NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
डीयू त्रिमूर्ति विवाद : सावरकर का भगत सिंह और नेताजी से क्या लेना-देना?
दरअसल, अकेले सावरकर की मूर्ति लगाने का नैतिक साहस संघ-भाजपा भी नहीं कर पा रही है। शायद इसीलिए एक योजना के तहत ऐसा किया गया। और सावरकर को भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ नत्थी कर दिया गया।
प्रदीप सिंह
23 Aug 2019
DU savarkar statue
फोटो साभार : Indian express

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ते हुए आप बाल-लाल-पाल, गांधी-नेहरू-पटेल, भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव और अली बंधुओं के संघर्षों को कई स्थानों पर एक साथ पढ़ते हैं। इन लोगों का नाम एक साथ इसलिए लिखा गया है क्योंकि उनके सपने और संघर्ष एक थे। संघर्ष का तरीका और विचारों की एकता थी। ढेर सारे बिंदुओं पर उनमें आपसी सहमति थी। लेकिन इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाने वालों ने स्वतंत्रता संग्राम की एक नई त्रिमूर्ति तैयार की है। जिसे सुनकर आप हैरान हो जाएंगे।

संघ-भाजपा की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने दिल्ली विश्वविद्यालय में जो कारनामा किया है वह उनके बौद्धिक दिवालियापन का ही सबूत है। ‘ज्ञान-शील-एकता परिषद की विशेषता’ के आदर्श वाले एबीवीपी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फेकल्टी में सावरकर-सुभाष चन्द्र बोस और भगत सिंह की मूर्ति लगाई है। ये मूर्ति कब और कैसे स्थापित की गई यह भी सवालों के घेरे में है। छात्रों का कहना है कि संभवत: रात में किसी समय चुपके से छात्रसंघ पदाधिकारियों ने तीनों की मूर्तियों को लगाया।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर एबीवीपी का कब्जा है तो उन्हें इस तरह चुपके से मूर्ति लगाने की जरूरत क्यों पड़ गई? 

दरअसल, अकेले सावरकर की मूर्ति लगाने का नैतिक साहस संघ-भाजपा भी नहीं कर पा रही है। शायद इसीलिए एक योजना के तहत ऐसा किया गया। और सावरकर को भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ नत्थी कर दिया गया। जिससे दूसरे छात्र संगठन और दल विरोध न कर पाएं और अगर करें और फिर आसानी से उन्हें देशद्रोही होने का तमगा दिया जा सके। और कुछ महीने बाद डूसा और डूटा के चुनावों में अन्य छात्र संगठनों को निशाना बनाया जा सके।

कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने एबीवीपी पर चुनावी लाभ के लिए स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को अपमानित करने का आरोप लगाया है।  

राजनीति या किसी भी क्षेत्र में जोड़ियां ऐसे नहीं बनती हैं। एक कालखंड में एक समान विचार और व्यवहार वाली शख्सियतों को समानताओं के आधार पर एक साथ जोड़ा जाता है। यहां तो तीनों में जमीन-आसमान का अंतर है। यह बात सही है कि वीडी सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के अहम किरदार थे। लेकिन उनका सार्वजनिक और आंदोलनात्मक जीवन दो भागों में बंटा है। एक समय में वे क्रांतिकारिता और त्याग से भरे हुए नायक की भूमिका में थे। और देश की आज़ादी के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए तत्पर दिखते हैं। लेकिन उनके जीवन का दूसरा भाग अंग्रेजों के प्रति वफादारी सिद्ध करने में बीतता है। अंग्रेज अधिकारियों के लिखे पत्र में यह साफतौर पर दर्ज है कि वीडी सावरकर को अपने क्रांतिकारी जीवन पर पश्चाताप था। इसे उन्होंने कई बार व्यक्त किया था।

नेताजी सुभाष के जीवन और विचार को देखें तो वह देश की स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। देश के स्वतंत्रता संग्राम और कांग्रेस में शामिल रहे। लेकिन महात्मा गांधी से मतभेद होने के कारण कांग्रेस को छोड़ दिया। गांधी और कांग्रेस के तरीके से वह असहमत थे। देश की आजादी के लिए वे विश्व भर में जनमत बनाने में लगे थे।

लेकिन भगत सिंह का रास्ता उक्त दोनों नेताओं से अलग था। उनकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से देश को स्वतंत्र कराने भर सीमित नहीं था। वे आज़ादी के बाद भी “काले अंग्रेजों” से संघर्ष करने का आह्वान कर रहे थे। ऐसे में सावरकर के साथ नेताजी और भगत सिंह की मूर्ति लगाने को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

आर्ट्स फेकल्टी में एबीवीपी द्वारा वीडी सावरकर की मूर्ति लगाने पर एनएसयूआई ने कड़ी आपत्ति जताई है। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीरज कुंदन ने कहा कि सावरकर देशविरोधी व्यक्ति थे जिन्होंने देश की आजादी में योगदान देने की बजाय अंग्रेजों से अपनी जिंदगी की भीख मांगी। जबकि सरदार भगत सिंह जैसे वीर सपूतों ने देश के लिए अपनी जान को जवानी में ही न्यौछावर कर दिया और सुभाष चन्द्र बोस ने देश की आजादी में सबसे अहम रोल निभाया।

कहा जा रहा है कि एबीवीपी से जुड़े डूसू अध्यक्ष शक्ति सिंह किसी दूसरे कार्यक्रम के बहाने मूर्तियों को टेंट में छिपाकर लाए और आर्ट्स फैकल्टी के बाहर देर रात स्थापित करा दिया। एनएसयूआई ने सावरकर की इस मूर्ति स्थापना को अवैध बताकर मोरिस नगर थाने में शिकायत भी दर्ज करवाई है और हटाने की मांग की है। एनएसयूआई ने इस मामले की निंदा करते हुए एक पत्र डीयू प्रशासन को भी लिखा है।

