तरफ लौटने के आह्वान के साथ ‘वंदे मातरम्’ कहकर बात ख़त्म कर दी गई है। किसी व्यक्ति या संस्था का नाम क्यों नहीं दिया गया, इससे भी यही साबित हो जाता है कि सारे तर्क झूठ पर आधारित हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए गढ़े गए हैं। लिखने और भेजने वाला इसे जानता है और किसी भी कार्रवाई, पूछताछ या सवालों से बचने के लिए वह परदे के पीछे छुप गया है।  

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 आज हालात ये हैं कि एक तरफ सच को मिला हुआ छोटा सा स्पेस है और दूसरी तरफ झूठ का अंबार खड़ा किया जा रहा है। सच लिखने वाले जब ऐसे तर्कों को पढ़ते हैं तो माथा पकड़ कर बैठ जाते हैं और सोचने लगते हैं कि ऐसे झूठ से लड़ने का क्या तरीका होगा? हर बार सच के सामने ऐसे झूठ गढ़ कर परोस दिए जाएंगे? अगर यही बात है तो ऐसे झूठ से कितना लड़ा जा सकता है। लेकिन लड़ना तो होगा।

 जीडीपी जैसी शब्दावलियां भारत की 90 फ़ीसदी से अधिक आबादी के समझ के बाहर हैं। वजह यह नहीं है कि वह समझना नहीं चाहते। वजह यह है कि जिस संस्था को ऐसी बातों को लेकर जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई थी वह सुशांत सिंह राजपूत, क्रिकेट बॉलीवुड जैसी चीजों मैं लोगों को फंसा कर अपनी कमाई करने के जुगाड़ में लगी रहती है इसलिए आम लोगों को इनकी समझ नहीं हो पाती है। आम लोगों में इन चीजों को लेकर दिलचस्पी पैदा करने की कोशिश नहीं की जाती है।

 मीडिया के पास तमाम संसाधनों और तरीके हैं कि वह बहुत आसानी से जीडीपी जैसी सामान्य की बातों को आम लोगों तक बहुत आसानी से पहुंचा दे लेकिन मीडिया ऐसा काम नहीं करती। अपनी जिम्मेदारी से बिल्कुल कन्नी काटकर वह केवल समाज की छाया में अपना बाजार लगाने का हुनर जानती है। नहीं तो जीडीपी की अवधारणा में ऐसा कुछ भी नहीं है कि आम लोग इसे समझ ना पाए। जो आम लोग सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती की पूरी जिंदगी पर विश्लेषण कर रहे हैं वह लोग उस जीडीपी के बारे में क्यों नहीं समझ सकते जिसकी उनकी जिंदगी में बहुत अधिक अहमियत है।

 झूठ का कारोबार वहीं होता है जहां पर जानकारियों का दायरा बहुत कम होता है। जैसे कि लोगों को जीडीपी का फुल फॉर्म तो पता होता है। वह झट से बता भी देंगे कि जीडीपी यानी ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट, हिन्दी में सकल घरेलू उत्पाद। लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता की जीडीपी होती क्या है? इसका कैलकुलेशन कैसे किया जाता है? इससे देश के लोगों का जीवन कैसे प्रभावित होता है?

 इस वैचारिक पृष्ठभूमि के बाद अब सिलसिलेवार ढंग से ‘गुमनाम’ आईटी सेल द्वारा प्रसारित किए जा रहे मैसेज के सभी तर्कों की छानबीन करते हैं। 

 1. जब आप टूथपेस्ट खरीदते हैं तो जीडीपी बढ़ती है परंतु किसी गरीब से दातून खरीदते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती!

