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भारत
राजनीति
बढ़ती आबादी पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की चिंता के मायने
जिस विशाल जनसंख्या को प्रधानमंत्री कल तक डेमोग्राफिक डिविडेंट बता रहे थे, अब उसे वे डेमोग्राफिक डिजास्टर बता रहे हैं। असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने ऐलान किया है कि असम में 1 जनवरी, 2020 से उन लोगों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, जिनकी दो से ज्यादा संतानें हैं।
अनिल जैन
01 Nov 2019
population
Image courtesy: Indian Express 

बात करीब साढ़े छह साल पुरानी है। नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा अंगडाई लेने लगी थी। उन्होंने गुजरात से बाहर निकलना शुरू कर दिया था। इस सिलसिले में 6 फरवरी 2013 को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने देश की 65 फीसद युवा आबादी को देश की सबसे बडी ताकत और विकास का इंजन बताया था। मोदी ने कहा था, ''यूरोप बूढ़ा हो चुका है, चीन बूढ़ा हो चुका है, लेकिन मेरा देश दुनिया का सबसे नौजवान देश है।

देश की युवा आबादी हमारे लिए एक अवसर है, एक वरदान है, लेकिन हम इसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमारे पास अपार भू-संपदा और अन्य प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन हम उनका भी सही इस्तेमाल करके देश को समृद्ध नहीं बना पा रहे हैं। अवसर हमारे हाथों से निकलते जा रहे हैं।’’

बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की हैसियत से कई रैलियों-सभाओं में और प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले पूरे कार्यकाल के दौरान देश-विदेश में कई मौकों पर भी मोदी इसी आशय की बात करते हुए देश की बढती जनसंख्या को डेमोग्राफिक डिविडेंट यानी जनांकिकीय लाभांश बताते रहे। लेकिन 2019 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद इस बारे में उनके विचार बिल्कुल उलट रूप में सामने आए। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए उन्होंने देश की बढ़ती हुई आबादी को राष्ट्रीय चिंता और चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि हमारे देश में जो बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, वह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए कई तरह के संकट पैदा करेगा।

प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान आते ही उनके तमाम मंत्रियों, भाजपा नेताओं और भाजपा शासित राज्यों की सरकारों ने बढ़ती जनसंख्या को देश के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बताने का अभियान छेड़ दिया। बढ़ती बेरोजगारी, भीषण आर्थिक मंदी और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में मची व्यापक अराजकता के बीच सरकार की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि बढ़ती जनसंख्या ही सारी मुसीबतों की जड़ है, लिहाजा सरकार इसमें क्या कर सकती है। इस सिलसिले में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाने की मांग भी उठ रही है।

हाल ही में असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने ऐलान किया है कि असम में 1 जनवरी, 2020 से उन लोगों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, जिनकी दो से ज्यादा संतानें हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी देश की बड़ी आबादी उसके लिए ताकत या वरदान मानी जाती है, लेकिन उस आबादी का अगर सदुपयोग न हो तो वह अभिशाप साबित होती है। यह भी सच है कि इस समय तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के और भी कई देशों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। क्योंकि जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उसके लिए जीवन की बुनियादी सुविधाएं और संसाधन जुटाना तथा उसके लिए रोजगार के अवसर पैदा करना सरकारों के लिए चुनौती साबित हो रहा है। भारत के संदर्भ में तो अलग-अलग माध्यमों से अक्सर इस आशय की रिपोर्ट आती रहती हैं, जिनमें यह बताया जाता है कि आबादी के मामले में भारत जल्द ही चीन को पीछे छोड़ कर दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा।

यह बात कुछ हद सही भी है। चीन की जनसंख्या भारत के मुकाबले काफी धीमी गति से बढ़ रही है। इसीलिए जब स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताई तो उसका आमतौर पर स्वागत ही हुआ। यह संभवत: पहला मौका था, जब किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने भाषण में बढ़ती जनसंख्या की समस्या पर चिंता जताई हो। लेकिन सवाल है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके सुर में सुर मिला रही उनकी पार्टी क्या वाकई इस चिंता को लेकर गंभीर है?

