NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
झारखंड चुनाव में वामपंथ की चुनौतियाँ
इस बार के विधानसभा चुनाव में संयुक्त वाम गठबंधन के तहत सीपीआई ने 16, भाकपा माले ने 15, सीपीएम ने 10 और मासस ने 5 (कुल 46) सीटों पर वामपंथी उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे हैं।
अनिल अंशुमन
11 Dec 2019
वामपंथ

झारखंड विधान सभा का तीसरे और चौथे चरण का मतदान क्रमशः 12 और 16 दिसंबर को होना है। जिसमें प्रदेश के प्रमुख वामपंथी दल भाकपा माले और मार्क्सवादी समन्वय समिति को राजधनवार व निरसा की सीट को बरक़रार रखने के साथ-साथ बागोदर की सीट पर विनोद सिंह की वापसी की चुनौती है। सनद हो कि झारखंड राज्य गठन के पूर्व से ही बागोदर और निरसा सीट पर भाकपा माले और मार्क्सवादी समन्वय समिति के प्रत्याशी अधिकांशतः जीतते रहे हैं। राज्य गठन के बाद बनी झारखंड विधान सभा में भी इन सीटों से वामपंथी विधायकों की उपस्थिति लगातार बनी हुई है। हालांकि 2014 के विधान सभा चुनाव में भाकपा माले के विनोद सिंह भाजपा उम्मीदवार से कड़े मुक़ाबले में कुछ वोटों से पराजित हो गए थे। 

लंबे समय से उक्त तीनों सीटों के अलावा हज़ारीबाग़ ज़िले के बरकट्ठा, चतरा के सिमरिया, रामगढ़, रांची के सिल्ली, धनबाद के सिंदरी और संताल परगना के नाला व पलामू प्रमंडल के कई अन्य इलाक़े वामपंथी दलों के राजनीतिक कामकाज के मज़बूत इलाक़ों की हैसियत रखते रहें हैं और यहाँ विधायक भी जीतते रहें हैं।

इस बार के विधानसभा चुनाव में संयुक्त वाम गठबंधन के तहत सीपीआई ने 16, भाकपा माले ने 15, सीपीएम ने 10 और मासस ने 5 (कुल 46) सीटों पर वामपंथी उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे हैं।

सनद हो कि 2014 के विधानसभा चुनाव में राजधानवार सीट पर भाकपा माले प्रत्याशी राजकुमार यादव ने झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरंडी को और निरसा सीट पर मार्क्सवादी समन्वय समिति के अरूप चटर्जी ने भाजपा प्रत्याशी को पराजित किया था। कोयलाञ्चल के जाने माने मज़दूर–किसान नेता गुरुदास चटर्जी की शहादत के बाद अरूप चटर्जी ने कमान संभालते हुए पिछले दो चुनावों से लगातार जीत रहे हैं। वहीं, झारखंड विधानसभा में जनता व विपक्ष की सबसे बुलंद आवाज़ कहे जानेवाले चर्चित जननेता व भाकपा माले के केंद्रीय कमेटी सदस्य तथा बागोदर सीट पर लगातार चार बार जीत हासिल करनेवाले महेंद्र सिंह की शहादत के बाद उनकी परंपरा आगे बढ़ाते हुए विनोद सिंह ने भी दो बार जीत दर्ज की है।

उक्त तीनों विधानसभा सीटों समेत प्रायः सभी वामपंथी सीटों की सबसे अहम विशेषता रही है कि यहाँ के मतदाता चुनाव में सरकार के लिए नहीं वरन सदन में एक मज़बूत विपक्ष के लिए वामपंथी जनप्रतिधि का चुनाव करते हैं। इस लिहाज़ से इन सीटों पर सिर्फ़ राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के बीच ही मुक़ाबला नहीं होता है, बल्कि मतदाताओं के भी दो विचार–चिंतन के बीच सीधी टक्कर होती है। जो पूरे प्रदेश में फ़िलहाल किसी भी अन्य सीट पर नहीं परिलक्षित होता है। क्योंकि चालू पैटर्न यही है कि अधिकांश लोग सरकार बनाने के लिए ही वोट देने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं।

गिरडीह ज़िले के बागोदर–धनवार और आसपास के इलाकों के ग़रीब गुरबों व किसानों को संगठित कर महेंद्र सिंह ने भाकपा माले की क्रांतिकारी राजनीति को स्थापित किया। जबकि कोयला की राजधानी कहे जानेवाले धनबाद क्षेत्र में मज़दूरों और किसानों के सवालों के संघर्षों को राजनीतिक स्वर देने वाले गुरुदास चटर्जी ने निरसा क्षेत्र व अन्य इलाकों में ए.के राय स्थापित मार्क्सवादी समन्वय समिति को परवान चढ़ाया।

वर्तमान के भाजपा–एनडीए राज में प्रदेश के आदिवासियों पर हो रहे हमलों व राज्य दमन, जल–जंगल–ज़मीन व खनिज की लूट, भूख से हो रही मौतें, विस्थापन–पलायन, अकाल, मॉब लिंचिंग–सांप्रदायिक हिंसा, जेपीएससी घोटाला, पारा शिक्षक–मनरेगा व सहिया–सहायिका व सभी मानदेय कर्मियों के सवालों तथा राज्य में नागरिक-मानवाधिकार हनन जैसे विभिन्न ज्वलंत जन मुद्दों पर सबसे पहले वामपंथी दलों और उनके विधायकों को ही सक्रिय देखा गया। सदन में अधिक संख्या में नहीं होने के बावजूद वे भी वर्तमान सत्ता–शासन की जन विरोधी नीतियों व कार्यों के ख़िलाफ़ उसे पूरी सक्रियता से कठघरे में खड़ा करने में सतत सक्रिय रहें हैं।

