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जलवायु परिवर्तन से विश्व में विषम मौसम की घटनाओं में बढ़ोतरी, भारत अछूता नहीं
भारत को पहले से ही चेतावनी दी जा चुकी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ मानसून की बारिश के और बढ़ते जाने का अनुमान है और इससे कृषि एवं अर्थव्यवस्था दोनों पर ही असर पड़ेगा।
सीमा शर्मा
29 Jul 2021
natural disaster
चित्र साभार: पीटीआई

पिछले कुछ हफ्तों से दुनिया के कई भू-भाग मौसम में आये चरम बदलाव की घटनाओं की मार से प्रभावित रहे हैं। उग्र बारिश ने मध्य चीन और यूरोप में भीषण बाढ़ ला दी है; 120 फ़ारेनहाइट (49 सेल्सियस) की ऐतिहासिक गर्म लू के थपेड़े पश्चिमी कनाडा में चलीं; उष्णकटिबंधीय गर्मी ने फ़िनलैंड और आयरलैंड को प्रभावित किया है; दावानल ने साइबेरियाई टुन्ड्रा के तापमान को 100.4 फारेनहाईट तक बढ़ा दिया था, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राज़ील में भी दावानल के साथ-साथ सूखे का भी अनुभव हुआ है।

रायटर्स में प्रकाशित खबर के अनुसार, अगले दो हफ़्तों में जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के वैज्ञानिक अपने छठे आकलन रिपोर्ट की पहली किश्त को अंतिम रूप देने जा रहे हैं, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के इर्दगिर्द स्थापित विज्ञान और भविष्य में जलवायु के गर्म होते जाने और इसके प्रभाव के बारे में जानकारी को अपडेट करेगा। इस दो-सप्ताह तक चलने वाली वर्चुअल बैठक में सरकार के प्रतिनिधि भी हिस्सा लेने जा रहे हैं। यह रिपोर्ट 2013 में आई इस तरह की आखिरी आईपीसीसी रिपोर्ट को और विस्तारित करने के द्वारा चरम मौसम और क्षेत्रीय प्रभावों पर और अधिक ध्यान केन्द्रित करने जा रही है।

भारत के हिस्से में भी ऐसी चौंकाने वाली घटनाएं रही हैं। भारत के पश्चिमी तटीय राज्यों महाराष्ट्र और गोवा सहित हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में चरम मौसम की श्रृंखलाबद्ध घटनाएं देखने में आई हैं। भयंकर बाढ़, बादल फटने की घटना और भू-स्खलन के कारण सैकड़ों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। पश्चिमी तट के कुछ हिस्सों में हो रही रिकॉर्ड तोड़ बारिश की सूचना के अनुसार 22 जुलाई से अब तक वहां से दसियों हजार लोगों को हटाया जा चुका है।

राहत एवं पुनर्वास विभाग के अनुसार, महाराष्ट्र में बाढ़ प्रभावित इलाकों से करीब 2,29,074 लोगों को निकाला जा चुका है। 26 जुलाई तक कुल मिलाकर 164 मौतें हो चुकी हैं और 25,564 जानवर इस बीच हताहत हुए हैं; 46 लोग घायल थे और 100 अभी भी लापता हैं। करीब 1028 गाँव प्रभावित हुए हैं, जिनमें से रायगढ़ जिला सबसे बुरी तरह प्रभावित है, जिसके बाद रत्नागिरी और सतारा जिले हैं।

इस बीच, हिमाचल प्रदेश में 25 जुलाई को भूस्खलन की घटना प्रकाश में आई है, जिसमें 9 लोगों की मौत हो गई और कई लोगों के घायल होने की खबर है। उत्तराखंड से इस महीने की शुरुआत से ही लगातार भूस्खलन की श्रृंखलाबद्ध खबरें आ रही हैं।

दुनियाभर के वैज्ञानिक इन घटनाओं के लिए मानव जनित जलवायु परिवर्तन को इसका जिम्मेदार ठहराने को लेकर एकमत हैं। जो भारत में हैं उन्होंने पहले से ही चेता रखा था कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ-साथ मानसूनी बारिश में भी और बढ़ोत्तरी होगी। मौसम विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन, स्काईमेट वेदर के अध्यक्ष जी पी शर्मा का इस बारे में कहना था “अभी सीजन आधा भी पूरा नहीं हुआ है और हमने पहले से ही इस मौसम में होने वाली बारिश के लक्ष्य को हासिल कर लिया है। जलवायु परिवर्तन इस समय की सच्चाई है। मानसून अब काफी हद तक अनिश्चित हो चुका है और हम मानसून सीजन के पैटर्न में व्यापक बदलाव को देख रहे हैं, जिसे कभी सबसे स्थिर माना जाता था।"

