NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
चांद पर पहुंचता भारत और सीवर में मरते सफाईकर्मी
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल के शुरुआती छह महीनों में देश के सिर्फ आठ राज्यों में 50 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है।
अमित सिंह
28 Jul 2019
Manual Scavenging
सांकेतिक तस्वीर

एक तरफ तकनीक की दुनिया में हम इतना आगे बढ़ गए हैं कि चांद पर अतंरिक्ष यान भेज रहे हैं तो दूसरी तरफ तकनीक और सुरक्षा के अभाव में अब भी सफाई कर्मचारी सीवर में अपनी जान गवां रहे हैं। 


हाल ही में जारी किए गए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) के आकंड़ों के मुताबिक इस साल के शुरुआती छह महीनों में देश के सिर्फ आठ राज्यों में 50 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। एनसीएसके के अनुसार कि ये आंकड़े सिर्फ आठ राज्यों पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और तमिलनाडु के हैं।


आयोग खुद स्वीकार कर रहा है कि राज्यों ने मरने वाले कर्मचारियों की संख्या कम करके दिखाई है। सफाई कर्मचारी आयोग को जो आंकड़े राज्य सरकारों ने दिए हैं, उन्हीं को आधिकारिक तौर पर शामिल किया है।


उदाहरण के तौर पर दिल्ली सरकार की ओर से दी गई जानकारी में इस साल एक जनवरी से 30 जून के बीच मरने वाले सफाई कर्मचारियों की संख्या तीन बताई गई है जबकि वास्तविक आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हैं। पिछले महीने जून में ही दिल्ली जल बोर्ड की सीवर की मरम्मत और सफाई का काम रहे तीन मजदूरों की मौत का आंकड़ा इसमें शामिल नहीं किया गया है। 
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने पिछले हफ्ते संसद में अपनी एक रिपोर्ट भी पेश की थी। इसमें आयोग ने स्वच्छ भारत अभियान को सिर्फ शौचालयों के निर्माण तक सीमित नहीं करने बल्कि इसके माध्यम से मैला ढोने वाले सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास भी किए जाने की मांग की है।


वहीं, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष जाला ने मैनुअल स्केवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम के रूप में रोजगार का निषेध अधिनियम 2013 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसमें कर्मचारियों को नियुक्ति देने वाली संस्थाओं को मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की बात कही गई है। आयोग की रिपोर्ट में रेलवे को निशाना बनाकर कहा गया है कि रेलवे ही सबसे ज्यादा सफाई कर्मचारियों को काम पर रखता है और मैनुअल स्केवेंजिंग की समस्या रेलवे में सबसे अधिक है।
आपको बता दें कि देश में 1993 में मैनुअल स्केवेंजिग पर देश में रोक लगा दी गई है और 2013 में कानून में संशोधन कर सीवर और सैप्टिक टैंक की मैनुअल सफाई पर रोक को भी इसमें जोड़ दिया गया है।


लेकिन इसके बावजूद मैनुअल स्केवेंजिग पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के ही एक आंकड़े के मुताबिक जनवरी 2017 से पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हर पांच दिन में औसतन एक आदमी की मौत हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 2014-2018 के दरम्यान सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करते हुए 323 मौतें हुई हैं। 1993 से अब तक 817 कर्मचारियों की मौत सीवर की सफाई करते हुए हो चुकी है।


वहीं, एक दूसरी निजी संस्था सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक आंकड़े के मुताबिक पिछले पांच साल में ये आंकड़ा 1,470 मौतों का है।
आपको बता दें कि सीवर सफाई के दौरान मरने वाले कर्मचारियों के परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान है लेकिन मुआवजा देने के मामले में ज्यादातर राज्यों का रिकॉर्ड बहुत खराब है।
इतना ही नहीं पिछले हफ्ते लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले ने बताया कि पिछले तीन सालों में 88 सफाई कर्मचारियों की मौत सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करते हुए हो गई है, जबकि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगा हुआ है। 


इतना ही नहीं मंत्री ने यह भी बताया कि प्रतिबंधित होने के बावजूद इस तरह के मामले में किसी को सजा मिली है यह जानकारी किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से सामने नहीं आई है।
मंत्री के बयान से यह साफ है कि सफाई कर्मचारियों की लगातार हो रही मौत और किसी को भी सजा नहीं मिलने के चलने का मतलब है कि प्रतिबंधित करने वाले अधिनियम को ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया है।  


