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भारत
राजनीति
लॉकडाउन के दौरान लोकतंत्र और लोकलुभावन राजनीति
लोकलुभावन या लोकप्रियतावादी शासन आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग की कोशिश कर रहा है।
कृषणु बी नियोग
07 May 2020
lockdown
Courtesy: Amnesty International

कोविड-19 महामारी के एवज में लगाये गये लॉकडाउन से दुनिया भर की सरकारों की ओर से आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर चिंता होने लगी है। कुछ देशों के प्रमुख अब डिक्री यानी शासनादेश या विधि-विधान के नाम पर शासन कर सकते हैं और इस बात पर फ़ैसला ले सकते हैं कि आपातकाल की स्थिति कब समाप्त होगी। कुछ ने तो चुनाव को ही स्थगित कर दिया है, कहीं-कहीं तो वे अदालतें ही स्थगित हो गयी हैं, जहां उनके ख़िलाफ़ मामले लम्बित पड़े हैं। कुछ ने तो पूरे राजनीतिक विरोधियों को ही पांचवां स्तंभकार घोषित कर दिया है (पांचवां स्तंभकार या पांचवां स्तंभ उन लोगों के समूह को कहा जाता है, जो आमतौर पर एक दुश्मन समूह या राष्ट्र के पक्ष में एक बड़े समूह को कमज़ोर करते हैं।)। जिन देशों में सरकार समर्थक मीडिया ने जमकर प्रचार-प्रसार किया है और ग़लत-सलत सूचनायें दीं हैं, वहां अब फ़र्ज़ी ख़बरों से जूझने के नाम पर पत्रकारों को परेशान किया जा सकता है और मीडिया पर नियंत्रण किया जा सकता है। टोगो, चिली और अन्य देशों के सशस्त्र बल इस महामारी के पहले से ही लंबे समय से जारी मुद्दों पर असंतोष का शमन करते हुए उन देशों की सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं।

इस बात में कोई शक नहीं कि फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग महामारी से लड़ने के लिए ज़रूरी है लेकिन इसका इस्तेमाल हाशिये की आबादी (उदाहरण के लिए, युगांडा) का शिकार करने के रूप में किया जा रहा है। ऐसा बढ़ी हुई निगरानी के शीर्षस्थ  स्तर पर हो रहा है और नोवल कोरोनावायरस के फ़ैलने पर नज़र रखने के नाम पर डेटा-संग्रह के लिए अपनाये जा रहे ये उपाय स्पष्ट रूप से लोगों की गरिमा को घटाने वाले क़दम हैं। लोकतंत्र का वैश्विक सूचकांक महामारी के पहले से ही अपने निम्नतम स्तर पर रहा है, महामारी के बाद के समय में भी इसमें बेहतरी की उम्मीद नहीं दिखती है।

लोकप्रियतावादी समय में महामारी:

जो सत्ता में हैं,उनमें से कुछ की प्रकृति से लगता है कि आने वाले मंज़र आगे और जटिल होंगे। दुनिया एक तरह के लोकप्रियतावादी लोकतांत्रिक दौर से गुज़र रही है, और दक्षिणपंथी लोकप्रियतावादी नेता हंगरी, संयुक्त राज्य अमेरिका, फिलीपींस, तुर्की, ब्राजील और कई अन्य देशों की सत्ता के शीर्ष पर हैं। हालांकि लोकवाद की परिभाषा बहुत विवादास्पद है, लेकिन लोकवादी या लोकप्रियतावादी नेताओं की ख़ासियत यही है कि उनमें आमतौर पर संस्थागत प्रणाली, विशेषज्ञों की राय और बहुलतावाद को लेकर किसी तरह की सम्मान की भावना नहीं होती है। आम तौर पर मीडिया के ख़ास वर्ग के साथ उनका रिश्ता छत्तीस के आंकड़े वाले होते हैं,जो कि ज़िंदगी से भी बड़े बन चुके उनके विराट व्यक्तित्व और उनके शासन के लिए महत्वपूर्ण होता है।

