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माघ मेला : ‘दो गज़ की दूरी, मास्क है ज़रूरी’ का ऐलान और लाखों की भीड़
ग्राउंड रिपोर्ट: प्रयागराज में संगम पर एक साथ हजारों की संख्या में श्रद्धालु नहा रहे हैं। मेला प्रशासन द्वारा लगातार माइक से 'दो गज़ की दूरी, मास्क है ज़रूरी' का ऐलान होता रहता है।
गौरव गुलमोहर
15 Jan 2021
माघ मेला

प्रयागराज (इलाहाबाद): ऐसे समय में जब दवाई भी और कड़ाई भी के नारे के साथ कोरोना को लेकर कोई भी लापरवाही न करने की चेतावनियां जारी की जा रही हैं। जब संसद का शीत सत्र रद्द कर दिया जाता है। जब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय नहीं खोले गए हैं और ट्रेन जैसी सुविधाएं भी पूरी तरह बहाल नहीं हुई हैं, वैसे समय में हमारे देश में चुनाव भी होते हैं और रैली भी और दुनिया का सबसे बड़ा माघ मेला भी लग चुका है।

मकर संक्रांति के मौके पर गुरुवार, 14 जनवरी लेकर आज शुक्रवार, 15 जनवरी तक लाखों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगा चुके हैं। कल्पवासी भी धीरे-धीरे माघ मेला में आने लगे हैं। हालांकि मेले में वर्षों से लगातार आ रहे श्रद्धालु मानते हैं कि कोरोना और लॉकडाउन की वजह से इस बार माघ मेले में आने वालों की संख्या काफी घटी है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में कोरोना केस की संख्या कम होने का दावा करते हुए कहा कि "मकर संक्रांति का उत्सव हमारे लिए उत्साह से कम नहीं। भारत ने एक साथ दो-दो वैक्सीन (टीका) कोरोना से बचाव के लिए लांच की है और 16 जनवरी से वैक्सीन लग रही है। लेकिन सभी तक वैक्सीन पहुंचने में समय लगेगा। सावधानी और सतर्कता इसके लिए आवश्यक है। हम मकर संक्रांति के इस आयोजन के साथ सहभागी बनें और हर्षोल्लास के साथ मनाएं। लेकिन दो गज़ की दूरी और मास्क ज़रूरी का पालन जरूर करें।"

वहीं इलाहाबाद के संगम में लाखों की भीड़ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपील नाकाम रही। संगम की ओर लाखों की संख्या में मेलार्थियों के बढ़ती भीड़ में दो गज़ की दूरी और मास्क ज़रूरी की कल्पना बेमानी है। बच्चे, बूढ़े, नौजवान और महिलाएं सर पर गठरी लादे, झोला लटकाए समूह में मेला देखने पहुंचे हैं। गंगा-यमुना के संगम पर एक साथ हजारों की संख्या में श्रद्धालु नहा रहे हैं। मेला प्रशासन द्वारा लगातार माइक से 'दो गज़ की दूरी मास्क है ज़रूरी' का ऐलान होता रहता है।

मेला प्रशासन के दावों से भिन्न मेला परिदृश्य

भारत में एक करोड़ तीन लाख से अधिक कोरोना केस सामने आ चुके हैं और डेढ़ लाख से अधिक लोग कोरोना महामारी की वजह से अपनी जान गवां चुके हैं। इसी बीच मेला प्रशासन द्वारा लगातार दावे होते रहे हैं कि मेला क्षेत्र में व्यवस्था चाक चौबंद है। कोरोना की गाइडलाइन फॉलो हो रही है। लेकिन मेलार्थियों के बीच किसी तरह की सोशल डिस्टेंसिंग और मुंह पर मास्क का पालन होता नज़र नहीं आया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार कुल 16 जगहों पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई है। हालांकि पहले दिन ही इसका कोई खास असर नहीं दिखा।

इस रिपोर्टर ने मुख्य गेट पर टम्प्रेचर चेक कर रहीं दीप्ति रंजन (बदला हुआ नाम) से पूछा कि आप मेला में आने वाले सभी लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग कर पा रही हैं? वे कहती हैं कि "इतनी बड़ी संख्या में सबका बुखार नापना नामुमकिन है। लेकिन हम सबका बुखार नापने की कोशिश कर रहे हैं।"

