NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
घटना-दुर्घटना
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
एक डॉक्टर की मौत – क्यों? कुछ बुनियादी सवाल
ऐसे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से रेजिडेंट डॉक्टरों को इतना कठोर कदम उठाने पर मज़बूर होना पड़ता है?
टीकेंद्र सिंह पंवार
18 Jun 2019
Translated by महेश कुमार
Tadvi
फोटो साभार: Hindustan Times

जब अस्पतालों में सुरक्षा की मांग को लेकर पूरे देश में रेजिडेंट डॉक्टरों की हड़ताल दूसरे दिन भी चल रही थी, तो एक रेजिडेंट डॉक्टर ने हरियाणा के रोहतक के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में आत्महत्या कर ली। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब अपनी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रही एक आदिवासी रेजिडेंट डॉक्टर पायल तडवी ने भी आत्महत्या कर ली थी। रोहतक के मेडिकल कॉलेज में रेजिडेंट डॉक्टर हड़ताल पर चले गए; वे बाल रोग विभाग की प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं जो संयोग से एक महिला हैं। पीड़ित डॉ. ओंकार, कर्नाटक से हैं, वे पीडियाट्रिक्स में अपने एमडी (डॉक्टर ऑफ मेडिसन) की पढ़ाई कर रहे थे। अन्य मांग के अलावा उनके  परिवार के सदस्यों को एक करोड़ रुपये मुआवज़ा देने की भी मांग की गई है।

ऐसा क्यों है कि जिन रेजिडेंट डॉक्टरों को प्रतिभा के मामले में सबसे ऊपर माना जाता है, वे ऐसे कठोर कदम क्यों उठाते हैं? केवल 63,000उम्मीदवार, सीनियर सेकंडरी से पास होकर, राष्ट्रीय पात्रता की प्रवेश परीक्षा (NEET) (2018 में NEET परीक्षा में 13,26,725 छात्र शामिल हुए) को उत्तीर्ण करते हैं और उनमें से केवल 25,000 स्नातकोत्तर की परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए योग्य पाए जाते हैं। ये वे लोग हैं जिनका एक सपना सच होने जैसा है। फिर ऐसे लोगों द्वारा आत्महत्या करना एक गंभीर चिंता का विषय है। यह एक ऐसी त्रासदी है कि जो लोग दूसरों का जीवन बचाने के लिए होते है, वे अचानक अपना जीवन समाप्त कर देते हैं।

जबकि डॉ. पायल और डॉ. ओंकार दोनों की सामाजिक स्थिति उनके पीड़ित होने के पीछे की सच्चाई के रूप में पाई गई है, लेकिन इसके साथ ही ऐसा कुछ और भी है जो नीचे ही नीचे पक रहा है। डॉ. ओंकार के लिए एक कारण तो यह था कि उनकी छुट्टी मंजूर नहीं हुई थी। उन्होंने कर्नाटक जो उनका मूल निवास स्थान है, अपनी बहन की शादी में भाग लेने के लिए छुट्टी के लिए आवेदन किया था। यह कितना विचित्र लगता है।

इस तथ्य के बारे में कोई दो राय नहीं है कि अलग-अलग लोग उनके इर्द-गिर्द हालात में अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन भारत में, यह एक स्वीकृत वास्तविकता है कि पीजी के छात्र या जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर (जैसा कि उन्हें कहा जाता है), अपने वरिष्ठ के कार्यक्रम को लागू करते हुए अपार दबाव में रहते हैं। यह दबाव मुख्य कारणों में से एक है जो उन्हें आत्महत्या करने जैसे कठोर कदम उठाने की ओर खींचता है।

एक व्यक्ति जो पोस्ट-ग्रेजुएशन करने और फिर पोस्ट-डॉक्ट्रेट या एमसीएच करने के दौर से गुज़रता है, न कि एक छात्र के रूप में, बल्कि एक पति या पत्नी के रूप में, आसानी से समझ सकता है कि उस व्यक्ति का रेजीडेंट होते हुए यह सब करते हुए उस पर किस तरह का दबाव होता है वह सिर्फ इतना नहीं होता कि वह दबाव सिर्फ  छात्र तक ही सीमित रहता है, बल्कि वह उन पर भी होता है जो उनके साथ जुड़े होते हैं। मेरी पत्नी जो हिमाचल प्रदेश में पहली महिला सर्जन (सामान्य सर्जरी) बन गई और फिर पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) चंडीगढ़ से पहली महिला कार्डियाओ-थोरेसिक सर्जन बनीं, को लगातार इस तरह के दबावों का सामना करना पड़ा। पूरी तरह से पुरुष डोमेन में प्रवेश करने वाली एक महिला होने के नाते उनके लिए वह एक वास्तविक अवरोधक था, लेकिन एक रेजीडेंट डॉक्टर होना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण काम था। प्रारंभ में, यह सुनिश्चित करने के प्रयास भी किए गए थे कि वह सर्जरी के विषय को छोड़ दे और बाद में दबाव यह था कि वे अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में खुद को सक्षम साबित करें।

