NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
दिल्ली-एनसीआर में रेहड़ी-पटरी वाले संकट में, नई नीति से भी कोई हल नहीं
साग-सब्जी लेकर ढेर सारे सामान हम फुटपाथों और संडे-मंडे मार्केटों से ही लेते हैं। बहुत ही आसानी से हम राह चलते उनसे सामान खरीद कर चल देते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में हमारा ध्यान रेहड़ी-पटरी वालों के काम में दिन प्रतिदन आने वाली दुश्वारियों की तरफ नहीं जाता है।
प्रदीप सिंह
14 Sep 2019
footpath vendors
फोटो साभार : नवोदय टाइम्स

किसी भी शहर में सड़क के किनारे फुटपाथों पर लगने वाली दुकानें ही मुख्यत: लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करती हैं। साग-सब्जी लेकर ढेर सारे सामान हम फुटपाथों और संडे-मंडे मार्केटों से ही लेते हैं। बहुत ही आसानी से हम राह चलते उनसे सामान खरीद कर चल देते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में हमारा ध्यान रेहड़ी-पटरी वालों के काम में दिन प्रतिदन आने वाली दुश्वारियों की तरफ नहीं जाता है। पुलिस, प्राधिकरण और स्थानीय गुंडों को हफ्ता देने के बावजूद उनका काम आसान नहीं है। पुलिस-प्रशासन की जब भी भौं टेढ़ी होती है तो उसका खामियाजा सबसे पहले रेहड़ी-पटरी वालों को ही उठाना पड़ता है। दिल्ली-एनसीआर में इस समय रेहड़ी-पटरी वाले ऐसे ही मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।

दिल्ली में डीडीए और एनडीएमसी के नियम-कानूनों के दायरे में न आने के कारण ढेर सारे रेहड़ी-पटरी वालों को अपनी दुकाने बंद करनी पड़ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रेहड़ी-पटरी पर अपनी दुकानों को सजाने वाले नियम-कानून का उल्लंघन करते हैं?

2014 में यूपीए सरकार ने रेहड़ी-पटरी वालों के अधिकारों के लिए रेहड़ी पटरी कानून पूरे देश के लिए पास किया था। कानून के हिसाब से लाइसेंस लेकर रेहड़ी–पटरी पर व्यापार किया जा सकता है। एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारत ही नहीं विकसित देशों में भी सड़क के किनारे दुकानें देखी जाती हैं। इसलिए उन्हें उजाड़ने की बजाय नियमित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि दुकानों को नियमित करने के लिए स्थानीय निकाय लाइसेंस की संख्या तय कर देते हैं। और लाइसेंस के लिए नियम-कानून की पूर्ति करना सबके वश की बात नहीं होती है।

अभी कुछ महीने पहले केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय आजीविका मिशन (NULM) के तहत देश भर में सचल दुकानों की योजना बनाई है। इसके तहत देश के 2430 शहरों में 18 लाख रेहड़ी-पटरी वालों की पहचान की गई है। रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाकर जीविका चलाने वालों की यह बहुत छोटी संख्या है। सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे देश तो क्या किसी एक शहर में कितने लोग रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाते हैं, इसका कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब18 महीने पहले वेंडर जोन पॉलिसी को मंजूरी दी थी। नोएडा अथॉरिटी ने इसके लिए 243 वेंडर जोन चिह्नित किए हैं। जिनमें 1100 दुकानें देने की व्यवस्था है। जबकि सच्चाई यह है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में दसियों हजार लोग सड़कों के किनारे दुकानें लगाकर अपना भरण-पोषण करते हैं। ऐसे में अधिकांश लोगों को लाइसेंस नहीं मिल सकेगा। फिलहाल अभी तक एक भी लाइसेंस जारी नहीं हुआ है। 8 हजार लोगों ने इसके लिए आवेदन किए थे।

3 महीने पहले अथॉरिटी ने इनके लाइसेंस जारी करने की तैयारी कर दी थी लेकिन एक महीने पहले पुरानी प्लानिंग को बीच में रोककर अचानक रेहड़ी-पटरी वालों को हटाने का अभियान शुरू कर दिया। नोएडा अथॉरिटी की नवनियुक्त सीईओ रितु माहेश्वरी ने शहर की सड़कों पर लगने वाले जाम और अव्यवस्था के लिए रेहड़ी पटरी वालों को जिम्मेदार ठहराया है।

फरवरी माह में उत्तर प्रदेश शासन ने रेहड़ी-पटरी वालों के लिए नई नीति घोषित की थी। यह नीति नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में भी लागू की गई है। प्राधिकरण के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी आरके मिश्रा का कहना है कि पूरे शहर में वेडिंग जोन तय कर लिए हैं। नए नियमों के तहत सड़कों, फुटपाथ, ओवरब्रिज, फ्लाई ओवर और दूसरे रास्तों पर रेहड़ी पटरी नहीं लगेंगी। प्राधिकरण का शुरुआती आकलन है कि शहर में करीब1,000 लोगों को लाइसेंस जारी किए जाएंगे। तीन वर्ष बाद लाइसेंस का नवीनीकरण होगा। नियमों के तहत लाइसेंस उसी व्यक्ति को मिलेगा जिसके पास आजीविका कोई अन्य साधन नहीं है।

