NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
उत्तराखंड: जलवायु परिवर्तन की वजह से लौटते मानसून ने मचाया क़हर
मौसम वैज्ञानिकों ने असमय होने वाली बारिश के लिए, इस साल देश में ज़्यादा देर तक ठहरे दक्षिणपश्चिमी मानसून को ज़िम्मेदार बताया है। ज़मीन के ऊपर मौजूद ज़्यादा आर्द्रता ने मौसम की स्थितियों को एक नए मौसम तंत्र के लिए अनुकूल बना दिया है।
सीमा शर्मा
26 Oct 2021
Climate Change

उत्तराखंड के लिए प्राकृतिक आपदाएं नई नहीं हैं। हर साल मानसून के चलते बदल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी आपदाएं आती हैं। लेकिन पहले मानसून के लौटने के दौरान यह घटनाएं देखने को नहीं मिलती थीं। लेकिन इस साल ऐसा हुआ।राज्य में रविवार को बारिश शुरू हुई, जो मंगलवार तक जारी रही। अब तक अक्टूबर में राज्य में 192.6 मिलीमीटर की भारी बारिश हो चुकी है। जबकि पिछले साल इस दौरान सिर्फ 31.2 मिलीमीटर बारिश ही हुई थी।

इस साल हुई बारिश में से 122.4 मिलीमीटर तो सिर्फ 24 घंटे में हो गई। रिपोर्टों के मुताबिक भारी बारिश और भूस्खलन की लगातार घटनाओं के चलते 52 लोग जान गंवा चुके हैं। सबसे ज्यादा स्थिति नैनीताल जिले में खराब रही, जहां 28 मौतें हुईं।

एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता अतुल सत्ती का मानना है कि पिछले कुछ सालों में पर्यटकों की संख्या में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी  हो गई है, यह भी राज्य में आ रही आपदाओं का एक कारण है। पहले हर साल राज्य में लगभग 6 लाख पर्यटक आते थे। अब यह संख्या 15 लाख हो चुकी है। इस संख्या के बढ़ने के साथ ही वाहन प्रदूषण, नदी प्रदूषण, निर्माण गतिविधियां और व्यावसायीकरण बढ़ता जा रहा है, जिससे हरित सुरक्षा चक्र का विनाश हो रहा है और बदलाव आ रहे हैं।

अतुल कहते हैं, "इन सभी तत्वों के चलते तापमान में वृद्धि हुई है और वर्षा का समय बदला है। अब हम ऐसी बारिश देखते हैं, जो लगातार 2-3 दिनों तक होती है। फिर कुछ ऐसा वक़्त होता है, जब पूरा सूखा होता है। 1980 और 90 के दशक में जोशीमठ क्षेत्र में 20-25 दिसंबर के बीच बर्फबारी होती थी। लेकिन बीते सालों में यह बदल गया। कई बार तो इलाके में बर्फ़ ही नहीं गिरती।" पहले भी मौसम से जुड़ी आपदाओं के प्रभाव भयावह हो गए थे। ऐसा  कमजोर इलाके में बेलगाम निर्माण गतिविधियों, पानी की दिशा बदलने और धड़ल्ले से सड़क निर्माण के चलते हुआ था।

वहीं मौसम वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इस बेमौसम बरसात की वजह दक्षिणपश्चिम मानसून के हमारे देश पर ज्यादा ठहरने को बता रहे हैं। इलाके के ऊपर मानसून धाराओं की उपस्थिति का मतलब हुआ, जमीन के ऊपर ज्यादा आर्द्रता का मौजूद होना। इससे वर्षा की स्थितियां बेहतर हो जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कम दबाव वाले क्षेत्र मानसून की उत्तरी सीमा के साथ साथ यात्रा करते रहे, जो मध्य भारत में ऊपर से गुजर रहा था। बाद में  यह तंत्र उत्तराखंड की तरफ गया और उत्तर प्रदेश की तरफ मुड़ गया। फिर मानसून के लौटने के बाद सूखी उत्तर पूर्वी हवाएं उत्तर भारत के ऊपर चलने लगीं। लेकिन कई तरह के मौसम तंत्रों की मौजूदगी के चलते पवनों के बहने की प्रक्रिया में बदलाव आ गया। इसलिए हमे गंगा के मैदान में ऊपर बड़ी मात्रा में आर्द्रता युक्त पूर्वी पवनें दिखाई दे रही हैं, जिनकी गहराई 800 फीट से ज्यादा थी।

