NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चुनावी बांड: असली मुद्दे से कतराते हुए सुनवाई!
बुनियादी समस्या यह है कि अदालत चुनावी बांड योजना को ही चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार कर ही नहीं रही है जबकि ये याचिकाएं 2018 से उसके पास विचारार्थ पड़ी हुई हैं। 
प्रकाश करात
02 Apr 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
चुनावी बांड: असली मुद्दे से कतराते हुए सुनवाई!

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांडों की एक और खेप जारी किए जाने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। बांडों की ताजातरीन खेप 1 से 10 अप्रैल तक जारी की जानी है। एसोसिएशन फॉर डैमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नाम के एनजीओ ने अत्यावश्यक के रूप में अदालत से इसकी प्रार्थना की थी कि चार विधानसभाओं के चुनाव के लिए जारी किए जाने वाले बांडों को रोक दिया जाए।

__

अदालत ने यह दर्ज किया कि यह योजना बिना किन्हीं कानूनी बाधाओं के तीन साल से जारी है और उसके संबंध में कुछ बचाव उपाय भी लागू हो चुके हैं। इसलिए, इसे तत्काल रोकने का कारण नहीं बनता है। बहरहाल, अदालत ने इस फैसले के लिए जो कारण बताए हैं, हजम होने वाले नहीं हैं। असली नुक्ता तो यह है कि यह तो पूरी की पूरी योजना ही राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग का सरासर अपारदर्शी तरीका मुहैया कराने वाली और पूरी तरह से सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में जाने वाली योजना है। इसी तरह, अदालत ने जिन बचाव उपायों की बात की है, वास्तव में उसके ही 2019 के  आदेश में बताए गए उपाय हैं और इस आदेश में राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया गया था कि उन्हें जो भी चुनावी बांड मिले हैं उनका विवरण एक सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को दे दें। यह निर्देश भी चुनावी बांडों की उस समय जारी की गयी खास खेप के संबंध में ही था और उसके बाद से इस मामले में कुछ नहीं किया गया है।

बुनियादी समस्या यह है कि अदालत चुनावी बांड योजना को ही चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार कर ही नहीं रही है जबकि ये याचिकाएं 2018 से उसके पास विचारार्थ पड़ी हुई हैं। सीपीआई-एम ने भी इन चुनावी बांडों को चुनौती देते हुए, एक याचिका दायर की है।

इन याचिकाओं को नहीं सुनने और महज इतना कहने के जरिए कि यह योजना तो बिना कानूनी बाधाओं के तीन साल से चल रही है, वास्तव में चुनावी बांड योजना को ही वैधता दे दी गयी है, जबकि यह राजनीतिक फंडिंग की ऐसी विषाक्त व्यवस्था है जो अपारदर्शी है और सत्ताधारी पार्टी द्वारा की गयी कृपाओं के बदले में, कार्पोरेट फंडिंग हासिल किए जाने के खेल को आसान बनाती है। 

जाहिर है कि इस तरह के खेल में न तो चंदा देने वाला जाहिर करता है कि इन बांडों के जरिए किसे पैसा दिया जा रहा है और न यह पैसा पाने वाली पार्टी यह बताने के लिए बाध्य है कि उसे यह पैसा मिल कहां से रहा है। इस तरह यह व्यवस्था, दलाली के भुगतान और अवैध धन के प्रवाह का बहुत ही कारआमद दरवाजा बन गयी है। इतना ही नहीं, खोखा कंपनियों के रास्ते पैसे को घुमाने के जरिए, अवैध कमाई को भी किसी पार्टी के खाते में वैध बनाकर पहुंचाया जा सकता है।

आरटीआइ के जवाबों के जरिए सामने आयी जानकारियों के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक ने 2018 की फरवरी में यह योजना जारी होने के बाद से, अब तक चुनावी बांडों की कुल 14 खेपें जारी की हैं। इस तरह, 2020 के आखिर तक कुल 12,773 चुनावी बांड जारी किए गए थे, जिसमें से कुल 6,472 करोड़ रु0 की कीमत के, 12,632 बांड, राजनीतिक पार्टियों द्वारा भुनाए गए थे। 2018 की फरवरी में जारी इन बांडों की पहली ही खेप में, 222 करोड़ रु0 के बांड जारी किए गए थे। इनमें से 94.5 फीसद यानी 210 करोड़ रु0 से ज्यादा की रकम भाजपा के खाते में गयी थी। इसकी जानकारी, चुनाव आयोग को दिए गए भाजपा के ऑडिटशुदा आय-व्यय के खाते से सामने आयी। इसी प्रकार, चुनावी बांड की बाकी सभी खेपों में भी, 90 फीसद से ज्यादा रकम भाजपा के ही खाते में गयी है।

जाहिर है कि ये चंदे कार्पोरेटों से या अति-धनिकों से ही आए हैं। इसका पता इस तथ्य से भी लगता है कि स्टेट बैंक द्वारा जारी किए गए बांडों का कुल 92.12 फीसद से ज्यादा हिस्सा, एक करोड़ या उससे भी बड़ी रकम के बांडों की शक्ल में ही दिया गया था।

चुनावी बांड की यह योजना लाने के साथ ही मोदी सरकार ने प्रासंगिक कानूनों में संशोधन कर इसकी व्यवस्था की थी कि भारत में कारोबार कर रही बहुराष्ट्रीय कंपनियां, भारतीय कंपनियां बनकर राजनीतिक चंदा दे सकें और इन चंदों को विदेशी चंदों में शुमार नहीं किया जाए। इसके अलावा, पहले जो किसी भी कंपनी के राजनीतिक चंदा देने पर, यह सीमा लगी हुई थी कि वह अपने तीन साल के औसत मुनाफे के 7.5 से ज्यादा राजनीतिक चंदा नहीं दे सकती है, उस सीमा को भी खत्म कर दिया गया।

