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भारत
राजनीति
बढ़ती लागत, घटती कमाई: बिहार के 'सिल्क सिटी' के बुनकरों की वजूद की लड़ाई
किसी ज़माने में समृद्ध रहे भागलपुर के बुनकर इस समय महंगे कच्चा माल की ख़रीद, रेशम के उत्पाद के निर्माण और लाभकारी क़ीमतों पर अपने उत्पाद बेचने के सिलसिले में भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
सौरव कुमार
15 Feb 2021
भागलपुर के नाथनगर का एक पावरलूम
भागलपुर के नाथनगर का एक पावरलूम

सरकार के “वोकल फ़ॉर लोकल” और “आत्‍म निर्भर भारत अभियान” के नारे बिहार के ‘सिल्क सिटी’, भागलपुर का मज़ाक उड़ाते दिख रहे हैं। यह सिल्क सिटी हज़ारों बुनकरों का पनाहग़ाह है। भागलपुर हर दिन ज़माने से बुनकरी का काम कर रहे इस समुदाय के वजूद के संकट की लड़ाई के चलते अपनी चमक खोता जा रहा है।

सरकारी मदद या हस्तक्षेप की कमी के चलते घाटे में चल रहे रेशम के कारोबार, महंगे कच्चे माल, हाथ से बने कपड़े की सस्ती बिक्री और धागे की बढ़ी क़ीमत जैसी कई चुनौतियों ने बुनकरों के सामने एक गहरा सवाल पैदा कर दिया है कि बुनकरी का काम जारी रखा जाये या फिर ज़माने से चले आ रहे इस पेशे को छोड़ दिया जाये।

कच्चे सूती धागे की बढ़ती क़ीमत

कच्चे सूती धागे की क़ीमत में बढ़ोत्तरी ढहते रेशम और अन्य कपड़ा उद्योगों पर पड़ने वाली हालिया चोट है। पर्दे, कुर्ता, सलवार बनाने में इस्तेमाल होने वाली कपास की एक क़िस्म, इकत की स्थानीय बाज़ार में ज़्यादा मांग है, लेकिन यह बुनकरों की पसंद नहीं रह गयी है। सूत की क़ीमत में इस बढ़ोत्तरी के चलते उनके असंतोष के संकेत के रूप में भागलपुर के बुनकरों को तक़रीबन 50 करोड़ रुपए के कच्चे सूती धागे का ऑर्डर नहीं मिला था। प्रति किलोग्राम सूती धागे की लागत 300 रुपये से बढ़कर 450 रुपये हो गयी है, जिससे बुनकरों को इस सामग्री का ख़रीद पाना और इसके साथ काम कर पाना महंगा पड़ रहा है।

क़ीमत में हुई यस बढ़ोत्तरी कपास-टसर रेशम मिश्रित कपड़ों के निर्माण में आड़े आ गयी है। मसलन,100 रुपये की क़ीमत वाले एक दुपट्टे की क़ीमत अब 140 रुपये है, 300 रुपये की एक बेड शीट 360 रुपये की हो गयी है, इस चलते बुनकरों की तरफ़ से इन कपड़ो के होने वाले उत्पादन में कमी आ गयी है। रेशम बुनकर खादी ग्रामोद्योग संघ (RBKGS) के सचिव, अलीम अंसारी के मुताबिक़, लुंगी, शर्ट, गमछा आदि जैसे सूती उत्पादों का उत्पादन बहुत कम हो गया है और इसके पीछे का एकमात्र कारण कच्चे धागे का महंगा होना है।

इसके अलावा,सूती कपड़ों पर डिज़ाइन बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले सूती धागे पर भी मार पड़ी है, हालांकि यह एक पूर्ण सूती वस्त्र बनाने के मुक़ाबले एक छोटा काम है। सूती धागे के डिज़ाइन वाले ये रेशमी वस्त्र इस छोटे घटक के मूल्य में होने वाली बढ़ोत्तरी के चलते महंगे हो गये हैं। प्रति किलोग्राम रेशम की क़ीमत 3,000 रुपये हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 7,000 रुपये हो गयी है, जबकि बुनकरों की आमदनी जस की तस बनी हुई है। कपास के मिश्रण से रेशम की साड़ी बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का ख़र्च 2,000 रुपये से बढ़कर 2,500 रुपये तक हो गया है, और उन्हें बड़े खुदरा विक्रेताओं और व्यापारियों को पहले की दरों पर बेच पाना अब मुमकिन नहीं रह गया है।

