NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ध्रुवीकरण के डर से आवारा मवेशियों के मसले पर हिचकिचाहट
किसानों के लिए यह समस्या जितनी बड़ी है उसे देखते हुए विपक्षी राजनीतिक दलों को इस चुनाव में शुरू से ही इसे ज़ोर-शोर से उठाना चाहिए था। लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के डर से राज्य की कोई बड़ी पार्टी ऐसा करने से हिचकिचाती रही।
सरोजिनी बिष्ट
17 May 2019
आवारा मवेशियों के मसले पर हिचकिचाहट

17वीं लोकसभा के लिए चुनाव जब अंतिम चरण की ओर हैं तब जाकर उत्तर प्रदेश में आवारा मवेशियों की समस्या मुद्दा बनती दिख रही है। लेकिन उसमें भी समाधान को लेकर गंभीरता या किसानों के प्रति चिंता कम, एक-दूसरे पर राजनीतिक तीर चलाने की मंशा ही अधिक दिखती है। किसानों के लिए यह समस्या जितनी बड़ी है उसे देखते हुए विपक्षी राजनीतिक दलों को इस चुनाव में शुरू से ही इसे ज़ोर-शोर से उठाना चाहिए था। लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के डर से राज्य की कोई बड़ी पार्टी ऐसा करने से हिचकिचाती रही। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बारे में तब बोलना शुरू किया जब उनकी चुनावी जनसभा में सांड़ ने घुसकर उत्पात मचाया। तब तक सात में से लोकसभा चुनाव के तीन चरण निकल चुके थे।  

25 अप्रैल की इस घटना के बाद ट्विटर पर अखिलेश ने लिखा, "21 महीनों में हमने एक्सप्रेस-वे बनाया था, लेकिन पिछले दो सालों में जनता पाँच करोड़ आवारा पशुओं से परेशान हो गयी है। अगर सरकार राजनीतिक कार्यक्रमों में सांड़ को घुसने से नहीं रोक पा रही, तो ग़रीब किसानों का क्या हाल हो रहा होगा यह बस वही जानते होंगे।" पाँच करोड़ का आंकड़ा उन्हें कहाँ से मिला, मालूम नहीं, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि हर गाँव-जवार में झुंड के झुंड आवारा मवेशी फसलों को तबाह कर रहे हैं। बढ़ती लागत और उपज का सही दाम नहीं मिलने से किसानों की कमर पहले ही टूटी हुई थी, ऊपर से आवारा गाय-सांड़ों की समस्या। जंगली सूअरों, नीलगायों के उत्पात के मुक़ाबले यह समस्या कहीं बड़ी है।

मोदी-योगी के शासन के बाद उत्तर प्रदेश में आवारा मवेशियों की जनसंख्या का विस्फ़ोट हुआ है। कथित गौरक्षकों की गुंडागर्दी से गोवंशीय पशुओं की ख़रीद-बिक्री लगभग ठप है। मवेशी कारोबार से जुड़े लोगों में ज़्यादातर मुसलमान हैं। माहौल को देखते हुए उन्होंने इससे किनारा कर लिया है। किसानों पर इसकी दोहरी मार पड़ रही है। एक तो उन्हें अपने लिए अनुपयोगी गोवंशीय पशुओं का कोई दाम नहीं मिल रहा और दूसरा उन्हें खुला छोड़ देने पर वही मवेशी उनके खेत चर रहे हैं। दूध दुहने के लिए जब तक बछड़े की ज़रूरत होती है तब तक लोग उसे रखते हैं और उसके बाद उसे दूर ले जाकर छोड़ देते हैं। अपनी मुसीबत दूसरे के गले डालने के चक्कर में सब मुसीबत के दलदल में धँसते जा रहे हैं। 

