NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
EXCLUSIVE: "न सिर्फ ऑक्सीजन की कमी बल्कि प्रशासनिक विफलता BRD अस्पताल में बच्चों की हुई मौत के लिए है ज़िम्मेदार"
ये बात हादसे के बाद गठित उच्च स्तरीय जाँच टीम ने कहा। तकनीकी विशेषज्ञ समूह का गठन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आदेश पर किया गया था।
तारिक़ अनवर
24 Apr 2018
Gorakhpur Hospital Tragedy

गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में न सिर्फ ऑक्सीजन की कमी बल्कि व्यवस्थित प्रशासनिक विफलता के कारण 30 से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई थी। ये खुलासा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा द्वारा गठित डॉक्टरों की उच्च स्तरीय जांच टीम ने किया। ज्ञात हो कि ये घटना पिछले साल 10-11 अगस्त के मध्यरात्रि को हुई थी।

डॉक्टरों की अपर्याप्त संख्या, अपर्याप्त प्रशिक्षित नर्स, प्रत्येक बेड पर 4-5 नवजात शिशुओं की संख्या के साथ बीमार बच्चों की बड़ी संख्या, एसेप्सिस सिद्धांतों की अवहेलना और सुविधाओं पर अधिक दबाव इस चौंकाने वाले रिपोर्ट तस्वीर सहित दिया गया था जिसे सार्वजनिक तौर पर जारी नहीं किया गया था। ये रिपोर्ट विशेष तौर पर न्यूज़क्लिक के हाथ लगी है।

इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार और मीडिया द्वारा भुगतान में देरी के चलते हुए ऑक्सीजन आपूर्ति कटौती को कारण बताया गया है और इस तरह ऑक्सीजन की व्यवस्था न करने के लिए डॉक्टरों को दोष देने की त्रुटि का खुलासा करता है। जो तस्वीर उभर कर सामने आई है उससे पता चलता है कि अस्पताल की व्यवस्थित लापरवाही है जिसके लिए राज्य सरकार का स्वास्थ्य विभाग और नीति निर्माता पूरी तरह उत्तरदायी हैं।

इस टीम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के डिप्टी कमिश्नर (टीकाकरण) डॉ एमके अग्रवाल, नई दिल्ली स्थित वीएमएमसी तथा सफदरजंग अस्पताल में बाल चिकित्सा के प्रोफेसर तथा प्रमुख डॉ हरीश चेल्लानी, और नई दिल्ली स्थित लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में नवजात विज्ञान के निदेशक, प्रोफेसर तथा प्रमुख डॉ सुषमा नांगिया ने 13 अगस्त, 2017को बीआरडी कॉलेज का दौरा किया। डॉक्टरों की उच्च स्तरीय टीम का ये दौरा घटना के दो दिन बाद हुआ। रिकॉर्ड समीक्षा के आधार पर, हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स से बातचीत और आधारभूत संरचना, उपकरण, मानव संसाधन तथा अस्पताल में दाख़िल बच्चों के ऑनसाइट मूल्यांकन समेत इस रिपोर्ट में दिनभर हुए मूल्यांकन को विस्तार से दिया गया किया। ये रिपोर्ट पिछले साल 15 अगस्त को मंत्रालय को सौंपी गई।

उच्चस्तरीय जांच टीम ने पाया कि 1 से 6 अगस्त, 2017 के बीच तथा 7 और 12 अगस्त, 2017 के बीच बच्चों के दाख़िले और मौत "अलग नहीं" थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई 2016 की तुलना में जुलाई 2017 में मौत की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। दरअसल ये संख्या कम थी अर्थात 292 के मुकाबले 2009 थी।

रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि "नवजात इकाई के बाह्य तथा भीतरी दोनों ईकाई में काफी भीड़ थी, बच्चों के प्रत्येक बेड पर एक शिशु होने के बजाए4-5 नवजात शिशु थें।"