वेंडर जोन पॉलिसी के तहत अथॉरिटी पिछले एक महीने से रेहड़ी-पटरी को हटा रही है। जिसके चलते करीब25 हजार से भी ज्यादा लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इनमें सब्जी से लेकर रोजमर्रा की जरूरत से जुड़े अन्य सामान बेचने वाले लोग भी शामिल हैं।
IMG1-1040x570.jpg

रेहड़ी-पटरी एसोसिएशन के गंगेश्वर दत्त शर्मा ने कहा कि अथॉरिटी ने वेंडर जोन नहीं बनाया, न ही सर्वे हुआ, फिर भी रेहड़ी-पटरी को उजाड़ा जा रहा है। अथॉरिटी अतिक्रमण के नाम पर रेहड़ी-पटरी वालों को उजाड़ रही है। ऐसी खराब स्थिति पिछले 30 साल में कभी नहीं हुई।

बिना वेंडर जोन पॉलिसी लागू किए अतिक्रमण हटाने के नाम पर हो रहे शोषण के खिलाफ10 हजार से अधिक रेहड़ी-पटरी वालों ने नोएडा अथॉरिटी के कार्यालय पर प्रदर्शन भी किया। अथॉरिटी के अधिकारियों के साथ प्रदर्शनकारियों की मीटिंग भी हुई लेकिन कोई हल नहीं निकला।

नोएडा अथॉरिटी के ओएसडी एमपी सिंह कहते हैं कि “हमने रेहड़ी-पटरी वालों का ज्ञापन ले लिया है। उनसे कहा है कि जहां-जहां कोर्ट का स्टे है, वहां हम रेहड़ी वालों को नहीं हटाएंगे। बाकी जगह अभियान जारी रहेगा। एक महीने के अंदर वेंडर जोन पॉलिसी के लिए लोगों को लाइसेंस जारी करने का प्रयास किया जाएगा।”
IMG2.jpg

दिल्ली में भी आए दिन रेहड़ी-पटरी वालों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली कांग्रेस के नेता देवेन्द्र यादव ने केजरीवाल सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि दिल्ली सरकार एक सप्ताह में रेहड़ी पटरी अधिनियम के तहत टाउन वेंडिग कमेटी की मान्यता को मंजूर नहीं दिया तो दिल्ली के टाउन वेंडिग कमेटी के सभी सदस्यों के साथ लाखों रेहड़ी पटरी वाले 15 सितंबर को विशाल धरना देंगे।

कांग्रेस से जुड़े मुकेश गोयल कहते हैं कि दिल्ली में रेहड़ी पटरीवालों के साथ अन्याय हो रहा है। रेहड़ी पटरी वाले सम्मानपूर्वक अपना व्यापार करके अपनी जीविका चलाने में व्यवधान डाला जा रहा है। दिल्ली सरकार यदि 2014 में पारित रेहड़ी पटरी अधिनियम को लागू कर दे तो इसका सीधा फायदा दिल्ली के 5 लाख रेहड़ी पटरी के परिवार वालो को मिलता, जो आज के दौर में चल रही आर्थिक मंदी के शिकार हैं।

FOOTPATH VENDORS
Delhi
ncr
Supreme Court
National Livelihood Mission
UttarPradesh
Congress
AAP
Arvind Kejriwal
economic crises
BJP

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट


बाकी खबरें

  • LAW AND LIFE
    सत्यम श्रीवास्तव
    मानवाधिकारों और न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाता उत्तर प्रदेश : मानवाधिकार समूहों की संयुक्त रिपोर्ट
    30 Oct 2021
    29 अक्तूबर को जारी हुई एक रिपोर्ट ‘कानून और ज़िंदगियों की संस्थागत मौत: उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा हत्याएं और उन्हें छिपाने की साजिशें’ हमें उत्तर प्रदेश में मौजूदा कानून व्यवस्था के हालात को बेहद…
  • migrant
    सोनिया यादव
    महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या
    30 Oct 2021
    एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल भारत में तकरीबन 1 लाख 53 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से सबसे ज़्यादा तकरीबन 37 हज़ार दिहाड़ी मजदूर थे।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    आंदोलन की ताकतें व वाम-लोकतांत्रिक शक्तियां ही भाजपा-विरोधी मोर्चेबन्दी को विश्वसनीय विकल्प बना सकती है, जाति-गठजोड़ नहीं
    30 Oct 2021
    पिछले 3 चुनावों का अनुभव गवाह है कि महज जातियों के जोड़ गणित से भाजपा का बाल भी बांका नहीं हुआ, इतिहास साक्षी है कि जोड़-तोड़ से सरकार बदल भी जाय तो जनता के जीवन में तो कोई बड़ी तब्दीली नहीं ही आती, संकट…
  • Children playing in front of the Dhepagudi UP school in their village in Muniguda
    राखी घोष
    ओडिशा: रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न-आय वाले परिवारों के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि जब अगस्त 2021 में सर्वेक्षण किया गया था तो ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28% बच्चे ही नियमित तौर पर पठन-पाठन कर रहे थे, जबकि 37% बच्चों ने अध्ययन बंद कर दिया था।…
  • climate change
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देश भारी हथियारों से लैस एजेंटों को तैनात करके, परिष्कृत और महंगी निगरानी प्रणाली, मानव रहित हवाई प्रणाली आदि विकसित करके पलायन को रोकने के लिए एक ''जलवायु दीवार'' का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License