NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली चुनाव की तैयारी : झुग्गी वालों को फिर दिखाया घर का सपना
केंद्र और राज्य सरकार अपने अगामी चुनावी एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है और झुग्गी-बस्तियों का सर्वे एक निजी संस्था एसपीवाईएम से करा रही हैं। लेकिन इसे लेकर झुग्गीवासियों में एक डर भी है। ख़ास रिपोर्ट-
सुनील कुमार
26 Jul 2019
झुग्गी वासियों को आवास का सपना

दिल्ली के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही दिल्ली और केन्द्र सरकार लोगों को लुभाने में लग गई है। दिल्ली सरकार झुग्गी-बस्ती में रहने वाले लोगों को मुख्यमंत्री आवास, तो केन्द्र सरकार प्रधानमंत्री आवास देने की बात कर रही है।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) के अनुसार दिल्ली में 675 झुग्गी बस्तियां हैं, जिसमें 3,05,521 परिवार रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इन बस्तियों में करीब 4.2 लाख परिवार रहते थे, जो कि दिल्ली की जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत था। संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट 2009 के अनुसार दिल्ली में 18.9 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गी झापड़ी में रहती थी। 675 झुग्गी-बस्तियां दिल्ली की 0.5 प्रतिशत (आधे प्रतिशत) जमीन पर बसी हुई हैं। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में लगभग 800 झुग्गी-बस्तियां हैं, जो कि 0.6 प्रतिशत जमीन पर बसी हैं।

IMG-20190724-WA0024.jpg

सरकार का मानना है कि इन बस्तियों में 15 से 20 से लाख लोग रहते हैं जबकि सच्चाई है कि यह संख्या दुगुनी है। गांव से उजड़े हुए लोगों को शहर में पनाह देने वाला स्थल झुग्गी बस्ती ही है, जिनके पास किसी तरह का शहरी निवासी होने का दस्तावेज नहीं है।

केंद्र और राज्य सरकार अपने अगामी चुनावी एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है और झुग्गी-बस्तियों का सर्वे एक निजी संस्था एसपीवाईएम से करा रही हैं। किसी बस्ती में सर्वे कराने का प्रचार डीडीए द्वारा किया जा रहा है तो किसी बस्ती में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड द्वारा मुख्यमंत्री आवास देने की बात कही जा रही है। इस सर्वे से लोगों में एक डर व्याप्त है कि सर्वे के नाम पर लोगों की बस्तियों को तोड़ कर बेघर कर दिया जायेगा। यह डर जायज भी है, क्योंकि सर्वे करने से पहले क्षेत्र के जन प्रतिनिधियों या जिम्मेवार अधिकारियों द्वारा लोगों को विश्वास में नहीं लिया गया और बस्तियों में नोटिस चिपका दिये गये। अगर कहीं पर जन प्रतिनिधि लोगों के सामने आये तो वे अपनी पार्टी का प्लान बता कर लोगों को सपने दिखाने लगे कि आप को एक करोड़ की सम्पत्ति मिल जायेगी। जब लोगों ने सवाल किया तो वे जवाब देने के बजाय दोषारोपण करने लगे कि पब्लिक को भड़काया जा रहा है।

20190724_105137.jpg

बस्तियों में नोटिस चिपका कर एसपीवाईएम द्वारा सर्वेक्षण की तारीख तय कर दी गई। तय तारीख पर लोग डरे-सहमे अपने काम-काज से छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। दक्षिणपुरी के विराट सिनेमा के पास सी ब्लॉक और दक्षिणपुरी एक्सटेंशन के शहीद कैंप, ब्लॉक 16 के झुग्गी-बस्ती में 15 जुलाई को उपनिदेशक (समाजशास्त्र) के हस्ताक्षर वाला नोटिस लगाया गया कि 24 जुलाई को एसपीवाईएम द्वारा सर्वे किया जायेगा। इस नोटिस के बाद बस्ती वाले लोगों में भय व्याप्त हो गया और वह 24 जुलाई को अपने काम से छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। इन बस्तियों में रहने वाले लोग बेलदारी, दुकानों और प्राइवेट दफ्तरों में काम करते हैं और महिलाएं ज्यादतर कोठियों में घरेलू काम के लिए जाती हैं।