निश्चित रूप से, ऐसे आघात देश भर में समान है, सभी मेडिकल कॉलेजों में।

सबसे पहले, यह सरकारी कॉलेजों और अस्पतालों में मरीजों की भारी भीड़ और स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्य द्वारा निवेश में कमी से जुड़ा है। काम के दबाव का बड़ा हिस्सा सहने वाले रेजिडेंट डॉक्टर इस सबका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतते हैं। उनके ऊपर, यहां तक कि न्यूनतम सुविधाएं जैसे कि विश्राम कक्ष, स्वच्छ पेयजल आदि भी उपलब्ध नहीं हैं।

दूसरा कारण इस पेशे की पूरी की पूरी अलोकतांत्रिक संरचना है, उसके काम करने की संस्कृति और अत्यधिक पदानुक्रम से जुड़ा हुआ है। बॉस,यानी विभाग के प्रमुख (HoD) या यहां तक कि यूनिट हेड के आदेश को बिना किसी रोक-टोक के लागू करना आवश्यक है। चिकित्सा और विशेष रूप से सर्जरी के कौशल को सीखने और विकसित करना, उनके मालिक की इच्छा और इच्छाशक्ति के अधीन है। ‘उस्ताद से ही सीखना,रेजीडेंट  डॉक्टरों के लिए सफलता का मंत्र है। तो, बॉस द्वारा अपने बॉस से सीखने की कहानी चलती रहती है। एक थीसिस पर हस्ताक्षर करवाने के लिए पीजी छात्र को बहुत निराशा हो सकती है, क्योंकि बहुत ही मामूली आधार पर उसे न सिर्फ फिर से लिखने के लिए कहा जा सकता है,बल्कि कई बार तो वह इसे ठुकरा भी देता है।

एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर, भले ही तेज तर्रार और समझदार हो, उसे अपने बॉस की 'परीक्षा उत्तीर्ण' करना आवश्यक बना देता है। अस्पताल में जबरदस्त मेहनत करने के बावजूद रेजिडेंट डॉक्टरों को अपनी पढ़ाई करनी पड़ती है, यह बॉस ही है जो आम तौर पर उनका भविष्य तय करता है।

यह वह सुपर पदानुक्रम का वातावरण तैयार करता है जो लोकतांत्रिक आवाज़ और पसंद को दबा देता हैं। इन सबसे ऊपर, मेडिकल कॉलेज परिसरों में लोकतांत्रिक छात्रों के आंदोलन की अनुपस्थिति में, यह श्रेणीबद्ध प्रणाली ज्यादा अधिक ढंग से संक्षरित है। दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के रेजीडेंट डॉक्टरों के लिए, हालात और भी बदतर हैं।

मुझे याद है कि 1990 के दशक के शुरुआती दिनों में मेरे विश्वविद्यालय के दिनों में, कुछ प्रोफेसरों ने शोध के स्कॉलर का उपयोग उनके अपने घरेलू काम करवाने के लिए किया था, जैसे कि सब्जियां लाना आदि। ऐसे शिक्षकों के खिलाफ कड़े विरोध प्रदर्शन हुए। लेकिन मेडिकल कॉलेज परिसरों में ऐसा कभी नहीं देखा गया। लेकिन, यह गाइड या ‘सलाहकारों’ की भूमिका को कम नहीं करता है, क्योंकि वे खुद को मेडिकल बिरादरी में  कौशल और ज्ञान प्रदान करने वाला मानते हैं। रेजिडेंट डॉक्टरों पर मालिकों का नियंत्रण कम होना चाहिए।