लेफ्ट b.jpg

आज के दौर में लोकतांत्रिक राजनीति की अपनी जटिलता ही कही जाएगी है कि जनता से विश्वासघात और अवसरवाद करने का खेल खेलनेवाले सत्ताधारी दलों व नेताओं–प्रत्याशियों को ही अंततोगत्वा बहुसंख्य मतदाताओं का वोट मिल जाता है। इतना ही नहीं जो सामाजिक कार्यकर्ता सड़कों पर तो वामपंथी दलों और उनके विधायकों के साथ मिलकर अभियान चलाते हैं, चुनावों में इनके प्रत्याशी बनना भी नहीं पसंद करते हैं।

मसलन, खूंटी के इलाक़ों में जब अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत पत्थलगड़ी अभियान चला रहे बेक़सूर आदिवासियों पर भाजपा सरकार का राज्य दमन जारी था और विरोध की किसी भी आवाज़ पर देशद्रोह का मुक़दमा थोपा जा रहा था, प्रायः सारा विपक्ष चुप बैठा था तो वामपंथी दलों ने आगे बढ़ाकर मुखर विरोध किया था।

बहरहाल, फ़िलहाल 12 दिसंबर को होने वाला मतदान सामने है। इस चरण के प्रचार के तहत भी प्रधानमंत्री फिर आए और 9 दिसंबर को बरही व बोकारो की जन सभाओं को संबोधित किये। हमेशा की भांति विपक्ष को कोसते हुए अपनी सरकार द्वारा रेल लाइन व सड़क निर्माण को प्रदेश की जनता का वास्तविक विकास बताते हुए दोबारा सरकार में लाने की अपील की। हैरानी है कि रोज़ी–रोटी के संकटों से विदेशों तक में हर दिन हो रहे पलायन और सर्वाधिक पिछड़े इलाक़ों में दर्ज क्षेत्र के मतदाताओं के ज़रूरी जन मुद्दों के समाधान का कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया और धारा 370 और उनकी सरकार में हुए राम मंदिर निर्माण के फ़ैसले पर राजनीति की गई।

स्वस्थ लोकतांत्रिक तक़ाज़ों के लिहाज़ से उक्त संदर्भों में मतदाताओं के समक्ष एक प्रश्न तो अवश्य ही विचारणीय हो जाता है कि पाँच वर्षों के दौरान उनकी ज़िंदगी के सभी ज़रूरी सवालों पर जिस प्रकार से वामपंथी दल और उनके प्रतिबद्ध जन प्रतिनिधि–कार्यकर्ता सदन से लेकर सड़कों पर पूरी तत्परता से सक्रिय दिखाई देते हैं। आख़िर क्यों ऐसा होता है कि चुनावी प्रक्रिया के समय लोगों के वोट का हक़दार कोई और ही बन जाया करता है?

jharkhand elections
Jharkhand Assembly Elections
left
Left politics
left in jharkhand
challenges for left

Related Stories

बीजेपी और टीएमसी के 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जाल' में न फंसने की वाम की अपील


बाकी खबरें

  • सबरंग इंडिया
    सद्भाव बनाए रखना मुसलमानों की जिम्मेदारी: असम CM
    17 Mar 2022
    हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि एक करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्य में मुस्लिम आबादी का 35 प्रतिशत हैं, वे अब अल्पसंख्यक नहीं, बल्कि बहुसंख्यक हैं।
  • सौरव कुमार
    कर्नाटक : देवदासियों ने सामाजिक सुरक्षा और आजीविका की मांगों को लेकर दिया धरना
    17 Mar 2022
    कलबुर्गी, विजयपुरा, विजयनगर, रायचूर, दवेंगेरे, बागलकोट, बल्लारी, यादगीर और कोप्पल ज़िलों की लगभग 1500 देवदासियों ने पुनर्वास की मांग को लेकर बेंगलुरु शहर में धरना दिया।
  • UKRAIN
    क्लाउस उलरिच
    गेहूं के निर्यात से कहीं बड़ी है यूक्रेन की अर्थव्यवस्था 
    17 Mar 2022
    1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्रता मिलने के बाद, यूक्रेन का आर्थिक विकास भ्रष्टाचार, कैपिटल फ्लाइट और सुधारों की कमी से बाधित हुआ। हाल ही में हुए सुधारों से अब देश में रूस के युद्ध की धमकी दी जा रही…
  • भाषा
    दिल्ली हिंसा में पुलिस की भूमिका निराशाजनक, पुलिस सुधार लागू हों : पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह
    17 Mar 2022
    ‘पुलिस के लिये सबसे सशक्त हथियार नागरिकों का भरोसा एवं विश्वास होता है । नागरिक आपके ऊपर भरोसा तभी करेंगे जब आप उचित तरीके से काम करेंगे । ऐसे में लोगों को साथ लें । सामान्य जनता के प्रति संवेदनशील…
  • तान्या वाधवा
    कोलंबिया में राष्ट्रपति पद के दौड़ में गुस्तावो पेट्रो
    17 Mar 2022
    अलग-अलग जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक़ कोलंबिया में आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए प्रगतिशील नेता गुस्तावो पेट्रो पसंदीदा उम्मीदवार हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License