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दो दलित बच्चों की हत्या के बाद सन्नाटे में भावखेड़ी,  कई अनसुलझे सवाल
दो दलित बच्चों की हत्या को स्थानीय पुलिस साधारण तरीके से ले रही है और इस कारण उसने आरोपियों को रिमांड पर नहीं लिया। एक आरोपी को मानसिक रोगी बताया जा रहा है। इस घटना के कई अनसुलझे पहलू है, जिसे नज़रअंदाज किया जा रहा है।
राजु कुमार
27 Sep 2019
dalit child death

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले का भावखेड़ी गांव दो दिन पहले तक एक सामान्य गांव की तरह ही था, लेकिन खुले में शौच के कारण दो दलित बच्चों की हत्या के बाद यह गांव सुर्खियों में है। दो दिन से इस गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है। गांव के लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। लोग खुलकर बात करने से कतरा रहे हैं। अब यह गांव पुलिस के पहरे में है। भावखेड़ी पंचायत के सरपंच सूरज यादव का कहना है, ‘‘इस घटना से हम बहुत शर्मिंदा हैं। हमारे पंचायत की बदनामी हो गई। खुले में शौच के कारण बच्चों की हत्या बहुत ही दुःखद घटना है।’’

शिवपुरी विकासखंड के भावखेड़ी गांव में 25 सितंबर की सुबह गांव के मनोज बाल्मीकि का 10 साल का बेटा अविनाश और 13 साल की बहन रोशनी शौच के लिए घर से बाहर गए थे। मनोज के पुश्तैनी घर से कुछ दूर वे सड़क किनारे शौच कर रहे थे, तभी वहां से गांव के दो दबंग हाकिम यादव और रामेश्वर यादव वहां पहुंच गए। आरोप है कि बच्चों को खुले में शौच करते देख उन्होंने दोनों बच्चों को लाठियों से पीट कर हत्या कर दी। हत्या के दोनों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुछताछ में एक आरोपी ने बोला,  "भगवान का आदेश हुआ है कि इस धरती से राक्षसों का सर्वनाश कर दो, इसलिए मैं राक्षसों का सर्वनाश करने निकला हूं।"

इसे पढ़ें : खुले में शौच करने पर दो दलित बच्चों की पीटकर हत्या: क्या सच में 'सब ठीक' है?

Police in Bhavkhedi_0.jpg

दो दलित बच्चों की हत्या को स्थानीय पुलिस साधारण तरीके से ले रही है और इस कारण उसने आरोपियों को रिमांड पर नहीं लिया। एक आरोपी को मानसिक रोगी बताया जा रहा है। इस घटना के कई अनसुलझे पहलू है, जिसे नज़रअंदाज किया जा रहा है। दलित समुदाय के साथ छुआछूत और उनसे कम पैसे में मजदूरी कराने की मानसिकता भी इस इलाके में है। भले ही इस परिवार का गांव में किसी से रंजिश नहीं थी, लेकिन सामंती मानसिकता के कारण ही खुले में शौच के कारण इतनी वीभत्स घटना हुई है।
Manoj Balmiki_0.jpg

(मृतक बच्चों के पिता और भाई मनोज बाल्मीकि) 

शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव ने घटना के बाद इस गांव का दौरा किया। उनका कहना है, ‘‘बहुत स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ़ खुले में शौच के कारण ही दबंगों ने दो बच्चों की हत्या कर दी। न ही अभी साफ तौर पर यह कहा जा सकता है कि आरोपी मानसिक रोगी है। बच्चे के पिता का कहना है कि रोशनी के साथ छेड़खानी का प्रयास आरोपियों ने किया था, जिसके बाद बच्चों ने चिल्लाकर विरोध किया। इसके बाद आरोपियों ने उनकी जान ले ली।

अब पूरी हकीकत जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन मौजूदा हकीकत यह है कि इस इलाके में आज भी दलितों के साथ भेदभाव है। पहले की तुलना में भेदभाव कम है, लेकिन दबंगों के संस्कारों में होने के कारण पूरी तरह वे इसे छोड़ नहीं पाए हैं और यह उनके व्यवहार में दिखता है। बच्चे के पिता के अनुसार हत्या के आरोपी उनसे कम पैसे में मजदूरी करवाना चाहते थे। उनके इनकार के बाद वे धमकी दिए थे। सवाल यह है कि क्या वे बच्चे दलित नहीं होते, तो भी खुले में शौच के कारण उनकी हत्या कर दी जाती? इसका जवाब है - नहीं।’’

