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भारत
राजनीति
दिल्ली हिंसा की आग के बीच से एक नई एकता उभर सकती है
उत्तरी-पूर्वी दिल्ली की हिंसा के दौरान मुस्लिमों, दलितों, सिखों और अन्य बचे हुए लोगों के बीच एक नए बने रिश्तों की शुरुआत हो सकती है।
मंजूर अली
02 Mar 2020
दिल्ली हिंसा
फोटो साभार: एपी

रविवार के दिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली में अचानक से जो दंगे भड़क उठे थे, उसके पीछे हिंदुत्व ब्रिगेड और उनके समर्थकों के नेतृत्व में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ चलाए जा रहे शातिर अभियान की एक अनिवार्य परिणति के रूप में इसे देखना चाहिए। उनकी इसी आक्रामकता ने राजधानी और इसके बाहर तक में घृणा का वातावरण को बढ़ावा देने का काम किया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हिंदू विरोधी के रूप में चित्रित करने और कट्टरपंथी इस्लाम से प्रेरित साबित करने की भरपूर कोशिश की है, जिसके चलते दोनों समुदायों के बीच में गहरी खाई खिंच जाने का ख़तरा पैदा हो गया है।

2014 के बाद से जबसे बीजेपी सत्ता में आई है, ऐसा पहली बार हो रहा है जब उसे सीएए के खिलाफ चल रहे इन विरोध प्रदर्शनों के रूप में व्यापक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटना पड़ रहा है। हिंदुत्व के विभिन्न संगठनों के लिए भी विरोध प्रदर्शन की यह स्थिति पूरी तरह से नई और अप्रत्याशित है। आजतक तो वे अपने जहरीले भाषणों के जरिये मुस्लिम विरोधी छवि पेश करने के लिए आज़ाद थे, जिसका शायद ही मुस्लिम समाज की ओर से कभी विरोध देखने को मिला हो।

हालिया दिल्ली विधानसभा के चुनावों के दौरान भी बीजेपी के नेताओं की ओर से जिस प्रकार की भाषणबाजी देखने को मिली है, वह अपने आप में अकल्पनीय है। इन भाषणों के जरिये अपने समर्थकों को दिल्ली के सीएए विरोधी स्थल के रूप में प्रतिष्ठित शाहीन बाग में जाकर हमले के लिए उकसाया जाता रहा है। इसी धर्मान्धता में डूबकर कपिल गुज्जर और गोपाल शर्मा जैसे युवकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी तक कर डाली। कपिल गुज्जर की तो जब धर-पकड़ की गई तो उसने स्पष्ट तौर पर अपने विशिष्ट हिंदुत्व-प्रेरित भारत के दृष्टिकोण को दर्शाया, जब टीवी चैनलों को दिए गए अपने बयान में उसने ऐलान किया कि यह देश ‘हिंदुओं का है’।

इन धमकियों, गाली-गलौज और यहां तक कि वास्तविक हिंसा की घटनाओं के बावजूद प्रदर्शनकारियों की हिम्मत नहीं टूटी है। यहाँ तक कि चार दिनों तक दिल्ली में जारी हिंसा के बाद भी, सीएए के खिलाफ चल रहा यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक धरना-प्रदर्शन अभी भी जारी है और पूरे देश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के लिए प्रेरणादायक बना हुआ है।

हिंदुत्व के समर्थकों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत ये है कि इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व अधिकतर महिलाएं कर रही हैं। इसने हिंदुत्व समर्थकों के कट्टरवादी धड़े के बीच में बैचेनी को बढाने का ही काम किया है। वे समझ ही नहीं पा रहे कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाये, खासतौर पर दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद से तो यह संकट और भी अधिक बढ़ गया है।

