NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: धरती एक दावानल की चपेट में आने जा रही है
कुछ साल पहले तक तो जलवायु परिवर्तन को एक सैद्धांतिक बात कहकर टाल दिया जाता था लेकिन अब हक़ीक़त यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर हमारे रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई देने लगा है।
उपेंद्र स्वामी
11 Aug 2021
climate change

सोमवार यानी 9 अगस्त की सुबह जिस समय संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समूह (आईपीसीसी यानी इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट को लेकर प्रेस कांफ्रेंस करने की तैयारी कर रहा था, उससे कुछ ही घंटे पहले वहां से तकरीबन छह सौ किलोमीटर दूर इटली के वेनिस शहर में रात बड़ी ही असामान्य किस्म की बेमौसमी बाढ़ सी आई थी। वेनिस के सेन मार्को पियाजा तक में एक मीटर के आसपास पानी भर गया था।

वेनिस के बारे में लोग जानते ही हैं कि वह एक टापू शहर है। शरद और फिर सर्दियों के मौसम में वेनिस को घेरे खड़े समुद्र का पानी अक्सर चढ़ जाता है, लेकिन इसका भी मौसम न था। वेनिस के लिए इस तरह की बाढ़ के संकट अब कुछ ज्यादा आने लगे हैं। जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन इसकी एक बड़ी वजह गिनाई जाती है। बता दूं कि दुनिया की जिन सबसे खूबसूरत जगहों को जलवायु परिवर्तन और समुद्र के चढ़ते जलस्तर से खतरा माना जाता है, उनमें से वेनिस भी एक है।

वेनिस की बाढ़। फोटो साभार: रॉयटर्स

ऐसे में यह एक बड़ा अजीब संयोग था कि अगले ही दिन सुबह आईपीसीसी जलवायु परिवर्तन के कारण हमारी दुनिया के अस्तित्व पर छाए घने बादलों के बारे में एक बड़ी ही भयावह तस्वीर अपनी रिपोर्ट में पेश करने जा रहा था।

जलवायु परिवर्तन हाल के सालों का बड़ा ही चर्चित और विवादित मुद्दा रहा है। चर्चित इसलिए कि इस बात को अब हर कोई जानता है (जाहिर है, दुनिया की तमाम सरकारें तो जानती ही रही होंगी) कि धरती गर्म हो रही है और इसका सीधा असर हमारे मौजूदा जीवन पर और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व पर पड़ रहा है। इसके अलावा सब इतना भी जान ले रहे हैं कि पृथ्वी के तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए कार्बन के उत्सर्जन को कम करना होगा।

यह विवादित इसलिए है कि दुनिया की तमाम सरकारें सालों व दशकों से इस झगड़े में उलझी हैं कि आखिर आगे के कदम उठाने में किसकी कितनी जिम्मेदारी है। मसला अमीर व गरीब देशों और विकसित व विकासशील देशों के बीच का भी हो जाता है। मामला इसलिए और उलझ जाता है कि विकास के मायने प्रकृति को नष्ट करने से और ज्यादा शहरीकरण व औद्योगीकरण करने से हो जाते हैं, लेकिन इन्हीं से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में अमीर व विकसित देश तो कहते हैं कि सबको उत्सर्जन कम करना चाहिए। लेकिन गरीब व विकासशील देश जवाबी दलील देते हैं कि हमें तो विकास करना है, धरती का बेड़ा गर्क तो आप पहले ही इतने सालों में कर चुके हैं। आप तो विकसित हो चुके, अब हमारे विकास करने की बारी आई है तो हमें कहते हैं कि उत्सर्जन कम करो, सीमा तय करो। तो ऐसे में हर बार विवाद इसी में उलझा रह जाता है कि किसको कितनी जिम्मेदारी उठानी चाहिए और किसे कितनी जिम्मेदारी से कब तक मुक्ति दी जानी चाहिए।

इस सारे झमेले में वाकई दुनिया का बेड़ा गर्क हो जा रहा है, ठीक यही बात आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में कही है। उसने साफ कहा है कि वक्त हाथ से निकला जा रहा है। उसका कहना है कि दुनिया के हर उस हिस्से को जलवायु परिवर्तन ने प्रभावित करना शुरू कर दिया है जहां लोग रहते हैं। कुछ साल पहले तक तो जलवायु परिवर्तन को एक सैद्धांतिक बात कहकर टाल दिया जाता था लेकिन अब हकीकत यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर हमारे रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने लगा है।

