NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
चीनी क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार का पैकेज, केवल निजी मिलों को एक मीठा तोहफ़ा
किसान आन्दोलन ने मिलों के बकाये को सरकार द्वारा भुगतान के लिए सरकार की आलोचना की है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
08 Jun 2018
Sugar
Image Courtesy : Global Farmer Network

नरेंद्र मोदी सरकार ने बुधवार को "चीनी क्षेत्र के संकट" को हल करने के लिए 7,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है। पैकेज, जो तीन हिस्सों में विभाजित है, जिसमें केंद्र सरकार 1,175 करोड़ रुपये की लागत से एक वर्ष के लिए 30 एलएमटी चीनी का बफर स्टॉक तैयार करेगी शामिल है। अन्य दो घटक में चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य तय करना और इथेनॉल उत्पादन के लिए अतिरिक्त स्टॉक के इस्तेमाल तय करना हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि निवेश की जाने वाली राशि पर्याप्त है और क्या अकेले धन संरचनात्मक हस्तक्षेप की अनुपस्थिति में इस क्षेत्र की समस्याओं को हल कर सकता है।

प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, "इस योजना के तहत प्रतिपूर्ति त्रैमासिक आधार पर की जाएगी जिसे मिलों की तरफ से किसानों के खातों में सीधे उनके गन्ना मूल्य बकाया राशि के खिलाफ जमा किया जाएगा।" न्यूनतम समर्थन मूल्य 29 रुपये प्रति किलोग्राम होगा। कीमतों को नियंत्रण में रखने का इरादा, चीनी मिलों के लिए अधिकतम उत्पादन कोटा भी तय करता है।

गन्ना के अतिरिक्त स्टॉक की खपत को बढ़ाने के लिए, केंद्र गर्म बॉयलर स्थापित करके चीनी मिलों से जुड़ी डिस्टिलरीज को अपग्रेड करेगा। मिलों में नई डिस्टिलरीज भी स्थापित की जाएंगी। सरकार चीनी मिलों को 1,332 करोड़ रुपये के ब्याज का बोझ उठाने में भी मदद करेगी और बैंकों से तीन साल की अवधि में 4,440 करोड़ रुपये के ऋण में मदद करेगी।

उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा के उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अपमानजनक हार का सामना करने के कुछ दिन बाद ही यह पैकेज आया है। हार का एक महत्वपूर्ण योगदान गन्ना किसानों की तकलीफ को माना जा रहा है, जो अभी भी अपनी फसलों के दाम के लिए मिलों से भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस पैकेज़ से मिलों को काफी लाभ होगा। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सहारनपुर के एक गन्ना किसान अरुण राणा ने कहा, "मुझे 31 दिसंबर तक बेची गई फसल के लिए भुगतान प्राप्त हुआ है। लेकिन मैं अभी भी मई तक बेचे गए उत्पादों के भुगतान का इंतजार कर रहा हूं। चीनी मिलें सरकार पर दबाव दाल रही हैं यह कहकर कि वे मिसिबत में हैं और इसलिए भुगतान नहीं कर सकती हैं। साथ ही, हम यह भी देखते हैं कि उनके मुनाफे में वृद्धि हुई है। वर्षों में उनकी पूंजी और आरक्षित निधि में वृद्धि हुई है। "

उन्होंने कहा कि देरी से भुगतान की स्थिति में, मिलों को किसानों को ब्याज देना था, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं किया जाता है। उन्हें आशा थी कि पैकेज के कुछ फायदे किसानों को भी मिलेंगे लेकिन उन्होंने कहा कि सहकारी समितियों की भूमिका सहित उद्योग के साथ कई ढांचागत मुद्दे भी हैं जो चिनत का विषय हैं।

सहकारी समितियां खरीद प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। किसानों को सीधे मिलों को बेचने की अनुमति नहीं है। उन्हें अपनी सहकारी समितियों से संपर्क करने की जरूरत होती है, जो बदले में, उन्हें सरकारी उत्पादन पर मिलों को अपने उपज की बिक्री को अधिकृत करने के लिए स्लिप्स जारी करते हैं। एक किसान, पर्ची के बिना, अक्सर इन दरों के नीचे अपने उपज बेचने के लिए मजबूर हो जाता है। इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं, बिना किसी उत्पाद के स्लिप्स/पर्ची प्राप्त किए बिना। फिर ये व्यक्ति किसानों को भारी कीमत के लिए अपनी पर्ची बेचते हैं।