सी ब्लॉक, अम्बेडकर कैम्प में रहने वाले दूलीचंद (56) बताते हैं कि वह तारवाती अस्पताल के पास लेबर चौक पर काम के लिए जाते हैं लेकिन बुधवार को वह लेबर चौक नहीं गये और सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। उन्होंने बताया कि 5 सदस्यीय परिवार में वही अकेले कमाने वाले व्यक्ति हैं। इसी बस्ती में रहने वाले राकेश ने बताया कि वह पुष्प बिहार में पूड़ी-सब्जी बेचते हैं लेकिन सर्वे कराने के लिए ही वह अपनी दुकान नहीं लगाये।

यह कहानी केवल इसी बस्ती के लोगों की नहीं है। शहीद कैम्प में रहने वाली गीता ने बताया कि उनका परिवार इस बस्ती में 40 साल से अधिक समय से रह रहा है और वह नेहरू प्लेस में कम्प्यूटर ऑपरेटर की नौकरी करती है। वह सर्वे कराने के लिए ही घर पर छुट्टी लेकर रूकी कि जब सर्वेकर्ता आएंगे तो वह अपने भाई को भी फोन करके बुला लेगी। कुछ इसी तरह की कहानी ऑफिस में पिऊन का काम करने वाले राकेश ने भी बताया कि वह छुट्टी लेकर घर पर रहे और उनकी ही तरह कम से कम 100-150 लोग छुट्टी लेकर सर्वेकर्ता का इंतजार करते रहे। अगर एक दिन सर्वे करने वाले नहीं आए तो प्राइवेट कामों में छुट्टी लेना आसान नहीं होता है, दिहाड़ी भी कटती है, बात भी सुननी पड़ती है और नौकरी जाने का भी खतरा होता है।

12 बजे तक जब कोई सर्वेकर्ता नहीं आया तो कुछ लोग एसपीवाईएम के नम्बर पर बार-बार फोन करके शिकायत करने लगे, जिनका सही उत्तर देने के बजाय एसपीवाईएम के लोगों ने फोन पर जानकारी लेने वालों के साथ डांट-डपट किया। काफी फोन करने के बाद सी ब्लॉक बस्ती में पांच सदस्यीय सर्वेकर्ता पहुंचे। उन्होंने बताया कि वे लोग बिहार के रहने वाले हैं और जीटीबी नगर में एसपीवाईएम के कैम्प में रह रहे हैं। उन्हें उसी दिन खबर दी गई कि इन बस्तियों में सर्वे करना है और उनको जगह भी मालूम नहीं थी। सर्वेकर्ता सर्वे के उपरांत लोगों को किसी तरह का सबूत नहीं दे रहे थे, जिसके कारण लोगों में रोष व्याप्त हुआ और उन्होंने सर्वे को रोक दिया।

उत्तरी दिल्ली के बस्तियों में भी देखा गया कि एसपीवाईएम ने सर्वेकर्ता को किसी तरह की ट्रेनिंग नहीं दी थी, जिसके कारण सर्वेकर्ता सही से फॉर्म भी नहीं भर पा रहे थे और किसी तरह से अपना कोरम ही पूरा कर रहे थे। जहां अब सभी सर्वे टैब पर होता है वहीं एसपीवाईएम फॉर्म पर सर्वे कर रहा था। यहां तक कि उसके कॉलम में कहीं भी वीपी सिंह की टोकन को शामिल नहीं किया गया था जबकि बस्ती वालों का पहला दस्तावेज वही है।

20190725_082225.jpg

लोगों का डर जायज है, क्योंकि एक गैरजिम्मेवार एजेंसी को सर्वे का काम दिया गया है जो कि किसी तरह खानापूर्ति करना चाहती है। दूसरी बात है कि इन-सीटू अपग्रेडेशन का काम 1990 के बाद दिल्ली में हुआ ही नहीं है। 2000 में जिस तरह से लोगों की बस्ती तोड़कर उनको नरेला, बावना, भोरगढ़, भलस्वा जैसी जगहों पर बसाया गया, उससे भी लोगों को डर है कि उनकी बस्ती को तोड़कर उनको दूर भेजा जा सकता है।