संगठन का कहना है कि इस तरह की विभाजनकारी बातों के लिए अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह केवल डूसू चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। सावरकर को इतिहास के पन्नो में उनकी गद्दारी को देशभक्ति में बदलने के लिए एबीवीपी ऐसे कार्य कर रही है जिसे लेकर एनएसयूआई अपना विरोध जारी रखेगी और इतिहास के साथ कोई छेड़छाड़ नही करने देगी।

संघ-भाजपा से जुड़े संगठन और कार्यकर्ता वामपंथी इतिहासकारों पर इतिहास से छेड़-छाड़ करने का आरोप लगाते रहते हैं। ऐसे आरोप प्राय: तथ्यात्मक कम राजनीति से अधिक प्रेरित हैं। अक्सर यह देखा गया है कि संघ-भाजपा इतिहास को अपने नजरिये से गढ़ने की कोशिश करते हैं। ऐतिहासिक महापुरुषों को खेमे में बांटते हैं। नेहरू के खिलाफ सरदार पटेल को खड़ा करते हैं तो उत्तर भारत को दक्षिण भारत के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

देश के स्वतंत्रता संग्राम के कई नायक हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 तक चली आज़ादी की जंग में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। नरम दल और गरम दल से लेकर कई संगठन बने। देश की आजादी में सबका अहम योगदान है। लेकिन आजादी की लड़ाई में रंच मात्र सहयोग नहीं करने वाले संगठन संघ-भाजपा हमेशा से ऐतिहासिक नायकों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करती रही है।

विश्वविद्यालय में रातों रात यह त्रिमूर्ति स्थापित करने की घटना सोशल मीडिया पर छाया हुई है। भोपाल में रहने वाले वरिष्ठ लेखक राजेन्द्र शर्मा अपने फेसबुक पर लिखते हैं- “युगल, त्रिमूर्ति, पंचायतन आदि श्रेष्ठ नायकों की आपसी मैत्री और एकता जनता के मानस पर पहले बनती हैं फिर शिल्प अथवा कलाओं में उकेरी जाती हैं। राधा- कृष्ण, सीता राम, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, गांधी-नेहरू-सुभाष, भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव, विनय-बादल-दिनेश को जनता यूं ही नहीं स्वीकार करती। मार्क्स-ऐंगल्स-लेनिन जैसे उदाहरण दुनिया भर में देखे जा सकते हैं।”

वरिष्ठ पत्रकार और कवि चंद्रभूषण अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं- “ एबीवीपी को डीयू में गुपचुप सावरकर की मूर्ति लगानी थी तो हेडगेवार और गोडसे के साथ लगाती। भगत सिंह और नेताजी का भला उनसे क्या लेना-देना। ”

Delhi University
savarkar statue
RSS
BJP
NSUI
ABVP
Congress
students'Protest
Bhagat Singh
Subhash chandra bose

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

लखनऊ विश्वविद्यालय: दलित प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ मुक़दमा, हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं!

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात


बाकी खबरें

  • loksabha
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    संसद में चर्चा होना देशहित में- मोदी, लेकिन कृषि क़ानून निरस्त करने का बिल बिना चर्चा के ही पास!
    29 Nov 2021
    सरकार की कथनी-करनी का फ़र्क़ एक बार फिर तुरंत देश के सामने आ गया। आज सुबह संसद सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से कहा कि संसद में चर्चा होना देशहित में है और सरकार हर सवाल का जवाब…
  • TN
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु इस सप्ताह: राज्य सरकार ने सस्ते दामों पर बेचे टमाटर, श्रमिकों ने किसानों के प्रति दिखाई एकजुटता 
    29 Nov 2021
    इस सप्ताह, तमिलनाडु ने 52,549 करोड़ रूपये की 82 औद्योगिक परियोजनाओं के लिए सभी क्षेत्रों के प्रमुख उद्योगपतियों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इसके साथ ही सरकार ने थूथुकड़ी, नागापट्टिनम और…
  • alok dhanwa
    अनिल अंशुमन
    ‘जनता का आदमी’ के नाम ‘जनकवि नागार्जुन स्मृति सम्मान’: नए तेवर के कवि आलोक धन्वा हुए सम्मानित
    29 Nov 2021
    यह सम्मान 2020 में ही दिल्ली में नागार्जुन जी के स्मृति दिवस पर दिया जाना था। लेकिन कोरोना महामारी के कारण यह संभव नहीं हो सका। इसलिए महामारी प्रकोप के कम होते ही यह सम्मान आलोक धन्वा के प्रिय शहर…
  • Assam
    संदीपन तालुकदार
    असम: नागांव ज़िले में स्वास्थ्य ढांचा उपलब्ध होने के बावजूद कोविड मरीज़ों को स्थानांतरित किया गया
    29 Nov 2021
    महामारी ने स्वास्थ्य सुविधा संकट की परतें खोलकर रख दी हैं और बताया कि कैसे एम्स की सुविधा होने पर नागांव बेहतर तरीक़े से महामारी का सामना कर सकता था।
  • Bahgul River
    तारिक़ अनवर
    यूपी के इस गाँव के लोग हर साल बांध बना कर तोड़ते हैं, जानिए क्यों?
    29 Nov 2021
    हालांकि सरकार ने पिछले साल एक स्थायी जलाशय बनाने के लिए 57.46 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की थी, लेकिन इस परियोजना को अभी तक अमल में नहीं लाया गया है और इस साल भी मिट्टी से बांध बनाने की प्रक्रिया…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License