पड़ताल- यह तर्क पूरी तरह से गलत है। जिस किसी ने भी इस तर्क को लिखा है उसने पूरी बेईमानी के साथ इस तरह गढ़ा है। बेईमानी इसलिए की है क्योंकि उसे पता है कि सामने वाले को यह नहीं पता की जीडीपी होती क्या है? अगर परिभाषा के अनुसार देखा जाए तो देश की सीमा के भीतर एक वित्त वर्ष के अंदर उत्पादित कुल सेवाओं और सामानों के कुल बाजार मूल्य को जीडीपी कहते हैं। इस आधार पर देखा जाए तो आदर्श तौर पर टूथपेस्ट का मूल्य और दातून का मूल्य दोनों जीडीपी के अंदर आ सकते हैं। लेकिन दातून का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। टूथपेस्ट का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसलिए टूथपेस्ट की गणना जीडीपी में कर ली जाती है लेकिन दातून कि नहीं। अब तो आप कहेंगे कि तर्क तो सही है। इस तर्क को बेईमान क्यों कहा जा रहा है? तो इसे ऐसी समझिए कि मान लीजिए कि केवल टूथपेस्ट बेचकर कोई अपनी जिंदगी चलाता है और कोई केवल दातून बेचकर अपनी जिंदगी चलाता है। इसका मतलब है कि जब तक टूथपेस्ट और दातून बिकेगा नहीं तब तक जिंदगी चलेगी नहीं। और जिंदगी चलाने के लिए केवल टूथपेस्ट और दातून के बलबूते तो चलती नहीं है। इनका घर होगा, इन्हें अपना पेट पालने के लिए अनाज खरीदना या उपजाना होगा, पहनने के लिए कपड़े की जरूरत होगी। इसलिए कहीं न कहीं इनके पैसे का इस्तेमाल जीडीपी बढ़ाने या घटाने में होगा ही होगा। इसलिए अगर दातून अधिक बिकेगा तो जीडीपी अधिक बढ़ेगी टूथपेस्ट अधिक बिकेगा तो जीडीपी अधिक बढ़ेगी। टूथपेस्ट और दातून मिलेगा नहीं तो न जीडीपी बढ़ेगी और न ही इनकी जिंदगी बेहतर होगी। इसलिए आज तक की जब आप टूथपेस्ट खरीदते हैं तो जीडीपी बढ़ती है परंतु किसी गरीब से दातून खरीदते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती है पूरी तरह से आम लोगों को बरगलाने वाला तर्क है।

 ठीक है ऐसे ही यह सारे तर्क झूठ हैं कि जब आप किसी हॉस्पिटल में जाकर 500 रुपये की दवाई खरीदते हैं तो जीडीपी बढ़ती है लेकिन आप अपने घर में गिलोय नीम या गोमूत्र से अपना इलाज करते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती है। जब आप अपने घर में सब्जियां उगा कर खाते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती, परंतु जब किसी बड़े ऐसी मॉल में जाकर 10 दिन की बासी सब्जी खरीदते हैं तो जीडीपी बढ़ती है। यह सारे तर्क झूठे गढ़े गए तर्क हैं। आईटी सेल इनका जमकर इस्तेमाल कर रहा है। इन आईटी सेल वालों से पूछना चाहिए कि क्या ऐसा होता है कि एक व्यक्ति अपनी जिंदगी की सारी जरूरतें अपने यहां ही पूरा कर लेता है। ठीक है कि किसी के द्वारा नीम लगाने से उसकी खुजली ठीक हो जाए। वह अस्पताल ना जाए। लेकिन उसकी दूसरी जरूरतों का क्या? अगर नीम पर उसे इतना ही भरोसा है तो वह नीम का बिजनेस स्टार्ट कर दे। जो पैसे आएंगे उनका इस्तेमाल तो उसे दूसरी जगह करना पड़ेगा। नीम से कमाई होगी तो एक व्यक्ति अपने जीवन को चलाने के लिए दूसरे सामान को खरीदेगा तब जीडीपी प्रभावित होगी। एक इंसान की जरूरतें दूसरों पर टिकी हुई होती हैं। 

 एक इंसान खुद ही गाय रख ले, गाय का दूध निकाल ले, गाय बीमार पड़े तो इलाज करवा ले, डॉक्टर बन जाए, डॉक्टर कर खुद का इलाज कर ले, मास्टर बन जाए मास्टर बनकर खुद को पढ़ा ले, खुद ही घर बना ले रोड बना ले, पुल बना ले, बिजली बनाने लगे ऐसा तो नहीं हो सकता न। दुनिया सब के सहयोग से चलती है। सबकी उसमें जरूरत होती है। सबका उसमें हिस्सा होता है। ऐसे ही समाज बनता है। इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था की वह विधा बनती है जिसमें सबको संसाधनों का बंटवारा करने की कोशिश की जाती है।