यार्न यानी कच्चे धागे की मूल्य वृद्धि असल में कच्चे धागे की आपूर्ति योजना (YSS) के तहत चलने वाले यार्न बैंक का भागलपुर में नहीं होने का एक नतीजा है। यार्न बैंक नहीं होने के चलते खुले बाज़ार में अब भी कुछ लोगों का एकाधिकार है और वे भारी मुनाफ़ा कमा रहे हैं। इस बाज़ार पर एकाधिकार और मनमाने मूल्य बढ़ोत्तरी का असर सीधे-सीधे ग़रीब बुनकरों पर पड़ा है। यार्न बैंक नहीं होने से भागलपुर को कच्चे धागे की आपूर्ति चेन्नई, कोलकाता से होती है और कच्चे रेशम का कोया(cocoon) झारखंड और उत्तराखंड से ख़रीदा जाता है। कच्चे धागे पाने की मुश्किल और थका देने वाली प्रक्रिया अब भी वैसी ही है। यार्न बैंक की घोषणा किये जाने के एक दशक बाद भी नेशनल हैंडलूम डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NHDC) अपने वायदे को पूरा नहीं कर पाया है। अलीम अंसारी का कहना है कि उन्होंने राज्य सरकार से बुनकरों की असुविधा को कम करने के लिए एक यार्न बैंक स्थापित करने का अनुरोध किया है, लेकिन उनका कहना है कि सरकार ने इस बात को भी अनसुनी कर दी है।

भागलपुर रेशम उद्योग का वार्षिक कारोबार इस समय तक़रीबन 100 करोड़ रुपये का है, जबकि यह कभी 600 करोड़ रुपये का हुआ करता था।

भागलपुर रेशम उद्योग की लोकप्रियता इसके बहुप्रशंसित 'टसर सिल्क' की वजह से है, जिसकी पहचान विश्व भर में रही है। हालांकि, राज्य भर के बुनकरों की बिगड़ती हालत के चलते ‘आत्म निर्भार भारत’ योजना में यह उद्योग फ़िट होता हुआ नहीं दिखता है। यह स्थानीय उद्योग गर्त में है और इसे उन राज्य और केंद्र सरकारों की दया के हवाले छोड़ दिया गया है, जिन्होंने इस उद्योग के पुनरुद्धार के नाम पर सिर्फ़ बयानबाजी की है। कपड़ा मंत्रालय की तरफ़ से बुनकरों के सम्बन्ध में जारी की गयी योजनाओं में राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP), व्यापक हथकरघा क्लस्टर विकास योजना (CHCDS) और हथकरघा बुनकर व्यापक कल्याण योजना (HWCWS) शामिल हैं, लेकिन लक्ष्य तक इसका न्यूनतम लाभ ही पहुंच पाया है।

बुनकरों की व्यथा-कथा

बुनकरों को लक्ष्य करके बनायी गयी इन सरकारी नीतियों में एक पेचीदा जटिलता बनी हुई है। इस जटिलता को माखन बरारीपुर, नाथनगर में रहने वाले बुनकर, कालीचरण (38) के मामले में देखा जा सकता है, उन्होंने 2019 में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) योजना के तहत तीन दिवसीय प्रशिक्षण लिया था, लेकिन वह कोई नई तकनीक या कौशल नहीं सीख पाए। वह बताते हैं, "मैं 20 साल से कपड़े बुन रहा हूं और पीएमकेवीवाई योजना में शामिल होने के बाद मैं आशान्वित था, लेकिन इससे बड़ी निराशा हुई, क्योंकि प्रशिक्षकों ने कुछ भी नया नहीं सिखाया। हमें एक टी-शर्ट, एक प्रमाण पत्र ज़रूर मिले, लेकिन जानकारी नहीं मिली। मान्यता देना किसी भी लिहाज़ से न्यून मासिक आमदनी से निजात पाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

