NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
अगर सरकार में ईमान होता तो इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में जानने का हक जनता को भी होता!
सरकार की संस्था का इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में किया गया फ़ैसला मौजूदा सरकार के ईमान के बेईमान हो जाने की तरफ इशारा करता है। क्योंकि फैसले में इतनी अतार्किक बात की गई है जिस पर कोई भी सजग नागरिक भरोसा नहीं कर सकता है।
अजय कुमार
30 Dec 2020
funding

सरकारी संस्थाएं जिस तरह के फैसले लेती हैं, उसमें सरकार का ईमान भी छुपा रहता है। सरकार की एक संस्था का नाम है सेंट्रल इनफॉरमेशन कमिशन (सीआईसी) यानी केंद्रीय सूचना आयोग। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाएं जब राज्य सरकारें और केंद्र सरकारें नहीं जारी करती हैं तो इस संस्था में जाकर शिकायत की जाती है। यह संस्था इन शिकायतों पर सुनवाई करती हैं।  इसी साल 21 दिसंबर को इलेक्टोरल बॉन्ड (चुनावी बॉन्ड) से जुड़े एक मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए सेंट्रल इनफॉरमेशन कमिशन की एक बेंच ने कहा कि लोगों का इससे कोई हित नहीं जुड़ता है कि राजनीतिक पार्टियां कहां से, किस तरह से और किन लोगों से चुनावी चंदा लेकर आती हैं। इसलिए उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए।

सीआईसी कहता है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से जुड़ा इलेक्टोरल बॉन्ड का यह मामला वृहत्तर सार्वजनिक हित का नहीं है इसलिए इस मामले को आगे खींचने का कोई फायदा नहीं है।

सरकार की संस्था का इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में किया गया फैसला मौजूदा सरकार के ईमान के बेईमान हो जाने की तरफ इशारा करता है। क्योंकि फैसले में इतनी अतार्किक बात की गई है जिस पर कोई भी सजग नागरिक भरोसा नहीं कर सकता है। कैसे कोई भरोसा कर ले कि इलेक्टोरल बॉन्ड सार्वजनिक हित से जुड़ा हुआ मसला नहीं है? इलेक्टोरल बॉन्ड से वृहत्तर सर्वजनिक हित नहीं जुड़ा हुआ है।

खुद सेंट्रल इनफॉरमेशन कमिशन का साल 2013 का फुल बेंच का फैसला कहता है कि राजनीतिक पार्टियां महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाएं हैं। राजनीतिक पार्टियां लगातार सार्वजनिक काम करती हैं। इनके काम लगातार प्रशासन और सामाजिक आर्थिक परिवेश को परिभाषित करते रहते हैं। इसलिए भारत के लोगों को यह जानने का पूरा हक है की राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार चुनावी प्रक्रिया में कितना खर्च कर रहा है? यह पैसा किन स्रोतों से आ रहा है? जिस तरह की महत्वपूर्ण भूमिका यह राजनीतिक पार्टियां सर्वजन के लिए निभाती हैं, इस लिहाज से यह राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार कानून के तहत धारा 2(h) के अंतर्गत पब्लिक अथॉरिटी की कैटेगरी में आती हैं।

अब आते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड पर कि इलेक्टोरल बॉन्ड क्या है? क्यों इसकी वजह से चुनावी चंदे की पारदर्शिता पूरी तरह से कमजोर हुई है?

