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राजनीति
दिल्ली चुनाव की तैयारी : झुग्गी वालों को फिर दिखाया घर का सपना
केंद्र और राज्य सरकार अपने अगामी चुनावी एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है और झुग्गी-बस्तियों का सर्वे एक निजी संस्था एसपीवाईएम से करा रही हैं। लेकिन इसे लेकर झुग्गीवासियों में एक डर भी है। ख़ास रिपोर्ट-
सुनील कुमार
26 Jul 2019
झुग्गी वासियों को आवास का सपना

दिल्ली के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही दिल्ली और केन्द्र सरकार लोगों को लुभाने में लग गई है। दिल्ली सरकार झुग्गी-बस्ती में रहने वाले लोगों को मुख्यमंत्री आवास, तो केन्द्र सरकार प्रधानमंत्री आवास देने की बात कर रही है।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) के अनुसार दिल्ली में 675 झुग्गी बस्तियां हैं, जिसमें 3,05,521 परिवार रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इन बस्तियों में करीब 4.2 लाख परिवार रहते थे, जो कि दिल्ली की जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत था। संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट 2009 के अनुसार दिल्ली में 18.9 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गी झापड़ी में रहती थी। 675 झुग्गी-बस्तियां दिल्ली की 0.5 प्रतिशत (आधे प्रतिशत) जमीन पर बसी हुई हैं। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में लगभग 800 झुग्गी-बस्तियां हैं, जो कि 0.6 प्रतिशत जमीन पर बसी हैं।

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सरकार का मानना है कि इन बस्तियों में 15 से 20 से लाख लोग रहते हैं जबकि सच्चाई है कि यह संख्या दुगुनी है। गांव से उजड़े हुए लोगों को शहर में पनाह देने वाला स्थल झुग्गी बस्ती ही है, जिनके पास किसी तरह का शहरी निवासी होने का दस्तावेज नहीं है।

केंद्र और राज्य सरकार अपने अगामी चुनावी एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है और झुग्गी-बस्तियों का सर्वे एक निजी संस्था एसपीवाईएम से करा रही हैं। किसी बस्ती में सर्वे कराने का प्रचार डीडीए द्वारा किया जा रहा है तो किसी बस्ती में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड द्वारा मुख्यमंत्री आवास देने की बात कही जा रही है। इस सर्वे से लोगों में एक डर व्याप्त है कि सर्वे के नाम पर लोगों की बस्तियों को तोड़ कर बेघर कर दिया जायेगा। यह डर जायज भी है, क्योंकि सर्वे करने से पहले क्षेत्र के जन प्रतिनिधियों या जिम्मेवार अधिकारियों द्वारा लोगों को विश्वास में नहीं लिया गया और बस्तियों में नोटिस चिपका दिये गये। अगर कहीं पर जन प्रतिनिधि लोगों के सामने आये तो वे अपनी पार्टी का प्लान बता कर लोगों को सपने दिखाने लगे कि आप को एक करोड़ की सम्पत्ति मिल जायेगी। जब लोगों ने सवाल किया तो वे जवाब देने के बजाय दोषारोपण करने लगे कि पब्लिक को भड़काया जा रहा है।

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बस्तियों में नोटिस चिपका कर एसपीवाईएम द्वारा सर्वेक्षण की तारीख तय कर दी गई। तय तारीख पर लोग डरे-सहमे अपने काम-काज से छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। दक्षिणपुरी के विराट सिनेमा के पास सी ब्लॉक और दक्षिणपुरी एक्सटेंशन के शहीद कैंप, ब्लॉक 16 के झुग्गी-बस्ती में 15 जुलाई को उपनिदेशक (समाजशास्त्र) के हस्ताक्षर वाला नोटिस लगाया गया कि 24 जुलाई को एसपीवाईएम द्वारा सर्वे किया जायेगा। इस नोटिस के बाद बस्ती वाले लोगों में भय व्याप्त हो गया और वह 24 जुलाई को अपने काम से छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। इन बस्तियों में रहने वाले लोग बेलदारी, दुकानों और प्राइवेट दफ्तरों में काम करते हैं और महिलाएं ज्यादतर कोठियों में घरेलू काम के लिए जाती हैं।

सी ब्लॉक, अम्बेडकर कैम्प में रहने वाले दूलीचंद (56) बताते हैं कि वह तारवाती अस्पताल के पास लेबर चौक पर काम के लिए जाते हैं लेकिन बुधवार को वह लेबर चौक नहीं गये और सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। उन्होंने बताया कि 5 सदस्यीय परिवार में वही अकेले कमाने वाले व्यक्ति हैं। इसी बस्ती में रहने वाले राकेश ने बताया कि वह पुष्प बिहार में पूड़ी-सब्जी बेचते हैं लेकिन सर्वे कराने के लिए ही वह अपनी दुकान नहीं लगाये।