स्काईमेट वेदर में मौसम परिवर्तन विभाग के अध्यक्ष जीपी शर्मा के मुताबिक़, "यह बिल्कुल साफ़ है कि मानसून अपने वक़्त से ही वापस लौट गया होता, तो हमें इस तरह की बारिश देखने को नहीं मिलती। कई तरह के मौसम तंत्रों के एक साथ आने की चलते ऐसी भारी बारिश के लिए स्थितियां अनुकूल हो गईं। ऊपर पहाड़ियों में जब पश्चिमी विक्षोभ की स्थिति बनी, तो मध्य प्रदेश और बंगाल की खाड़ी के ऊपर दो निम्न दबाव वाले  क्षेत्रों का निर्माण हुआ। लेकिन यह तंत्र मानसून के देरी से जाने के चलते सक्रिय हुआ। आम तौर मौसम तंत्र जमीन के बहुत भीतर यात्रा नहीं करते। खासकर उस जगह, जहां से मानसून लौट चुका हो। चूंकि उस दौरान मानसून की उत्तरी सीमा मध्य प्रदेश से गुजर ही रही थी, तो यह निम्न दाब के क्षेत्र अंदर तक घुस आए।

वह आगे कहते हैं, "सिर्फ इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश के ऊपर बने निम्न दाब के क्षेत्रों का पश्चिमी विक्षोभ से उत्तरी हिमालय के ऊपर संपर्क हुआ और उसने, इसे विक्षोभ को नीचे खींच लिया, जिससे भारी बारिश हुई। बल्कि इससे ना केवल उत्तराखंड में भारी बरिश हुई, बल्कि जम्मू कश्मीर के ऊपर समय से पहले बर्फबारी भी हुई।

चूंकि पश्चिमी विक्षोभ के आने के दौरान उत्तर भारत में किसी मौसम तंत्र की मौजूदगी नहीं रहती, इसलिए हमें सिर्फ हॉकी फुल्की बौछारें ही देखने को मिलती रही हैं. आमतौर पर हमें इस विक्षोभ में बदलाव अक्टूबर के अंत से दिखना शुरू हो जाता है। नवम्बर में इसकी प्रबलता में बढ़ोत्तरी होती है।

बंगाल की खाड़ी में जो निम्न दबाव के क्षेत्र घूम रहे हैं, वे चक्रवाती तूफान लायनरॉक और कोंपासू के अवशेष हैं, जो प्रशांत महासागर में आए थे। इन्हें हिन्द महासागर में दोबारा शक्ति मिल गई। लायनरॉक जहां मध्य प्रदेश गया, वहीं कोंपासू बंगाल, बिहार और पूर्वोत्तर भारत पहुंचा।

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाली आईपीसीसी रिपोर्ट, "छठवीं विश्लेषण रिपोर्ट मौसम परिवर्तन 2021" पहले ही बता चुकी है कि वैश्विक तापमान बढ़ने से दक्षिणपूर्वी एशिया में मानसून की समय तालिका में बदलाव आ रहा है। एक गर्म मौसम ज्यादा आर्द्रता वाले, ज्यादा शुष्क मौसम को प्रबलता जिससे सूखे या बाढ़ की स्थितियां निर्मित होंगी।

इन परिघटनाओं की स्थिति और बारंबारता, क्षेत्रीय पर्यावरण वृत्त में संभावित बदलावों पर निर्भर करेगी। इसमें मानसून और मध्य अक्षांश वाले तूफान के रास्ते शामिल हैं। कई सालों से मानसून अपने वापस जाने की तारीख़ का उल्लघंन कर रहा है। इसके चलते भारत में सरकारी संस्था आईएमडी ने भी मानसून जाने की शुरुआत की तारीख 1 सितंबर से बढ़ाकर 17 कर दी है। आमतौर पर वापस लौटने की प्रक्रिया 15 अक्टूबर तक हो जाती थी, लेकिन पिछले दशक में ऐसा नहीं हुआ।

जीपी शर्मा कहते हैं, "अब हम मौसम परिवर्तन की जद में आ चुके हैं, जिसने साफ़ तौर पर मानसून के दौरान, इसके पहले और बाद के मौसम तंत्र के समय में बदलाव कर दिया है। 

हम अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में हैं, लेकिन मौसम तंत्र महाराष्ट्र के भीतरी इलाकों में अब तक पहुंच रहे हैं। लेकिन मौसम स्थितियों द्वारा जो तबाही हुई है, उसकी एकमात्र वजह मौसम संकट नहीं है। यह बहुत हद तक साफ हो चुका है कि उत्तराखंड में पर्यावरणीय संतुलन के लिए विकास योजनाएं और मानवीय हस्तक्षेप घातक साबित हो रहे हैं।

