NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली मेट्रो को लाभ कमाने वाले साधन के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए
भारत की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर अक्सर ज़्यादा रहता है। यह सही समय है जब यहां के नागरिकों को जर्मनी से सीख लेने की ज़रूरत है और गुणवत्तापूर्ण हवा में सांस लेने के अपने अधिकार को पुनःप्राप्त करने की ज़रूरत है।
टिकेंदर सिंह पंवार
17 Feb 2018
delhi metro

हवा की गुणवत्ता में सुधार और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन देने वालों के लिए एक अच्छी ख़बर है। लेकिन ये ख़बर भारत के लोगों के लिए नहीं बल्कि जर्मनी के नागरिकों के लिए है। जर्मनी की सरकार ने फ़ैसला किया है कि सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने पर वह अपने नागरिकों से कोई किराया नहीं लेगा।

इस तरह के क़दम उठाने का मुख्य कारण जर्मनी के शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण है। जर्मनी के कुछ शहरों में वायु प्रदूषण की वृद्धि देखी जा रही है। इन शहरों में विशेष रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड की वृद्धि से प्रदूषण में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हालांकि ये स्तर भारत की तुलना में बहुत कम है लेकिन लोगों की संवेदनशीलता काफी ज़्यादा है जिसने सरकार को अलग तरीक़े से सोचने के लिए मजबूर किया है। यहां तक कि यूरोपीय संघ ने इसी तरह के शहरी हवा की गुणवत्ता के नियमों को निर्धारित किया है। जर्मनी में अदालतें स्वतंत्र रूप से सबसे बुरी तरह प्रभावित शहरों में से कुछ शहरों में डीजल वाहनों के चलाने पर प्रतिबंध लगाने का विचार कर रही थी।

जर्मनी में सार्वजनिक परिवहन मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में शहर की सरकारों द्वारा चलाया जाता है। संघीय सरकार भी इस तरह के कार्यों के लिए शहरों को मदद करने की योजना बना रही है (मुफ्त सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल)। ये प्रयोग पांच मॉडल शहरों में प्रारंभ किया जाएगा, जहां इसकी प्रभावशीलता के लिए छोटे पैमाने पर प्रयोग होंगे।

मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की आर्थिक व्यवहारिकता पर जर्मन परिवहन कंपनियों के एक वर्ग द्वारा आवाज़ उठाई गई। यह अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष 15 बिलियन डॉलर (₹ 95.8 लाख करोड़ रुपए) से ज़्यादा का राजस्व का नुकसान टिकट की बिक्री से होगा। इसलिए एक दृढ़ वित्तीय आधार की आवश्यकता है यह सुनिश्चित करने के लिए कि ख़तरनाक प्रदूषण से शहर को बचा लिया गया। जर्मनी के नागरिकों ने फैसला किया है कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे और इस सुधार के साथ आगे बढ़ेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे की उनके सार्वजनिक परिवहन मजबूत किया जाए।

जहां तक वायु की गुणवत्ता का संबंध है, भारतीय शहरों के मामले कहीं अधिक खतरनाक स्तर पर है। भारत के शहरों की स्थिति दुनिया के उन शहरों जैसी है जहां वायु सबसे प्रदूषित है। दुनिया में सबसे प्रदूषित बीस शहरों में से भारत के आठ शहर हैं। हवा ज़हरीली हो गई है। अतीत में हवा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए सुझाव दिए गए हैं। जैसे कि बेहतर ईंधन, बेहतर दहन इंजन आदि।

शहरों में वायु की गुणवत्ता में गिरावट और ऑटोमोबाइल में वृद्धि के बीच सीधा संबंध है। समाधान अविश्वसनीय रूप से सरल है। या तो शहरों में ऑटोमोबाइल की संख्या कम की जाए या हवा की स्थिति ख़राब होने के लिए छोड़ दिया जाए। यदि ऑटोमोबाइल (निजी परिवहन की संख्या) को कम किया जाना है तो इसके लिए केवल एक ही व्यवहार्य समाधान है कि सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए। दुर्भाग्यवश, सार्वजनिक परिवहन को लाभ कमाने वाला जन सेवा माना जाता है। जन सेवा की संरचना का ऐसा नज़रिया लंबे समय के लिए अपने उद्देश्य में सफल नहीं होंगे। इसका महत्व कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में ही नहीं है बल्कि परिवेश में प्रदूषण को कम करने में भी है। यह शायद ही ध्यान में रखा जाता है।

सड़कों पर कारों को सुविधाजनक बनाने के लिए शहरों में सड़क ढांचे के लिए सब्सिडी दी जा रही है। सार्वजनिक परिवहन पर गंभीरता से चर्चा नहीं की जा रही है। जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) में कुछ चर्चाएं हुईं तब कुछ बीआरटी और ऐसे अन्य कॉरिडोर विकसित किए गए लेकिन जल्द ही अधिकांश शहरों में नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

राजधानी दिल्ली में मेट्रो रेल का उत्कृष्ट बुनियादी ढांचा है। बचे हुए क्षेत्रों तक सुविधा पहुंचने के लिए मेट्रो का विस्तार किया जा रहा है। यह अच्छी योजना है। लेकिन जिस तरह से दिल्ली मेट्रो को मुनाफा कमाने के एक साधन के रूप में देखा जाता है, ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों ने इसका इस्तेमाल करना छोड़ दिया है।

