NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
दिल्ली की सड़कों पर उतरे दृष्टिबाधित दिव्यांग विधार्थी
हम परेशानियों का हल नहीं निकाल रहे है बल्कि परेशानियों की पैकेजिंग कर उसे जनता में बेचने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने विकलांग को दिव्यांग कहकर पुकारने की अपील की और समझ लिया कि दिव्यांगों के प्रति उसका काम पूरा हो गया।
अजय कुमार
07 Aug 2018
Blind students delhi

हम परेशानियों का हल नहीं निकाल रहे है बल्कि परेशानियों की पैकेजिंग कर उसे जनता में बेचने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने विकलांग को दिव्यांग कहकर पुकारने की अपील की और समझ लिया कि दिव्यांगों के प्रति उसका काम पूरा हो गया। समाज कल्याण विकास और बाल विकास विभाग बना दिया और समझ लिया कि बच्चों के प्रति उसकी ध्यान देने की जिम्मेदारी खत्म हो गयी। हमने नीतियों के नाम पर सबकी पैकेजिंग कर दी, सारी परेशानियों को हिंदी के सुनहरें शब्दों में ढाल दिया और मान लिया कि भारत माता की जय हो जाएगी।  

भारत की राजधानी दिल्ली में दिव्यांग लड़कों के अध्ययन-अध्यापन के लिए एकमात्र आवासीय सीनियर सेकंडरी ब्लाइंड स्कूल है। इस स्कूल में अपना भविष्य बनाने के लिए देश के हर हिस्से से लड़के पढ़ने आते हैं। दिल्ली के किंग्सवे कैम्प के इलाके में जहां यह स्कूल मौजूद है,उस इलाके को समाज कल्याण विभाग ने सेवा कुटीर का नाम दिया है। लेकिन इस कुटीर की जमीनी हकीकत सरकार के लोक-कल्याणकारी सेवाभावना की किताबी और भाषणबाज़ी बयानों से कोसों दूर है।

इस जमीनी हकीकत में रह रहे दृष्टिबाधित विधार्थियों का सब्र टूट गया। पिछले कई सालों से सेवा कुटीर के भीतर होने वाला संघर्ष 6 जुलाई को सड़कों पर आ गया। दृष्टिबाधित स्कूल के साथ दिल्ली का जुवनाइल जस्टिस कोर्ट और जेल भी है। दृष्टिबाधित दिव्यांग विधार्थियों ने सुबह तकरीबन 10 बजे  के आस-पास जेल की पुलिसिया तंत्र की यातायात सुविधा का सारा ताम-झाम रोक दिया। सरकारी तंत्र और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारे लगाने शुरू किये। क्लास 1 से 12 तक की पढाई पढ़ने वाले लड़कों की जुबानी नारों को सुनकर और उनकी दृष्टिबाधित दिव्यांगता देखकर पुलिस भी कुछ समय तक आवाक रह गयी। कई घंटों तक पुलिस को समझ नहीं आया कि वह करे तो क्या करे? आँख रहते हुए भी अंधों की तरह शासन चलानी वाली सरकारों की जी हुजूरी करे या दिव्यांगों के साथ चली आ रही अन्याय का कुछ समय तक साथ दे। पुलिस कुछ देर तक दिव्यांगों के सशक्त जज्बातों को देखती रही, उनके नारों में खुद को शर्मशार महसूस करती रही। बाद में वही किया जो सरकार के अधीन काम करने वाली किसी पुलिसिया तंत्र के लोग करते हैं।  

लोकतंत्र के इस जुझारू दृश्य में  मैं अपनी पत्रकारीय भूमिका निभाने लगा। वह सारी जरूरी जानकारीयां जानने की कोशिश की, जिसके लिए जूझते  हुए दृष्टिबाधित दिव्यांग सड़क पर पहुंच चुके थे। 'हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है' की गूंज से आसमान को शर्मिंदा कर रहे थे। आसमान  हल्की-हल्की बारिश में रो रहा था, मैं पूछ रहा था और दिव्यांग विधार्थी जवाब दे रहे थे। 

 

साथियों आपकी परेशानी क्या है ?