इसमें कहा गया है कि "अस्पताल में बाहर से दाख़िल हुए बीमार शिशुओं की संख्या अस्पताल के आंतरिक शिशुओं की तुलना में काफी ज्यादा थी और आंतरिक शिशुओं की तुलना में बाहर से दाख़िल किए गए शिशुओं की मौत की संख्या ज़्यादा थी।" आगे कहा गया कि "इस वर्ष के पहली छमाही (जनवरी-जून 2017) के दौरान नवजात यूनिट में अस्पताल के बाहर जन्मे 1,548 शिशुओं तथा इस अस्पताल में जन्मे 521 शिशुओं को दाख़िल कराया गया था जिसमें बाहर जन्मे 42% जबकि अस्पताल में जन्मे 33% शिशुओं की मौत हुई।"

रिपोर्ट में प्रशासनिक की बड़ी लापरवाही के बारे में भी बताया गया जिसके चलते घटना वाली रात आपात की स्थिति और भयावह हो गई थी। इसी विफलताओं को छिपाने के लिए डॉक्टरों को कथित तौर पर बलि का बकरा बनाया गया था।

रिपोर्ट में कहा गया है, "गैर-शैक्षणिक जेआर (जूनियर रेसिडेंट्स) समेत संकाय और जूनियर रेसिडेंट्स (एमडी कर रहे) की तादाद उचित लगती है; हालांकि, सीनियर रेसिडेंट्स (एमडी रेसिडेंट्स) की संख्या अनुचित है। 12 पदों के लिए सिर्फ 4 हैं। और इन्हें 24 घंटे सेवा देनी पड़ती है न कि केवल नियमित घंटों के दौरान।"

मरीज़ों की देखभाल के मामले में एमडी सीनियर रेसिडेंट्स निर्णायक कार्रवाई करते हैं और मरीज़ों को दिए जाने वाली सुविधा की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जांच टीम ने पाया कि "वर्तमान में मरीज़ों को रूटिन समय से परे जूनियर रेसिडेंट्स द्वारा व्यवस्था की जाती है जो कि ख़ुद एक छात्र हैं और बीमार मरीज़ों की व्यवस्था करना सीख रहे हैं।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि नर्सिंग कर्मियों की संख्या पर्याप्त है, फिर भी उन्हें नवजात शिशु की देखभाल करने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया गया है। जांच टीम के मुताबिक़"नर्सिंग कर्मियों की संख्या पर्याप्त है लेकिन उचित देखभाल के लिए उन्हें दिन भर तर्कसंगत तरीक़े से तैनात करने की आवश्यकता है। इसके अलावा नवजात शिशु की देखभाल के लिए प्रशिक्षित नर्स नगण्य हैं। नवजात क्षेत्र में काम कर रहे 31 नर्सों में से केवल 3 ही एफबीएनसी (सुविधा आधारित नवजात देखभाल) प्रशिक्षित हैं।"

इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि नवजात मरीज़ों के क्लिनिकल प्रबंधन प्रोटोकॉल को बढ़ाने ने और मज़बूत करने की ज़रूरत है। डॉक्टरों की टीम ने पाया कि "एसेप्सिस (बैक्टीरिया,वायरस और अन्य सूक्ष्मजीवों की अनुपस्थिति) के संबंध में केयर उचित नहीं है जैसे हाथों के धोने, कीटाणुनाशक के इस्तेमाल, शिशुओं का डिस्चार्ज करने या मौत के बच्चों के बिस्तरों को साफ करने।”

डॉक्टरों की टीम ने "एंटीबायोटिक दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल और अंतःशिरा तरल चिकित्सा के साथ-साथ आंतरिक भोजन के रूप में ख़राब पोषणीय सहायता की स्थिति को पाया"।

इस तथ्य से और अधिक प्रमाणित किया गया है कि इस अवधि के दौरान (1-12 अगस्त, 2017) 30% नवजात तथा 13% बाल रोग से संबंधित मरीज़ शिशु की मौत हो गई। दाख़िले के तुरंत बाद (12 घंटे के भीतर) मौत की संख्या 11% थी, दाख़़िले के 24 घंटे के भीतर 25% और इसके बाद अगले 24 घंटे में 25-35% मौत हुई। यह संकेत देता है कि दा़ख़िले के 48 घंटे के भीतर लगभग 50% मौतें हुईं जो "बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दाखिले के बाद पेरिफेरल यूनिटों में सबऑप्टिमल स्टैबलाइजेशन तथा खराब देखभाल दोनों के संकेत देते है"।

विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि नवजात शिशु के माता-पिता को इस्तेमाल की चीज़ों और कई डिस्पोजेबल खरीदना पड़ा है जो कि यह अस्पताल की ज़िम्मेदारी है। विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "जेब ख़र्च से बाहर है क्योंकि नवजात शिशुओं के माता-पिता को नवजात मरीजों के लिए कई डिस्पोजेबल और इस्तेमाल की वस्तुओं को खरीदना पड़ा है, हालांकि एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) मरीज़ों को अस्पताल की आपूर्ति द्वारा देखभाल किया जाता है।"

कर्मचारियों की कमी वाले बीआरडी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों पर दबाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अस्पताल में रेफरल की संख्या - दोनों बाल चिकित्सा और नवजात मामलों के लिए - अधिक है, संभवतः इसलिए क्योंकि यह इस क्षेत्र में उपलब्ध एकमात्र तृतीयक सुविधा केंद्र है। 1-6 अगस्त, 2017 के दौरान 175 बाल चिकित्सा में और 70नवजात ईकाई में दाखिले हुए जिसमें 16% बाल रोगियों तथा 4 9% नवजात मरीज़ों की मौत हुईं।

इसी प्रकार पिछले साल 7-12 अगस्त के दौरान 188 बाल रोगियों और 99 नवजात रोगियों का दाखिला हुआ और 16% बाल रोगियों तथा 42% नवजात रोगियों की मौत हुई। अधिकांश नवजात मौतें 'एस्फिक्सिया' (मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी), समयपूर्व और सेप्सिस के कारण हुई जबकि अधिकांश बाल रोगियों की मौत 'एक्यूट एनसेफलाइटिस सिंड्रोम' के परिणामस्वरूप हुई।

सरकार की विफलताओं को छिपाने के लिए डॉक्टरों को बलि का बकरा बनाने के कथित आरोपों को ये निष्कर्ष आधार प्रदान करता है।

Gorakhpur Hospital Tragedy
Uttar pradesh
Yogi Adityanath

Related Stories

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह प्रकरण में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश


बाकी खबरें

  • एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    मुकुंद झा
    एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    16 Jan 2022
    संयुक्त किसान मोर्चा के फ़ैसले- 31 जनवरी को देशभर में किसान मनाएंगे "विश्वासघात दिवस"। लखीमपुर खीरी मामले में लगाया जाएगा पक्का मोर्चा। मज़दूर आंदोलन के साथ एकजुटता। 23-24 फरवरी की हड़ताल का समर्थन।
  • cm yogi dalit
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव और दलित: फिर पकाई और खाई जाने लगी सियासी खिचड़ी
    16 Jan 2022
    चुनाव आते ही दलित समुदाय राजनीतिक दलों के लिए अहम हो जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उनके साथ बैठकर खाना खाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि दलित वोटर अपनी पसंद किसे बनाते हैं…
  • modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : झुकती है सरकार, बस चुनाव आना चाहिए
    16 Jan 2022
    बीते एक-दो सप्ताह में हो सकता है आपसे कुछ ज़रूरी ख़बरें छूट गई हों जो आपको जाननी चाहिए और सिर्फ़ ख़बरें ही नहीं उनका आगा-पीछा भी मतलब ख़बर के भीतर की असल ख़बर। वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन आपको वही बता  …
  • Tribute to Kamal Khan
    असद रिज़वी
    कमाल ख़ान : हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
    16 Jan 2022
    पत्रकार कमाल ख़ान का जाना पत्रकारिता के लिए एक बड़ा नुक़सान है। हालांकि वे जाते जाते भी अपनी आंखें दान कर गए हैं, ताकि कोई और उनकी तरह इस दुनिया को देख सके, समझ सके और हो सके तो सलीके से समझा सके।…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    योगी गोरखपुर में, आजाद-अखिलेश अलगाव और चन्नी-सिद्धू का दुराव
    15 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के अयोध्या से विधानसभा चुनाव लडने की बात पार्टी में पक्की हो गयी थी. लेकिन अब वह गोरखपुर से चुनाव लडेंगे. पार्टी ने राय पलट क्यों दी? दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License