मौसम में इस प्रकार की अनियमतता की घटनाओं ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आइएमएडी) को गलत पूर्वानुमान लगाते पाया है, और जैसा कि अधिकारियों को दिल्ली में मानसून के आगमन के बारे में गलत पूर्वानुमान पर स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। शर्मा के अनुसार “अब यह सिर्फ मौसम विशेषज्ञों के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहा और इसके लिए बहु-विषयक या बहु-विशिष्ट फोकस की आवश्यकता है, जिसके लिए सभी हितधारकों के बीच में एकीकरण की दरकार है।”

पाट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, ‘जलवायु परिवर्तन भारतीय मानसून के सीजन को और भी अधिक अराजक बनाता जा रहा है’, हर डिग्री सेल्सियस के जलवायु के गर्म होते जाने से मानसूनी बारिश में तकरीबन 5% की वृद्धि होगी। ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में मानसून की बारिश को पूर्व के लगाये अनुमानों से कहीं अधिक बढ़ा दिया है। यह 21वीं सदी के मानसून गतिशीलता पर हावी है। जलवायु परिवर्तन के चलते अप्रत्याशित चरम मौसम और उनके गंभीर परिणामों का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।

अधिक अराजक मानसून का सीजन इस क्षेत्र में कृषि एवं अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर रहा है। मौसम विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन, स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष, महेश पालावत के अनुसार “चार महीने लंबे चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में आमतौर पर जुलाई महीने में सबसे अधिक बारिश होती है। हमने पूरे महाराष्ट्र में भारी बारिश होने का अनुमान लगाया था, लेकिन इस प्रकार के चरम मौसम की झड़ी का अंदाजा नहीं था।”

उन्होंने बताया कि हम जलवायु परिवर्तन की चपेट में आ चुके हैं और इसके परिणाम हमारी आँखों के सामने हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई और तेजी से शहरीकरण के साथ-साथ पश्चिमी घाटों की नाजुक प्रकृति के चलते भूस्खलन और बड़े पैमाने पर तबाही का मंजर देखने में आ रहा है।

तापमान में वृद्धि और बारिश के बीच की कड़ी के बारे में विस्तार से बताते हुए उनका कहना था कि वातावरण के गर्म होने से हवा की नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिसके कारण तीव्र तूफानी बादल (काफी कम उंचाई पर सपाट आधार वाले बादल विशाल द्रव्यमान का निर्माण करते हैं) बादलों या लंबवत रूप से बनने वाले बादल, इस क्षेत्र में कुछ मूसलाधार बारिश को लाने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा, जब वातावरण अस्थिर होता है, तो ये बादल फिर फिर से बनते जाते हैं और मूसलाधार बारिश को ट्रिगर करते रहते हैं।

हिमालयी क्षेत्र में मौसम के मिजाज के बारे में बात करते हुए पालावत आगे कहते हैं “पर्वतीय क्षेत्र में मौसम पहले से अधिक नाजुक हो चुका है क्योंकि पहाड़ मौसम के प्रति कहीं अधिक तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं। जैसा कि पहले ही दोहराया जा चुका है, तेजी ऊपरी हवा के थपेड़ों के अभाव में तीव्र तूफानी बादलों के विकास के साथ, वे काफी लंबी दूरी की यात्रा कर पाने की स्थिति में नहीं होते हैं या हम कह सकते हैं कि वे फंस कर रह जाते हैं। ये बादल तक एक निश्चित क्षेत्र में ही सारा पानी गिरा देते हैं, जिसे बादल का फटना कहा जाता है।”

उनके विचार में वनों की अंधाधुंध कटाई पनबिजली संयंत्रों, सड़कों, होटलों और आवास आदि जैसे आधारभूत ढांचों के निरंतर निर्माण कार्य के कारण मिट्टी की पकड़ ढीली होती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप जरा सी भी बारिश होने पर भी बार-बार भूस्खलन होता है। उन्होंने कहा और इस तथ्य को देखते हुए कि हिमालयी पर्वतश्रृंखला पारिस्थितिक रूप से नाजुक प्रकृति की हैं, जलवायु परिवर्तन का अति सूक्ष्म प्रभाव भी पर्वतीय क्षेत्रों में घातक घटनाओं का कारण बनने के लिए पर्याप्त है।

