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भारत
राजनीति
एमएसपी से किसान क्यों संतुष्ट नहीं है?
इस तथ्य के अलावा कि यह लागत की पर्याप्त वापसी नहीं करती है, दो अन्य कारक हैं जो मोदी सरकार की एमएसपी नीति को ज्यादातर कागज़ो तक ही सीमित कर रहे हैं।
सुबोध वर्मा
09 Oct 2018
गेहूं एमएसपी

देश में सिर्फ 12 प्रतिशत गेहूं पैदा करने वाले किसान अपनी उपज सरकारी एजेंसियों को बेचने में सक्षम हैं और ज्यादातर राज्यों में मंडी (थोक बाजार) में कीमतें सीजन में ज़्यादातर समय एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य)  से नीचे रहती हैं। सरकार इन दो महत्वपूर्ण कारकों को अनदेखा करती है – पूरी की पूरी एमएसपी नीति किसानों को असंतुष्ट और संकट में घिरा छोड़ देती हैं। यह इस तथ्य के अतिरिक्त है कि सरकार किसी भी मामले में एमएसपी को उन स्तरों पर तय कर रही है जो कुल लागत +50 प्रतिशत के फार्मूले से कम हैं और जो किसानों की मांग रही है, जैसा कि न्यूज़क्लिक द्वारा पहले रिपोर्ट किया जा चुका है।

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उपर्युक्त ग्राफिक दिखाते हैं कि पंजाब और हरियाणा में अधिकांश किसान सरकारी खरीद एजेंसियों को अपना गेहूं बेचने में सक्षम हैं। ये दोनों राज्य मिलकर देश में गेहूं की कुल पैदावार का केवल 7 प्रतिशत ही पैदा करते हैं। उत्तर प्रदेश में, अनुमानित 1.5 करोड़ गेहूं किसान हैं, भारत में सबसे बड़ी संख्या, उसमें केवल 11 लाख किसान (7 प्रतिशत) अपनी उपज सरकारी एजेंसियों को बेच पाते हैं। राजस्थान में यह केवल 4 प्रतिशत है जबकि  मध्य प्रदेश में यह 22 प्रतिशत है। इन पांच राज्य से भारत के 77 प्रतिशत गेहूं उत्पादक हैं। इन आंकड़ों की गणना कृषि मंत्रालय के तहत कृषि लागत और कीमतों पर आयोग द्वारा प्रकाशित रबी 2019-20 के लिए मूल्य नीति रिपोर्ट और 2010-11 और 2015-16 के परिचालन होल्डिंग्स पर कृषि जनगणना डेटा से की गई है।

लेकिन यही सब कुछ नहीं है। रबी प्राइस पॉलिसी रिपोर्ट में यह भी पता चलता है कि पंजाब और हरियाणा को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में गेहूं को अप्रैल, मई और जून के महीनों में फैले साल के विपणन सत्र में अधिकांश गेहूँ को निश्चित एमएसपी से नीचे की दर पर बेचा जाता है तब जब गेहूं की फसल बाजार में लाई जाती है।

अफसोस की बात है कि, यूपी और राजस्थान में, लगभग पूरे तीन महीने का लंबा मौसम एमएसपी से नीचे गेहूं की कीमतों के साथ बीत गया जबकि सीजन में दो तिहाई से अधिक सत्र में दैनिक कीमतें तय दरों नीचे देखी गईं। केवल पंजाब और हरियाणा में सीजन के आस-पास भारी मात्रा में किसानों ने गेहूं के लिए एमएसपी स्तर की कीमतें प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी।

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यदि हालात ऐसे हैं, तो यह आश्चर्य की बात नहीं है कि देश भर में किसान उथल-पुथल में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई योजनाओं की तरह, यह नीति भी ज्यादातर कागज़ तक ही सीमित है। और, इसका मतलब है कि किसानों के संकट को पॉलिसी घोषणाओं द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है। और जौं, सरसों, कस्तूरी आदि जैसे अन्य रबी फसलों की स्थिति तो ओर भी बदतर है।

इस निरंतर संकट के कई प्रतिबिंब हैं और मोदी सरकार इसे समझने में पूर्णत विफल है: 200 से अधिक किसानों और अन्य संगठनों के संयुक्त मंच ने इस साल नवंबर में दिल्ली में लॉन्ग मार्च का आह्वान किया है। कुछ ही दिन पहले, कई उत्तर भारतीय राज्यों के किसानों ने दिल्ली जाने की कोशिश की लेकिन दिल्ली-यूपी सीमा पर केंद्र सरकार के आदेशों पर उन्हें रोक दिया गया और उन पर हिंसक हमला किया। इस साल अच्छी फसल के के बावजूद किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं।

कृषि मोर्चे पर मोदी सरकार की असफलताओं के चलते आगामी विधानसभा चुनावों पर असर होगा, जो चुनाव एमपी और राजस्थान में भी होंगे। किसानों का बढ़ता क्रोध पहले से ही अपनी राय को चुनावों में प्रतिबिंबित कर रहा है जो इन चुनावों में बीजेपी के लिए एक मुश्किल घड़ी या यहां तक कि नुकसान भी दिखाते हैं। और यह अगले साल आम चुनावों में भी यह एक मुद्दा होगा।

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SWAMINATHAN COMMISSON
Narendra modi

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