मेट्रो के किराए में 6 महीने के अंतराल में दो बार वृद्धि हुई। आखिरी बार दिसंबर 2017 में बढ़ाया गया जिस दौरान किराया दोगुना हो गया। आरटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ आखिरी बार किराए की वृद्धि के बाद 3 लाख यात्रियों ने मेट्रो से सफर करना छोड़ दिया। इस वृद्धि की पीड़ा को निम्न मध्यम वर्ग, श्रमिक वर्ग और छात्रों ने सबसे ज्यादा महसूस किया। किराए में वृद्धि का मार सबसे ज़्यादा छोटी दूरी के यात्री पर पड़ी क्योंकि उनके किराए में तेजी से बढ़ोतरी हुई। याद कीजिए कि जब मेट्रो की शुरूआत हुई थी तो न्यूनतम किराया 2 रूपए और अधिकतम 8 रुपए था जो अब क्रमशः 10 और 60 रुपए तक पहुंच गया है।

सार्वजनिक परिवहन, जिसमें मेट्रो सबसे बड़ी संरचना है, को इस तरह के मनमानी किराया वृद्धि के माध्यम से बर्बाद किया जा रहा है। एक महानगर के रूप में ख़राब हवा की गुणवत्ता के मामले में दिल्ली अब ख़तरनाक हो गया है। शहर में निजी कारों की बड़ी संख्या होने का यह प्रत्यक्ष परिणाम है। यह केवल तभी नियंत्रित किया जा सकता है जब हम सार्वजनिक परिवहन को मज़बूत करेंगे, लोगों को साइकिल चलाने और पैदल चलने के लिए प्रोत्साहित करेगें। इसका मतलब सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ करना, साइकिल ट्रैक्स बनाना, और फुटपाथ बनाना। दिल्ली के शहरी प्राधिकरणों को शायद यह समझ में नहीं आता कि जब हम शहर और यहां रहने वाले लोगों पर नज़र डालते हैं तो हमें इसे संपूर्ण रूप से देखने की जरूरत है न कि एक एक करके जैसा कि किया जा रहा है।

दुनिया भर के मेट्रो को सब्सिडी दी जाती है, क्योंकि यह भीड़ को कम कर देती है और दूसरे प्रकार के परिवहन की तुलना में काफी कम हो जाता है। इस तरह के सार्वजनिक परिवहन के लिए किराए का निर्णय करते समय सामाजिक कल्याण को ध्यान रखा जाना चाहिए।

यही वह परिप्रेक्ष्य है जो कि मेट्रो किराए के निर्धारण में पूरी तरह से ग़ायब रहता है। दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) की किराया निर्धारण समिति ने 3.5मिलियन से अधिक यात्रियों के लिए किराया तय करने का काम सौंपा लेकिन इसमें एक भी जनप्रतिनिधि नहीं है। किराए को मनमाने ढंग से बढ़ाया गया। इसके अलावा 7% स्वत: वार्षिक किराया संशोधन को लागू करने की मांग की गई है।

यह सबसे सही समय है जब भारतीय शहरों के नागरिकों को अपने शहरों में अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के को लेकर जर्मनी से सीख लेना चाहिए। ज़िंदगी के लिए सबसे जरूरी चीज़ों में से एक है गुणवत्तापूर्ण हवा।

दिल्ली मेट्रो
जर्मनी
सार्वजनिक परिवाहन
दिल्ली प्रदूषण
वायु प्रदूषण

Related Stories

वोट बैंक की पॉलिटिक्स से हल नहीं होगी पराली की समस्या

दक्षिण दिल्ली में काटे जाएँगे 16,500 पेड़

दिल्ली मेट्रो : डीएमआरसी कर्मचारियों अपनी कई मांगो को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहें हैं और अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की तैयारी में हैं |

मेट्रो का बढ़ा किराया लोगों का फूटा गुस्सा

ग्रीस संकट : बैंक और शेयर बाज़ार हुए एक सप्ताह के लिए बंद


बाकी खबरें

  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: क्या है यूपी की सियासी फ़ज़ा, लखनऊ और बनारस से विशेष
    05 Dec 2021
    चुनाव चक्र के इस एपिसोड में हम जानेंगे नारों और विज्ञापनों के बरक्स उत्तर प्रदेश की ज़मीनी हक़ीक़त। चलेंगे राजधानी लखनऊ और सत्ता के दूसरे सबसे विशेष केंद्र बनारस... और बात करेंगे अपने सहयोगी…
  • Babri Masjid
    न्यूज़क्लिक टीम
    बाबरी मस्जिद का ध्वस्त होना बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों की हार
    05 Dec 2021
    6 दिसंबर आंबेडकर को याद करने का दिन था, लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर के उस दिन का मतलब ही बदल दिया गया है . 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस भाग में नीलांजन बात करते हैं उन दोनों ख़ास…
  • putin
    डेविड सी.स्पीडी
    पुतिन की लक्ष्मण रेखाओं पर नज़र
    05 Dec 2021
    मालूम होता है कि यूक्रेन को ताजा दी गई $150 मिलियन की सैन्य सहायता में उसके हवाई अड्डों पर अमेरिकी प्रशिक्षणकर्मियों की तैनाती भी शामिल है।
  • satire
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: विश्व गुरु को हंसना-हंसाना नहीं चाहिए
    05 Dec 2021
    अब अगर हम हंसने-हंसाने में ही लगे रहेंगे तो विश्व गुरु कैसे बनेंगे। विश्व गुरु बनने के लिए हमें इस हंसने और हंसाने की आदत को बिल्कुल ही छोड़ना होगा।
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'पुनल तुम आदमी निकले...'
    05 Dec 2021
    इतवार की कविता में आज पढ़िये सस्सी-पुन्नू की प्रेमकहानी पर नए ज़ाविये से लिखी इमरान फ़िरोज़ की यह नज़्म।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License