एक उदाहरण देखिए जो इस समय कर-गुजर रहा है। ग्रीस यानी यूनान का बड़ा हिस्सा पिछले लगभग दस दिनों से भीषण दावानल से गुजर रहा है। वहां इस तरह का नजारा है जो लोगों ने कभी नहीं देखा। ग्रीस का दूसरा सबसे बड़ा द्वीप एविया इन दिनों किसी हॉरर फिल्म के दृश्य जैसा लगता है। एक भीषण आग हर चीज को भस्म कर देने के लिए बढ़ रही है।

 

ग्रीस का एविया एक भीषण आग से गुज़र रहा है। फोटो साभार: रॉयटर्स

यही हाल भूमध्य सागर के दूसरी तरफ तुर्की में है। वहां भी भीषण गर्मी ने दावानल का रूप ले लिया है। और तो और, अटलांटिक महासागर के उस पार अमेरिका में कैलिफोर्निया राज्य इसी तरह की जंगली आग को झेल रहा है। हर जगह लाखों लोग बेघर हो रहे हैं और बचकर भाग रहे हैं। ब्राजील ने जून में इतना सूखा देखा जो पिछले 90 सालों में न देखा था।

याद कीजिए कि पिछले ही महीने यानी जुलाई में यूरोप में ही जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स के कुछ हिस्सों ने इतनी भीषण वर्षा और बाढ़ देखी थी जो वहां किसी ने न कभी देखी और सुनी। ठीक उसी समय सैकड़ों किलोमीटर पूर्व में चीन के हेनान प्रांत में भी बाढ़ की यही स्थिति थी। हम 2013 में उत्तराखंड में जलप्रलय की झलक देख चुके हैं।

उत्तराखंड के केदरानाथ में 2013 में हुई तबाही का दृश्य (फाइल फ़ोटो)

हमारे अपने यहां हमने इस मानसून में देखा है कि बारिश बड़ी असामान्य रही है। नहीं होगी तो हफ्तों तक नहीं होगी और होगी तो अचानक छप्पर फाड़कर। प्रकृति का चक्र बड़ा असामान्य हो चला है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में यही याद दिलाया गया है और कहा गया है कि वक्त बहुत कम है।

पहले जो कभी भीषण गर्मी 50-60 सालों में एक बार पड़ा करती थी, वह अब हर दशक में पड़ने लगी है। अचानक बेहिसाब बारिश और फिर बेतरह सूखे की घटनाएं, दोनों बढ़ने लगी हैं। यह चक्र तेज होते रहेंगे क्योंकि धरती का औसत तापमान 1 डिग्री से ज्यादा बढ़ चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण पहले ही इतने बदलाव आ चुके हैं जो स्थायी हैं और उन्हें पलटा नहीं जा सकता। उनका असर तो हमें झेलना ही होगा।

आईपीसीसी की रिपोर्ट इस लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार उसने अलग-अलग मॉडल व आंकड़े देकर हर तरह की संभावनाओं का पूरा खाका खींचा है। सवाल केवल गर्मी व बारिश का नहीं है, ग्लेशियरों के पिघलने का नहीं है, बल्कि फसलें खराब होंगी, इंसानों की खाद्य सुरक्षा चौपट हो जाएगी। नतीजे की कल्पना की जा सकती है।

हाल इतने खराब हो चुके हैं कि अगर इस समय सारी दुनिया चेतकर अपने उत्सर्जन में घोर कमी कर भी लेती है तो भी साल 2040 तक दुनिया का औसत तापमान 1.5 डिग्री और 2060 तक 1.6 डिग्री सेल्शियस बढ़ ही जाएगा। उसके बाद ही जाकर ही यह स्थिर होना शुरू होगा। लेकिन हम झगड़ों में उलझे रहे और उत्सर्जन में कोई खास कमी न कर पाए तो 2060 तक तापमान 2.0 डिग्री और सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्शियस बढ़ जाएगा। ऐसा हुआ तो? धरती इतनी गर्म इससे पहले तीस लाख साल पहले ही थी जब मानवों के पूर्वजों के पहले अंश पनप रहे थे और जब समुद्र का स्तर अभी के स्तर से करीब 25 मीटर ऊपर था।

वैज्ञाननिकों की चेतावनी है कि औद्योगीकरण के पूर्व के औसत से तापमान में 1.5 सेल्शियस की वृद्धि भी इस कदर मौसमी बदलाव करेगी कि फसलें बरबाद हो जाएंगी और लोग केवल घरों से बाहर निकलने से ही जान गंवा देंगे।

अब हम क्या चाहते हैं, यह हमें देखना है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

climate change
uttrakhand flood
Greece
KEDARNATH

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License