NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव : बनारस की मशहूर और अनोखी पीतल पिचकारी का कारोबार पड़ रहा है फीका
बढ़ती लागत और कारीगरों की घटती संख्या के कारण पिचकारी बनाने की पारंपरिक कला मर रही है, जिसके चलते यह छोटा उद्योग ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष रहा है।
तारिक़ अनवर
03 Mar 2022
Translated by महेश कुमार
Varanasi District

वाराणसी (उत्तर प्रदेश): कभी काशी (वाराणसी का प्राचीन नाम) में पीतल की पिचकारी बनाने वाला उद्योग फलता-फूलता था, इस पिचकारी का मुख्य रूप से होली के त्योहार के दौरान इस्तेमाल किया जाता है, अब इसके निर्माता अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति इस लघु उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के कारण और ऊंची लागत के कारण, इस पारंपरिक, अद्वितीय और सुंदर शिल्प/क्राफ्टवर्क को आयातित प्लास्टिक की पिचकारियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है जो बहुत कम कीमतों पर बेची जाती हैं। जबकि खुदरा बाजार में पीतल की पिचकारी की कीमत 1,800-2,000 रुपये प्रति पिचकारी है, और प्लास्टिक वाली पिचकारी की  कीमत मात्र 100-800 रुपये के बीच है।

जिले में कभी पीतल की पिचकारी बनाने की 36 इकाइयाँ होती थी, लेकिन अब ये घटकर सिर्फ एक या दो रह गई हैं। निकट भविष्य में इस उद्योग के समाप्त होने का एक और कारण यह है कि अधिकांश कारीगर बुजुर्ग हैं जो अधिक समय तक काम करने में सक्षम नहीं हैं।

वाराणसी के अयार गांव के निवासी राजेंद्र प्रसाद मौर्य, जो इसके एकमात्र निर्माता हैं न्यूज़क्लिक के बताते हैं की, "दो कारणों से यह उद्योग धराशायी हो गया: एक, उच्च मुद्रास्फीति जिसने मांग को कम कर दिया है, और दूसरी, युवा पीढ़ी जो अपने बुजुर्गों से इस कला को विरासत में नहीं ले पाई है।" 

पिचकारी की निर्माण प्रक्रिया

पीतल, तांबे और जस्ते के मिश्र धातु से बनाता है। यह सीमेंटेशन प्रक्रिया द्वारा निर्मित होता है जहां दो धातुओं के अयस्कों को निश्चित अनुपात में गर्म किया जाता है जब तक कि जस्ता वाष्प का उत्पादन नहीं होता है जिसमें तांबे के साथ प्रतिक्रिया की एक ठोस अवस्था होती है।

फिर पिघले हुए पीतल को विभिन्न आकार के सांचों में डाला जाता है, जिन सांचों को भुनी हुई मिट्टी और जले हुए स्नेहक तेल के मिश्रण से बनाया जाता है, और फिर यह धातु जैसे ही  ठंडा होता है, एक ठोस आकार ले लेता है।

उन्होंने बताया की, “पीतल की पिचकारी बड़े पैमाने पर हाथ से बनाई जाती है और उन पर दस्तकारी की जाती है। इनके पूरे निर्माण में मशीनों का बेहद सीमित इस्तेमाल शामिल है।” 

पिचकारी का सिलेंडर, पीतल की चादरों से बना होता है, जिसे बाजार से खरीदा जाता है। बड़ी चादरों को टुकड़ों में काटा जाता है, पाइप या सिलेंडर की शक्ल दी जाती है और उसे तार से बांधा जाता है। किसी भी मशीन का इस्तेमाल किए बिना जोड़ को मैन्युअल रूप से मिलाया जाता है।

फिर सिलेंडर को मशीनों की मदद से इस तरह से पॉलिश किया जाता है कि जोड़ दिखाई न दें। पिस्टन पीतल की छड़ों से बना होता है, जो रेडीमेड होते हैं।

होली से लेकर कृषि में इसके इस्तेमाल तक

होली के त्योहार को जीवंत बनाने के अलावा इस पिचकारी या प्रेशर वाटर गन का इस्तेमाल कई अन्य कामों में भी किया जाता है, खासकर खेती में कीटनाशकों के छिड़काव के लिए भी इसे काम में लाया जाता है।