इन-सीटू अपग्रेडेशन में भी असली मामला जमीन का है-जिस जमीन को बस्ती वालों ने रहने योग्य बनाया और जिसका बाजार मूल्य काफी हो चुका है, उस जमीन को हड़पने का है। हाल में इन-सीटू अपग्रेडेशन के लिए चुनी गई कठपुतुली कॉलोनी से हम समझ सकते हैं कि यह बस्ती जब बसी थी तो यहां आस-पास कुछ नहीं था। उनके आने के बाद ही फ्लाइओवर और मेट्रो का निर्माण हुआ, जिसके बाद उस जमीन का मूल्य काफी बढ़ गया और उस जमीन को 60 और 40 के अनुपात में बांटकर डेवलपर को दे दिया गया। लेकिन डेढ़ साल बाद भी वहां पर अभी मकान नहीं बन पाया है। जो झुग्गी-बस्ती दिल्ली के आधे प्रतिशत जमीन पर बसी है उसको वहां से हटा कर और कम पर बसाने की योजना है। अगर हम इसको कठपुतुली के तर्ज पर देखें तो इन बस्तियों को 0.3 प्रतिशत जमीन ही मिलेगा, बाकी जमीन को डेवलपर बेच कर मुनाफा कमायेगा। इन बस्ती वालों के लिए कम से कम 3-4 प्रतिशत जमीन सरकार को देनी चाहिए, क्योंकि इनकी आबादी 20 प्रतिशत से कम नहीं है। अतः इनको उचित जमीन मिलनी चाहिए और फ्लैट की जगह इनको 50 गज की जमीन मिले, ताकि इनकी आने वाली पीढ़ी भी अपना गुजर-बसर कर सके।

लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) से जुड़े हैं

Delhi
jhuggi
Modi government
Arvind Kejriwal
kejriwal sarkar
DDA
Workers
poor workers
CM Housing Scheme
PM Housing Scheme
PM AWAS
CM AWAS

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

धनशोधन क़ानून के तहत ईडी ने दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार किया

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग


बाकी खबरें

  • CM YOGI
    श्याम मीरा सिंह
    मथुरा में डेंगू से मरती जनता, और बांसुरी बजाते योगी!
    04 Sep 2021
    मथुरा के हर गांव की हालत ऐसी है कि प्रत्येक गांव में डेंगू के मरीज निकल आएंगे, मथुरा के फरह ब्लॉक में स्थित कोह गांव में अभी तक 11 लोगों ने डेंगू और वायरल फीवर से अपनी जान गंवा दी। इसी तरह गोवर्धन…
  • गुजरात के एक जिले में गन्ना मज़दूर कर्ज़ के भंवर में बुरी तरह फंसे
    दमयन्ती धर
    गुजरात के एक जिले में गन्ना मज़दूर कर्ज़ के भंवर में बुरी तरह फंसे
    04 Sep 2021
    डांग जिले के गन्ना कटाई के काम से जुड़े श्रमिकों को न तो मिल-मालिकों द्वारा ही श्रमिकों के तौर पर मान्यता प्रदान की गई है और न ही उन्हें खेतिहर मजदूर के बतौर मान्यता दी गई है।
  • क्या अफ़गानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देना भारत के हित में है? 
    एम. के. भद्रकुमार
    क्या अफ़गानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देना भारत के हित में है? 
    04 Sep 2021
    इस बात की संभावना जताई जा रही है कि तालिबान के नेतृत्व में बनने वाली सरकार एक समावेशी गठबंधन की सरकार होगी। अब तक की मिली रिपोर्टों के अनुसार इस संबंध में शुक्रवार को काबुल में घोषणा होने की उम्मीद…
  • दिल्ली दंगे: गिरफ़्तारी से लेकर जांच तक दिल्ली पुलिस लगातार कठघरे में
    मुकुंद झा
    दिल्ली दंगे: गिरफ़्तारी से लेकर जांच तक दिल्ली पुलिस लगातार कठघरे में
    04 Sep 2021
    यह कोई पहली बार नहीं है जब पुलिस की जांच पर सवाल उठ रहे हैं। इससे पहले भी कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • किसान महापंचायत के लिए एकजुटता। 5 सितंबर की महापंचायत के लिए किसान-मज़दूर पिछले काफी दिनों से लगातार छोटी-छोटी पंचायतें कर रहे हैं। मुज़फ़्फ़रनगर के सरनावली गांव में 23 अगस्त को हुई पंचायत का दृश्य। 
    लाल बहादुर सिंह
    मुज़फ़्फ़रनगर महापंचायत : जनउभार और राजनैतिक हस्तक्षेप की दिशा में किसान आंदोलन की लम्बी छलांग
    04 Sep 2021
    किसान आंदोलन देश में नीतिगत बदलाव की लड़ाई के लिए एक बड़ी राष्ट्रीय संस्था बनने की ओर बढ़ रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License