 अब जो आईटी सेल द्वारा जीडीपी को बचाने के लिए कोको कोला, कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड का उदाहरण दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इनसे जीडीपी बढ़ती है लेकिन लोग बीमार होते हैं इसलिए जीडीपी बुरी चीज है। यह ठीक ऐसा ही तर्क है जैसे बेरोजगारों को नौकरी देने के नाम पर भाजपा के आईटी सेल के झूठ के कारोबार में लगा दिया जाता है। ठीक ऐसे ही है जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सांप्रदायिक संगठन को लोग हिंदू धर्म का नुमाइंदा मान लेते हैं। ठीक ऐसे ही है जैसे शादी में लड़का लड़की बात नहीं करते हैं और घर वाले शादी तय कर देते हैं। ठीक ऐसे ही है जैसे जाना जम्मू कश्मीर है और यात्रा केरल की कर ली जाए। कहने का मतलब यह है कि बेसिर पैर का तर्क है। अगर कोल्ड ड्रिंक, जंक फूड से लोग मरे जा रहे हैं तो आईटी सेल द्वारा सरकार से कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड पर बैन लगाने की मांग की जानी चाहिए। न कि यह झूठा तर्क आना चाहिए कि इनसे डॉक्टरी को बढ़ावा मिलता है, इंश्योरेंस को बढ़ावा मिलता है, इन सब का असर जीडीपी के घटने और बढ़ने पर पड़ता है। इसीलिए यह सब बने हुए हैं। यह पूरी तरह से मूर्खों वाली बात हुई। अब इस मूर्खता का क्या तर्क दिया जाए।

 जीडीपी के कैलकुलेशन में एक देश के अंदर उत्पादित सभी सेवाओं और सामानों के बाजार मूल्य को शामिल किया जाता है। जब सभी कहा जा रहा है तो इसका साफ मतलब है कि इसे मापने में जरूरी सामान से लेकर किसी के लिए गैर जरूरी सामान तक सब शामिल किया जाता है। जैसे आईटी सेल वाले जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक को जीडीपी में शामिल कर रहे हैं ठीक वैसे ही उन्होंने जिस मोबाइल पर यह मैसेज लिखा होगा वह मोबाइल भी जीडीपी में शामिल होता है। जिस स्कूल से पढ़कर शिक्षा ली होगी उसी स्कूल के टीचर की सैलरी भी जीडीपी में शामिल होती है। जिस घर में वो रहते हैं, उस घर में लगने वाले सीमेंट और सरिया का दाम भी जीडीपी में शामिल होता है।

 जीडीपी को आम आदमी को समझाने के लिए इस मैसेज में यह परिभाषा दी गई है कि जो पैसा आप लिखित में आदान-प्रदान करते हैं वह अगर हम जोड़ ले तो जीडीपी बनती हैं। आम आदमी को समझाने के लिए दी गई परिभाषा पूरी तरह से सही नहीं है। और जो चीज इरादतन गलत बोली जाती है। वह पूरी तरह से झूठ होती है।

 जीडीपी का मतलब होता है एक वित्तीय वर्ष में एक देश की सीमा के अंदर उत्पादित कुल सेवाओं और सामानों का बाजार मूल्य। यानी जीडीपी के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि वह खास वर्ष से जुड़ी हुई होती है। दूसरी शर्त यह है की सामानों और सेवाओं का उत्पादन देश की सीमा के अंदर होना चाहिए। और तीसरी शर्त यह है कि इसमें किसी को छोड़ा नहीं जाता बल्कि सब को शामिल करने की कोशिश की जाती है। ऐसा नहीं होता कि एग्रीकल्चर छोड़कर केवल कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड को शामिल किया जाए। चूंकी गणना उन्हीं की हो पाएगी जो लिखित में होते हैं इसलिए रिकॉर्डेड लेनदेन की अहमियत होती है। तभी सरकार हर लेनदेन काग़ज़ पर चाहती है और हर खरीदारी का बिल लेने पर ज़ोर दिया जाता है। जीएसटी लगाने के पीछे भी यही तर्क दिया गया था।

