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राजनीति
डूबे हुए कॉर्पोरेट कर्ज़ की वसूली के लिए बना नया कानून कितना अच्छा है ?
दिवालियापन से सम्बंधित नया दिवालियापन संहिता (आईबीसी) एनपीए की वसूली में असफल रहा है, और बड़े निगमों को सस्ती संपत्ति पाने में मदद कर रहा है।
सुबोध वर्मा
15 Sep 2018
Translated by महेश कुमार
BAD LONE

कॉरपोरेट घरानों के डूबे हुए ऋणों के साथ- विजय माल्या और मेहुल चोकसी और निरव मोदी जैसे भगोड़ों के उपर जो कर्ज़ है – वह आम लोगों को  चिंता में डालता है। इसने पूरे बैंकिंग क्षेत्र को संकट में डुबो दिया है और  इस बारे में व्यापक जिज्ञासा है कि मोदी सरकार इन मामलों से कैसे निपटती है।

नये दिवालियापन संहिता, 2016 (आईबीसी) को कॉरपोरेट  ऋणदाताओं के गैर-उत्पादक संपत्ति या एनपीए को तेजी से ठीक करने के लिए एक प्रभावी हथियार के रूप में लाया गया था। कंपनियों और बैंकों को नियंत्रित करने से  संबंधित कानूनों में संशोधन की श्रृंखला के दो साल बाद और आईबीसी के उपयोग के परिणामस्वरूप 32 कंपनियों की 89,400 करोड़ रुपये के डूबे हुए कर्जों में से केवल 55 प्रतिशत कर्जें की वसूली हुई है। जिसके एवज में करीब 39320 करोड़ रुपये कर्जे को माफ कर दिया गया है।

इसके अलावा,136 कंपनियों के क्लस्टर पर कुल 57,646 करोड़ रुपए का कर्ज़ था।  जिसमें दिवालियापन के प्रक्रिया के दौरान कुल 4817 करोड़ रुपए की वसूली हुइ जो पूरे कर्जे का केवल 8.3. प्रतिशत है।इन आंकड़ों को इन्सॉल्वेंसी  बोर्ड ऑफ इंडिया (आईबीबीआई) द्वारा पेश किया गया है जो सभी दिवालियापन या दिवालियापन प्रक्रियाओं के लिए नामित नियामक है। यह दोनों तरह के आंकड़ें 30 जून, 2018 तक के हैं।

तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल के लोकसभा में दिए जवाब के अनुसार, नया आईबीसी लागू  होने के बाद आईबीसी, 2016 के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के सामने 6,326 नए मामले दायर किए गए और विभिन्न उच्च न्यायालय से 30 जून 2018 तक  कर्जा बंदोबस्ती के 2323 मामलें स्थानान्तरित  हुए। इसका मतलब है कि, देनदार कंपनियों के कुल 8649 मामले मुख्य रूप से बैंकों और अन्य वित्तीय कंपनियों से लिए गए कर्जों को चुकाने में असमर्थ थे, इसके साथ कर्जे का एक छोटा सा हिस्सा ऑपरेशनल क्रेडिटर का भी था ।

 

मंत्री ने कहा कि इन 9000 मामलों में से तकरीबन 4,390 मामले खारिज कर दिए गए थे और नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल में आईबीसी के तहत 907 मामले स्वीकार कर लिए गए। विचाराधीन मामले दो रास्तों के साथ आगे बढ़ सकते हैं: या तो कोइ अन्य इकाई – या कोइ कंपनी – डूबती कंपनी के साथ मिलती है और उसे लेने के लिए सहमत होती है, उसके कर्ज का भुगतान करती है या कोई भी आगे नहीं आता है और डूबने वाली कंपनी की संपत्तियां बेची जाती हैं (ज्यादातर जंक कीमतों पर) जिसे ऋणशोधन ( लिक्विडेशन ) कहा जाता है ।

आईबीबीआई दोनों प्रकार के मामलों के लिए आंकड़ें प्रदान करता है। ऐसा लगता है कि बड़े कर्जे वाली  32 कंपनियां जिनका कर्जा  89,402.43 करोड़ रुपए  है ,अपने मामले को हल कराने में सफल रही हैं यानी कुछ ही कंपनियां अपनी संपत्ति और देनदारियों को ‘हल’ करने में कामयाब रही हैं। कर्जो की यह समाधान योजना नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार की गयी थी।

आंकड़ें दिखाते हैं कि इस तरह के 'रिज़ॉल्यूशन'  के परिणामस्वरूप 49783.17 करोड़ रुपये की वसूली हुई है, जो ज्यादातर उन बैंकों का बकाया था जो  वित्तीय देनदारों की तरह काम करते थे। इसका मतलब है कि  कुछ 39,619.26 या 55 प्रतिशत डूबता हुआ कर्जा नाली में बह गया।

हालांकि आईबीबीआई यह नहीं बताता  कि देनदार कंपनियों को खरीदने वाली कंपनियां कौन सी थीं, मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि भारत की कॉरपोरेट दुनिया में कुछ बड़ी मछलियां मज़े में हैं, इन डूबने वाली कंपनियों को बहुत सस्ते दरों पर लिया जा रहा हैं। मिसाल के तौर पर, भूषण स्टील- जो  57,505 करोड़ रुपये के डूबत कर्जे में था- को टाटा समूह ने कुल 36,771.32 करोड़ रुपये में खरीद कर लिया है। यह खरीदारों के लिए 20,773.73 करोड़ रुपये की बचत है - लेकिन सार्वजनिक खजाने के लिए उस राशि का नुकसान है क्योंकि यह  सार्वजनिक बैंकों और संस्थानों द्वारा दिया गया कर्जा था। 

यह आईबीसी को समझने का एक प्रमुख नजरिया सामने लाती है, जिसे एक बदलाव  के रूप में माना जा रहा है। यह भारी जेब वाले वाली कंपनियां को सुविधा प्रदान करता है।  छोटी मछली, बड़ी  को मछली द्वारा निगली जा रही है।

अब,दूसरे रास्ते पर एक नज़र डालें - जब देनदार कंपनी को कोई अच्छा खरीदार नहीं मिलता है और उसे ऋणशोधन की प्रक्रिया में जाना पड़ता है। क्या नई आईबीसी संहिता ने ऐसी कंपनियों से अधिक कर्ज वसूलने में मदद की है? ऐसा नहीं लगता है क्योंकि 136 कंपनियों की कुल 57,646 करोड़ रुपये की संपत्ति को केवल 4817.31 करोड़ रूपये के कूड़े के भाव में बेच दिया गया,जो कुल कर्जे का केवल 8.3 फीसदी है। 

 

इसलिए, संक्षेप में  कहा जाए तो  नए आईबीसी ने आसानी से एक प्रकार की स्क्रीनिंग प्रक्रिया की सुविधा प्रदान की है। जहां कुछ आकर्षक कंपनियां जो किसी भी कारण (बाहरी कारक, आंतरिक दुर्भावना)  कर्जें में चली गयीं हों ,उन्हें बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा सस्ते रूप से खरीदा जाएगा जबकि बचे खुचे को  कूड़े के भाव में बेचा जाएगा। और यह सारी प्रक्रियाएं एक नियत समय में कर ली जाएंगी। 

 जैसा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले साल अगस्त में दिवालियापन कानून के एक सम्मेलन में कहा था, "मुझे लगता है कि यह एकमात्र सही तरीका है जिसके द्वारा व्यवसाय अब चलेंगे और यह संदेश  सभी तक  जोर से और स्पष्ट  रूप से पहुँच जाना चाहिए"।

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