मौर्य ने बताया कि, “इसका इस्तेमाल खाद्यान्न, सब्जियों, सिंघाड़ा और आम के पेड़ों पर कीटनाशकों के छिड़काव के लिए भी किया जाता है। असम में इसकी मांग अधिक है जहां चाय उत्पादक इसका उपयोग कीट के लार्वा को बेअसर करने के लिए करते हैं, जो चाय की पत्तियों को नष्ट कर देता है। इसका इस्तेमाल नवनिर्मित दीवारों और खंभों पर पानी छिड़कने के लिए भी किया जाता है, क्योंकि यह पानी की बर्बादी से बचने में मदद करता है।” 

16 इंच लंबाई, दो इंच चोड़ाई वाली यह सुनहरे रंग की पानी की बंदूक आने वाली पीढ़ियों तक चलती है क्योंकि यह शुद्ध पीतल से बनी होती है। "पीतल के बर्तन का यदि उचित देखभाल के साथ इस्तेमाल किया जाता है, तो ये दशकों तक चल सकते हैं, जो सही मायने में खर्च किए पैसे की पूरी वसूली है। उन्होंने बताया कि, इन्हे ले जाना और साफ रखना आसान होता है। ये किसी भी अवसर के लिए उपहार आइटम हो सकते हैं।”

व्यापार का गणित अंकगणित

इस प्रेशर वाटर गन या पिचकारी का निर्माता अपनी जेब से एक भी पैसा इसके निर्माण पर निवेश नहीं करता है। इसे ऑर्डर पर बनाया जाता है। व्यापारी आवश्यक कच्चा माल जैसे तांबा, जस्ता और पीतल की छड़ें और चादरें प्रदान करते हैं। निर्माता केवल अपनी श्रम लागत का  शुल्क लेता है, जिसकी गणना इंच में की जाती है।

"जरूरी नहीं कि हम तांबे और जस्ता से ही पीतल बनाएं। कभी-कभी, हमें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें पिघलाने और इस्तेमाल करने के लिए पीतल की वस्तुएं प्रदान की जाती हैं। मौर्य ने कहा, हम व्यापारियों से अपनी श्रम लागत 30 रुपये प्रति इंच की दर से वसूलते हैं।

विकट चुनौतियां

मौर्य ने कहा कि वे एक साल में 6,000-7,000 से ज्यादा पिचकारी की मैन्युफैक्चरिंग की ऑर्डर नहीं ले सकते हैं क्योंकि उनके पास केवल पांच कारीगर हैं जो कई दशकों से इस उद्योग में लगे हुए हैं।

“सब कारीगर बूढ़े हो गए हैं; इसलिए, उन पर भारी काम का बोझ नहीं डाला जा सकता है। अगर मैं काम बढ़ा दूं, तो हमें ज्यादा से ज्यादा लोगों की जरूरत होगी, जो उपलब्ध नहीं हैं। मेरे पास जो कार्य बल है वह समय सीमा को पूरा करने के लिए ओवरटाइम नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा इसलिए, मैं केवल वही ऑर्डर स्वीकार करता हूं जो कारीगरों पर अधिक बोझ डाले बिना समय पर पूरा कर लिया जाए।” 

अयार गांव निवासी 68 वर्षीय कंचन राम इस उद्योग में 30 वर्षों से अधिक समय से काम कर रहे हैं। वर्कशॉप के पूरे साल चलने पर उन्हें हर महीने मात्र 6,000 रुपये मिलते हैं।

उन्होंने न्यूज़क्लिक को आगे बताया कि “इससे पहले, हमारे पास काफी ऑर्डर आते थे और समय पर खेप की डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए बढ़ी हुई शिफ्ट में काम करना पड़ता था। पिछले कुछ वर्षों में ओर्डेर्स में तीव्र गिरावट देखी गई है। इसलिए, सीमित कार्यबल के कारण हमें मना करना पड़ा। इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मेरे परिवार में कोई नहीं है क्योंकि मेरा इकलौता बेटा स्नातक है जो अब अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में ड्राइवर का काम कर रहा है।"  

69 वर्षीय लालजी पटेल ने दो दशकों से अधिक समय तक उद्योग में काम कर इस कला को सीखा है। “मैं इस कुटीर उद्योग से 1966 से जुड़ा हुआ हूँ, जब मासिक वेतन 15 रुपये होता था, जो समय के साथ बढ़ता रहा। मेरे परिवार में किसी को भी यह कला विरासत में नहीं मिली है। मेरे चार बेटे अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।"

