NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चार साल का सफर: भाजपा से मोजपा
चार साल पहले टीवी डिबेट्स के दौरान मैं कभी-कभार शरारत से भाजपा के बजाय मोजपा ( मोदी जनता पार्टी ) कह दिया करता था। भाजपा के प्रवक्ता जाहिर है कि कैमरे के सामने प्रतिवाद करते थे, जोर से झल्लाते थे, लेकिन उनमें से दो-एक बाद में चिंता भी प्रकट करते थे।
पुरुषोत्तम अग्रवाल
28 May 2018
BJP
Image Coutesy: NDTV.com

नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के काम-काज पर सबसे रोचक टिप्पणी पिछले सप्ताह की गयी। जिन सज्जन ने यह टिप्पणी की, उन्हें ध्यान में रखें तो टिप्पणी रोचक के साथ दुखभरी भी लगेगी। पिछले दिनों इंदौर में, भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और वर्तमान में भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य श्री मुरली मनोहर जोशी से पत्रकारों ने पूछा, ‘ आप मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर, इसके काम के आधार पर कितने नंबर देंगे?’

‘नंबर तो तब दिये जाएँ, जब कॉपी में कुछ लिखा हो।’ जोशीजी के इस जबाव ने बहुत कुछ कह भी दिया और पत्रकारों को लाजबाव भी कर दिया।

जिन्हें आजकल भक्त कहा जाता है, वे इस उत्तर को जाहिर है कि जोशीजी की कुंठा कह कर निबटा देंगे, जैसे यशवंत सिन्हा के असंतोष को निबटाते रहे हैं। इन भक्तों की भीड़ को वाकई मोदीजी की उपलब्धि कहा जा सकता है। समर्थक ( और अंध-समर्थक भी) हर नेता के, बल्कि किसी भी सेलिब्रिटी के होते ही हैं, लेकिन अपने ‘नायक’ के पक्ष से विरोधी ही नहीं, खुद अपने घर के लोगों से गाली-गलौज की हद तक भिड़ने को तैयार समर्थक (‘भक्त’) हरेक के नसीब में नहीं होते।

मोदीजी को अपने नसीब का बड़ा साफ अहसास है। दिल्ली विधानसभा के चुनाव के दौरान उन्होंने उस वक्त पेट्रोल की कम कीमतों का कारण अपने नसीब को ही बताया था। वोट भी यही कह कर माँगे थे कि नसीब वाले के होते कम नसीब को क्यों चुनें दिल्ली वाले? यह दीगर बात है कि दिल्ली के वोटर ने ज्यादा और कम नसीब की परवाह किये बिना वोट डाले। लेकिन मोदीजी की खुशनसीबी की सचाई से इंकार करना तो नामुमकिन है।

यह खुशनसीबी बाकायदा गढ़ी गयी है। नरेंद्र मोदी की इमेज बिल्डिंग में पेशेवर विज्ञापन एजेंसियों का योगदान तो रहा ही है, साथ ही इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के भी बड़े हिस्से की भूमिका विज्ञापन एजेंसी जैसी ही रही है। मीडिया के इस मोदी-युग में मीडिया सरकार से सवाल करने के बजाय सरकार की ओर से जबाव देने की भूमिका निभा रहा है। सरकार भी नहीं, सारी भक्ति एक व्यक्ति—प्रधान मंत्री मोदी—के प्रति ही है।

मोदीजी की खुशनसीबी नहीं तो क्या है कि जैसी गलतियाँ बच्चे भी नहीं करते, वैसी गलतियाँ लगातार करने के बावजूद मीडिया में उनसे सवाल पूछने वाले कम ही हैं। वे कह दें कि नेहरू ने करिअप्पा और थिमैया का अपमान किया, वे भगतसिंह से मिलने तक नहीं गये। मीडिया ऐसी नितांत बेतुकी बातों पर सवाल उठाने के बजाय वफादारी से प्रचार करने लगता है। मोदीजी शी जिंग पिंग से शिखर वार्ता करते वक्त स्ट्रेंग्थ शब्द की “व्याख्या” करने लगें, वह भी गलत स्पेलिंग के आधार पर तो न केवल वाट्सऐप यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट बल्कि ‘जाने-माने पत्रकार’ भी लहालोट होते नजर आते हैं। मजे की बात तो यह है कि कुछ ‘सबाल्टर्न’ इतिहासकार भी जो अभी कुछ दिन तक पहले तक मायावती, फिर राहुल गाँधी के सलाहकार हुआ करते थे, दलित आंदोलनों के इतिहासकार हुआ करते थे, मायावती के जीवनीकार हुआ करते थे, आज नरेंद्र मोदी की भाषण-कला पर मुग्ध हो कर कह रहे हैं, “नरेंद्र मोदी के भाषणों को सुनें, तो उनमें महाभारत के मुहावरे , स्थानीय भाषा की गूंज दिखती है।नए भारत के स्वप्न इन सांस्कृतिक पाठों से जुड़कर उन्हें लोकप्रियता देते हैं।"

यह खुशनसीबी नहीं तो क्या है कि विज्ञापन एजेंसियों और कारपोरेट द्वारा रची गयी फर्जी लोकप्रियता का ऐसा महिमामंडन घनघोर अस्मितावादी “क्रांतिकारी” करें। नरेंद्र मोदी के भाषण कैसे-कैसे सांस्कृतिक पाठ रचते हैं, इसके उदाहरण वे स्वयं हर दो-चार दिन में पेश कर देते हैं। कभी सिकंदर को बिहार तक पहुँचा कर तो कभी श्यामाप्रसाद मुखर्जी का निधन लंदन में करवा कर।

