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क्यों पीएम ग़रीब कल्याण बीमा योजना के तहत केवल 0.013% हेल्थकेयर वर्कर्स को ही लाभ मिला है?
पीएमजीके बीमा योजना केवल कोविड के कारण जीवन की हानि और कोविड से संबंधित ड्यूटि के कारण होने वाली आकस्मिक मृत्यु को कवर करती है।
अनुषा आर॰, तन्वी सिंह
26 May 2021
Translated by महेश कुमार
क्यों पीएम ग़रीब कल्याण बीमा योजना के तहत केवल 0.013% हेल्थकेयर वर्कर्स को ही लाभ मिला है?

तन्वी सिंह और अनुषा आर॰ ने 'सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में कोविड-19 से लड़ने वाले स्वास्थ्य कर्मियों के लिए बनी ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण बीमा योजना' के डिजाइन और उसके कार्यान्वयन में मौजूद खामियों को उजागर करते हुए बताया कि स्वास्थ्य देखभाल कर्मी जो महामारी का मुक़ाबला करने के लिए सबसे आगे हैं उनके लिए योजना का लाभ सुनिश्चित करने के लिए इन खामियों को तत्काल ठीक करना क्यों जरूरी है।

27 मार्च 2020 को केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने 1.7 लाख करोड़ रुपये के एक कोविड राहत पैकेज को पेश किया था। इसमें भारत के लगभग 22 लाख स्वास्थ्य कर्मियों का बीमा कवर शामिल भी  शामिल है। पैकेज, जिसे 'सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में कोविड-19 से लड़ने वाले स्वास्थ्य कर्मियों के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण बीमा योजना' के रूप में जाना जाता है, वह अप्रैल 2021 में समाप्त हो गया था जिसे बाद में एक अन्य वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया था। इस पैकेज को केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय आपदा जवाबी कोष के ज़रीए वित्त पोषित किया गया है, और यह स्वास्थ्य कर्मियों के लिए 50 लाख रुपए का बीमा कवर भी प्रदान करता है।

हालाँकि, इसके डिजाइन में एक बड़ी खामियां है जो पीएमजीके बीमा योजना केवल कोविड के कारण जीवन की हानी और कोविड संबंधित ड्यूटि के कारण आकस्मिक मृत्यु को कवर करती है।

यह योजना अपने दायरे से उस पर्याप्त मात्रा में सहायता को दूर कर देती है जिसकी अधिकांश स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों को सख्त जरूरत होती है, यानी बीमारी से बचे लोगों के चिकित्सा खर्च के लिए इसकी विशेष जरूरत होती है।

वैसे बीमारी की मृत्यु दर केवल 1.1 प्रतिशत है, जबकि भारत में आधिकारिक तौर पर वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 2,50,000 मामले रिपोर्ट किए जा रहे है। इसका मतलब यह है कि इस योजना से बहुत कम संख्या में लोग, और विशेष रूप से केवल मृतक स्वास्थ्य कर्मियों के परिवार ही लाभान्वित होंगे।

जबकि प्रभावित स्वास्थ्य कर्मी कोविड अस्पतालों में मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं, हम सब इस बात को भली भांति जानते हैं कि मौजूदा हालात में न केवल सार्वजनिक बल्कि निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में इलाज़ कराना या दाखिला लेना व्यावहारिक रूप से कठिन है।

ये कुछ ऐसे समय होते हैं जब स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच शक्ति के विशेषाधिकार से बाधित होती है जो स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे में सकल और भयंकर कमी के चलते और अधिक जटिल हो जाती है। नतीजतन, लोगों को निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की तरफ रुख करना पड़ता और इलाज़ के साथ-साथ दवाओं (जो ज्यादातर केवल काले बाजार में उपलब्ध है) की खरीद पर अकल्पनीय रकम खर्च करने पर मजबूर होना पड़ता है।

पीएमजीके बीमा योजना के लिए पात्रता का मानदंड

पीएमजीके बीमा योजना के एफएक्यू नंबर 13 के अनुसार, कोई भी दावेदार जिसका दावा स्वीकार किया जाता है, उसे 50 लाख रुपये की राशि मिलेगी, जो अन्य किसी भी बीमा योजनाओं या बीमा के अतिरिक्त होगी, जिसके कि वे पात्र होंगे। इस योजना के लिए किसी व्यक्तिगत नामांकन की आवश्यकता नहीं है।

इस योजना में दो प्रकार के कवर शामिल हैं:

1. कोविड की वजह से जीवन की हानि

2. कोविड संबंधित ड्यूटी के कारण आकस्मिक मृत्यु होने पर इसका लाभ।

दोनों तरह के दावों में दावे के फॉर्म के अलावा पहचान प्रमाण, मृतक से संबंध का प्रमाण और मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज जमा करने होंगे।

कोविड के कारण जीवन के नुकसान के मामले में, दावेदार को एक प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने की जरूरत होगी जो प्रमाणित करेगी कि मृतक कोविड जांच में पॉज़िटिव था।

इसके अलावा, अस्पताल की तरफ से एक प्रमाण पत्र देना होगा जिसमें बताया जाना चाहिए कि मृतक एक कर्मचारी था और उसे मरीजों की देखभाल के लिए तैनात या काम के लिए चुना गया था और हो सकता है कि वह कोविड रोगियों के सीधे संपर्क में आया हो।

कोविड से संबंधित ड्यूटि के कारण आकस्मिक मृत्यु के मामले में दावेदार को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) की प्रमाणित प्रति और स्वास्थ्य संस्थान, संगठन या कार्यालय द्वारा एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा कि मृतक वहां का कर्मचारी था और कोविड  से संबंधित ड्यूटी के कारण उसकी आकस्मिक रूप से मृत्यु हो गई थी।

प्रक्रियात्मक बाधाएं

योजना को लागू करने के संबंध में किए गए शोध के दौरान, हमें पता चला कि दावों के निपटारे के वक़्त जरूरी दस्तावेजों को इकट्ठा करने और उनके प्रसंस्करण के संबंध में निम्नलिखित बाधाओं की पहचान की गई है:

कोविड पॉजिटिव सर्टिफिकेट: मृत्यु के बाद राज्यों सरकारों द्वारा कोविड की जांच करने से इनकार करने का मतलब यह होगा कि स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों के परिवार बीमे की राशि का दावा नहीं कर पाएंगे। इस योजना में स्पष्टता का भी अभाव है कि क्या विश्व स्वास्थ्य संगठन के आईसीडी-10 (रोगों और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकीय वर्गीकरण) कोड यू07.2 मौतों का होना, यानी संदिग्ध/नैदानिक/संभावित मौतें, कोविड मौतों के समान हैं और क्या वे दावे के लिए योग्य हैं। इस तथ्य की जटिलता यह है कि राज्य खुद इन मौतों को कोविड मौतों के रूप में दर्ज नहीं कर रहे हैं।

नियोक्ता से प्रमाण की जरूरत: इसमें दूसरी अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह है कि मृतक स्वास्थ्य कर्मी के परिवार को मृतक को नियुक्त करने वाले संस्थान/संगठन/कार्यालय से एक प्रमाण पत्र हासिल करना होगा, जिसमें यह दर्शाया गया हो कि उन्हे कोविड ड्यूटी के कारण संक्रमण हुआ या फिर उनकी मौत कोविड ड्यूटि के दौरान घटी दुर्घटना के परिणामस्वरूप मृत्यु हो गई थी।

व्यवहार में देखा जाए तो, नियोक्ता ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने से इनकार कर रहे हैं जब तक कि स्वास्थ्य कर्मी किसी कोविड पॉज़िटिव केस के सीधे संपर्क में न आया हो। चूंकि भारत में राज्य कोविड-19 से संबंधित मौतों की उचित रिकॉर्डिंग के मामले में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं, और सह-रुग्ण और संदिग्ध/संभावित/नैदानिक ​​मामलों को कोविड मौतों के रूप में नहीं गिन रहे है, इसलिए कई स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारियों को इसके धारणा के तहत योजना के लिए गलत तरीके से अपात्र माना जा रहा है।

कोविड ड्यूटी पर सरकार द्वारा खास "काम" के लिए रखा जाना या उसे काम पर "बुलाए" जाने को लेकर काफी अस्पष्टता है: हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक केस में पीएमजीके बीमा योजना के दावे के मामले में जिसमें बी.एस. सरगड़े होमियोपैथी डॉक्टर की मौत हो गई थी, में  एक बहुत ही भ्रमित करने वाला फैसला दिया जिसका पीएमजीके बीमा योजना के तहत पात्रता मानदंड पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

डॉ सुरगड़े को नवी मुंबई नगर निगम (NMMC) ने लॉकडाउन के दौरान उनके अस्पताल/औषधालय को खुला रखने का एक नोटिस दिया था। नोटिस में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि इस तरह के निर्देश महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत “कोविड की रोकथाम और लगाम” लगाने के लिए जारी किए गए थे।