एचएनबी गढ़वाल यूनिवर्सिटी में जिओलॉजी के प्रमुख प्रोफेसर YP सुंदरियाल मामले पर आगे प्रकाश डालते हुए कहते हैं, "ऊपरी हिमालय मौसमी और विवर्तनिकी तौर पर संवेदनशील है। यह इतना संवेदनशील है कि हमें वहां बड़ी जल योजनाएं बनाने से बचना चाहिए। या फिर उनकी क्षमता कम रखनी चाहिए। दूसरी बात कि सड़कों का निर्माण वैज्ञानिक तरीकों  से होना चाहिए। फिलहाल हम देख रहे हैं कि सड़कों का निर्माण या उनका चौड़ीकरण ढाल स्थायित्व पर ध्यान दिए बिना, अच्छी गुणवत्ता वाली आधार दीवार के बिना ही रहा है। यह सभी तरीके भूस्खलन द्वारा होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
 
उन्होंने आगे कहा, "योजना बनाने और उसे लागू करने में भारी अंतर है। जैसे वर्षा का समयकाल बदल रहा है, अतिवादी मौसमी परिघटनाओं के साथ तापमान में  भी वृद्धि हो रही है। नीति निर्माताओं को क्षेत्र के भूशास्त्र की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। इसे कोई नहीं नकार सकता कि विकास जरूरी है, लेकिन जल विद्युत योजनाएं, खासकर उत्तरी हिमालय क्षेत्र में काम क्षमता की होनी चाहिए। नीति निर्माण में स्थानीय भूगर्भ शास्त्री को शामिल किया जाना चाहिए, जो स्थानीय पर्यावरण और उसकी प्रतिक्रिया को अच्छे से समझता हो।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Climate Change Explains the Unprecedented Havoc Created by Retreating Monsoon in Uttarakhand

UTTARAKHAND
Flash floods
climate change
Monsoon
natural disaster

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

इको-एन्ज़ाइटी: व्यासी बांध की झील में डूबे लोहारी गांव के लोगों की निराशा और तनाव कौन दूर करेगा

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 


बाकी खबरें

  • यूएस द्वारा रक्षा पर किए गए ख़र्च का क़रीब आधा निजी कंपनियों को मिलाः कॉस्ट ऑफ़ वॉर प्रोजेक्ट
    पीपल्स डिस्पैच
    यूएस द्वारा रक्षा पर किए गए ख़र्च का क़रीब आधा निजी कंपनियों को मिलाः कॉस्ट ऑफ़ वॉर प्रोजेक्ट
    14 Sep 2021
    ब्राउन यूनिवर्सिटी के अध्ययन में कहा गया है कि रक्षा क्षेत्र में लाभ पर काम करने वाले निजी कंपनियों को शामिल करने की नीति ने संभावित राजनयिक समाधानों के प्रयासों को कमज़ोर कर दिया है।
  • ईरान और आईएईए ने ईरान परमाणु कार्यक्रम के निगरानी उपकरणों की मरम्मत को लेकर समझौता किया
    पीपल्स डिस्पैच
    ईरान और आईएईए ने ईरान परमाणु कार्यक्रम के निगरानी उपकरणों की मरम्मत को लेकर समझौता किया
    14 Sep 2021
    ये समझौता वियना में आईएईए के आगामी आम सम्मेलन को देखते हुए हुआ है।
  • campaign for women's reservation
    कुमुदिनी पति
    महिला आरक्षण को लेकर नए सिरे से मुहिम शुरू: देशभर में लगातार होंगे कार्यक्रम
    14 Sep 2021
    महिला आंदोलन की मांग रही है कि औरतों को विधान सभाओं और संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण मिले। लेकिन आज, 25 वर्ष बीतने के बाद भी हम जहां-के-तहां खड़े हैं। इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, वह इस…
  • पश्चिम बंगाल: आलू की कीमत में भारी गिरावट, किसानों ने मांगा समर्थन मूल्य
    संदीप चक्रवर्ती
    पश्चिम बंगाल: आलू की कीमत में भारी गिरावट, किसानों ने मांगा समर्थन मूल्य
    14 Sep 2021
    राज्य में आलू की खेती करने वाले किसानों को उनकी पैदावार के औने-पौने दाम मिल रहे हैं। आलू की एक बोरी (50 किलोग्राम) महज 260 रुपये में बिक रही है।
  • केवल बढ़ती अव्यवस्था के कारण
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    बढ़ती अव्यवस्था के कारण
    14 Sep 2021
    हम कैसे समय में जी रहे हैं जहाँ हमसे एक ऐसी दुनिया में तर्कसंगत रहने की बात कही जाती है जहाँ केवल अव्यवस्था ही एकमात्र आदर्श है, युद्ध और बाढ़ के कारण अव्यवस्था, किसी-न-किसी महामारी के कारण अव्यवस्था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License