फ़ोटो: कालीचरण, पीएमकेवीवाई से प्रशिक्षित बुनकर

कालीचरण कहते हैं, "मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि वह हमें ‘रेपियर' मशीनें मुहैया कराए, जो हमें एक दिन में लम्बाई के हिसाब से ज़्यादा कपड़े की बुनाई करने में सक्षम बनाती है। इस समय सिर्फ़ 30 मीटर कपड़ा बुनने की सीमा है, जबकि रेपियर से इस सीमा को बढ़ाकर प्रति दिन 200 मीटर तक किया जा सकता है। अगर हमारी न्यून आय की चिंताओं को सरकार दूर करना चाहती है, तो सरकार हमें रेपियर मशीन मुहैया करा दे।

भागलपुर में एक बुनकर सेवा केंद्र (WSC) है, जिसका मक़सद उत्पाद के विकास, विविधता और उसमें सुधार के लिए अर्ध-कुशल और कुशल हथकरघा बुनकरों को प्रशिक्षण प्रदान करना है। हालांकि, यह रेशम केंद्र इस समय पावरलूम का आशियाना है,मगर इस बुनकर सेवा केंद्र (WSC) के होने से इस समुदाय को कोई फ़ायदा नहीं मिल पा रहा है।

गया और बांका के बाद भागलपुर में बुनकरों का सबसे बड़ा समूह है, यानी यहां तक़रीनब 60,000 बुनकर रहते है। यहां उस ‘तांती’ या बुनकर समुदाय (अनुसूचित जाति) का ज़िक़्र किया जा सकता है, जो निचली जातियों से आते है। पूरी तरह बुनाई की श्रमसाध्य आजीविका पर निर्भर रहते हुए इनके पास किसी  प्रकार का कोई कृषि कार्य नहीं हैं और इनके पास जोत की कोई ज़मीन भी नहीं है।

मनोहरलाल

बुनकरों के लिए 9 रुपये प्रति मीटर की दर से मिलने वाली बुनाई की दर प्रति मीटर 5 रुपये हो गयी है, जबकि कच्चे धागे की 150 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ी हुई क़ीमत ने इस समुदाय को ग़ैर-मुनाफ़ा वाले एक व्यवसाय में धकेल दिया है। मनोहर लाल (50) कहते हैं, '' कच्चे धागे की आसमान छूती क़ीमत ने हमारे घटते वजूद पर एक और क़रारा प्रहार है। एक पावरलूम से नोकदार बिनाई नली के छिटकने से मनोहर की दाहिनी आंख की रोशनी चली गयी और अपनी किशोरावस्था में ही उनकी आंखें चली गयीं। बुनकरों की क्षतिग्रस्त आंख और मुश्किल ज़िंदगी एक निराशाजनक भविष्य की ओर इशारा करते हैं, मनोहर आगे बताते हुए कहते हैं कि कच्चे धागे की बढ़ती क़ीमत कच्चे धागे के बड़े व्यापारियों की तरफ़ से किये जाने वाले उनके व्यवस्थागत शोषण का एक नतीजा है।

दिन-रात चलने वाले हज़ारों पावरलूम की आवाज़ें इन बुनकरों की आजीविका से जुड़ी चिंताओं और फ़रियादों को सरकारी अधिकारियों और प्रशासन तक पहुंचा पाने में नाकाम रही हैं। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए राज्य के पूर्व उद्योग मंत्री, श्याम रजक कहते हैं, “बिहार के बुनकर किसी तरह अपना वजूद बचाये हुए हैं और उन्हें लंबे समय से बकाया बिजली शुल्क को माफ़ करने जैसी सरकारी मदद की सख़्त ज़रूरत है। उनकी बिगड़ी हुई आर्थिक हालत उनके जीवन यापन में बढ़ बनी हुई है।”

रजक बताते हैं, "मेरे कार्यकाल के दौरान रेशम उद्योग को लोकप्रिय बनाने और सब्सिडी दिये जाने की पहल की गयी थी और केंद्र से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जानी की मांग को मज़बूती से रखा गया था और इससे वजूद बचाने के लिए संघर्षरत इस रेशम उद्योग को बचाया जा सकता था।" वह रेशम उद्योग को बढ़ावा देने और बुनकरों को सीधे लाभ पहुंचाने के मक़सद से उत्पाद को बाहर बेचे जाने को सुनिश्चित करने के लिए भागलपुर हवाई अड्डे के तत्काल सजाने-संवारने पर ज़ोर देते हैं, ताकि यह श्रमसाध्य पारंपरिक उद्योग अपने धूसर होते चहरे की चमक वापस पा सके।