इसी सन्दर्भ में दिल्ली में घटी हाल की घटनाओं के लिए सरकार से सम्बन्धित औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं पर उँगलियाँ उठनी शुरू हो गई हैं। यही ताकतें थीं, जिन्होंने 2002 में मुस्लिम-विरोधी गुजरात दंगों के लिए गोधरा में हुई घटना को जिम्मेदार करार दिया था। इसे विडम्बना ही कह सकते हैं कि ठीक इसी तर्क के सहारे, कल इतिहास में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई इस हिंसा के लिए भी कहीं न कहीं इन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को ही न जिम्मेदार ठहरा दिया जाये।

पर्यवेक्षकों का इस बात को लेकर हैरान-परेशान होना कि एक ऐसे समय में दिल्ली में हिंसा भड़क उठती है, जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प देश की (देश की राजधानी सहित) अपनी राजकीय यात्रा पर थे, अपने आप में बिल्कुल उचित है। यह हिंसा साज़िशकर्ताओं की एक साज़िश भी हो सकती है। दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस के गैर-पेशेवराना रुख के बारे में अब यह सफाई भी दी जा सकती है कि सुरक्षा बल चूँकि ट्रम्प की यात्रा के सम्बन्ध में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पूरी तरह से मशगूल थे, इसलिये उनका ध्यान भटक गया होगा। तीन दिनों तक बीजेपी के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से चुप्पी साध लेने को भी ट्रम्प की इस यात्रा के पीछे छिपाया जा सकता है। वास्तव में देखें तो दंगाइयों को कुछ नहीं तो करीब चार दिनों तक खुलकर अपनी मनमानी करने की छूट मिली हुई थी।

दिल्ली में घटित हाल की इस हिंसा के अगर राजनितिक पहलू पर गौर करेंगे तो इसे अतीत से हटकर पायेंगे। यदि आरएसएस इन शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों से निपट पाने में खुद को अक्षम पा रहा था तो वहीं दूसरी ओर अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों, वे चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में हों, वे बहुसंख्यकवादियों से निपटने के मामले में या इसके क्या हिंसक परिणाम होने वाले हैं, को लेकर जो ख़ामोशी नजर आई है। वह गौरतलब है। अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारकर झगड़े फसाद को शांत करने के बजाय नव-निर्वाचित आप सरकार ने भी पहले-पहल तो इन संघर्षों पर अपनी प्रतिक्रिया देने से ही इनकार कर दिया था।

ऐसी खबरें हैं कि कुछ ने तो यहाँ तक तर्क पेश किये कि हालिया चुनावों में इन विधानसभा सीटों पर तो हमारे उम्मीदवार ही नहीं चुन कर आये हैं। जबकि कुछ आप के विधायकों ने दिल्ली के लेफ्टिनेंट-गवर्नर से मुलाकात की थी और उनसे कार्रवाई करने की माँग करते हुए उनके आवास पर धरने पर भी बैठे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय, राजघाट गए और वहाँ से शांति की अपील की। कई लोगों ने उन्हें गाँधी के नोआखाली यात्रा की याद दिलाई, जब 1946 में वहाँ पर भयानक दंगे छिड़े हुए थे। लेकिन सच तो ये है कि केजरीवाल कोई गाँधी नहीं हैं, और दोनों के बीच तुलना का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

दिल्ली में हुई हिंसा में आरएसएस के राज की छाप साफ़ दिखाई पड़ती है। यह इसके ‘नए भारत’ के आइडिया का दस्तखत लिए हुए है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हिन्दू राष्ट्र के हिंदुत्व विजन को दर्शाता है जिसमें मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक धर्मों के लिए खुद के लिए आवाज़ उठाने की जगह नहीं बचती। सामाजिक समरसता के नाम पर इस नए भारत में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में व्यवहार किया जाना तय है।

