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भारत
राजनीति
दलित आन्दोलन को बदनाम करने की साज़िश
2 अप्रैल 2018 के भारत बंद में हुइ हिंसा से किसको क्या मिला या किसने इस हिंसा का फायदा उठाया?
मुकुंद झा
06 Apr 2018
Dalits Protest

2 अप्रैल 2018 के भारत बंद के दौरान हुई हिंसा से किसे क्या मिला या किसने इस हिंसा का फयदा उठाया? जब हम भारत में दलित आंदोलन देखते हैं तो पाते हैं कि पिछले कुछ वर्षो में इनके आंदोलनों ने एक बार फिर से गति पकड़ी है | जब हम देख रहे हैं कि इन आंदोलनों की व्यापकता बढ़ी है और इनके आन्दोलन में एक बड़ा बदलाव है कि अब ये पहले से कहीं तेज़ और आक्रमक है | इसके कई करण है पर कई दलित विचारक मानते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण है  देश में पहली बार हिंदूवादी विचार को सत्ता का प्रत्यक्ष और भरपूर संरक्षण मिलना |

2014 के आम चुनाव के बाद देश में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत के सथा सत्ता में आने का मौका मिला, जिसके बाद से ही उससे जुड़े कई  कट्टर हिन्दूवादी संगठन जैसे हिन्दू युवावह्नी, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद आदि तमाम संगठनों द्वारा देश के अलग-अलग शहरों में जाति और धर्म के नाम पर लोगों पर हमले तेज़ हो गये | इन हमलों का सबसे अधिक शिकार दलित और अल्पसंख्यक समाज हुआ, इसी कारण समाज के इस सबसे निचले तबके में अपने ऊपर हो रहे हिंसक हमलों से आक्रोश बढ़ रहा है और वो अलग-अलग राज्यों में आन्दोलन के रूप में अपना रोष विरोध प्रदर्शनों के द्वार प्रकट कर रहे है |

अगर हम देख तो भारत में आय दिन कोई ना कोई  दक्षिणपंथी संगठन किसी न किसी मुद्दे पर हिंसक आन्दोलन करते रहते है चाहे वो करनी सेना का पद्मावती फ़िल्म पर पुर देश में हिंसक आन्दोलन हो या फिर बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद द्वार देश रोज़ गायके नाम पर लोगो की हत्या और मार-पिट करना आम बात है, पर इस पर सरकार कुछ नही बोलती है | क्योंकि ये अधिकतर वो संग्ठन जो भाजपा के सहयोगी और बिरादराना संगठन है |

जबकी 2 अप्रैल को देशव्यापी बंद के दौरान  कुछ राज्यों में हुई कुछ हिंसक घटनाओं को इतना बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है जैसे देश में इससे पूर्व कभी भी इस तरह की हिंसक विरोध हुए ही नहीं है | जबकी कुछ रिपोर्टों की माने तो बंद के दौरान हिंसा करने वाले दलित संगठन के नहीं थे बल्कि वो आरएसएस और कई अन्य हिन्दूवादी संगठन के लोग थे | इसके बाबजूद भी इस आन्दोलन में हुई हिंसा को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता |

इन हिंसक घटनाओं से इस आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य को भुला कर पूरा ध्यान हिंसा की ओर मोड़ दिया है | सरकार और सारे हिन्दूवादी संगठन हिंसा को लेकर  पूरे आन्दोलन की आलोचना कर रहे है ,इसके साथ ही वो अपने मनुवादी ऐजेंडे को आगे कर के पुरे दलित आंदोलनों को दबाने का प्रयास कर रही है | जबकी हिंसा इस आन्दोलन का आधार नहीं था बल्कि कई ऐसी भी खबरे आई की भिड़ को पुलिस और कई जगह पर सवर्णों ने उन्हें उकसाय जिसके परिणाम स्वरूप हिंसा हुई | कई जगह दलित ही हिसा का शिकार हो गये | ये दिखता है की हिंसा एकतरफा नही था |

इस आन्दोलन की आड़ लेकर  आरएसएस,भाजपा ,और इन से जुड़े संघटन दलितो के अधिकारों को खत्म करने की बात कर रहे है | सोशल मिडिया में इनकी ट्रोल सेना पूरी तरह सक्रिय हो गई है | ये दलित आदिवासी के मिले संवैधानिकआरक्षण को खत्म करने का प्रचार कर रही है | साथ ही वो इन हिंसक घटनाओ का सहारा ले कर ,पिछले कई वर्षो से हो रहे दलितों पर अत्याचार को भी सही ठहरने का प्रयास कर रहे हैं |

इन सब में सरकार भी इनका पूरा साथ देती हुई दिख रही है,क्योकि सरकार रोज़गार,किसान ,एसएससी स्कैम ,सीबीएसई लिक पिनबी घोटाल जैसे कई मुद्दो पर बुरी तरह  से घिरी हुई थी | इस बिच में इस बंद के दौरान हुई हिंसा को आगे करके एन सभी मुद्दो को पीछे करना चाहती है |जिसमे वो काफी हद तक सफल हो रही है क्योकि उन्हें इसमे मुख्यधार के मिडिया संगठनों का भी भरपूर साथ मिल रहा हैं |

 इस आन्दोलन की आड़ में सरकार बड़े ही सतिर तरीके से  अपने रोज़गार  देने की विफलता को छिपा रही है |भाजपा के कई नेता कई  बार गाहे बगाहे  ये कहते है कि युवाओ को नौकरी आरक्षण के करण नही मिल रहा है |सारी  नौकरी आरक्षण वाले खा जाते है |जबकि सत्य यह है कि मोदी सरकार ने चुनाव पुर्व साल में 2 करोड़ नौकरी का वाद किया था, पर वो अपने अब तक के अपने पुरे कार्यकाल में 2करोड़ नौकरी नहीं दे पाए है | इसलिऐ वो युवाओ को आरक्षण के नाम पर भ्रमित कर रहे है ,बेरोजगार युवकों को आरक्षित और अनारक्षित में बांटकर उनके गुस्से से बचना चाहती हैं | परन्तु आज के युवा सज़ग है और वो इनके इस दुष्प्रचार में नहीं फसेंगे |

इन सब पर दलित विचारकऔर कार्यकर्ता अनिल  चमड़िया ने अपने फेसबुक पर कहा की “2 अप्रैल को सामाजिक स्तर जातीय पूर्वाग्रहों, प्रशासन का एकपक्षीय रवैया और मीडिया के भीतर दलित विरोधी मानसिकता का एक बहुस्तरीय ढांचा सक्रिय दिखाई दिया है। दो अप्रैल को देश की सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए दलितों के बीच चेतना के विस्तार होने के साफ-साफ संकेत मिलते हैं। उसके खुद पर देशव्यापी निर्भरता का भरोसा बढ़ने का सबूत मिलता है”।

Dalits Protest
Bharat Bandh
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