यह कहानी केवल इसी बस्ती के लोगों की नहीं है। शहीद कैम्प में रहने वाली गीता ने बताया कि उनका परिवार इस बस्ती में 40 साल से अधिक समय से रह रहा है और वह नेहरू प्लेस में कम्प्यूटर ऑपरेटर की नौकरी करती है। वह सर्वे कराने के लिए ही घर पर छुट्टी लेकर रूकी कि जब सर्वेकर्ता आएंगे तो वह अपने भाई को भी फोन करके बुला लेगी। कुछ इसी तरह की कहानी ऑफिस में पिऊन का काम करने वाले राकेश ने भी बताया कि वह छुट्टी लेकर घर पर रहे और उनकी ही तरह कम से कम 100-150 लोग छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। अगर एक दिन सर्वे करने वाले नहीं आए तो प्राइवेट कामों में छुट्टी लेना आसान नहीं होता है, दिहाड़ी भी कटती है, बात भी सुननी पड़ती है और नौकरी जाने का भी खतरा होता है।

12 बजे तक जब कोई सर्वेकर्ता नहीं आया तो कुछ लोग एसपीवाईएम के नम्बर पर बार-बार फोन करके शिकायत करने लगे, जिनका सही उत्तर देने के बजाय एसपीवाईएम के लोगों ने फोन पर जानकारी लेने वालों के साथ डांट-डपट किया। काफी फोन करने के बाद सी ब्लॉक बस्ती में पांच सदस्यीय सर्वेकर्ता पहुंचे। उन्होंने बताया कि वे लोग बिहार के रहने वाले हैं और जीटीबी नगर में एसपीवाईएम के कैम्प में रह रहे हैं। उन्हें उसी दिन खबर दी गई कि इन बस्तियों में सर्वे करना है और उनको जगह भी मालूम नहीं थी। सर्वेकर्ता सर्वे के उपरांत लोगों को किसी तरह का सबूत नहीं दे रहे थे, जिसके कारण लोगों में रोष व्याप्त हुआ और उन्होंने सर्वे को रोक दिया।

उत्तरी दिल्ली के बस्तियों में भी देखा गया कि एसपीवाईएम ने सर्वेकर्ता को किसी तरह की ट्रेनिंग नहीं दी थी, जिसके कारण सर्वेकर्ता सही से फॉर्म भी नहीं भर पा रहे थे और किसी तरह से अपना कोरम ही पूरा कर रहे थे। जहां अब सभी सर्वे टैब पर होता है वहीं एसपीवाईएम फॉर्म पर सर्वे कर रहा था। यहां तक कि उसके कॉलम में कहीं भी वीपी सिंह की टोकन को शामिल नहीं किया गया था जबकि बस्ती वालों का पहला दस्तावेज वही है।

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लोगों का डर जायज है, क्योंकि एक गैरजिम्मेवार एजेंसी को सर्वे का काम दिया गया है जो कि किसी तरह खानापूर्ति करना चाहती है। दूसरी बात है कि इन-सीटू अपग्रेडेशन का काम 1990 के बाद दिल्ली में हुआ ही नहीं है। 2000 में जिस तरह से लोगों की बस्ती तोड़कर उनको नरेला, बावना, भोरगढ़, भलस्वा जैसी जगहों पर बसाया गया, उससे भी लोगों को डर है कि उनकी बस्ती को तोड़कर उनको दूर भेजा जा सकता है।

इन-सीटू अपग्रेडेशन में भी असली मामला जमीन का है-जिस जमीन को बस्ती वालों ने रहने योग्य बनाया और जिसका बाजार मूल्य काफी हो चुका है, उस जमीन को हड़पने का है। हाल में इन-सीटू अपग्रेडेशन के लिए चुनी गई कठपुतुली कॉलोनी से हम समझ सकते हैं कि यह बस्ती जब बसी थी तो यहां आस-पास कुछ नहीं था। उनके आने के बाद ही फ्लाइओवर और मेट्रो का निर्माण हुआ, जिसके बाद उस जमीन का मूल्य काफी बढ़ गया और उस जमीन को 60 और 40 के अनुपात में बांटकर डेवलपर को दे दिया गया। लेकिन डेढ़ साल बाद भी वहां पर अभी मकान नहीं बन पाया है। जो झुग्गी-बस्ती दिल्ली के आधे प्रतिशत जमीन पर बसी है उसको वहां से हटा कर और कम पर बसाने की योजना है। अगर हम इसको कठपुतुली के तर्ज पर देखें तो इन बस्तियों को 0.3 प्रतिशत जमीन ही मिलेगा, बाकी जमीन को डेवलपर बेच कर मुनाफा कमायेगा। इन बस्ती वालों के लिए कम से कम 3-4 प्रतिशत जमीन सरकार को देनी चाहिए, क्योंकि इनकी आबादी 20 प्रतिशत से कम नहीं है। अतः इनको उचित जमीन मिलनी चाहिए और फ्लैट की जगह इनको 50 गज की जमीन मिले, ताकि इनकी आने वाली पीढ़ी भी अपना गुजर-बसर कर सके।

लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) से जुड़े हैं

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