बिंदू दास

बिंदू दास (70) इसकी दशा को दर्शाते हुए कहते हैं कि इस 'टसर सिल्क' का पूर्ववर्ती स्वर्ग ग़रीबी की भयंकर चपेट में है। सत्तर साल का यह बुनकर हथकरघा का इस्तेमाल करता है, और दो कपड़े बुनाई से महज़ 100 रुपये कमा पाता है। विलुप्त होने के कगार पर यह हथकरघा उद्योग असल में सरकार की प्राथमिकता सूची में ही नहीं है, जबकि यह उन बड़े व्यापारियों का एक आसान निशाना है, जो बुनकरों को कम दर पर भुगतान करते हैं और दास का कहना है कि बाज़ार में उसी उत्पाद को दोगुनी दर पर बेचा जाता है।

बुनाई का यह घरेलू कारोबार भागलपुर शहर के नाथनगर और चंपानगर के दो क्षेत्रों के तीन किमी के दायरे में फैला हुआ है और यह हज़ारों परिवारों का आर्थिक आधार है। इन बुनकर परिवारों में से कई लोगों ने यह बात कही कि कोविड-19 के चलते लगाये गये लॉकडाउन ने इस उद्योग पर क़रारा प्रहार किया है, इससे इस कारोबार के 95% हिस्से को चोट पहुंची है और नुकसान हुआ है।

रेशम उद्योग और सामाजिक अनुबंध

भागलपुर रेशम उद्योग की कहानी बुनाई और शिल्प दोनों ही लिहाज़ से मुस्लिम और हिंदू (तांती, अनुसूचित जाति) समुदायों से ऐसे जुड़ी हुई है कि इन्हें अलग-अलग कर के देखा ही नहीं जा सकता। नथनगर और चंपानगर क्षेत्रों में शहर से निकलने वाली संकरी गलियों के दोनों किनारों पर बुनाई के क्लस्टर हैं।

25 पावरलूम के साथ सबसे बड़ी बुनाई इकाइयों में से एक चलाने वाले मोहम्मद शमशाद (45) के मुताबिक़, धार्मिक सामंजस्य के बिना इस रेशम शहर की कल्पना कर पाना एक भूल होगी, क्योंकि बुनाई, धुलाई, रंगाई और व्यापार की रूपरेखा की इस पूरी प्रक्रिया में हिंदू और मुसलमानों के बीच कार्यों का बंटवारा एक दूसरे का पूरक है। बुनकरों की कमज़ोर होती हालत के बावजूद, सामाजिक सद्भाव और आर्थिक लेन-देन इस वक़्त की हक़ीक़त हैं, जबकि सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है और शहर में 1989 के सांप्रदायिक दंगों की यादें हैं।

शमशाद

शमशाद इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उस शिल्प को आधार देने के लिए सरकार की ओर से बहुत मदद नहीं की दी जाती रही है, जिसकी दुनिया भर में अपनी पहचान है। वह कहते हैं, "अगर गंभीर प्रयास करना ही है, तो हम बुनकर समुदाय के लिए कपड़े की ख़रीद-फ़रोख़्त करने वाले गलियारों और एक सरकारी आउटलेट की स्थापना की मांग करते हैं और इससे बड़े व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों बड़े पैमाने पर हो रहे शोषण से यह समुदाय बच जायेगा।"

जो शिकायतें शमशाद की हैं, वही शिकायतें मोहम्मद ज़ुबैर (55) की बातों में भी दिखती है। ज़ुबैर को लगता है कि बुनकर को कच्चे माल ख़रीदने से लेकर सिल्क की वस्तुओं के निर्माण तक की प्रक्रिया में अपार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। विनिर्माण के बाद बुनकर को अपने उत्पाद को सही बाज़ार में बेचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Dipping Earnings, Rising Costs: Weavers of Bihar’s ‘Silk City’ Fight for Survival

Bhagalpur silk
Handloom Industry
Cotton Yarn Price
Weaver Community
Bihar Weavers
Bihar Economy

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