सच्चाई तो यह है कि पिछले दो महीनों से शाहीन बाग़ में चल रहा सीएए-विरोधी प्रदर्शन अपने आप में एक प्रतीक बन चुका था। इसने लगातार बढती संख्या के साथ उदारवादी हिन्दुओं, दलितों, सिखों, ईसाईयों और अन्य को अपनी और आकृष्ट करना शुरू कर दिया था। जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली आग की लपटों में झुलस रही थी, तो उस दौरान भी इस नए बने गठजोड़ ने अपनी एकजुटता के इम्तिहान की घड़ी को सफलतापूर्वक पास किया है। इस प्रकार की कई खबरें देखने में आ रही हैं जिसमें दलितों और सिखों ने न सिर्फ मुसलमानों को इस कठिन समय में ढांढस बंधाने का काम किया, बल्कि अपने मंदिरों और गुरुद्वारों को इनके आश्रय स्थल के रूप में खोल दिया है। ऐसे कई हिन्दू परिवार हैं, जिन्होंने मुसलमान परिवारों को अपने घरों में पनाह दी। वहीं मुसलमानों ने इस बात को सुनिश्चित किया कि उग्र भीड़ हिन्दुओं के मंदिरों को नुकसान न पहुँचा पाए। हमारे लोकतंत्र के लिए यह एक बड़ी उम्मीद के रूप में सामने आया है।

संविधानवादी भारत के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में न्याय, समानता और स्वतंत्रता पर जोर देते रहे हैं, लेकिन भ्रातृत्व की यह जो भावना है वही कभी-कभी इन सभी को फीका साबित कर जाती है। भ्रातृत्व की यह भावना लोकतंत्र का प्रकाश स्तंभ साबित हो सकती है, खासकर तब जब हर तरफ अराजकता का राज हो और जनता को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया हो।

लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि इस बार मुसलमानों ने भी कहीं बेहतर संगठित तरीके से इस अन्यायपूर्ण सीएए को वापस धक्का देने का बीड़ा उठाया है। यह भी सच है कि मात्रात्मक रूप में उनकी यह एक विनम्र कोशिश भर है। लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों की ओर से अपने अधिकारों की यह लड़ाई की कोई आकस्मिक परिघटना नहीं, बल्कि इसकी एक सतत प्रक्रिया रही है। हालाँकि यह दूसरी बात है कि इस बार जाकर इसे मान्यता मिल रही है कि मुसलमानों ने इस अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण नागरिकता कानून और इससे सम्बन्धित प्रस्तावों को निरस्त करने की आपनी माँग से पीछे हटने से इंकार कर दिया है।

दिल्ली हिंसा के दौरान मुस्लिम घरों से पत्थर फेंके जाने की तस्वीरें खूब वायरल हुई थीं। लेकिन इस बात को अक्सर भुला दिया जाता है कि गुस्साई हिंसक भीड़ उनके दरवाजों पर भी खड़ी थी, जिसके खिलाफ मुसलमानों को खुद को बचाना भी था। आरएसएस और बीजेपी के पक्ष में हमदर्दी रखने वाले लोगों के बीच में इसने सनसनी फैला रखी है कि देखो मुसलमानों ने हिन्दुओं पर हमला कर दिया है। वास्तव में देखें तो ये नैरेटिव हमलावरों की दिली इच्छा और चाहत को दर्शाने का काम कर रहा है कि मुसलमानों को अपने ऊपर हो रही हिंसा का मुकाबला तो कत्तई नहीं करना चाहिए, बल्कि जो हो रहा था, उसे होने देना चाहिए था।

दिल्ली में हुई इन झड़पों में जो कि ऐसा लगता है कि फिलवक्त नियन्त्रण में है, कम से कम 42 लोगों की मौत हुई है और 200 से अधिक लोग घायल हैं। किस समुदाय के कितने लोग हताहत हुए हैं या घायल हैं, इसका सिलसिलेवार ब्योरा अभी ज्ञात नहीं है, लेकिन यह एक हकीकत है कि भीड़ ने निशाना बनाकर मुसलमानों की मस्जिदों, घरों और उनकी दुकानों और व्यवसायों को अपना निशाना बनाया था। इस उग्र भीड़ में वे बाहरी तत्व भी शामिल थे जिन्हें कथित तौर पर इन प्रभावित क्षेत्रों में लाया गया था।