इसे भी पढ़ें : जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न

यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में एक बार भी कभी बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी चिंताओं का जिक्र नहीं किया। बल्कि इसके ठीक उलट उन्होंने कई बार देश की विशाल युवा आबादी के फायदे गिनाए। सवाल यही है कि आखिर अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि बढ़ती जनसंख्या राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गई?

दरअसल मोदी सरकार को अपने पिछले कार्यकाल में तेज गति से आर्थिक विकास की उम्मीद थी। आर्थिक मोर्चे पर उठाए गए कुछ अप्रत्याशित फैसलों और शुरू की गई योजनाओं के आधार पर उसे लग रहा था कि आर्थिक विकास दर तेज होगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बडी संख्या में युवा कामगारों की जरूरत होगी। लेकिन सारे फैसले और योजनाएं नाकाम साबित हुईं। रोजगार के अपेक्षित अवसर न तो मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल पैदा हुए और इस कार्यकाल में तो पैदा होने के कोई आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे।

यही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था मंदी की गिरफ्त में होने के चलते अब तो रोजगारशुदा लोग भी बेरोजगार हो रहे हैं। बेरोजगार नौजवानों की फौज सरकार को बोझ की तरह महसूस हो रही है। इसीलिए जिस विशाल जनसंख्या को प्रधानमंत्री कल तक डेमोग्राफिक डिविडेंट बता रहे थे, अब उसे वे डेमोग्राफिक डिजास्टर बता रहे हैं। वे देश में बढ़ती बेरोजगारी की स्थिति को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था की बदहाली और बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता जताने वालों को पेशेवर दलाल करार दे रहे हैं। उनके मंत्री तमाम तरह के कुतर्कों के सहारे बेरोजगारी बढ़ने की हकीकत को नकार रहे हैं।

इसे भी पढ़ें : जनसंख्या विस्फोट पर नरेंद्र मोदी की चिंता और संघ का एजेंडा

वैसे जनसंख्या विस्फोट की स्थिति को लेकर प्रधानमंत्री का चिंता जताना इसलिए भी बेमानी है, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि के आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं कि हमारा देश जल्द ही जनसंख्या स्थिरता के करीब पहुंचने वाला है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 2015-16 के मुताबिक देश का मौजूदा टोटल प्रजनन दर 2.3 से नीचे है। यानी देश के दंपति औसतन करीब 2.3 बच्चों को जन्म देते हैं। यह दर भी तेजी से कम हो रही है। जनसंख्या को स्थिर करने के लिए यह दर 2.1 होनी चाहिए और यह स्थिति कुछ ही वर्षों में खुद ब खुद आने वाली है।

भारत दुनिया में पहला देश है, जिसने सबसे पहले अपनी आजादी के चंद वर्षों बाद 1950-52 में ही परिवार नियोजन को लेकर राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम शुरू कर दिया था। हालांकि गरीबी और अशिक्षा के चलते शुरुआती दशकों में इसके क्रियान्वयन में जरूर कुछ दिक्कतें पेश आती रहीं और 1975-77 में आपातकाल के दौरान मूर्खतापूर्ण जोर-जबरदस्ती से लागू करने के चलते यह कार्यक्रम बदनाम भी हुआ लेकिन पिछले दो दशकों के दौरान लोगों में इस कार्यक्रम को लेकर जागरुकता बढी है, जिससे स्थिति में काफी सुधार हुआ है। लेकिन जनसंख्या को लेकर हमारे यहां कट्टरपंथी हिंदू संगठनों की ओर से एक निहायत बेतुका प्रचार अभियान सुनियोजित तरीके से पिछले कई वर्षों से चलाया जा रहा है, जो कि हमारे जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के खिलाफ है।