माघ मेला-2021 का अनुमानित बजट लगभग 60 करोड़ रुपये है। मेला क्षेत्र गंगा-यमुना किनारे पहले जितना ही फैला नज़र आ रहा है। प्रशासन के अनुसार 80 लाख लोगों के लिए बंदोबस्त किया गया था लेकिन कल से आज तक गंगा-यमुना पर बने कुल छः घाटों पर लगभग चार से पांच लाख लोगों ने स्नान किया। इतनी भीड़ में भी प्रशासनिक लापरवाही साफ तौर पर देखने को मिली। वहीं मेला क्षेत्र में मौजूद लोगों का मानना है कि माघ मेले के छह प्रमुख स्नान पर्व होते हैं। 28 के बाद बाद माघ महीना शुरू होगा और तभी से ज्यादा भीड़ शुरू होगी।

गाजीपुर से गंगा में स्नान करने संगम आये नौजवान राजन राजभर ऐसे समय में मेले के आयोजन को उचित नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि "देखिए यहां एनाउंस हो रहा है कि कोविड-19 से बचिए। लेकिन यहां कोई गाइडलाइन फॉलो नहीं हो रही है। अगर कोरोना वास्तव में है और इससे पूरी दुनिया प्रभावित है तो यहां रोक लगनी चाहिए। इस बार हम गंगा नहाने न आते वैक्सीन तैयार हो जाती तो अगली बार नहाने आते। अगर मुस्लिमों का कोई फंक्शन होता जहां इतनी भीड़ उमड़ती तो मुद्दा जरूर उठता। जैसे हमारे मुख्यमंत्री योगी जी हिंदुत्व के पुजारी हैं तो वे मुद्दा जरूर उठाते कि रोक लगनी चाहिए। लेकिन यहां भीड़ कोई मुद्दा नहीं है।"

क्या भारत के गांवों में कोरोना जैसा कुछ है भी?

कोरोना में लगे लॉकडाउन के बाद से पहला अवसर है जब बड़े स्तर पर माघ मेला में इलाहाबाद और आस-पास के मज़दूरों को काम मिला है और फेरी लगाकर खिलौना, सिंदूर, चादर, कम्बल और बाँसुरी बेचने वाले कई राज्यों के फेरी करने वालों को मौका मिला है। देश के विभिन्न राज्यों और दूर-दराज के गांवों से आये लोगों में कोरोना महामारी को लेकर कोई सावधानी या डर नज़र नहीं आया। गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर लोग संगम स्नान करने आये हैं। समूह में बैठकर खा-पी रहे हैं और साथ-साथ घाटों पर नहा रहे हैं।

सीता मद्धेशिया (45) आजमगढ़, मऊ से संगम स्नान करने आई हैं। उनसे हमने पूछा कि इतनी भीड़ में कोरोना होने का डर नहीं लग रहा है? वे कहती हैं कि "पहली बार नहाने आये हैं। कोरोना से डर नहीं लग रहा है। गांव में कोरोना नहीं है। जैसे पहले था वैसे आज भी गांव में सब रह रहे हैं। बस-गाड़ी में कोई हिफाजत नहीं है। यहाँ इतनी भीड़ में क्या हिफाजत होगी?"

संगम में मध्य प्रदेश के नरसंगपुर जिला से आये लीलाधर पटेल (42) मजीरा बेच रहे हैं। उनके गले में मास्क लटक रहा है। लीलाधर आठ लोगों के समूह में मजीरा बेचने आये हैं। एक मजीरा पचास रुपये में बेच रहे हैं। वे कहते हैं कि "कोरोना से कोई डर नहीं। गंगा माई की कृपा है, चाहे मारे चाहे बचाये। कोरोना की वजह से पहले की अपेक्षा इस बार धंधा मंदा है। एक महीना हो गया आये, किसी तरह पेट चल रहा है। एक मजीरा तीस रूपये में मिलता है चालीस से पचास रुपये में बेचता हूँ। सुबह से दो दर्जन मजीरा लेकर घूम रहा हूँ आधा भी नहीं बिका है।"

संगम में इस बार कोरोना का प्रभाव साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। मेले में बिसात खाना की दुकान लगाने वाले, फूल, मिट्टी का चूल्हा, कंडी, लकड़ी बेचने वाले यह मानते हैं कि इस बार मेला पर कोरोना का प्रभाव पड़ा है। एक तरफ जहां पहले माघ मेला में शहर खचाखच भरा रहता था, यात्रियों को ले जाने के लिए ट्रेनें और बसें कम पड़ जाती थीं इस बार स्पेशल ट्रेनें खाली ही रवाना हुईं।

मध्य प्रदेश के बिंदौरी से एक टोली में साठ से अधिक आदिवासी गंगा नहाने आये हैं। टोली में सभी कोरोना महामारी का नाम जानते हैं। लेकिन उनके बीच सावधानी को लेकर कोई जानकारी नहीं है। सुखदेव शिव सरैया आठ लोगों के साथ माघ मेला में आये हैं। वे कहते हैं कि "कोरोना महामारी क्या करेगा ईश्वर है। ऊपर वाले के भरोसे मेले में आ गए हैं।"

वैक्सीन को लेकर क्या सोचते हैं ग्रामीण?