दिव्यांग विद्यार्थी -  पिछले 8-10 सालों से इस स्कूल में कोई भी प्रधानाचार्य नहीं है। शिक्षकों की भारी कमी है। क्लास 1 से 12 तक के दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए तकरीबन 21 शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान है। लेकिन पिछले कुछ सालों से केवल 3 शिक्षकों और 6 कॉन्ट्रैक्ट पर रखे हुए शिक्षकों की रहमों-करम पर हमारा भविष्य छोड़ दिया गया है। हम पिछले कई महीनों से हमारे भविष्य के साथ हो रही, इस नाइंसाफी के खिलाफ समाज कल्याण विभाग में लिखित अर्जी लगा रहे हैं। कई बार हमने रैलियां भी निकालीं लेकिन कुछ नहीं हुआ। समाज कल्याण विभाग के सेक्रेटरी कहते हैं कि 'हम तुम्हें मुफ्त रोटी-पानी दे रहे हैं, तुम्हें और क्या चाहिए'

 

क्या आपलोग अपना मांग पत्र दिखा सकते हैं ? 

दिव्यांग विधार्थी - जी बिल्कुल। यह बात अलग है कि  पत्रकारों पर भरोसा कम रह गया है लेकिन बिना आपलोगों के हमारी क्या किसी की भी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। उनके मांग पत्र की मांगे-  1. स्कूल में प्रधानाचार्य का न होना, इस पर कोई सुनवाई नहीं। 2. अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं दी गयी है कि विधालय में अध्यापकों की नियुक्ति की जा रही है या नहीं 3. पिछले कुछ सालों से 9 से 12 वीं क्लास के विद्यार्थियों को ऑडियो डिवाइस नहीं दिया गया। आख़िरकार जब पढ़ने के साधन ही नहीं रहेंगे तो हम पढ़ेंगे क्या ? 4. स्कूल में कप्यूटर और इ-लाइब्रेरी नहीं होना। 5. हमारे हॉस्टल में वार्डेन के पद की नियुक्ति न होना। 

Divyaang students 2.jpg

आपके नारों में मौजूद गुस्सा यह बताता है कि आपलोगों के साथ और भी नाइंसाफीयां हो रही हैं ? क्या मैं सही सोच रहा हूँ। 

दिव्यांग विधार्थी - हमारे साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी तो ईश्वर करता है ।हम जन्म से ही  दुनिया को वैसे नहीं समझ पाते जैसे आप लोग देखते और समझते  हैं। हमें लगता है कि ईश्वर जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। लेकिन आप लोग ईश्वर साबित करने में लग जाते हैं कि हम जैसों ने पिछले जन्म में जरूर कोई घोर अपराध किया होगा ,इसलिए अंधें है। जरा सोचकर देखिए कि न्यायालय आपको फांसी की सजा दे और यह न बातये कि आपका अपराध क्या है? तब आपको कैसा लगेगा? आप गुस्सा होंगे,झलाएंगे, न्यायलय के अस्तित्व को खारिज करेंगे और अपनी नियति पर हसेंगे। हमारे साथ भी यही होता है। खैर इन सब बातों को छोड़िए...हम अंधे हैं इसलिए आप समझ सकते हैं कि मांग पत्र की बातें हमारी हैं लेकिन पत्र हमने नहीं लिखा है। हमारे अंधे होने की वजह से हमारी मूलभूत सुविधाओं की प्रदायगी  में घोर लापरवाही बरती जाती है। कई दिन हो गए,ऐसा खाना नहीं खाया है, जिसे खाने के बाद लगे कि अच्छा खाना मिला है। हमारे भोजन को आप चख भी नहीं पाएंगे। पानी की व्यवस्था  ऐसी है जैसे गंदगी ने अंधों को ही अपना साथी चुना  हो। हॉस्टल में अभी तक वार्डन की नियुक्ति नहीं हुई है ।साफ-सफाई के लिए दो चार लोग रखे गए हैं लेकिन वे घोर लापरवाही बरतते हैं। हम जिन आवासीय भवनों में रहते हैं, वह जर्जर हो चूका है।  मनीष सिसोदिया से लेकर सुषमा स्वराज तक यहां आ चुकी है लेकिन इनकी दिलचस्पी जुवनाइल जेल के बच्चों के साथ अधिक झुकी रहती है। हम कभी मीडिया की टीआरपी में सहयोग नहीं कर पाते और न ही तादाद में इतने अधिक है कि सरकारें बदल दें इसलिए हमारी कोई नहीं सुनता। जुवनायल में रहने वाले हमारे साथी गुस्से में आकर हर महीने तोड़ फोड़ करते हैं, आग लगा देते हैं, अभी कुछ ही महीने पहले सिलिंडर से आग लगा दिया था ।लेकिन हमारे पास गुस्सा तो है  लेकिन आंख न होने की वजह से गुस्सा दिखाने की ऐसी तरकीबे नहीं। हम चिल्ला सकते हैं, नारें लगा सकते हैं । आज सड़क पर निकलें है ,सड़क को बांधने की कोशिश करेंगे। लेकिन अंधें हैं, इसलिए पता है कि हम अधिक देर तक टिक नहीं पाएंगे। फिर भी हम भी जान चुके हैं कि जब तक लड़ेंगे नहीं तब तक कुछ होने वाला भी नहीं। पिछले कुछ सालों से लोग हमें दिव्यांग कह रहे हैं , थोड़ा अटपटा लगता है लेकिन आज अपने साथियों की जुझारू गूंज सुनकर दिव्यांग जैसा एहसास हो रहा है।