इसने विदेशी कंपनियों से चंदे की बाढ़ के लिए बांध के दरवाजे चौपट खोल दिए हैं और भारतीय कंपनियां अब जितना ही मर्जी चाहें पैसा सत्ताधारी पार्टी को दे सकती हैं। मोदी सरकार की तनाशाहीपूर्ण प्रकृति को देखते हुए, अब शायद ही कोई कंपनी विपक्षी पार्टियों को राजनीतिक चंदा देने का जोखिम लेने के लिए तैयार होगी। जहां तक जनता को अंधेरे में रखने का सवाल है, ये बांड बेशक अनाम होते हैं, लेकिन सरकार के लिए यह जानना कोई मुश्किल नहीं है कि कौन किससे बांड के जरिए पैसा ले रहा है। आखिरकार, ये बांड सरकारी स्वामित्ववाले बैंक के रास्ते से ही तो दिए-लिए जाते हैं।

चुनावी बांडों की यह खेप विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र के लिए और खासतौर पर पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के लिए, भाजपा का खजाना भरने का काम करेंगे। अब तक मुंबई के बाद, सबसे ज्यादा बांड कोलकाता में ही जारी किए गए हैं और मुंबई के बाद, बड़े कारोबारियों का सबसे बड़ा केंद्र कोलकाता ही है।

सरकार का यह दावा भी सरासर फर्जी है कि बांड योजना से वैध धन के  लेन-देन को ही बढ़ावा मिल रहा है और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लग रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि बड़े कारोबारियों से आने वाली काले धन की बड़ी-बड़ी रकमें ही अब भी चुनावी चंदे का खर्चों का मुख्य स्रोत मुहैया कराती हैं। हो सिर्फ यह रहा है कि इन बांडों के जरिए भाजपा, कार्पोरेटों तथा अति-धनिकों से आने वाले कानूनी चंदों पर अपनी इजारेदारी सुनिश्चित कर रही है और इसके साथ ही साथ उन्हीं स्रोतों से गैर-कानूनी चंदे की भारी राशियों की भी उगाही कर रही है। चुनावी बांड योजना, बड़े कारोबारियों के साथ अपनी मिली-भगत को औपचारिक रूप देने के लिए, सत्ताधारी पार्टी के लिए खूब उपयोगी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कर्तव्य के निर्वाहन में कोताही की है, जो उसने पूरे तीन साल गुजर जाने के बाद भी चुनावी बांड के प्रकरण की सुनवाई नहीं की है। वह इसी तरह से धारा-370 के निरस्त किए जाने और जम्मू-कश्मीर राज्य के तोड़े जाने के प्रकरण में सुनवाई करने में विफल रहा है। न्यायपालिका के असली मुद्दों से कतराने का यह रुझान, रंजन गोगोइ के मुख्य न्यायाधीशत्व के समय से, बहुत साफ-साफ दिखाई देने लगा है।

न्यायपालिका की यह जिम्मेदारी बनती है कि राजनीतिक फंडिंग के मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करे और धन के गोपन तथा अज्ञात स्रोतों का सहारा लेकर, जनतंत्र को तोड़े-मरोड़े जाने को रोके। इस मुद्दे को जितनी जल्दी हल किया जाएगा, भारत में जनतंत्र के लिए उतना ही अच्छा होगा।  

(प्रकाश करात सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इस आलेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Electoral Bonds: Supreme Court’s Latest Order Another Letdown

Electoral Bonds
Supreme Court
Association for Democratic Reforms
State Assembly Elections
election commission
CPIM
MNCs

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?


बाकी खबरें

  • Hemant Soren
    अनिल अंशुमन
    झारखंड-बिहार: स्थानीय भाषा को लेकर विवाद कहीं महज़ कुर्सी की राजनीति तो नहीं?
    22 Sep 2021
    “किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों…
  • Varanasi
    विजय विनीत
    बदहाली: रेशमी साड़ियां बुनने वाले हाथ कर रहे हैं ईंट-पत्थरों की ढुलाई, तल रहे हैं पकौड़े, बेच रहे हैं सब्ज़ी
    22 Sep 2021
    बनारस से ग्राउंड रिपोर्ट: विश्वविख्यात बनारस की रेशमी साड़ियों का ताना-बाना बिखर रहा है। इसी ताने-बाने में सिसक रही है बुनकरों की जिंदगी। जानने के लिए आपको लिए चलते हैं बनारस की संकरी गलियों में..
  • school
    सौम्या गुप्ता, सी. सरतचंद
    स्कूलों को वक़्त से पहले खोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए
    22 Sep 2021
    केवल स्कूलों को फिर से खोलने से असमान शिक्षा प्रणाली अधिक समान नहीं हो जाएगी जब तक कि सरकारें शिक्षा पर अपने ख़र्च को नहीं बढ़ाती हैं स्थिति में बदलाव लाना असंभव है। स्कूल खोलने से कोविड म्यूटेशन का…
  • SCO
    एम. के. भद्रकुमार
    ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है
    22 Sep 2021
    तेहरान का एससीओ में ज़ोरदार स्वागत के साथ शामिल किया जाना और इस संगठन का जल्दबाज़ी के साथ विस्तार किया जाना दिखाता है कि बीजिंग और मॉस्को के बीच ज़बरदस्त तालमेल है।
  • यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    22 Sep 2021
    योगी जी का विकास का सारा जश्न दरअसल अर्थव्यवस्था के ध्वंस और कोविड से हलकान, हैरान-परेशान जनता को मुंह चिढ़ाने और उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा है। कुछ विश्लेषकों ने ठीक नोट किया है कि "यूपी विकासोत्सव…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License