हम चाहे जितना मर्ज़ी कांग्रेस, भाजपा या गठबंधन, महागठबंधन कर लें। आम जन के मन में बसी राजनीति की छवि को तब तक नहीं सुधार सकते, जब तक राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे का हिसाब किताब पारदर्शी न बन जाए। एक राजनीतिक पार्टी तब तक खुद को जनकल्याणकारी नहीं साबित कर सकती जब तक वह खुद को चलाने वाले खर्च की आमदनी को सार्वजनिक करने का बीड़ा न उठाए। चुनाव आयोग तब तक खुद को  एक कारगर संस्था के रूप  में  प्रस्तुत नहीं  कर सकता जब तक वह चुनाव सुधार के तौर पर  राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को आम जनता में उजागर करने  के लिए सही और कठोर कदम नहीं उठाए। चूंकि भारतीय लोकतंत्र राजनीति से संचालित होता है, इसलिए भारतीय लोकतंत्र की यह एक ऐसी परेशानी है जो चुनाव आयोग के कमरे में हाथी की तरह बैठी रहती है और चुनाव आयोग इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं देता। 

राजनीतिक चंदे में मौजूद कई तरह के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए साल 2017-18 के बजट में इलेक्टोरल बॉन्ड को लाया गया। कहा गया कि यह इलेक्टोरल बॉन्ड चुनाव सुधार के लिए उठाया गया ऐतिहासिक कदम है।

चुनाव सुधार की यह कोई ऐतिहासिक योजना नहीं थी बल्कि चुनाव सुधार के नाम पर किया गया ऐतिहासिक फर्ज़ीवाड़ा था। अब आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों? तो इसे बिंदुवार देख लीजिए 

- इलेक्टोरल बॉन्ड एक ऐसा बॉन्ड होता है,जिसपर न ही बॉन्ड खरीदने वाले का नाम लिखा होता है और न ही  बॉन्ड के ज़रिए फंडिंग लेने वाली पार्टी का नाम लिखा होता है। 

-- एक किस्म की kyc फॉर्म भरकर निर्धारित एसबीआई ब्रांच से 1 हजार,1 लाख,10 लाख और 1 करोड़ के मूल्य में अंकित इलेक्ट्रोल बॉन्ड की खरीददारी की जा सकती है।

-- व्यक्ति, कम्पनी, हिन्दू अविभाजित परिवार, फर्म, व्यक्तियों का संघ अन्य व्यक्ति और एजेंसी  इलेक्ट्रोल बॉन्ड की खरीददारी कर सकती है। इस बॉन्ड को बीत चुके आम चुनाव में एक फीसदी से अधिक वोट पाने वाले किसी राजनीतिक दल को चंदे के रूप में  देने का नियम है। जिसे बॉन्ड के जारी किए दिन से  15 दिन के भीतर बैंक से क्रेडिट करा लेना होता है। यानी बॉन्ड की खरीददारी होगी और उसे किसी राजनीतिक दल को दिया जाएगा और राजनीतिक दल को 15 दिन के भीतर बॉन्ड की राशि मिल जाएगी। और इन सारी प्रक्रियाओं में किसी का भी नाम उजागर नहीं  होगा। सब बेनाम ही रहेंगे।

--  इलेक्टोरल बॉन्ड की राशि पर 100 फीसदी टैक्स की छूट मिलती है। यानी 500 करोड़ के इलेक्ट्रोल बॉन्ड पर 1 रुपये भी टैक्स भुगतान की जरूरत नहीं होती है ।

इसका मतलब यह है कि बॉन्ड से जुड़े सभी  पक्षकार  बेनाम  हैं, खातों में  राजनीतिक चंदे के नाम पर किसी भी प्राप्तकर्ता के नाम लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे में पॉलिटिकल फंडिंग में पारदर्शिता के नाम पर इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना फर्जी लगती है। यहां केवल बैंक को पता होगा की खरीदने वाला कौन है? बैंक सरकारी है? अतः सरकार आसानी से हर खरीदने वाले का नाम जान जायेगी? और यह भी पता लगाया जा सकता है कि अगले 15 दिन के अंदर किस पार्टी ने कितना इलेक्टोरल बॉन्ड  जमा किया? यानी सरकार - और सिर्फ सरकार ही - जान सकती है की कौन किसको चंदा दे रहा है? फिर गोपनीयता तो रही नहीं। केवल जनता और विपक्ष ज़रूर अँधेरे में रहेंगे। 