इस तरह के नेतृत्व हर तरह की मध्यस्थता को दरकिनार करना चाहते हैं और "भ्रष्ट कुलीन" के ख़िलाफ़ सीधे "लोगों" की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो कोई भी इस तरह के “लोगों” के दायरे के बाहर से होते हैं,चाहे वे राजनीतिक विरोधी, अल्पसंख्यक, कमज़ोर प्रवासियों, और इसी तरह के दूसरे लोग ही क्यों न हों,वे सबके सब एक दुश्मन की तरह देखे जाते हैं और इन्हें अमान्य ठहरा दिया जाता है या फिर इन्हें उत्पीड़ित किया जाता है। [यह लोकवादी शासनों की एक बहुत ही आंशिक तस्वीर है, जैसा कि 20 वीं सदी के लैटिन अमेरिकी लोकवाद के उदाहरणों से पता चलता है] लोकवाद बेहद नैतिकतावादी होता है और इसका दृष्टिकोण दुनिया का ध्रुवीकरण करने वाला होता है,जो लगातार "दोस्त / दुश्मन" के बीच भेद करने वाली एक मज़बूत रेखायें खींचता है। इन सभी कारणों से लोकवादी लोगों के हाथों में आयी हुई आपातकालीन शक्तियां ख़तरे की घंटी बजा रही हैं।

ऐसा नहीं है कि आपातकालीन या असाधारण शक्तियों के दुरुपयोग के प्रयास में सिर्फ़ लोकवादी या लोकप्रियतावादी शासन ही लगा हुआ है। बुश के राष्ट्रपति काल के दौरान हुए 9/11 के तुरंत बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के सीनेट द्वारा पैट्रियट अधिनियम का पारित किया जाना इस तरह के उदाहरण को सामने रखता है, क्योंकि पिछले दो दशकों में दूसरे देशों में भी इस तरह के सख़्त राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानूनों को लागू किया गया है। ये ‘असाधारण क़ानून’ नागरिकों पर नज़र रखने, उन्हें अनिश्चित काल के लिए नज़रबंद रखने,ज़्यादा सख़्ती के साथ पूछताछ करने, और अनेक तरह से संविधान की भावना की अवलेहना करने और विशिष्ट अधिकारों की अनदेखी करने के सिलसिले में शासन को असीमित अधिकार दे देते हैं और इस तरह की प्रवृत्ति दुनिया भर में फैल रही है।

जॉन लॉक सरकार की अपनी किताब,“टू ट्रिटीज़ ऑफ़ गवर्नमेंट” में इस शासनात्मक अंग को "परमाधिकार" शक्ति से लैस बताते हैं यानी कि सरकारों के पास असाधारण परिस्थितियों के दौरान पहले ज्ञात मौजूदा क़ानूनी मानदंडों द्वारा नहीं,बल्कि विवेक से फ़ैसले लेने का अधिकार होता है। इस तरह की सरकारें "जनता के हित" में मौजूदा क़ानूनों का भी उल्लंघन कर सकती हैं। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान अब्राहम लिंकन ने जिस कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल किया था, अक्सर इसका उदाहरण दिया जाता है।

लोकप्रियतावाद, परमाधिकार की शक्ति और व्यक्तिगत राजनीति:

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिनिधियों या नेताओं में किये गये ‘विश्वास’ के सवाल पर लोकप्रियतावाद और विशेषाधिकार प्राप्त सत्ता बंटे होते हैं। फ़्रांसीसी दार्शनिक बर्नार्ड मैनिन ने कहा है कि जब निर्वाचित प्रतिनिधि चुन लिये जाते हैं, तो उन्हें अप्रत्याशित घटनाक्रम होने पर "जनता के हित" के नाम पर तुंरत फ़ैसला लेने की अकूत क्षमता सौंपी दी जाती है। नियमित होने वाले चुनाव ऐसे तौर-तरीक़ों पर रोक लगा देते हैं, क्योंकि ऐसे में नेता और सत्ता को नये जनादेश हासिल करने की ज़रूरत पड़ती है। मेनिन के मुताबिक़ हमारे समय के मास मीडिया ने आधुनिक प्रतिनिधिक लोकतंत्र को "दर्शक" वाले लोकतंत्रों में बदल दिया है, जहां राजनेता किसी माध्यम में बदल दिये गये मंच पर प्रदर्शन करते दिखते हैं, और उनका आकलन उनके तौर-तरीक़ों, पोशाक पहनने की शैलियों, उनके भाषणों की प्रभावशीलता, या उनके भाव-भंगिमाओं सहित उनके अन्य शारीरिक विशेषताओं के आधार पर किया जाता है।

राजनीति का ऐसा वैयक्तिकरण उस राजनेता की छवि को राजनीतिक दलों या नीतिगत मंचों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण बना देता है (व्यक्तिगत राजनीति को भी लिंगगत रंग दिया जाता है, और महिला राजनेताओं को विभिन्न मानकों से आंका जाता है)। राजनीति के इस रूप ने संयुक्त राज्य अमेरिका में बराक ओबामा से लेकर फिलीपींस में रोड्रिगो डुटर्टी और कनाडा के जस्टिन ट्रूडो तक के सभी तरह के राजनेताओं को मदद पहुंचायी है।