इस उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं

जीआई (भौगोलिक संकेत)-पंजीकृत उत्पाद होने के बावजूद, पीतल की प्रेशर गन या पिचकारी को राज्य सरकार, एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना के अंतर्गत नहीं लाई पाई है।

 मौर्य ने बताया कि, “इस उद्योग को पुनर्जीवित किया जा सकता था और इसे शहर की विरासत के रूप में विकसित किया जा सकता था। लेकिन दुख की बात है कि कम से कम अभी तक इस तरह का कोई प्रयास नहीं हुआ है। शिल्प मर रहा है और उद्योग लगभग मर चुका है।” 

ओडीओपी योजना का उद्देश्य पारंपरिक कला और शिल्प को प्रोत्साहित करना, पुनर्जीवित करना और बढ़ावा देना है, जो उत्तर प्रदेश के लिए अद्वितीय हैं। यह योजना सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों या एमएसएमई को मान्यता प्राप्त बैंकों से वित्तीय सहायता प्राप्त करने, उचित मूल्य निर्धारण करने और विश्व स्तर पर विपणक के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए तकनीकी कौशल में सुधार के लिए प्रशिक्षण प्रदान करने में मदद करने का दावा करती है।

अफसोस की बात है कि ऐसे छोटे उद्योगों को पुनर्जीवित करना और प्रोत्साहन करना किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में शामिल नहीं है।

चुनावी गणित

राज्य में सात चरणों में चल रहे विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में वाराणसी में सात मार्च को मतदान होना है.

वाराणसी में सभी आठ विधानसभा क्षेत्रों में जीत दर्ज करना सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है क्योंकि यह जिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है, जो पिछले तीन दिनों से यहां डेरा डाले हुए हैं।

भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2017 में इन सभी सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि एक सीट पर ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने चुनाव लड़ा था - जो अब गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में यह चुनाव लड़ रहे हैं। अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाली अपना दल ने यहां से एक सीट जीती थी। इस बार अपना दल दो सीटों पर और बाकी छह सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है।

सपा नेता अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोनों के अगले सप्ताह वाराणसी में डेरा डालने की उम्मीद है, जिसके चलते एक हाई-वोल्टेज चुनाव अभियान की आस नज़र आती है। अखिलेश यादव और ममता बनर्जी भी 3 मार्च को वाराणसी में एक संयुक्त रैली और रोड शो की योजना बना रहे हैं, जबकि प्रियंका गांधी के भी 3 मार्च को यहां पहुंचने की उम्मीद है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UP Elections: The Glory of Varanasi’s Unique Handmade Brass Pichkari Units is Fading Away

Varanasi District
Brass Pichkaris
UP elections
Brass Pressure Guns
UP Artisans
ODOP
Kashi Pichkaris
Holi

Related Stories

सद्भाव बनाम ध्रुवीकरण : नेहरू और मोदी के चुनाव अभियान का फ़र्क़

इतवार की कविता: जश्न-ए-नौरोज़ भी है…जश्न-ए-बहाराँ भी है

पक्ष-प्रतिपक्ष: चुनाव नतीजे निराशाजनक ज़रूर हैं, पर निराशावाद का कोई कारण नहीं है

क्या भाजपा को महिलाओं ने जिताया? राशन योजना का वोटिंग पर क्या रहा असर 

क्या BJP के अलावा कोई विकल्प नहीं ?

विधानसभा चुनाव: एक ख़ास विचारधारा के ‘मानसिक कब्ज़े’ की पुष्टि करते परिणाम 

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !

यूपी चुनाव: सोनभद्र और चंदौली जिलों में कोविड-19 की अनसुनी कहानियां हुईं उजागर 

यूपी: चुनावी एजेंडे से क्यों गायब हैं मिर्ज़ापुर के पारंपरिक बांस उत्पाद निर्माता

यूपी चुनाव : मिर्ज़ापुर के ग़रीबों में है किडनी स्टोन की बड़ी समस्या


बाकी खबरें

  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी: आचार संहिता लगते ही प्रशासन ने हटाने शुरू किए पोस्टर, बैनर, होर्डिंग
    10 Jan 2022
    यूपी की सड़कों से राजनीतिक दलों के पोस्टर-बैनर हटाए जाने शुरू हो गए हैं, लेकिन सरकार की तरफ से जनहित की योजनाओं के नाम से जारी “विज्ञापनों” के पोस्टर-बैनर पर भी इसी तरह कार्रवाई होगी, स्पष्ट नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License