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डबल होगी आय, सबल होंगे किसान : मगर, कैसे?
नाबार्ड के मुताबिक 2011-12 के आधारवर्ष की तुलना में 2016-17 में कृषि विकास दर 6.3 प्रतिशत और 2017-18 में यह 3.4 प्रतिशत रही। ताजा विकास दर 2.9 फीसदी पर आ पहुंची है। मतलब ये कि कृषि विकास दर लगातार कम होती चली जा रही है।
प्रेम कुमार
19 Jun 2019
Kisan
फोटो साभार: Patrika

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वास दिला रहे हैं कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। देश को उनके वादे पर भरोसा है क्योंकि वे यह बात 2016 से लगातार कहते आए हैं। फिर भी इस सवाल पर मंथन इसलिए होता आया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में किसानों के लिए फसलों का खरीद मूल्य लागत से डेढ़ गुणा करने की भी बात कही थी, जो अब तक न तो पूरी हुई है और न ही इस वादे को दोहराया ही जाता है।

कितनी है किसानों की आमदनी?

प्रधानमंत्री की घोषणा का मतलब है कि 2016 में किसानों की आमदनी जितनी रही होगी, वह 2022 में डबल हो जाएगी जब देश आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहा होगा। मगर, 2016 में किसानों की आमदनी कितनी थी, इस बारे में केंद्र सरकार ने अब तक कुछ बताया नहीं है। आज किसानों की आमदनी कितनी है यह भी देश को पता नहीं है।

एक जानकारी जो 12 फरवरी 2019 को लोकसभा में तत्कालीन कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने रखी थी उसके मुताबिक किसानों की प्रति कृषि परिवार औसत आमदनी 2013 में 6426 रुपये प्रति माह थी। इसके अलावा नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस NSSO के मुताबिक 2012-13 में हर कृषि परिवार की औसत मासिक आमदनी भी यही रकम थी यानी 6426 रुपये प्रतिमाह। नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में किसानों की आमदनी 8931 रुपये प्रति माह हो चुकी थी।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से किसानों के अकाउन्ट में सीधे 6 हज़ार रुपये ट्रांसफर करने की पहल की गयी है। मतलब ये कि हर किसान परिवार के लिए कम से कम 500 रुपये महीने की आमदनी बढ़ गयी है। इसके बावजूद इससे उनकी आमदनी डबल करने में कोई मदद मिलती नहीं दिखती।

डबल आय मतलब कितना - 12 हज़ार या 17 हज़ार महीना?

अगर 2022 में किसानों की आमदनी डबल हो जाती है तो इसे कम से कम 17,862 रुपये प्रतिमाह प्रति परिवार होनी चाहिए। अगर सरकार 2012-13 के आंकड़े पर टिकी रहती है तो प्रति किसान परिवार आमदनी 12,852 रुपये मासिक होनी चाहिए। अगर ऐसा हो भी जाता है तो एक किसान परिवार में 5 आदमी मानें तो प्रति किसान आमदनी 2570.4 रुपये होता है। अगर नाबार्ड वाले आंकड़े को लें तो आमदनी होती है 3572.4 रुपये प्रतिमाह प्रति किसान।

देश में प्रतिव्यक्ति आय है करीब 9400 रुपये

देश में प्रतिव्यक्ति आय पर गौर करें तो यह 1,12, 835 रुपये सालाना है। यानी प्रतिव्यक्ति मासिक आय है 9400.29 रुपये। अब आप समझ सकते हैं कि आमदनी डबल होने के बाद यह सम्भव है कि किसान परिवार की आय देश में प्रतिव्यक्ति आय से अधिक हो जाए, मगर प्रति किसान यह रकम उससे काफी कम होगी।

कृषि विकास दर गिरती जाए फिर भी डबल हो जाएगी आमदनी?

हालांकि किसानों की आमदनी दुगुनी कर पाना आज भी टेढ़ी खीर है। केंद्र सरकार ने ऐसा कोई रोडमैप नहीं रखा है जिससे यह लक्ष्य हासिल होता दिखाई पड़े। नाबार्ड के मुताबिक 2011-12 के आधारवर्ष की तुलना में 2016-17 में कृषि विकास दर 6.3 प्रतिशत और 2017-18 में यह 3.4 प्रतिशत रही। ताजा विकास दर 2.9 फीसदी पर आ पहुंची है। मतलब ये कि कृषि विकास दर लगातार कम होती चली जा रही है। ऐसे में कौन सा जादू होने वाला है कि किसानों की आमदनी डबल हो जाए, यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।

किसानों की आय में गैरव्यावसायिक अनाज की हिस्सेदारी महज 17 फीसदी

यह बात भी उल्लेखनीय है कि किसानों की आमदनी में अनाज का हिस्सा महज 17 फीसदी है। आमदनी का बड़ा हिस्सा डेयरी, पशुपालन और दूसरे क्षेत्रों से है। अगर अनाज में भी देखा जाए तो किसानों की आमदनी का मुख्य स्रोत गन्ना, दलहन, तिलहन जैसे उत्पाद हैं। इस तरह गैर व्यावसायिक उत्पादों की भागीदारी किसानों की आमदनी में बहुत कम रह जाती है। इस चिन्ता को खत्म करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं, वह भी सतह पर नहीं दिखता। अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो बातें सामने रखी हैं उसके मुताबिक आलू से चिप्स बनाना, मकई से कॉर्न फ्रेलैक्स आदि तैयार करना, फलों से जूस तैयार करना यानी उत्पाद से सह उत्पाद और व्यावसायिक सह उत्पाद बनाने का आइडिया वे देते रहे हैं। मगर, इस आइडिया को अमली जामा पहनाने के लिए जमीनी स्तर पर किसानों के हाथ कुछ लगा नहीं है। 

अनाज का उत्पादन बढ़ा, पर रुक नहीं रहीं आत्महत्याएं!