हालांकि, लोकवाद को विशेष रूप से विशिष्ट राजनीतिक नेता पर ध्यान बढ़ाते जाने को लेकर प्रोत्साहित किया जाता है, ऐसा  इसलिए भी ज़्यादातर होता है,क्योंकि मीडिया अपना ध्यान उन नेताओं पर ज़्यादा केन्द्रित करता चला जाता है। परिभाषा के अनुसार, इस तरह का नेता किसी भी तरह के लोकवाद के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस तरह का नेता "लोगों" का "नाम" (और इस प्रकार, लोगों के दुश्मन का नाम) लेता है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई को लेकर उनका आह्वान करता है। नेता को उनके नाम पर संप्रभु सत्ता ("लोगों के दुश्मनों" के ख़िलाफ़ उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए) सौंप दी जाती है। यह एक ऐसी संप्रभु सत्ता होती है,जो कभी "लोगों" को कथित रूप से "कुलीनों" की संस्थागत राजनीति से वंचित कर देने के ख़िलाफ़ लड़ती है। लोकवादी नेताओं में संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए त्वरित, शानदार नतीजे का वादा किये जाने की प्रवृत्ति होती है। इस तरह के मक़सद को हासिल करने के लिए ये विशिष्ट और असाधारण शक्तियां उनके बिल्कुल अनुकूल दिखती हैं।

आपातकालीन और विशिष्ट स्थिति :

राजनीतिक दार्शनिक जियोर्जियो एगाम्बेन की फ़रवरी में कोविड-19 को "सामान्य फ्लू" के रूप में खारिज करने और इटली में फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के उपायों की ज़रूरत को कम महत्व दिये जाने के लिए व्यापक रूप से आलोचना की गयी थी। जैसा कि "विशिष्ट स्थिति" पर एगाम्बेन का दर्शन हमें बताता है कि इस स्थिति को आम तौर पर वजूद में होना तब समझा जाता है,जब सामान्य संवैधानिक / क़ानूनी मानदंड या क़ानून के शासन का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में नागरिक अधिकारों को धक्का पहुंचता है। हमारे इन कठिन हालात पर उनकी कुछ महत्वपूर्ण समझ है। सबसे पहले तो जिन कारणों से आपातकाल आता है,उनके गुज़र जाने के बाद भी इस तरह की सरकारों की आपातकालीन शक्तियों से चिपके रहने की बुरी आदत हो जाती है।

दूसरी बात कि द्वितीय विश्व युद्ध के पहले का यूरोपीय इतिहास हमें बताते हैं कि “… लोकतांत्रिक संविधान का बचाव करने के नाम पर जिस तरह के आपातकालीन उपाय को जायज़ ठहराना चाहते हैं, वे वही उपाय होते हैं,जो लोकतंत्र की तबाही का कारण बनते हैं”। तीसरी बात कि आधुनिक राज्य शायद ही कभी किसी अपवाद के पूर्ण विकसित स्थिति को लागू करते हैं। इसके बजाय, राष्ट्रीय सुरक्षा का हावाला देकर असाधारण उपायों को भी मानक उपायों में बदल दिया जाता है।

अपने हालिया निबंध में एगाम्बेन का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान जीवन को "विशुद्ध रूप से जैविक स्थिति तक सीमित कर दिया गया" है, शायद यह उस बात से जुड़ी हुई सच्चाई है,जिसे उन्होंने “ख़ाली ज़िंदगी” कहा है। इस विशेष स्थिति में जी रहा व्यक्ति शारीरिक रूप से दूरी बना सकता है और संक्रमण से बचने के लिए "घर से काम" करते हुए बाक़ी चीज़ों छोड़ सकता है। प्रवासी श्रमिकों जैसे संकटग्रस्त और हाशिए पर रह रहे लोग इन्हीं परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए संघर्ष करेंगे। कोई शक नहीं कि सरकार पोषण, आश्रय और स्वास्थ्य सेवायें मुहैया कराकर उनकी परेशानियों को कम कर सकती है, जैसा कि केरल की सरकार ने किया है। (और इस संक्रमण को रोकने के लिए फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग और आइसोलेशन बहुत अहम हैं।) स्लोवेनियाई दार्शनिक स्लावोज ज़िज़ेक ने इस बात की मांग की है कि सरकारें इन हालात में अपने कर्तव्यों का पालन करे, और उन्होंने इस बात की उम्मीद जतायी है कि इस लॉकडाउन से एक नयी वैश्विक राजनीतिक एकजुटता सामने आयेगी। दूसरे लोग इस फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग और ख़ुद के आइसोलेशन को एकजुटता और देखभाल का ही एक रूप मानते हैं।