जबकि आपको बता दें कि 'मैनुअल स्केवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम के रूप में रोजगार का निषेध अधिनियम 2013' के तहत स्थानीय प्रशासन और जिलाधिकारी को अधिनियम लागू करने के लिए शक्तियां प्रदान की गई हैं। 
हालांकि इसके उलट 2014 में ह्यूमन राइट वाच ने :क्लीनिंग ह्यूमन वेस्ट: मैनुअल स्कैवेंजिंग, कास्ट एंड डिस्क्रिमिनेशन इन इंडिया' नामक रिपोर्ट में यह दावा किया है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत और समर्थन के कारण बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न राज्यों में स्थानीय अधिकारी न केवल प्रासंगिक कानूनों को लागू करने में विफल रहते हैं, बल्कि स्वयं भी मैला ढोने वालों को नियुक्त करके कानून का सीधे उल्लंघन करते हैं।


हाल ही में सीवर सफाई के दौरान मौतों पर गंभीर रुख अपनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को आप सरकार और विभिन्न प्राधिकारों से हलफनामा दायर करके यह बताने को कहा कि वे हाथ से सेप्टिक टैंक और सीवर साफ करने के लिए लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काम पर रखते हैं या नहीं।


अदालत ने हलफनामे में हाथ से सीवर सफाई के काम पर रोक और उनके पुनर्वास से संबंधित कानून के अनुपालन की जानकारी भी देने को कहा।
अदालत ने कहा कि लोगों की मौत दिखाती है कि प्राधिकार कानून का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और अगर मौतें हुई हैं तो किसी को तो जेल जाना होगा। अदालत हाथ से सीवर सफाई करने वालों के पुनर्वास के लिए 2007 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 


इस पूरे मामले पर सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और रेमन मैगसैसै अवार्ड विजेता समाजसेवी बेजवाड़ा विल्सन का मानना है कि इस दिशा में एक व्यापक सोच का अभाव है। सीवेज की सफाई के लिए मजदूरों को बिना उपकरण के उतारा जा रहा है। हम तमाम आंकड़े सरकार को मुहैया करा रहे हैं लेकिन किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है।


उन्होंने कहा,'सिर पर मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए 2013 में आए कानून और 2014 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश पर भी अब तक अमल नहीं हुआ। इसमें केंद्र और सभी राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं। इस संदर्भ में हमने बहुत कोशिश की है, लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है।'

Labour Right
Labour
Manual Scavengers
Sanitation Workers
NCSK
delhi jal board

Related Stories

चिली की नई संविधान सभा में मज़दूरों और मज़दूरों के हक़ों को प्राथमिकता..

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन

यूपीः योगी सरकार में मनरेगा मज़दूर रहे बेहाल

दिल्ली में मज़दूरों ने अपनी मांगों को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के ख़िलाफ़ हड़ताल की

दिल्ली सरकार के विश्वविद्यालय से निकाले गए सफ़ाईकर्मी, नई ठेका एजेंसी का लिया बहाना

उत्तराखंड में स्वच्छता के सिपाही सड़कों पर, सफाई व्यवस्था चौपट; भाजपा मांगों से छुड़ा रही पीछा

मध्य प्रदेश: महामारी से श्रमिक नौकरी और मज़दूरी के नुकसान से गंभीर संकट में


बाकी खबरें

  • Hijab Verdict
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुसलमानों को अलग थलग करता है Hijab Verdict
    17 Mar 2022
  • fb
    न्यूज़क्लिक टीम
    बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल
    17 Mar 2022
    गैर लाभकारी मीडिया संगठन टीआरसी के कुमार संभव, श्रीगिरीश जलिहाल और एड.वॉच की नयनतारा रंगनाथन ने यह जांच की है कि फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल होने दिया। मामला यह है किसी भी राजनीतिक…
  • Russia-Ukraine war
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या है रूस-यूक्रेन जंग की असली वजह?
    17 Mar 2022
    रूस का आक्रमण यूक्रेन पर जारी है, मगर हमें इस जंग की एक व्यापक तस्वीर देखने की ज़रूरत है। न्यूज़क्लिक के इस वीडियो में हमने आपको बताया है कि रूस और यूक्रेन का क्या इतिहास रहा है, नाटो और अमेरिका का…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    झारखंड में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीज़ों का बढ़ता बोझ : रिपोर्ट
    17 Mar 2022
    कैग की ओर से विधानसभा में पेश हुई रिपोर्ट में राज्य के जिला अस्पतालों में जरूरत के मुकाबले स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी का खुलासा हुआ है।
  • अनिल जैन
    हिटलर से प्रेरित है 'कश्मीर फाइल्स’ की सरकारी मार्केटिंग, प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक
    17 Mar 2022
    एक वह समय था जब भारत के प्रधानमंत्री अपने समय के फिल्मकारों को 'हकीकत’, 'प्यासा’, 'नया दौर’ जैसी फिल्में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे और आज वह समय आ गया है जब मौजूदा प्रधानमंत्री एक खास वर्ग…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License