 लेकिन जीडीपी को लेकर फैलाए जा रहे झूठे मैसेज पढ़कर सामान्य इंसान यह निष्कर्ष निकालेगा कि टूथपेस्ट, जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक यह सारे धंधे पैसा कमाने के धंधे हैं। और जीडीपी में इन्हें ही शामिल किया जाता है इसलिए जीडीपी की गणना पूरी तरह से गलत है। एक आम इंसान को बहकाने के लिए इस तरह की बेबुनियाद और बेवकूफाना बात रखी जाती है। पैसे केवल संसाधनों को मापने का तरीका है। पारिश्रमिक है। पैसे पेड़ में नहीं उगते। पैसे कमाए जाते हैं। पैसे सामानों और सेवाओं की कीमत होती है। अपने झूठे तर्क को प्रभावी बनाने के लिए पैसे का बड़े ही बुरे ढंग से आईटी सेल ने इस्तेमाल किया है।

कई तरह के विरोधाभास होते हुए भी यह बात पूरी तरह साबित है कि अगर जीडीपी के आंकड़े लगातार सुस्‍त होते हैं तो ये देश के लिए खतरे की घंटी मानी जाती है। जीडीपी कम होने की वजह से लोगों की औसत आय कम हो जाती है। लोग ग़रीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। इसके अलावा नई नौकरियां पैदा होने की रफ्तार भी सुस्‍त पड़ जाती है। आर्थिक सुस्‍ती की वजह से छंटनी की आशंका बढ़ जाती है। वहीं लोगों की बचत और निवेश भी कम हो जाता है। यही सब आज हो रहा है। इससे खतरनाक समय भी आने वाला है। क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था केवल ख़तरे में नहीं आई है बल्कि गड्ढे में गिर चुकी है।
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आप इस मैसेज का निष्कर्ष पढ़िए - अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों के चोचले हैं। हम मानवतावादी व्यवस्था को प्रोत्साहित करें। लौटे अपने मूल संस्कृति की ओर, पर्यावरण प्रकृति का सम्मान हो। अब यह निष्कर्ष पूरी तरह से झूठ की प्रकाष्ठा, बेवकूफी की हदों को पार करता हुआ निष्कर्ष है। ऐसे निष्कर्ष पढ़कर कोई माथा पीट ले। इतना कुछ बता दिया है अब आप खुद ही निष्कर्ष निकालिए कि इस बेवकूफी का क्या तर्क दिया जाए?

 इस निष्कर्ष का एक लाइन में समझिए कि एक इंसान के पास पेट और दिमाग होता है। इन दोनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति है। इन सबके बीच मानवतावादी व्यवस्था बनाने के लिए अर्थव्यवस्था पूंजीपति संस्कृति पर्यावरण जैसे सभी पहलुओं की जायज व्याख्या करने की जरूरत होती है। और सभी की जरूरत है। इसलिए जीडीपी के आंकड़ों की जरूरत होती है। ताकि आपको पता चल पाए करोड़ों लोगों की भीड़ में मानवतावादी व्यवस्था पनप भी रही है या नहीं। अगर नहीं पनप रही है तो जायज़ नीतियों योजनाओं के द्वारा मानवतावादी व्यवस्था बनाने की कोशिश की जाए। इस जीडीपी का प्रतिकार अगर आईटी सेल द्वारा इस तरह से किया जाएगा तो यह पूरी तरह से साबित होगा कि ऐसे लोगों का मकसद मानवतावादी व्यवस्था बनाने में नहीं बल्कि मनुष्य को बर्बाद कर केवल अपना मुनाफा कमाने में है।

 कुल मिलाकर इस वायरल मैसेज का मकसद, सार या स्वर यही है कि जीडीपी, अर्थव्यवस्था, बेरोज़ागरी ये कोई समस्या नहीं है। देश में सब ठीक है, सब चंगा सी। और सरकार से कोई सवाल न किया जा

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