हालांकि, विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन, बैठकें, या विरोध प्रदर्शन जैसे राजनीतिक कार्रवाई के सामान्य तौर-तरीक़ों को चला पाना नामुमकिन हो गया है (सोशल मीडिया के ज़रिये होने वाली गतिविधियों को छोड़कर)। अरस्तू से लेकर हन्ना आरेंट जैसे राजनीतिक विचारकों तक ने मनुष्य होने के लिए उसके राजनीतिक अधिकारों की अपरिहार्यता का तर्क दिया है; चल रहे राजनीति स्थगन, जिससे लोगों के अस्तित्व को लगभग जैविक अस्तित्व तक सीमित कर दिया गया है, ऐसे में इस तरह के स्थगन के गंभीर, विनाशकारी नतीजे सामने आ सकते हैं। जब नागरिक राजनीतिक रूप से संलग्न हो ही नहीं पायेंगे, जैसे कि इस महामारी के दौरान हो रहा है, तो राज्य सत्ता नागरिकों पर जानबूझकर की जा रही राजनीतिक कार्रवाई को बंद नहीं कर पायेगी (अक्सर आपातकालीन उपायों के तहत)। यही वजह है कि इस समय जहां कहीं असहमति जताने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया जा रहा है,वहां राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और उन लोगों को सताने के लिए उनके अधिकारों और क़ानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार करने जैसे उपायों को हर कहीं देखा जा सकता है।

अपने देश में अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट (यूएपीए) की जड़ें भारत की आपातकाल (1962-1967, चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध) के दौरान कार्यपालिका को दी गयी असाधारण शक्तियां ही हैं। मगर क़ानून की असल जड़ें भी औपनिवेशिक युग के उस क़ानून में है, जिसने एक जगह इकट्ठा होने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया था, जिसे 1952 के वीजी रो बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ख़त्म कर दिया गया था। उस समय लोकसभा में हुई बहस से पता चलता है कि विपक्षी सांसदों ने इस क़ानून को लेकर आशंका व्यक्त की थी कि इस तरह का अधिनियम उन लोगों को शिकार बना सकता है, जिसे सत्ताधारी पार्टी अपना दुश्मन मानती है।

तब से इस क़ानून में कई बार संशोधन किया जा चुका है, और अब तो इस क़ानून का उद्देश्य आतंकवाद का मुकाबला करना माना जाता है। इसके तहत भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को ख़तरे में डालने, अलगाववादी प्रयासों और इसी तरह के और भी गंभीर आरोप लगाये जा रहे हैं। यूएपीए मुख्य रूप से सरकार को संगठनों पर प्रतिबंध लगाने और प्रतिबंधित संगठनों के कथित सदस्यों पर मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। हालांकि, जिस तरह से इसे जारी रखा गया है, और इसे संशोधित  किया गया है, क़ानून के जानकारों द्वारा इसकी आलोचना की जाती है।

माओवादियों के साथ कथित रिश्तों को लेकर कार्यकर्ता अखिल गोगोई पर पिछले दिसंबर में यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया था। एनआईए उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट पेश नहीं कर सकी और उन्हें ज़मानत दे दी गयी। हालांकि, महामारी के प्रकोप के बढ़ने के बावजूद उनकी जेल की अवधि बढ़ाये जाने के लिए असम में सीएए-विरोधी प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामले में भी उनके ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किये गये हैं (बिट्टू सोनोवाल और धज्ज्य कोंवर को भी जेल में रखा गया है)। गोगोई को जैसे ही एक मामले में जमानत दी जा रही होती है,वैसे ही फिर से उन्हें तुरंत ही नये आरोपों में गिरफ़्तार कर लिया जा रहा होता है। असम और अन्य जगहों के नागरिक समाज ने एक बयान में चल रहे घटनाक्रमों के इस मोड़ पर (विशेषकर गोगोई के स्वास्थ्य के सिलसिले में) अपनी चिंता व्यक्त की है, लेकिन इसका कोई फ़ायदा होता हुआ नहीं दिखता है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की उच्चायुक्त और ऑगस्टो पिनोचेट के यातना कक्षों से बच निकलने वाली मिशेल बाचेलेत ने राजनीतिक कैदियों और असहमति रखने वालों को छोड़ने का आह्वान किया है (क्योंकि भीड़भाड़ वाली जेलों में क़ैदियों को संक्रमण का ख़तरा है)। यह देखा जाना अभी बाक़ी है कि इन परिस्थितियों में सरकारें  उनके इस आह्वान पर ध्यान देती है या नहीं।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट के छात्र हैं। इनके विचार व्यक्तिगत हैं)

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख आप नीचे लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Democracy and Populist Politics During Lockdowns

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