NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
एमएसपी लगातार घटने के चलते छत्तीसगढ़ के आदिवासी रोज़गार के लिए शहर जाने को मजबूर
एक्टिविस्ट का मानना है कि पहाड़ी कोरबा, अबुझामदी जैसे आदिवासियों को संरक्षित नहीं किया गया जिसके चलते वे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
सौरभ शर्मा
12 Dec 2018
MSP
सांकेतिक तस्वीरI साभार-हफपोस्ट

लघु वन उत्पाद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घटाने के बाद आदिवासी-बहुल छत्तीसगढ़ के आदिवासी भारतीय जनता पार्टी की सरकार से बेहद नाराज़ हैं। नतीजतन रोज़गार की तलाश के लिए हज़ारों की संख्या में आदिवासी वन क्षेत्र छोड़ कर शहरों में जाने को मजबूर हैं।

लाह (रंगीन व कुसुमी), महुआ, साल तथा फूल ऐसे ही कुछ वन उत्पादन हैं जिसे वनवासी घने जंगलों से इकट्ठा करते हैं और बाज़ार ले जाकर बेचते हैं। हालांकि पिछले कुछ महीनों से सुकमा से सरगुजा के वनवासी बाज़ार में बेहतर क़ीमतों पर बेचने और खरीदारों को तलाशने में असफल रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार ने कई लघु वन उत्पादन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य कम कर दिया है जिसने संबंधित कारोबार को प्रभावित किया है। इन उत्पादों का प्रति वर्ष लगभग 2,000 करोड़ रुपए का कारोबार होता है।

नए एमएसपी के अनुसार, लाह (रागिनी) की क़ीमत 130 रुपए प्रति किलोग्राम है जबकि पिछले साल इसकी क़ीमत 230 रुपए प्रति किलोग्राम थी,वहीं लाह (कुसुमी) की क़ीमत 170 रुपए प्रति किलो है जबकि पिछले साल यह 320 रुपए प्रति किलोग्राम थी। इसी तरह इमली की क़ीमत पिछले वर्ष की क़ीमत की तुलना में 2 रुपए कम हुई है और अब वर्तमान क़ीमत 18 रुपए प्रति किलो है। एक प्रकार का तेल के बीज करांजे के एमएसपी में 2 रुपए की गिरावट देखी गई है और अब इसे 18 रुपए प्रति किलो पर ख़रीदा जा रहा है जबकि चिरौंजी को सरकार द्वारा 60 रुपए / किग्रा में ख़रीदा जा रहा है। चिरौंजी का एमएसपी पिछले साल 100 रुपए प्रति किलो था।

यह भी उल्लेख करना ज़रुरी है कि छत्तीसगढ़ में जंगलों का एक बड़ा हिस्सा है और इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की बड़ी आबादी लघु वन उत्पादों पर निर्भर करती है ताकि वे इन उत्पादों से प्राप्त पैसे से अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें। राज्य सरकार के अनुसार लगभग 14.1 लाख आदिवासी परिवार हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन वन उत्पादों पर निर्भर हैं।

वर्ष 2014-15 में केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ सरकार को 80.16 करोड़ रुपए का भुगतान किया था लेकिन अगले ही वित्तीय वर्ष में यह राशि घटकर73.5 करोड़ रुपए हो गई। इसके बाद केंद्र सरकार ने लघु वन उत्पाद पर एमएसपी की सहायता करना बंद कर दिया।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला के अनुसार लघु वन उत्पाद पर एमएसपी को कम करने के लिए सरकार की नीति से वनों में रहने वाले लोगों और इन उत्पादों पर निर्भर रहने वालों के जीवन को प्रभावित किया है।

शुक्ला कहते हैं, "छत्तीसगढ़ से हज़ारों लोगों (आदिवासी) ने सरकार की उदासीनता के कारण पिछले कुछ वर्षों में अपना कारोबार बदल दिया है। वास्तव में कोई भी इन आदिवासियों की पीड़ा पर ध्यान नहीं दे रहा है। वनों में रहने वाले सैकड़ों युवा रोज़गार की तलाश में प्रवास करते हैं। ये ग़लत है। वह दिन दूर नहीं है जब आदिवासी विलुप्त हो जाएंगे।"

उन्होंने कहा, यदि एमएसपी का समर्थन करके सरकार को घाटे का सामना करना पड़ रहा है तो कम से कम आदिवासी युवाओं के लिए समान संख्या में नौकरियां पैदा करनी चाहिए। शुक्ला कहते हैं कि इस राज्य में न तो नौकरियां हैं और न ही सरकार वन उत्पाद पर एमएसपी का मदद करने के लिए कुछ कर रही है।

शुक्ला कहते हैं, "विकल्पों की तलाश में लोग अन्य पेशे की तरफ चले जाएंगे और अपने गांवों से प्रवास कर जाएंगे। छत्तीसगढ़ में कई जनजातियां हैं जो पूरी तरह से वनों से बाहर चली गई हैं और अब वे शहर के निवासी हो गए हैं।”

सरगुजा डिवीजन के एक अन्य एक्टिविस्ट रामू पायक्रा कहते हैं कि सरकार आदिवासी के लिए अपनी नीतियों के बारे में बहुत कुछ दावा करती है लेकिन वास्तविकता यह है कि धरातल पर कुछ भी नहीं किया गया है। पायक्रा कहते हैं, "कथनी और करनी के बीच एक फ़र्क है। पहादी कोरबा,अबुझामदी और अन्य आदिवासी जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए था वे बाहर निकल रहे हैं और जल्द ही वे सभी शहरों में होंगे। उनके उपज का वास्तविक मूल्य नहीं देना उनके जीने का अधिकार छीनने जैसा है जो बिल्कुल मुनासिब नहीं है।"

वह कहते हैं, सरकार द्वारा बोनस दिया जाता है लेकिन हर कोई जानता है कि यह आदिवासियों तक कभी नहीं पहुंचता है जिन्होंने यह मानना शुरू कर दिया है कि बोनस केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए है।

बीजेपी सरकार के अधीन एमएसपी

MSP1.jpg

एमएसपी योजना वर्ष 2017-18 के अधीन ख़रीदा गया एमएफपी

MSP2.jpg

एमएफपी योजना वर्ष 2018-19 के अधीन ख़रीदा गया एमएफपी (30/09/2018 के अनुसार)

MSP3.jpg

वर्ष 2018-19 के लिए साल की बीज, चिरौंजी, गुठली, महुआ बीज और लाह (कुसुमी तथा रंगिनी) को इकट्ठा करने का काम जारी है।

MSP
Chhattisgarh
farmers distress
anti-farmer BJP
Raman Singh
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

छत्तीसगढ़ : दो सूत्रीय मांगों को लेकर बड़ी संख्या में मनरेगा कर्मियों ने इस्तीफ़ा दिया

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

छत्तीसगढ़ः 60 दिनों से हड़ताल कर रहे 15 हज़ार मनरेगा कर्मी इस्तीफ़ा देने को तैयार

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License