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र की अंतर्वस्तु को देखने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि मुसलमानों और विपक्षियों के खिलाफ चलने वाला यह अभियान बेरोकटोक जारी रहने वाला है। 15 दिसंबर 2019 को जब इस नए कानून को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिली थी, उसके ठीक बाद इस पत्रिका ने अपनी हेडलाइन में कहा था ‘जिहादी हिंसा से दिल्ली दहल उठी’। हाल के दिनों में इस पत्रिका ने अपनी कुछ अन्य सुर्खियों में, जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई घटना के बारे में मीडिया पर "फर्जी खबर" फैलाने का आरोप लगाया है, जब पुलिस ने लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों के साथ मारपीट की थी।

इसने सीएए के खिलाफ संघर्षरत छात्रों और प्रदर्शनकारियों के बारे में बताने के लिए "जिहादी हिंसा", "कट्टरपंथी इस्लामपंथी", "आतंक का साम्राज्य" जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल किया है। एक लेख में तो यहाँ तक दावा किया गया है कि जामिया में कुल 18,500 छात्र पढ़ते हैं, जिनमें से आधे लोगों ने खुद को पीएचडी में नामांकित करा रखा है, जिससे कि वे कम से कम 7-8 वर्षों तक ’शोधकर्ता’ के रूप में यहाँ पर रह सकते हैं, और इसके जरिये उनके पास “विरोध प्रदर्शन करने और तोड़-फोड़ करने के लिए पर्याप्त समय” उपलब्ध है।

जाहिरा तौर पर मुसलमानों के पास इस प्रकार के ताकतवर हिंदुत्व दुष्प्रचार से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हो सकते, जिसे सरकार की ओर से भी स्पष्ट तौर पर समर्थन हासिल नजर आता है। लेकिन इसके बावजूद कई अन्य लोगों के साथ जुड़कर मुस्लिमों ने न सिर्फ सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को संगठित करना जारी रखा है बल्कि दिल्ली में हिंसा से पीड़ित लोगों के रख-रखाव में मदद पहुँचानी भी शुरू कर दी है। पहले की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये मेडिकल, क़ानूनी और अन्य प्रकार की सुविधा जुटाने का काम किया है। इतना ही नहीं बल्कि वे इस समुदाय के बारे में हिंदुत्व साइबर-योद्धाओं की ओर से जो ऑनलाइन नकारात्मक धारणाएं फैलाई जा रही हैं, उससे भी बहादुरी से लड़ रहे हैं।

निष्कर्ष के तौर पर कोई यह तर्क रख सकता है कि अगर समग्र तौर पर देखें तो जो माहौल व्याप्त है, उसमें अल्पसंख्यकों के लिए और उनमें भी विशेषतया मुसलमानों के लिए हालात कहीं से भी अनुकूल नहीं हैं। बढ़ती धार्मिक बहुसंख्यकवाद ने भारतीय लोकतंत्र को तोड़कर रख दिया है, और विपक्षी दलों ने भी अल्पसंख्यकों से अपना किनारा कर लिया है। इसके बावजूद जितना भी थोड़ा-बहुत समर्थन वे अपने पक्ष में जुटा सकते हैं, के साथ वे अपने संवैधानिक अधिकारों के बचाव में संलग्न हैं। यदि देश के 20 करोड़ नागरिकों को हाशिये पर डाल दिया जाता है, तो यह यह भारत के लोकतंत्र के लिए खतरे के अलावा कुछ नहीं है। फिर भी कोई कह ही सकता है कि आरएसएस के इस नए भारत में, एक नए मुसलमान का भी उदय हो रहा है। क्या पता अगले ही दिन वह अपनी मौत मर जाये, या एक नई इबारत लिखी जाये।

(लेखक एक राजनैतिक विज्ञानी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

From Embers of Delhi Riots, New Solidarities Can Emerge

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