विश्व हिंदू परिषद से जुड़े स्वयंभू शंकराचार्यों, महंतों और तथाकथित साधु-साध्वियों द्वारा मनगढ़ंत आंकड़ों के जरिये यह प्रचार किया जाता है कि जल्दी ही एक दिन ऐसा आएगा, जब भारत में मुसलमान और ईसाई समुदाय अपनी आबादी को निर्बाध रूप से बढाते हुए बहुसंख्यक हो जाएंगे और हिंदू अल्पमत में रह जाएंगे। अत: उस 'भयानक’ दिन को आने से रोकने के लिए हिंदू भी अधिक से अधिक बच्चे पैदा करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तो 22 अगस्त 2016 को बाकायदा एक प्रस्ताव के जरिये आधिकारिक तौर हिंदुओं को जन्म दर बढ़ाने का आह्वान किया। हिंदुओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील संघ प्रमुख मोहन भागवत भी कई बार अपने भाषणों में कर चुके हैं। भागवत के पूर्ववर्ती सर संघचालक केएस सुदर्शन भी अपने जीवनकाल में इसी तरह की अपीलें अक्सर करते थे।

एक मज़ेदार बात यह भी उल्लेखनीय है कि मुसलमानों की कथित रूप से बढ़ती आबादी को लेकर चिंतित होने वाले यही हिंदू कट्टरपंथी इसराइल के यहूदियों का इस बात के लिए गुणगान करते नहीं थकते हैं कि संख्या में महज चंद लाख लेते हुए भी उन्होंने अपने पुरुषार्थ के बल पर करोड़ों मुसलमानों पर न सिर्फ धाक जमा रखी है बल्कि चार लड़ाइयों में उन्हें करारी शिकस्त भी दी है और उनकी जमीन छीनकर अपने राज्य का विस्तार किया है।

यहूदियों के इन आशिकों और हिंदू कट्टरता के प्रचारकों से पूछा जा सकता है कि अगर मुसलमान संख्या बल में यहूदियों से कई गुना भारी होते हुए भी उनसे शिकस्त खा जाते हैं तो हिंदुओं को ही भारतीय मुसलमानों की भावी और काल्पनिक बहुसंख्या की चिंता में दुबला होने की क्या जरूरत है? या फिर वे क्या यह जताना चाहते हैं कि यहूदी हिंदुओं से ज्यादा काबिल हैं?

मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की कथित रूप से बढ़ती आबादी पर चिंतित होने वाले यह भूल जाते हैं कि आबादी बढ़ने या ज्यादा बच्चे पैदा होने का कारण कोई धर्म या विदेशी धन नहीं होता। इसका कारण होता है गरीबी और अशिक्षा। किसी भी अच्छे खाते पीते और पढ़े-लिखे मुसलमान (अपवादों को छोड़कर) के यहां ज्यादा बच्चे नहीं होते। बच्चे पैदा करने की मशीन तो गरीब और अशिक्षित हिंदू या मुसलमान ही होता है। कहने का मतलब यह कि जो समुदाय जितना ज्यादा गरीब और अशिक्षित होगा, उसकी आबादी भी उतनी ही ज्यादा होगी।

अफसोस की बात यह है कि समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के आबादी संबंधी इन सामान्य नियमों को नफरत के सौदागर समझना चाहे तो भी नहीं समझ सकते, क्योंकि उनके इरादे तो कुछ और ही हैं। उनके द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार को प्रधानमंत्री के बयान से और हवा मिल गई है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि से संबंधित आंकड़ों और तथ्यों की रोशनी में यही कहा जा सकता है कि जनसंख्या विस्फोट पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी का चिंता जताना सिर्फ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार की नाकामी से ध्यान हटाने का उपक्रम ही नहीं बल्कि आबादी संबंधी काल्पनिक आंकडों के सहारे अल्पसंख्यक समुदायों को बदनाम करने के व्यापक अभियान का हिस्सा भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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