एक ज़माना था जब बछिया से ज़्यादा बछड़े की क़ीमत मिला करती थी, लेकिन खेती में बैलों का इस्तेमाल बंद होने के साथ वो दिन चले गये। अब तो लोग पैसे देकर उनसे पल्ला छुड़ाने को तैयार हैं। इसके चलते अब बहुत से किसान गायों की जगह भैंस पालना ही बेहतर समझ रहे हैं। एक तरह से कहें तो गोवंश की रक्षा के नाम पर मोदी-योगी की सरकारें उनकी दुश्मन बनी हुई हैं।

खेती ही नहीं, आवारा मवेशी जान के दुश्मन भी बन रहे हैं। शहर हो या हाइवे हर जगह इनका डेरा दिखता है। पहले खेती में इस्तेमाल के लिए बछड़ों को बधिया कर दिया जाता था, जिससे उनकी आक्रामकता कम हो जाती थी। सांड़ गाँव-जवार में कहीं एक-दो होते थे, जिनका इस्तेमाल प्रजनन के लिए होता था। एक सांड़ को क़ाबू करने के लिए पाँच-दस लट्ठधारी जाते थे। अब ऐसे सांड़ों के झुंड के झुंड घूम रहे हैं। हाल यह है कि राज्य की राजधानी लखनऊ में आए दिन सांड़ों के हमले की घटनाएँ घट रही हैं, जिनमें राहगीर न केवल घायल हुए हैं, बल्कि जान तक से हाथ धोना पड़ा है। पॉश कॉलोनियों तक में आवारा मवेशियों के डर से बच्चों का भयमुक्त होकर खेलना दूभर हो गया है।    

इतनी गंभीर समस्या के प्रति राज्य सरकार का क्या रवैया है, इसे साफ़ करने के लिए बीती 13 मई का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान देखिए। अखिलेश यादव की ओर से उठाये गये सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "नंदी भी एसपी की रैली में जा रहा है। वह पूछता है कि कसाइयों के मित्र लोग कहाँ हैं, उन्हें मैं ठीक कर देता हूँ। मैंने कहा कि नंदी बाबा चुनाव चल रहा है। आचार संहिता चल रही है। चुनाव के बाद अपना काम करना।" 

कुछ महीने पहले जब आवारा मवेशियों के झुंड गेहूँ की फसल को चरकर साफ़ करने लगे तो कई इलाक़ों में किसानों का आक्रोश फूट पड़ा। किसान इन मवेशियों को खदेड़कर सरकारी स्कूलों व अन्य भवनों में बंद करने लगे। तब योगी सरकार हरकत में आयी और हास्यास्पद क़दम उठाते हुए बहुत से सरकारी कर्मचारियों को आवारा मवेशी पकड़ने के काम में लगा दिया। इस अभियान में बमुश्किल कुछ हज़ार मवेशी पकड़े गये होंगे। जो कि समस्या के पैमाने को देखते हुए नगण्य है। जो हज़ारों मवेशी पकड़े भी गये, रखने व उनके खाने-पीने का सरकार की ओर से समूचित इंतज़ाम नहीं होने से उनमें से काफ़ी मर भी चुके हैं।    

फ़रवरी के महीने में राज्य सरकार ने अपना बजट पेश करते हुए बेसहारा गोवंशीय पशुओं के लिए 632 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की, जिसे ऊँट के मुँह में ज़ीरा ही कहा जाएगा। जो आवंटन भी हुआ, उससे ज़मीन पर कुछ काम होता नहीं दिख रहा। योगी सरकार इस मामले में अपने पड़ोस की राजस्थान सरकार से सीख सकती है, जो खेतों की तारबंदी के लिए 40,000 रुपये तक के अनुदान की योजना लेकर आयी है। 

कुल मिलाकर कहें तो अब समय आ गया है कि इस मसले पर धार्मिक भावुकता और राजनीतिक छल-छद्म से ऊपर उठकर व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ा जाये। सरकारें समीक्षा करें कि कहीं उनकी नीतियां गो-पालन को ही तो ख़तरे में नहीं डाल रही हैं।

stra cattles
Yogi govt
Uttar pradesh
Cow Vigilantism
gaurakshaks
Yogi Adityanath
farmers distress
stray cows

Related Stories

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह प्रकरण में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License