कई किसानों के पास एंटीलोप्स और जंगली सूअरों द्वारा विनाश के जोखिम के कारण चावल या गेहूं जैसी अन्य फसलों को लगाने का विकल्प भी नहीं है। राणा ने कहा कि गन्ना किसानों के लिए भी आर्थिक है क्योंकि बुवाई की लागत दूसरे और तीसरे वर्ष में शून्य है क्योंकि यह कटाई के समय उथल-पुथल नहीं है। इस प्रकार, किसान एक चक्र में जकड जाते हैं जिससे बचाना मुश्किल होता है।

अखिल भारतीय किसान सभा की केंद्रीय समिति के सदस्य डी पी सिंह ने कहा कि चीनी मिलों के मालिकों को सरकार से लाभ प्राप्त हुए थे, लेकिन किसानों को उनकी देनदारियों का भुगतान नहीं किया था। वर्तमान पैकेज का जवाब देते हुए, उन्होंने कहा कि यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि चीनी मिलों को पूरे भारत में किसानों को 23,000 करोड़ रुपये का भुगतान करने की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में अकेले बकाया राशि (13,367 करोड़ रुपये) है।

सिंह ने कहा कि मिलें उपज का अधिग्रहण करती हैं लेकिन सरकार भुगतान करती है, जो निश्चित रूप से एक अच्छी मिसाल नहीं है।

चीनी उद्योग
उत्तर प्रदेश
चीनी मिल
मोदी सरकार
कैराना

Related Stories

किसान आंदोलन के नौ महीने: भाजपा के दुष्प्रचार पर भारी पड़े नौजवान लड़के-लड़कियां

उप्र बंधक संकट: सभी बच्चों को सुरक्षित बचाया गया, आरोपी और उसकी पत्नी की मौत

नागरिकता कानून: यूपी के मऊ अब तक 19 लोग गिरफ्तार, आरएएफ और पीएसी तैनात

सत्ता का मन्त्र: बाँटो और नफ़रत फैलाओ!

जी.डी.पी. बढ़ोतरी दर: एक काँटों का ताज

5 सितम्बर मज़दूर-किसान रैली: सबको काम दो!

रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है

लातेहार लिंचिंगः राजनीतिक संबंध, पुलिसिया लापरवाही और तथ्य छिपाने की एक दुखद दास्तां

माब लिंचिंगः पूरे समाज को अमानवीय और बर्बर बनाती है

अविश्वास प्रस्ताव: दो बड़े सवालों पर फँसी सरकार!


बाकी खबरें

  • up
    न्यूज़क्लिक टीम
    शिक्षक उम्मीदवारों ने योगी सरकार को दी 2022 के लिए चुनौती
    07 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक ने इस ग्राउंड रिपोर्ट में लखनऊ में जून 2021 से चल शिक्षक उमीदवारों के विरोध प्रदर्शन में शामिल उमीदवारों से बात की| दरअसल, 2019 उत्तर प्रदेश शिक्षक प्रवेश परीक्षा में 69,000 सहायक…
  • Abahlali
    पवन कुलकर्णी
    अबहलाली बेस के नवनिर्वाचित महासचिव मजोंडोलो का संकल्प: "हम प्रतिरोध करेंगे"
    07 Dec 2021
    अपने ज़बरदस्त दमन के दौरान भी अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए आयोजित होती रहने वाली अबहलाली बेस मजोंडोलो की इस कांग्रेस ने दक्षिण अफ़्रीका के झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे लोगों के इस आंदोलन को लेकर…
  • Omicron
    संदीपन तालुकदार
    ओमिक्रॉन: प्राथमिक अध्ययन के मुताबिक दोबारा हो सकता है कोरोना संक्रमण
    07 Dec 2021
    एंटीबॉडी, ओमिक्रॉन पर कैसे हमला करती हैं, अभी इसे देखने के लिए परीक्षण चल रहे हैं और आने वाले हफ़्ते में इनके जारी होने की संभावना है।
  • democracy
    डॉ. राजू पाण्डेय
    संविधान दिवस की गूंज और लोकतंत्र को कमज़ोर करने के सुनियोजित प्रयास
    07 Dec 2021
    फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदी जी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज…
  • Sudha Bharadwaj
    भाषा
    एल्गार परिषद मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सुधा भारद्वाज की ज़मानत के ख़िलाफ़ एनआईए की याचिका ख़ारिज की
    07 Dec 2021
    न्यायमूर्ति यू यू ललित, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने एनआईए की दलीलों पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘हमें उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License