NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चुनाव 2019 : भाजपा के लिए इस बार मालवा-निमाड़ बचाना कठिन?
मालवा-निमाड़ भाजपा का गढ़ रहा है। 2014 में उसे यहां आठ में से आठ सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन इस बार हालत ये है कि उसे 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार बदलने पड़े हैं। ऊपर से प्रज्ञा ठाकुर के बयान ने उसके लिए नई मुसीबत पैदा कर दी है।
राजु कुमार
17 May 2019
Madhya Pradesh

पिछले लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश उन राज्यों में शुमार था, जहां से भाजपा को अधिक सीटें मिली थी। प्रदेश की 29 सीटों में से27 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। लेकिन महज एक साल बाद ही 2015 में रतलाम-झाबुआ सीट पर हुए उप चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। उस चुनाव में मिली जीत से उत्साहित कांग्रेस ने राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू कर दी और 2018 में 15 सालों से सत्ता पर काबिज भाजपा को मध्य प्रदेश में सत्ता से बेदखल कर दिया। विधानसभा चुनावों में मालवा-निमाड़ में कांग्रेस को अपेक्षा से ज्यादा सीटों पर जीत मिली। इस क्षेत्र की 64 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 35 सीटें हासिल हुई थी। भाजपा के गढ़ के रूप में चर्चित इस क्षेत्र में भाजपा कमजोर पड़ती जा रही है। भाजपा अपनी कमजोर स्थिति से पहले ही चिंतित थी और ऐन चुनाव के वक्त प्रज्ञा ठाकुर द्वारा आगर-मालवा में नाथूराम गोड्से को देशभक्त कह दिए जाने के बाद भाजपा इस क्षेत्र के चुनाव में बैकफुट पर आ गई।

malwa_niamr_lok_sabha_election - courtesy Jagran.jpg

मालवा-निमाड़ क्षेत्र में कुल आठ लोकसभा सीटें हैं। इनमें धार, खरगोन एवं रतलाम-झाबुआ सीट अनुसूचित जनजाति सीटें हैं। दो सीटें उज्जैन एवं देवास अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, तो तीन अन्य सीटें इंदौर, खंडवा एवं मंदसौर सामान्य हैं। 2014 में इन आठों सीटों पर भाजपा को जीत मिली। इस क्षेत्र के आदिवासियों के बीच लंबे समय से आरएसएस सक्रिय रहा है, जिसकी वजह से भाजपा को लाभ मिलता रहा है। लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में यह साफ हो गया कि आरएसएस की सक्रियता के बावजूद मतदाताओं का भाजपा से मोह भंग हो गया। 2014 की तरह करिश्माई जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने इन 8 में से 6 सीटों पर नए चेहरे उतारे हैं। विकास के मुद्दों पर ज्यादा बात करने के बजाय भाजपा राष्ट्रवाद पर जोर दे रही है, ताकि प्रत्याशियों के बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित किया जा सके। यही वजह है कि इस क्षेत्र में नरेन्द्र मोदी की कई सभाएं की गई। दूसरी ओर कांग्रेस विकास के मुद्दों पर बात करने के साथ-साथ किसानों की कर्ज माफी पर ज्यादा जोर दे रही है। कांग्रेस को उम्मीद है कि इस क्षेत्र में विधानसभा चुनावों की तरह ही उसका प्रदर्शन बेहतर होगा।

इंदौर लोकसभा सीट से भाजपा ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का टिकट काट दिया। इस क्षेत्र में भाजपा के इस निर्णय का नकारात्मक असर पड़ा। यही वजह है कि इंदौर में प्रधानमंत्री मोदी को टिकट से वंचित सुमित्रा महाजन की तारीफ में कसीदे पढ़ने पड़े। इंदौर में टिकट बदलाव के बाद कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा की इस परंपरागत सीट को हासिल कर लेगी। विधानसभा चुनावों में यहां की 8 सीटों में से कांग्रेस ने 4 पर जीत हासिल की थी। धार लोकसभा सीट को देखा जाए, तो यहां विधानसभा चुनाव परिणामों के आधार पर भाजपा पिछड़ती हुई नजर आ रही है। मालवा के आदिवासी अंचल में जय आदिवासी युवा शक्ति यानी जयस का प्रभाव बहुत ज्यादा रहा है। विधानसभा चुनावों में जयस के राष्ट्रीय नेता एम्स के पूर्व डॉक्टर हीरालाल अलावा ने कांग्रेस को समर्थन देते हुए कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। जयस का साथ मिलने से कांग्रेस न केवल धार सीट पर बल्कि अन्य जगहों पर ही बेहतर स्थिति में है। खंडवा सीट पर कांग्रेस के अरुण यादव और भाजपा के नंदकुमार चौहान के बीच टक्कर है। ये दोनों अपनी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं।

मंदसौर जिला देश में कार्फी चर्चित रहा है। यहां भाजपा के शासन काल में किसानों पर हुई पुलिस फायरिंग के बाद 6 किसानों की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद देश भर में किसान आंदोलन सुर्खियों में आ गया। विधानसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस को जीत की पूरी उम्मीद थी, लेकिन किसान आंदोलन के बाद सरकार की छवि खराब होने के बावजूद भाजपा ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया। इस लोकसभा में आने वाली 8 में से 7 विधानसभा सीटों पर भाजपा काबिज है। यद्यपि यहां से भाजपा की जीत में मतों का अंतर काफी कम रह गया। प्रदेश सरकार द्वारा किसानों की कर्ज माफी पर अमल शुरू कर दिए जाने के बाद कांग्रेस को इस सीट से ज्यादा उम्मीद है। खरगोन लोकसभा सीट में आने वाली 8 विधानसभा सीटों में 6 पर कांग्रेस काबिज है। यहां से एक निर्दलीय विधायक कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। जयस और निर्दलीय विधायक के समर्थन के बाद कांग्रेस यहां मजबूत दिख रही है।

