NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
छत्तीसगढ़: खनिज संपदा का लोगों को लाभ नहीं
राज्य के लोग गरीबी की जकड़ में फंसे हैं क्योंकि प्राकृतिक संसाधन का सारा लाभ कॉर्पोरेट की जेबों में जा रहा है।
सुबोध वर्मा
13 Nov 2018
Translated by महेश कुमार
chattisgarh mining
चट्टी बरिआतु खदान

छत्तीसगढ़ के लोग एक और राज्य विधानसभा और सरकार का चुनाव करने जा रहे हैं, लेकिन सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने एक महत्वपूर्ण सवाल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है कि वे राज्य के समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के बारे में क्या करने जा रहे हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि खनिजों, भूमि और पानी के अनियंत्रित निजी शोषण का वर्तमान मॉडल, और जंगलों की अंधी लूट ही उनका पसंदीदा मॉडल है। इसलिए इसे बदलने की उनकी कोई योजना नहीं है।

याद रखें: छत्तीसगढ़ में 28 खनिजों के भण्डार हैं जिसमें शामिल हैं 52 अरब टन कोयले (भारत के कुल जमा कोयले का 18 प्रतिशत), 2.7 अरब टन उच्च गुणवत्ता वाला लौह अयस्क (भारत के कुल जमा लौह का 19 प्रतिशत), और 37 प्रतिशत से अधिक आइरन अउर जमा है साथ ही बॉक्साइट, चूना पत्थर, डोलोमाइट, क्वार्टजाइट इत्यादिI साल 2016-17 में राज्य से 23,339 करोड़ रुपये की खनिज संपदा निकाली गई थी।

राज्य के लोगों को इससे क्या मिला? नीचे दिए गए चार्ट पर एक नज़र डालें जो खनिजों के मूल्य और पिछले कुछ वर्षों से राज्य सरकार द्वारा अर्जित किए राजस्व के मूल्य को दिखाता है।

Chhattisgarh mines 1.jpg

जैसा कि देखा जा सकता है कि इन खनिजों का लगभग सिर्फ 16-17 प्रतिशत मूल्य सरकारी ही खज़ाने में जाता है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स के मुताबिक बाकी खज़ाना वे लुटेरी कंपनियों हड़प गयीं जिन्हें 2016 तक 24,000 हेक्टेयर खनन ब्लॉक के पट्टे दिए गए थे।

भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने वर्षों यह धारणा बना दी है कि यह सामान्य बात है। निजी संसाधनों को पट्टे नही देंगे तो प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कैसे किया जाएगा जो खनिजों को निकालने और उन्हें संसाधित करने के लिए संसाधनों को एकत्रित करते हैं? लेकिन यह एकमात्र रास्ता नहीं है!

इस पर विचार करें: प्राकृतिक संसाधनों को निकालने के काम को प्रबंधित किया जा सकता था – वह भी अधिक टिकाऊ तरीके से - राज्य एजेंसियों द्वारा ताकि इसका लाभ सीधे लोगों तक पहुंच सके। आखिरकार, निजी क्षेत्र के लिए मौजूदा फ़ितूर के शुरू होने से पहले भी भारत कोयले और लौह और अन्य सभी खनिज संसाधनों को खनन कर रहा था।

इससे अतिरिक्त लाभ मिल सकता था: इसके नीचे खनिजों के समृद्ध भंडारों को प्राप्त करने के लिए भूमि से लोगों के जबरन विस्थापन को भी शायद रोका जा सकता थाI यह प्रक्रिया निश्चित रूप से ज़्यादा जवाबदेह होती और इस पर नज़र रखना भी आसान होता।

लेकिन वर्तमान में, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राज्य सरकार (जो राज्य पर तब से शासन कर रही है जब से यह मध्य प्रदेश से अलग होकर एक अलग राज्य बना)  की इच्छा है कि वह उस दुर्लभ संपदा को शक्तिशाली निजी संस्थाओं को खुश करने के लिए सभी नियमों और कानूनों को तोड़ दे और गरीबों से उनकी ज़मीन छीन लेI