चुनावी चंदे में पारदर्शिता के नाम पर ऐसी योजना के सामने आते ही अक्टूबर 2017 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तत्काल गौर नहीं किया। और भारत सरकार ने जनवरी 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना को अधिसूचित कर दिया। इसके बाद एक के बाद एक राज्य और केंद्र के चुनाव होते चले गए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ा अपना अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

इस साल के शुरू में चुनावी बॉन्ड के विश्लेषण से पता चला था कि योजना के माध्यम से राजनीतिक दलों द्वारा 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के बॉन्ड भुनाए गए थे और भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी थी।

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भी भाजपा ने चुनावी बॉन्ड से 2,410 करोड़ रुपये जुटाए थे और इससे पहले भी योजना के माध्यम से राजनीतिक दलों द्वारा भुनाए धन का वह लगभग 95 फीसदी धन प्राप्त कर रही थी।

हालांकि, इन बॉन्ड्स को जारी करने का अधिकार हासिल करने वाले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने आरटीआई के तहत उन नामों का खुलासा करने से इनकार कर दिया था, जिन्होंने ये बॉन्ड खरीदे थे। ऐसा उसने एक करोड़ या उससे अधिक के सभी दानकर्ताओं के मामले में किया था।

अभी हाल ही में संपन्न बिहार चुनाव में इलेक्ट्रोल बॉन्ड की भूमिका की बात की जाए तो मौजूदा सरकार को इस अपारदर्शी योजना से कितना लाभ हो रहा है, यह एक बार फिर साफ हो जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी से खुलासा हुआ है कि  एक-एक करोड़ रुपये के 279 बॉन्ड बेचे गए। इनमें से 130 बॉन्ड मुंबई में बेचे गए। दिलचस्प है कि बिहार विधानसभा चुनाव और मुंबई में इस बार बेहद गहरा संबंध था, क्योंकि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस बिहार में भाजपा के चुनाव प्रभारी थे। 

electrol bond
cic and electoral bond
electoral bond
bjp and electoral bond
right to information on electrol bond

Related Stories


बाकी खबरें

  • global
    संदीपन तालुकदार
    मौसम परिवर्तन: वैश्विक कार्बन उत्सर्जन पूर्व महामारी स्तर पर पहुंचने के करीब
    06 Nov 2021
    एक रिपोर्ट बताती है कि इस साल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 4.9 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा होगा। इससे 2020 में महामारी के दौरान उत्सर्जन में आई 5.4 फ़ीसदी की कमी वापस अपने पुराने स्तर पर पहुंच जाएगी। 
  • Moscow
    एम. के. भद्रकुमार
    भारत ने खेला रूसी कार्ड
    06 Nov 2021
    पुतिन की दिल्ली यात्रा से कुछ हफ्ते पहले इस महीने के अंत में मास्को में रूसी-भारतीय "2+2" मंत्रिस्तरीय की पहली बैठक घटनापूर्ण या महत्वपूर्ण होने वाली है क्योंकि यह वाशिंगटन में मंत्रिस्तरीय यूएस-…
  • Dalit-Adivasi education
    राज वाल्मीकि
    महामारी से कितनी प्रभावित हुई दलित-आदिवासी शिक्षा?
    06 Nov 2021
    हाल ही में नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स  ने दलित आदिवासियों की शिक्षा पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में अपेक्षा से अधिक दुखद तथ्य सामने आए हैं।
  • lakshwdeep
    अयस्कांत दास
    भारत में सबसे कम जेल में रहने की दर होने के बावजूद लक्षद्वीप को पांचवीं जेल की आवश्यकता क्यों है?
    06 Nov 2021
    पूरे देश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में लक्षद्वीप में जेल में रह रहे कैदियों की तादाद सबसे कम 6 फीसदी है। इसकी तुलना में दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश में जेल अधिभोग दर क्रमशः 174.9…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 10,929 नए मामले, 392 मरीज़ों की मौत
    06 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.43 फ़ीसदी यानी 1 लाख 46 हज़ार 950 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License