रतलाम-झाबुआ क्षेत्र से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया मैदान में हैं। मोदी लहर में केन्द्र में मंत्री रह चुके भूरिया चुनाव हार गए थे, लेकिन उप चुनाव में इन्होने फिर जीत हासिल कर ली। इसके पहले भी वे झाबुआ से 4 बार सांसद रह चुके हैं। इस दिग्गज आदिवासी नेता को हराने के लिए भाजपा ने अपने मौजूदा विधायक जीएस डामोर को टिकट दिया है। इस क्षेत्र के सबसे बड़े मुद्दे पर दोनों की दलों का रवैया बेहतर नहीं है। पलायन और सिलिकोसिस की बीमारी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा सवाल है। ऐसे में यहां का मुकाबला भी आसान नहीं दिख रहा है। 

देवास और उज्जैन लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। देवास से कांग्रेस ने विख्यात कबीरपंथी लोक गायक पद्मश्री प्रह्लाद टिपाणिया को टिकट दिया है। भाजपा ने भी जज की नौकरी छोड़ कर आए महेन्द्र सोलंकी को टिकट दिया है। ये दोनों ही राजनीति में नए हैं। भाजपा उम्मीदवार मोदी भरोसे हैं, तो कांग्रेस के टिपाणिया अपनी ख्याति को लेकर आशान्वित हैं। उज्जैन सीट का मुकाबला भी टक्कर का है। उज्जैन में भाजपा पिछला चुनाव 3 लाख से ज्यादा मतों से जीती थी, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में यह अंतर लगभग 70 हजार रह गया। भाजपा ने मौजूदा सांसद को टिकट नहीं दिया है। इस क्षेत्र की 8 में से 5 विधान सभा सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस आशान्वित है।

मालवा-निमाड़ के चुनाव को लेकर वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया का कहना है, ‘‘किसानों का मुद्दा, विस्थापन और पलायन का मुद्दा के साथ-साथ इस क्षेत्र में नर्मदा की लड़ाई भी एक अहम मुद्दा है। पिछले 15 सालों से प्रदेश में भाजपा की सरकार रही,लेकिन विस्थापन, पलायन पर कोई काम नहीं हुआ। पुनर्वास की लड़ाई भी लगातार चलती रही है। इस क्षेत्र में मजदूरों की आंदोलन भी लगातार चल रहा है। कई मामलों में इस क्षेत्र के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। इन सारे मसले को देखकर लगता है कि भाजपा के लिए इस बार मालवा-निमाड़ बचाना कठिन है।’’

malwa
Madhya Pradesh
BJP
2019 आम चुनाव
General elections2019
Modi
Narendra modi
Digvijay Singh
Congress
election 2014
sadhvi pragya thakur
Sadhvi Pragya

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • corona
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,778 नए मामले, 62 मरीज़ों की मौत
    23 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.05 फ़ीसदी यानी 23 हज़ार 87 हो गयी है।
  • moon
    संदीपन तालुकदार
    चीनी मिशन में इकट्ठा किये गये चंद्रमा के चट्टानों से शोध और नये निष्कर्षों को मिल रही रफ़्तार
    23 Mar 2022
    इस परिष्कृत चीनी चंद्र मिशन ने चीन और उसके बाहर दोनों ही जगहों पर पृथ्वी या उसके वायुमंडल से बाहर के चट्टानों पर शोध किया है। जानकार उम्मीद जता रहे हैं कि इससे हमें सौर मंडल के बारे में नयी-नयी…
  • bhagat singh
    हर्षवर्धन
    जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार
    23 Mar 2022
    भगत सिंह के जाति व्यवस्था के आलोचना के केंद्र में पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत है। उनके अनुसार इन दोनों सिद्धांतों का काम जाति व्यवस्था से हो रहे भीषण अत्याचार के कारण उत्पन्न होने वाले आक्रोश और…
  • bhagat singh
    लाल बहादुर सिंह
    भगत सिंह की फ़ोटो नहीं, उनके विचार और जीवन-मूल्यों पर ज़ोर देना ज़रूरी
    23 Mar 2022
    शहादत दिवस पर विशेष: भगत सिंह चाहते थे कि आज़ाद भारत में सत्ता किसानों-मजदूरों के हाथ में हो, पर आज देश को कम्पनियां चला रही हैं, यह बात समाज में सबसे पिछड़े माने जाने वाले किसान भी अपने आन्दोलन के…
  • भाषा
    साल 2021 में दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी : रिपोर्ट
    22 Mar 2022
    साल 2021 में वैश्विक स्तर पर वायु गुणवत्ता की स्थिति बयां करने वाली यह रिपोर्ट 117 देशों के 6,475 शहरों की आबोहवा में पीएम-2.5 सूक्ष्म कणों की मौजूदगी से जुड़े डेटा पर आधारित है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License