हमने मेला क्षेत्र में कई लोगों से बात की। लोगों के बीच कोरोना महामारी को लेकर कोई डर नहीं दिखा। लेकिन वैक्सीन को लेकर खास तरह का डर नज़र आया। लोग अभी वैक्सीन के बारे में कम जानते हैं। गोरखपुर के कुशीनगर से आये शशिकांत कुमार राजभर मानते हैं कि कोरोना की वजह से मेला पहले की अपेक्षा काफी कम है। वे कहते हैं कि "जब गंगा माई साथ हैं तो कोरोना से डर कैसा? लेकिन वैक्सीन अभी नहीं लगवा सकता। जब पूरे देश में लोग वैक्सीन लगवाएंगे तब मैं भी लगवा लूंगा। अभी  हो सकता है वैक्सीन रिएक्शन कर दे?"

इलाहाबाद के सैदाबाद से विष्णु शर्मा (16) नौवीं कक्षा फेल हैं। मेले में प्लास्टिक का हेलीकॉप्टर बेच रहे हैं। विष्णु वर्षों से मेले में खिलौना बेच रहे हैं। वे कहते हैं कि "कमाई कुछ भी नहीं है। सुबह से केवल तीन-चार पीस हेलीकॉप्टर बिका है। दिल्ली से मंगाता हूँ, एक पीस सोलह रुपये में मिलता है पच्चीस-तीस रुपये में बेचता हूँ।" विष्णु कोरोना और वैक्सीन के सवाल पर कहते हैं कि "भगवान जाने कोरोना है कि नहीं। अभी कोरोना टेस्ट नहीं कराया हूँ। वैक्सीन के बारे में मुझे कुछ नहीं पता है।"

हर वर्ष माघ मेला में आ रहे अरविंद कुमार पाठक मेले में सरकार द्वारा अच्छी व्यवस्था करने का हवाला देते हुए कहते हैं कि "गांव कोरोना है ही नहीं। इस बार कोरोना की वजह से मेले में भीड़ कम है। जहां तक रही वैक्सीन की बात तो सरकार ने इतनी अच्छी व्यवस्था कर रखी है कौन नहीं वैक्सीन लगवाना चाहेगा? कुछ लोग राजीतिक लाभ के उद्देश्य से वैक्सीन पर सवाल उठा रहे हैं।"

मेले के आयोजन से सरकार पीछे क्यों नहीं हटी?

"इससे प्रदेश सरकार के कमजोर होने का संदेश जाएगा। मुख्यमंत्री ऐसा बिलकुल नहीं चाहेंगे", डॉ. रमाशंकर सिंह ऐसा कह रहे हैं। गंगा और उसके किनारे बसे समुदायों पर अपनी किताब को अंतिम रूप दे रहे डॉ. सिंह मानते हैं कि "यह मेला सरकार द्वारा अपना इक़बाल बुलन्द करने का एक अवसर तो होता ही है, यह आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से भी उसके लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। सरकार अपनी विचारधारा और रुझानों को बड़ी आसानी से मेले में आयी जनता तक पहुँचा सकती है। मेला इसके लिए सबसे मुफ़ीद जगह है। इसलिए सरकार का इससे पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं था।"

वास्तव में पहले भी सरकारों के लिए मेले और प्रदर्शनियाँ इसका एक माध्यम हुआ करती थीं। हर शहर में कोई न कोई प्रदर्शनी या मेला ग्राउंड जरूर होता है जहाँ समय-समय पर मेले, त्योहारों के साथ सरकार के विकास कार्यक्रम भी जोड़ दिए जाते थे। इस सरकार के लिए यह अच्छी बात है कि मेला हिंदुत्व और विकास का एक नैरेटिव एक साथ उपलब्ध करा देता है।

सभी फोटो : गौरव गुलमोहर

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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