शायद, राज्य सरकार सामाजिक क्षेत्र (शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि) या सामान्य विकास कार्यक्रमों पर काफी कुछ खर्च कर रही है? लेकिन सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) पर सामाजिक क्षेत्र के व्यय पर आरबीआई के आंकड़ों पर एक सरसरी नज़र डालने से पता चलता है कि पिछले कई वर्षों से यह खर्च लगभग 11-12 प्रतिशत पर अटक गया है। इसलिए, पिछले दशक में छत्तीसगढ़ में खनन और सीमेंट फक्ट्रियों की वजह से यहाँ की अर्थव्यवस्था में जो 10% की बढ़ोत्तरी हुई है उससे यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि गरीबी से बेहाल राज्य के अंदरूनी क्षेत्रों को कोई राहत मिली होI नया रायपुर, निश्चित रूप से, एक स्मार्ट शहर बनने के रास्ते पर है (जो भी इसका मतलब है!) लेकिन दूर आदिवासी गांवों और दलित बस्तियों के लोगों के जीवन में कोई बदलाव नहीं है।

छत्तीसगढ़ ने कृषि उत्पादन के मामले में भी अच्छा प्रदर्शन किया है, फिर भी इसके किसान क्रोध से भरे हुए हैं क्योंकि उनकी कड़ी मेहनत का कोई दाम नहीं हैं। उनके उत्पाद के लिए जो कीमतें मिलती हैं वे मुश्किल से खर्चों को पूरा करती हैं। ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस) केवल 174 रुपये की दैनिक मजदूरी प्रदान करती है। पिछले साल इस योजना में करीब 42 लाख मज़दूरों ने काम किया था।

अगर छत्तीसगढ़ के संसाधनों का ठीक से उपयोग किया जाता, तो 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के 38 प्रतिशत को छोटे क़द का होने से रोका जा सकता था, 42 प्रतिशत में खून की कमी नही होती, न ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 47 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार होती। राज्य में महिला साक्षरता दर सिर्फ 66 प्रतिशत है और केवल 27 प्रतिशत महिलाओं ने 10 साल की स्कूली शिक्षा हासिल की है।

यदि ताज़ा चुनाव एक अलग और अजीब परिणाम पेश करते हैं, तो इसे राज्य के लोगों की तरफ से मदद की पुरज़ोर मांग होगी - उनके पास शायद ही कोई विकल्प है क्योंकि प्रमुख रिवायत तो उनके खिलाफ है।

Chhattisgarh
Mineral mining
Chhattisgarh elections 2018
Assembly elections 2018
BJP
privatization
Natural resources

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

छत्तीसगढ़ : दो सूत्रीय मांगों को लेकर बड़ी संख्या में मनरेगा कर्मियों ने इस्तीफ़ा दिया

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

छत्तीसगढ़ः 60 दिनों से हड़ताल कर रहे 15 हज़ार मनरेगा कर्मी इस्तीफ़ा देने को तैयार

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • आज का कार्टून
    आम आदमी जाए तो कहाँ जाए!
    05 May 2022
    महंगाई की मार भी गज़ब होती है। अगर महंगाई को नियंत्रित न किया जाए तो मार आम आदमी पर पड़ती है और अगर महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश की जाए तब भी मार आम आदमी पर पड़ती है।
  • एस एन साहू 
    श्रम मुद्दों पर भारतीय इतिहास और संविधान सभा के परिप्रेक्ष्य
    05 May 2022
    प्रगतिशील तरीके से श्रम मुद्दों को उठाने का भारत का रिकॉर्ड मई दिवस 1 मई,1891 को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरूआत से पहले का है।
  • विजय विनीत
    मिड-डे मील में व्यवस्था के बाद कैंसर से जंग लड़ने वाले पूर्वांचल के जांबाज़ पत्रकार पवन जायसवाल के साथ 'उम्मीदों की मौत'
    05 May 2022
    जांबाज़ पत्रकार पवन जायसवाल की प्राण रक्षा के लिए न मोदी-योगी सरकार आगे आई और न ही नौकरशाही। नतीजा, पत्रकार पवन जायसवाल के मौत की चीख़ बनारस के एक निजी अस्पताल में गूंजी और आंसू बहकर सामने आई।
  • सुकुमार मुरलीधरन
    भारतीय मीडिया : बेड़ियों में जकड़ा और जासूसी का शिकार
    05 May 2022
    विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय मीडिया पर लागू किए जा रहे नागवार नये नियमों और ख़ासकर डिजिटल डोमेन में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों और अवसरों की एक जांच-पड़ताल।
  • ज़ाहिद ख़ान
    नौशाद : जिनके संगीत में मिट्टी की सुगंध और ज़िंदगी की शक्ल थी
    05 May 2022
    नौशाद, हिंदी सिनेमा के ऐसे जगमगाते सितारे हैं, जो अपने संगीत से आज भी दिलों को मुनव्वर करते हैं। नौशाद की पुण्यतिथि पर पेश है उनके जीवन और काम से जुड़ी बातें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License