जरूरी जानकारियां मिल चुकी थी। पुलिस का भी धैर्य जवाब दे चूका था। पुलिस अब विद्यार्थियों को रोकने की कोशिश करने।  दृष्टिबाधित विधार्थी सड़क जाम करने की कोशिश में लग गए। चूँकि आँखों में कम रौशनी थी ,इसलिए सड़क जाम करने परेशानी हो रही थी।  पुलिस और विद्यार्थियों के बीच झड़प होने लगी।  बत्रा और जीटीबी नगर मेट्रो के बीच मौजूद  सड़क ट्रैफिक जाम हो गया। मैं चुपचाप इस जुझारू संघर्ष की कहानी लिखने ऑफिस की तरफ मूड़ चला। रास्ते में बजरंग सोनी मिले उदास मन से कहने लगे कि जिनके पास आँखें नहीं है, वह सड़क पर है, हिम्मत के साथ अपने हक और हकूक की लड़ाई लड़ रहे हैं, और जिनके पास आँखें हैं,वह लड़ नहीं रहे हैं दूसरों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। 


बाकी खबरें

  • कोविशील्ड, कोवैक्सीन की एक-एक खुराक से बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता हो सकती है विकसित: अध्ययन
    भाषा
    कोविशील्ड, कोवैक्सीन की एक-एक खुराक से बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता हो सकती है विकसित: अध्ययन
    09 Aug 2021
    यह अध्ययन उत्तर प्रदेश में 98 लोगों पर किया गया, जिनमें से 18 ने अनजाने में टीके की पहली खुराक कोविशील्ड और दूसरी खुराक कोवैक्सीन ले ली थी तथा इन दोनों टीकों की एक-एक खुराक लेने से उनमें बेहतर रोग…
  • टिकैत
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    मुज़फ़्फ़रनगर में 5 सितंबर की किसान महापंचायत में आर-पार की रणनीति बनेगी : टिकैत
    09 Aug 2021
    जेवर में सबौता अंडर पास के पास आयोजित किसान महापंचायत में राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों को बर्बाद करने के लिए बिना मांगे ये कृषि कानून देश के किसानों पर थोप दिए गए हैं, जिससे किसान पहले कर्ज में…
  • कोरोना
    भाषा
    दिल्ली: पिछले तीन महीने में भेजे गए नमूनों में से 80 फीसदी में वायरस का डेल्टा स्वरूप पाया गया
    09 Aug 2021
    महाराष्ट्र में ‘जीनोम सीक्वेंसिंग’ के दौरान कोरोना वायरस संक्रमण के डेल्टा प्लस स्वरूप के कुल 45 मामले सामने आए हैं।
  • ‘आगे बढ़ने के संदेश’ के साथ टोक्यो ओलंपिक का समापन, अब पेरिस में मिलेंगे
    एपी/भाषा
    ‘आगे बढ़ने के संदेश’ के साथ टोक्यो ओलंपिक का समापन, अब पेरिस में मिलेंगे
    09 Aug 2021
    कांस्य पदक विजेता बजरंग पूनिया भारतीय दल के ध्वजवाहक थे और भारत के सबसे बड़े दल ने इतिहास में सबसे ज्यादा पदक हासिल कर खेलों को ‘गुडबॉय’ कहा।
  • नागरिक होने का अधिकार
    रोमिला थापर
    नागरिक होने का अधिकार
    09 Aug 2021
    नागरिकता को लेकर भारत के आम लोगों के बीच चार मशहूर बुद्धिजीवियों ने भारत में नागरिकता का गठन करने वाले उन प्रमुख पहलुओं का गहराई से अध्ययन किया है, जो हाल ही में सत्ता पर काबिज सरकार के विवादास्पद…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License