यह बहुत बड़ा सुखद आश्चर्य है कि परेशानी में रहने के बावजूद किसान लगातार उत्पादन बढ़ाते चले जा रहे हैं। अनाज का उत्पादन 2015-16 में 251.6 मिलियन टन था जो 2016-17 में बढ़कर 275.1 मिलियन टन हो गया। यही उत्पादन 2017-18 में 279.5 मिलियन टन रहा। मगर, इस सुखद आश्चर्य के बीच दुखद बात यही है कि किसानों की आत्महत्याएं नहीं रुक रही हैं। 10 हज़ार से ज्यादा किसान अब भी साल में मौत को गले लगा रहे हैं।

न्यूनतम मजदूरी पाने वालों से भी बदतर हैं किसान

अगर न्यूनतम मजदूरी से तुलना करें तो भी किसानों की हालत बदतर है। दिल्ली में 30 दिन का रोजगार रहने पर महीने में प्रशिक्षित श्रम के लिए न्यूनतम मजदूरी 14,842 रुपये तय की गयी है। हालांकि मजदूरों को उनके लिए तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती, मगर इसे एक मानक के तौर पर देखें तो किसान आमदनी के इस स्तर से भी दूर हैं। अपना अनाज बेचकर वे इस स्थिति तक पहुंच पाएंगे, यह कहना मुश्किल है। खेती में सिर्फ किसान मेहनत नहीं करता, उसका पूरा परिवार मेहनत करता है। इस हिसाब से 5 आदमी के किसान परिवार में 2 लोग भी श्रम कर रहे हैं तो उनकी आमदनी कम से कम 29,684 रुपये होना चाहिए। मगर, आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी बात करना मूर्खता मानी जाएगी। सच ये है कि एक मजदूर को अगर ईमानदारी से न्यूनतम वेतन मिले तो वह रकम पांच सदस्यों वाले किसान परिवार से दुगुनी से ज्यादा होती है। न्यूनतम मजदूरी और किसानों की आमदनी में यह फर्क खेती की दुर्दशा बताने के लिए पर्याप्त है।

किसानों की आय डबल होगी जब विकास दर हो 13 फीसदी

नीति आयोग की 2017 की रिपोर्ट कहती है कि किसानों की आय 2022 तक दुगुनी करने के लिए कृषि क्षेत्र का विकास 10.4 फीसदी करना होगा। मगर, अब 2019 में एक गैर आधिकारिक अनुमान के मुताबिक यह वृद्धि दर 13 फीसदी से अधिक रहनी चाहिए। वर्तमान में 3 फीसदी से भी कम कृषि विकास दर के रहते यह लक्ष्य 2022 तक असम्भव दिख रहा है।

वस्तुस्थिति से अनजान है सरकार?

सवाल ये है कि क्या वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं है? ऐसा माना नहीं जा सकता। फिर, वे किस बिना पर ये दावा कर रहे हैं? एक समय देश को साल में 2 करोड़ रोज़गार सालाना देने का दावा कर चुके प्रधानमंत्री ने सवाल पूछे जाने पर कहा था कि मुद्रा लोन से करोड़ों लोगों को फायदा पहुंचाया गया है। वे अपने पैरों पर खड़े हुए हैं और इस तरह उन्हें रोजगार मिला है। उन्होंने पकौड़ा बेचने को भी रोज़गार बताकर अपने वादे का बचाव किया था।

अगर इसी तर्ज पर प्रधानमंत्री तर्क देते हैं तो 2022 में वे क्या तर्क दे सकते हैं जरा उस पर गौर करें। वे कह सकते हैं कि

Ø हमने किसानों को खेती के लिए कर्ज दिया।

Ø किसानों की कर्ज माफी को भी उनकी आमदनी माना जाए।

Ø किसानों को बिचौलियों से बचाने का भी उन्हें फायदा हुआ, उसे नोट किया जाए।

Ø किसानों को जो बीमा उपलब्ध करायी गयी, वह भी उनकी आमदनी समझा जाए।

फिर भी किसानों की आमदनी दुगुनी हो जाएगी, यह साबित कर पाना मुश्किल रहेगा। मगर, तब तक कोई और मुद्दा, कोई और लोकलुभावन घोषणा देश के सामने होगी जिस पर हम गणना कर रहे होंगे। किसानों की आमदनी डबल करने वाली बात पर चर्चा उसी तरह से थम चुकी होगी जैसे किसानों की उपज को उनकी लागत से डेढ़ गुणा दाम पर खरीदने के वादे पर चर्चा थम चुकी है।

(लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लंबे समय तक जुड़े रहे। आप इन दिनों एक पत्रकारिता संस्थान में पढ़ा रहे हैं।)

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