एनएमएमसी द्वारा जारी नोटिस में यह भी कहा गया है कि यदि क्लिनिक खुला नहीं रखा जाता है, तो डॉ सुरगड़े के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 188 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाएगी। यह स्पष्ट रूप से इशारा करता है कि एनएमएमसी नोटिस का उद्देश्य और इरादा चिकित्सकों को अपने औषधालयों को खुला रखने से था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नागरिकों को चिकित्सा सहायता मिलती रहे, जिसमें कोविड का इलाज़ भी शामिल है।

हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि डॉ. सुरगाडे की सेवाओं को वास्तव में राज्य द्वारा कोविड ड्यूटि कार्यों के संबंध में अपेक्षित/ड्राफ्ट की गई थीं। अदालत ने कहा कि विशेष सेवाओं की मांग या ड्रफटेड काम लेने के लिए और निजी चिकित्सकों को अपने क्लिनिक को बंद नहीं रखने के निर्देश देने के बीच बड़ा अंतर है, और यह केवल पहले वाली शर्त है जो योजना का लाभार्थी बनाती है।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो, यह निजी डॉक्टरों को सरकारी डॉक्टरों के समान लाभ प्रदान किए बिना उनके जीवन को खतरे में डालने के लिए मजबूर किए जाने की व्याख्या है जिसे कानूनी आड़ में किया गया है।

आवेदनों में ठहराव: अप्रैल में केंद्र सरकार को भेजे गए एक पत्र में, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने चिंता जताई थी कि जिलों के संयुक्त निदेशालयों तक पहुंचने पर ही बीमा के दावे ठप हो रहे हैं।

19 अप्रैल 2021 तक, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पत्र के अनुसार, 756 आधुनिक चिकित्सा डॉक्टरों (आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार) ने कोविड के चलते अपनी जान कुर्बान की है, जबकि उनमें से केवल 168 को ही बीमा का लाभ मिल सका है।

अब तक कुल 287 स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों/कर्मियों को इसका लाभ मिला है। इस डेटा में आयुर्वेद और अन्य वैकल्पिक चिकित्सा संबंधी चिकित्सक शामिल नहीं है जिन्हें महामारी में स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए मजबूत किया गया था।

प्रभावित दावेदार जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं उनमें बड़ी बाधा कानूनी उत्तराधिकारी का प्रमाण पत्र हासिल करने, मृत्यु का कारण, यह साबित करने की प्रामाणिकता कि वे कोविड स्वास्थ्य देखभाल में काम कर रहे थे को हासिल करने में प्रक्रियात्मक चुनौतियां हैं, और ऐसे समय में जब अधिकांश प्रशासनिक कार्यालयों की कार्यात्मक क्षमता कम हो गई है। यह सब हासिल करना बड़ी चुनौती बन गई है।

दावों का सत्यापन: केंद्रीय स्वास्थ्य खुफिया ब्यूरो (सीबीएचआई) ने पीएमजीके बीमा योजना के तहत कवर किए गए स्वास्थ्य कर्मियों की सूची का पता लगाने और सत्यापित करने की जिम्मेदारी ली है। आईएमए और सीबीएचआई ने अधिकृत सत्यापित सूची के सभी लोगों को योजना के तहत सीधे लाभ देने की अपील की है क्योंकि ऐसा करने से पहले लंबी दावा प्रक्रिया के चलते देरी होती है, और दावों की अस्वीकृति की संभावना भी बढ़ जाती है।

पिछले साल सरकार की आधिकारिक घोषणा के अनुसार, इस योजना का उद्देश्य 22 लाख स्वास्थ्य कर्मियों को लाभ पहुंचाना था। 19 अप्रैल 2021 तक, 287 स्वास्थ्य कर्मियों जोकि लक्ष्य की संख्या का केवल 0.013% है, को पीएमकेजी बीमा योजना के तहत लाभ मिला है। यह इस योजना के डिजाइन और कार्यान्वयन में विफलता को उजागर करने का काम करता है।

जब कोविड के मामले अवश्यंभावी रूप से रफ्तार पकड़ रहे हैं, यही वह उचित समय है जब सरकार इस योजना में मौजूद खामियों को ठीक करे और अग्रिम पंक्ति में काम करने वाली  स्वास्थ्य कर्मियों को सुरक्षा प्रदान करे।

(अनुषा आर॰ और तन्वी सिंह सेंटर फ़ॉर सोशल जस्टिस में रिसर्च एसोसिएट हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)

मूल लेख The Leaflet में प्रकाशित हो चुका है।

 

 

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