तीसरा, लंबे समय तक काम करने का समय और कोई भी काम का प्रोटोकॉल न होना भी रेजिडेंट डॉक्टरों को अधिक असुरक्षित बनाता हैं। एक रेजीडेंट डॉक्टर कभी-कभी छुट्टी लिए बिना 72 घंटे तक काम करता है। यह चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, आर्थोपेडिक्स, ज्ञान और प्रसूति आदि में काफी प्रचलित है। ऐसे व्यक्ति के लिए ऐसे विस्तारित घंटों के लिए परिश्रम के साथ काम करना कैसे संभव है? इससे आघात और आवेग बढ़ाना लाजिमी  हैं, जो अलग अलग तरीकों में प्रकट होते हैं। मुझे इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला में दो जर्मन छात्रों की  याद आती हैं, जो एक एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए आए थे। उन्होंने शाम 5 बजे के बाद काम करने से मना कर दिया था। पश्चिम में इस तरह के काम का माहौल है, लेकिन भारत में हम उन्हें एक साथ कई दिनों तक काम करने के लिए मज़बूर करते हैं, जो पूरी तरह से अनुचित है।

यह आवश्यक है कि अधिक लोकतांत्रिक माहौल के लिए, एचओडी के पद को बदलते रहना चाहिए, काम के घंटों के लिए एक प्रोटोकॉल बनाना चाहिए और सबसे ऊपर, मेडिकल कॉलेजों में पोस्ट-ग्रेजुएशन सीटों की संख्या में वृद्धि करनी चाहिए। इस तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था से बाँधते बोझ को कम करने में मदद मिल सकती है जिसके तहत रेजीडेंट डॉक्टर काम करते हैं।

लेखक शिमला के पूर्व उप महापौर हैं।

payal tadvi
payal
dr payal
doctors strike
bengal doctors

Related Stories

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

महाराष्ट्र: रेज़िडेंट डॉक्टर्स की हड़ताल और सरकार की अनदेखी के बीच जूझते आम लोग

गुजरात में डॉक्टरों की हड़ताल जारी, सरकार पर बदले की भावना से बिजली-पानी कनेक्शन काटने का आरोप!

तमिलनाडु: नियुक्तियों में हो रही अनिश्चितकालीन देरी के ख़िलाफ़ पशु चिकित्सकों का विरोध प्रदर्शन

म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट से नाराज़ स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल

दिल्ली: निगमकर्मियों के हड़ताल का 11वां दिन, कर्मचारी वेतन और जनता सफ़ाई के लिए परेशान

केन्या के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों ने काम बंद किया; 7 दिसंबर से नर्से भी हैं हड़ताल पर

‘‘मिक्सोपैथी" के ख़िलाफ़ देश के कई राज्यों में डॉक्टरों ने की एक दिन की हड़ताल

कोरोना महामारी के बीच नगर निगम डॉक्टरों ने दी अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी

सहकर्मी की मौत के बाद असम में डॉक्टरों की हड़ताल


बाकी खबरें

  • असद रिज़वी
    CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा
    06 May 2022
    न्यूज़क्लिक ने यूपी सरकार का नोटिस पाने वाले आंदोलनकारियों में से सदफ़ जाफ़र और दीपक मिश्रा उर्फ़ दीपक कबीर से बात की है।
  • नीलाम्बरन ए
    तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है
    06 May 2022
    रबर के गिरते दामों, केंद्र सरकार की श्रम एवं निर्यात नीतियों के चलते छोटे रबर बागानों में श्रमिक सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
  • दमयन्ती धर
    गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया
    06 May 2022
    इस मामले में वह रैली शामिल है, जिसे ऊना में सरवैया परिवार के दलितों की सरेआम पिटाई की घटना के एक साल पूरा होने के मौक़े पर 2017 में बुलायी गयी थी।
  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती
    06 May 2022
    नज़रिया: ऐसा लगता है इस दौर की रणनीति के अनुरूप काम का नया बंटवारा है- नॉन-स्टेट एक्टर्स अपने नफ़रती अभियान में लगे रहेंगे, दूसरी ओर प्रशासन उन्हें एक सीमा से आगे नहीं जाने देगा ताकि योगी जी के '…
  • भाषा
    दिल्ली: केंद्र प्रशासनिक सेवा विवाद : न्यायालय ने मामला पांच सदस्यीय पीठ को सौंपा
    06 May 2022
    केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच इस बात को लेकर विवाद है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक सेवाएं किसके नियंत्रण में रहेंगी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License