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव जसविंदर सिंह का कहना है, ‘‘दो मासूम बच्चों की लाठियों से पीट पीट कर की गई हत्या सामंती सोच का वीभत्स उदाहरण है। इसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त से सख्त कार्रवाई की जाने की जरूरत है। हत्यारों के राजनीतिक संबंधों को भी तलाशा जाना जरूरी है, आखिर वो कौन सी मानसिकता है जो मासूम बच्चों की पीट पीट कर हत्या कर देने के लिए हत्यारों को उकसाती है। इस घटना से एक बार फिर साबित हुआ है कि जन कल्याण की योजनाएं भी मनुवादी मानसिकता का शिकार होती हैं। स्वच्छता अभियान के तहत जब सबसे पहले उक्त दलित परिवार के घर शौचालय बनना चाहिए था, तब वही परिवार इससे वंचित रहता है।’’

Manoj Balmiki ka ghar (3)_1.jpg

(पीड़ित मनोज बाल्मीकि का घर) 

गांव के सरपंच सूरज यादव का कहना है, ‘‘गांव में कोई भेदभाव नहीं है। गांव में अभी 4 हैंडपंप चालू हालत में है। दलित मोहल्ले में भी एक हैंडपंप चालू हालत में है। यह घटना दुःखद है। गांव में 2011 की जनगणना के अनुसार सबके घरों में शौचालय बनवा दिए हैं। मनोज का परिवार पहले एक साथ रहता था। अब अलग रहने के कारण उसके शौचालय नहीं बने हैं। उसका नाम सूची में आने पर ही उसके घर शौचालय बनेगा।’’

एक आरोपी हाकिम यादव को पुलिस, गांव वाले और सरपंच मानसिक रोगी बता रहे हैं। सरपंच का कहना है कि ग्वालियर मानसिक अस्पताल से उसका 10 साल से इलाज चल रहा है। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने उसका अस्पताल का पर्चा देखा है। इससे मुकरते हुए वे दोहराते हैं कि उसके बारे में सारे गांव वाले जानते हैं। दूसरे आरोपी के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि वह घटना के समय से ही मौजूद था कि कुछ देर बाद पहुंचा, यह जांच के बाद ही मालूम पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि गांव के सरपंच को आरोपियों के परिवार से बताया जा रहा है।

इस मसले पर दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले मूल निवासी स्वाभिमान संघर्ष मोर्चा के राज्य संयोजक सुंदर सिंह खड्से का कहना है, ‘‘दोनों बच्चों की हत्या का कारण इतना साधारण नहीं है। गांव के 50 फीसदी लोग आज भी शौच के लिए बाहर जा रहे हैं। इस घटना के पीछे सामंती मानसिकता सबसे बड़ा कारण है। हमने कुछ साल पहले मध्यप्रदेश के 10 जिलों में दलितों की स्थिति पर अध्ययन करवाया था।

उसमें साफ उभर कर सामने आया था कि बड़े पैमाने पर आज भी दलितों के साथ भेदभाव है। 60 प्रतिशत से भी ज्यादा बच्चे शालाओं (स्कूलों) में एक साथ बैठकर खाना नहीं खाते। मध्याह्न भोजन में रसोइयां के रूप में दलित महिलाएं नहीं हैं। मंदिरों में प्रवेश को लेकर भी भेदभाव सामने आया था। ऐसे में इस हत्या के पीछे दलित समुदाय के सामाजिक एवं राजनीतिक उभार को रोकने की मानसिकता भी हो सकती है। आरोपी को मानसिक रोगी बताकर इस घटना से उसे बचाने की साजिश हो सकती है। इसलिए इस घटना की निष्पक्ष जांच बहुत ही जरूरी है। हम लोग एक-दो दिनों में वहां फैक्ट फाइडिंग टीम के रूप में जाने वाले हैं, ताकि इसके सभी पहलू सामने आ पाए।’’

(सभी फोटो : प्रमोद भार्गव )

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