लेकिन खुशनसीबी तो फिर भी है। सरकार चलते चार साल हो गये, दो करोड़ सालाना की दर से रोजगार का वादा पकौड़े तलने की सलाह में बदल गया; पंद्रह लाख रुपये जुमले में बदल गये, स्मार्ट सिटी सरकारों की स्मार्टनेस के प्रमाण में। स्वदेशी की तान वालमार्ट को टेरते न्यौते का रूप ले गयी, डालर की कीमत मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों की उम्र से होड़ लेने लगी। सामूहिक हत्याओं ( लिंचिंग) की खबरें आम लगने लगीं, हत्या करते हुए वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालने वाले नायक माने जाने लगे—लेकिन समर्थकों में से अभी भी बहुत से हैं कि जमे ही हुए हैं।

नरेंद्र मोदी इस लिहाज से भी विशिष्ट हैं कि उन्हें भाजपा का चरित्र बदलने का श्रेय जाता है। भाजपा की राजनीति जैसी भी है, अब तक उसकी छवि ऐसी काडर बेस्ड पार्टी की रही है जिसमें किसी व्यक्ति को संगठन से बड़ा होने की इजाजत नहीं दी जाती।भाजपा की कंट्रोलिंग अथॉरिटी यानि आरएसएस ने यह सबक सिखान में किसी नेता का लिहाज नहीं किया कि नेता विशेष नहीं, संगठन ही बड़ा होता है। यह बात बलराज मधोक और अटलबिहारी वाजपेयी से लेकर उमा भारती और कल्याण सिंह तक के बारे में सच है।

मोदीजी के समर्थक ( या ‘भक्त’) जैसी चाहें, प्रतिक्रिया दें, सचाई यही है कि मोदीजी को आगे बढ़ाने वाला आरएसएस भी अब जैसे उन पर निर्भर करने लगा है। आडवानी, यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी की बेचैनी और असुविधा का अर्थ समझने का अर्थ यह नहीं है कि इन लोगों को कोई क्लीन चिट दी जा रही है। लेकिन यह बेचैनी महत्वपूर्ण है, केवल आरएसएस के लिए ही नहीं, सारे राजनैतिक तंत्र के लिए। कोई व्यक्ति संगठन से भी बड़ा हो जाए, और सरकार से भी। उसे परवाह हो तो केवल अपने कारपोरेट मित्रों की—यह वाकई चिंता की बात है।

चार साल पहले टीवी डिबेट्स के दौरान मैं कभी-कभार शरारत से भाजपा के बजाय मोजपा ( मोदी जनता पार्टी ) कह दिया करता था। भाजपा के प्रवक्ता जाहिर है कि कैमरे के सामने प्रतिवाद करते थे, जोर से झल्लाते थे, लेकिन उनमें से दो-एक बाद में चिंता भी प्रकट करते थे।

चार साल में मोदीजी की “उपलब्धियाँ” तो खैर बहुत हैं, इनमें से कुछ का उल्लेख ऊपर किया भी गया है। इन्हीं में से एक बड़ी उपलब्धि यह भी है पिछले चार सालों में भाजपा बहुत तेजी से मोजपा बनने की राह पर चली है।

Courtesy: The Citizen,
Original published date:
26 May 2018
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • poonam
    सरोजिनी बिष्ट
    यूपी पुलिस की पिटाई की शिकार ‘आशा’ पूनम पांडे की कहानी
    16 Nov 2021
    आख़िर पूनम ने ऐसा क्या अपराध कर दिया था कि पुलिस ने न केवल उन्हें इतनी बेहरमी से पीटा, बल्कि उनपर मुकदमा भी दर्ज कर दिया।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी : जनता बदलाव का मन बना चुकी, बनावटी भीड़ और मेगा-इवेंट अब उसे बदल नहीं पाएंगे
    16 Nov 2021
    उत्तर-प्रदेश में चुनाव की हलचल तेज होती जा रही है। पिछले 15 दिन के अंदर यूपी में मोदी-शाह के आधे दर्जन कार्यक्रम हो चुके हैं। आज 16 नवम्बर को प्रधानमंत्री पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने…
  • Ramraj government's indifference towards farmers
    ओंकार सिंह
    लड़ाई अंधेरे से, लेकिन उजाला से वास्ता नहीं: रामराज वाली सरकार की किसानों के प्रति उदासीनता
    16 Nov 2021
    इस रामराज में अंधियारे और उजाले के मायने बहुत साफ हैं। उजाला मतलब हुक्मरानों और रईसों के हिस्से की चीज। अंधेरा मतलब महंगे तेल, राशन-सब्जी और ईंधन के लिए बिलबिलाते आम किसान-मजदूर के हिस्से की चीज।   
  • दित्सा भट्टाचार्य
    एबीवीपी सदस्यों के कथित हमले के ख़िलाफ़ जेएनयू छात्रों ने निकाली विरोध रैली
    16 Nov 2021
    जेएनयूएसयू सदस्यों का कहना है कि एक संगठन द्वारा रीडिंग सत्र आयोजित करने के लिए बुक किए गए यूनियन रूम पर एबीवीपी के सदस्यों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। एबीवीपी सदस्यों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कार्यक्रम…
  • Amid rising tide of labor actions, Starbucks workers set to vote on unionizing
    मोनिका क्रूज़
    श्रमिकों के तीव्र होते संघर्ष के बीच स्टारबक्स के कर्मचारी यूनियन बनाने को लेकर मतदान करेंगे
    16 Nov 2021
    न्यूयॉर्क में स्टारबक्स के कामगार इस कंपनी के कॉर्पोरेट-स्वामित्व वाले स्टोर में संभावित रूप से  बनने वाले पहले यूनियन के लिए वोट करेंगे। कामगारों ने न्यूयॉर्क के ऊपर के तीन और स्टोरों में यूनियन का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License