आईपीसीसी के पांचवे आकलन रिपोर्ट चक्र ने निष्कर्ष निकाला था कि जलवायु प्रणाली पर इंसानी प्रभाव “स्पष्ट” है। तब से, आरोपण पर साहित्य – जलवायु विज्ञान का उप-क्षेत्र जो इस बात पर विचार करता है कि कैसे (और कितना अधिक) मानव गतिविधियाँ जलवायु परिवर्तन का कारण बनती हैं - के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। आज वैज्ञानिक किसी भी समय से ज्यादा आश्वस्त हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिए हम लोग जिम्मेदार हैं। हाल के एक अध्ययन में पाया गया है कि पूर्व-औद्योगिक काल से धरती के गर्म होते जाने के पीछे के कारणों में मनुष्यों का ही हाथ रहा है, जिसने जलवायु परिवर्तन में आ रहे बदलाव के कारणों के बारे में बहस के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा है। एआर5 के बाद से क्षेत्रीय प्रभावों के बारे में भी अधिक ध्यान दिया गया है, इस बीच वैज्ञानिकों ने अपने मॉडल में सुधार किया गया है और यह समझ लिया है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रीय स्तर पर क्या प्रभाव पड़ने जा रहे हैं।  

निष्क्रियता की कीमत अधिक है 

भारत एक अरब से अधिक की जनसंख्या के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और यदि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन इसी प्रकार से अबाध गति से जारी रहा जो गंभीर नतीजे भुगतने के कगार पर है। प्राकृतिक आपदाओं के अलावा इन आपदाओं की आर्थिक लागत एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए और भी अधिक चुभने वाली है। विभिन्न अध्ययनों में जहाँ और अधिक चरम गीले वर्षों का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है, इसके कारण लोगों की भलाई, अर्थव्यवस्था, कृषि एवं खाद्य प्रणाली के उपर खतरा मंडराता जा रहा है।

इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों एवं अन्य संबंधित हितधारकों के समुदायों के बीच में जमीनी स्तर पर समुदायों को शामिल करते हुए कई चरणों में एक्शन प्लान को विकसित करने और लागू करने को लेकर एक आम सहमति बनी है। हम न सिर्फ भारत में बल्कि यूरोप और चीन के कुछ हिस्सों में भी इस चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव कर रहे हैं। हम चीन और जर्मनी में तबाही की भयावह तस्वीरों को देख रहे हैं, जो दर्शाते हैं कि जलवायु परिवर्तन यहाँ पर है और अभी है। यह अब सिर्फ विकासशील देशों की ही समस्या नहीं है, बल्कि यह अब जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे औद्योगिक राष्ट्रों को भी अपनी चपेट में लेने लगा है। आईपीसीसी वैज्ञानिक पिछले कुछ वर्षों से इन मुद्दों को लेकर चेताते आ रहे हैं। 

महासागरों और हिममंडल (एसआरओसीसी) पर आईपीसीसी की नवीनतम रिपोर्ट हमें विस्तार से इस बात का विवरण देती है कि कैसे ग्लोबल वार्मिंग महासागरों के गर्म होने की ओर ले जा रही है और कैसे मानसून के पैटर्न में तेजी से बदलाव होता जा रहा है।

भारती इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक पालिसी, इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस के अनुबंध एसोसिएट प्रोफेसर और आईपीसीसी की 6ठी आकलन रिपोर्ट के प्रमुख लेखक डॉ. अंजल प्रकाश के अनुसार, “ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की मानसून प्रणाली में व्यापक बदलाव आया है। या तो आपको लंबे समय तक सूखे का सामना करना पड़ेगा या भारी बारिश का। यह नया सामान्य होने जा रहा है। भारतीय शहरों, कस्बों और गाँवों को इसके अनुकूलन बनाने के लिए तत्काल योजनाओं की दरकार है।”

उन्होंने बताया “जलवायु अनुकूलन बुनियादी ढांचे और जोखिम प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि ये बढती चरम घटनाएं न सिर्फ जिंदगियों को प्रभावित करने जा रही हैं बल्कि हमारी अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित करेंगी। दूसरा, भारत को वैश्विक स्तर पर दक्षिण में विभिन्न देशों को हरित विकास के मॉडल के लिए प्रेरित करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए, और गृह के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे बनाये रखना होगा।” उन्होंने आगे कहा “लोगों, लाभ और गृह के बीच में संतुलन को बना पाना संभव है।”

सीमा शर्मा चंडीगढ़ स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो @seema_env हैंडल से ट्वीट करती हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

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