NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
उत्तराखंड में भीषण बाढ़ की वजह हिमखण्ड का विस्फोट है! 
चमोली में जो कुछ घटित हुआ उसकी पहचान हिमालय की उंचाई पर स्थित नंदा देवी ग्लेशियर में एक ‘हिमखंड विस्फोट’ के तौर पर हुई है।
संदीपन तालुकदार
09 Feb 2021
उत्तराखंड
चित्र साभार: वनइंडिया

रविवार 7 फरवरी के दिन गंगा की सहायक धौली गंगा, ऋषि गंगा और अलकनंदा नदियों में अचानक से भारी उफान आ गया था, जिसने उत्तराखंड में और खासकर चमोली जिले में चारों तरफ अफरातफरी के माहौल और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने का काम किया।

अचानक से आए इस बाढ़ के जलजले ने दो विद्युत् परियोजनाओं- तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना और ऋषि गंगा जल विद्युत् परियोजना को भारी नुकसान पहुँचाया है। अचानक से पानी की जद में आ जाने के कारण सैकड़ों की संख्या में श्रमिक सुरंगों में फंसे हुए हैं। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक अभी तक 23 लोगों की मौत की सूचना है, जबकि 150 लोग अभी भी लापता बताये जा रहे हैं। बचाव अभियान का काम अभी भी जारी है।

चमोली में जो घटित हुआ है उसकी पहचान हिमालय की उंचाई में स्थित नंदा देवी ग्लेशियर में ‘हिमखंड के विस्फोट’ के तौर पर हुई है। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न बाढ़ ने गंगा की सहायक नदियों को अचानक से पानी से जलमग्न कर दिया था। और भी विशिष्ट तौर पर कहें तो इस घटना को जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) के तौर पर कहा जाता है।
यह ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड क्या है?

ग्लेशियर में जमा होकर बनने वाली एक झील में से अचानक से पानी के छोड़े जाने को जीएलओएफ कहते हैं। हिमखंडीय झील का निर्माण दरअसल ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया के दौरान होता है, और यह ग्लेशियर के बगल में, सामने, भीतर, नीचे या उसकी सतह पर कहीं भी निर्मित हो सकता है।

जब इस प्रकार की हिमखंड झील टूटती हैं, तो इस टूटन को जीएलओएफ के तौर पर जाना जाता है। इस प्रकार की घटना झील के नीचे वाले स्थलों के लिए विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकती है।

कई वजहें जीएलओएफ का कारण बन सकती हैं जैसे कि कटाव, पानी के जबरदस्त दबाव का बढ़ना, बर्फ के भारी पहाड़ या किसी चट्टान का गिरना, बर्फ के नीचे जवालामुखी विस्फोट, झील में किसी बगल के ग्लेशियर के ढहने से बड़े पैमाने पर पानी के विस्थापन जैसे कारण हो सकते हैं। 

भौगौलिक हो या सामाजिक-आर्थिक दोनों ही दृष्टि से जीएलओएफ बेहद अहम हैं। पृथ्वी के इतिहास में अगर देखें तो जीएलओएफ कुछ सबसे बड़े बाढ़ों की वजह रहा है। इनकी वजह से बड़े पैमाने पर परिदृश्य में बदलाव हुए हैं और यहाँ तक कि अचानक से बड़े पैमाने पर महासागरों में इस प्रकिया में ताजे पानी के छोड़े जाने से इसने क्षेत्रीय जलवायु परिस्थितियों तक को बदलकर रख दिया है। निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढाँचे पर जीएलओएफ बहुत बड़े जोखिम को पैदा कर सकते हैं।

उत्तराखंड में जीएलओएफ की क्या वजह रही?

हालाँकि अभी तक उत्तराखंड में जीएलओएफ के पीछे के कारणों का ठीक-ठीक पता नहीं चल सका है। आईआईटी इंदौर के ग्लेशियोलॉजी और हाइड्रोलॉजी के सहायक प्रोफेसर फारूक आज़म का कहना था कि इस क्षेत्र में कोई भी हिमनदी झील मौजूद नहीं थी। यह ग्लेशियर के अंदरूनी इलाके में पानी की मौजूदगी की ओर संकेत करता है, जिसके पिघलने से ग्लेशियर के फटने के कारण अचानक से नीचे की घाटी में पानी की तेज धार और कई टन मलबे का ढेर बहने लगा था। हालाँकि आज़म का यह भी कहना था कि इस प्रकार की घटना अपनआप में असामान्य है।

आज़म इस क्षेत्र के लगातार गर्म होने की ओर इंगित करते हैं। पूर्व में बर्फ का तापमान -6 से लेकर -20 डिग्री सेल्सियस हुआ करता था, लेकिन अब यह -2 डिग्री पर है, जिसके चलते ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया अतिसंवेदनशील हो चुकी है।

इसके आलावा कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इस घटना के पीछे जलवायु परिवर्तन का हाथ है। डाउन टू अर्थ से बातचीत के दौरान खुद को गुमनाम रखे जाने की शर्त पर एक वैज्ञानिक का कहना था कि इस साल ऊँचे इलाकों में बर्फ़बारी में कमी देखने को मिली है।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में मौजूद करीब सभी 200 ग्लेशियरों की निगरानी का काम सर्दियों के मौसम में कर पाना संभव नहीं रहता। सिर्फ मार्च से सितंबर के बीच में जब मौसम अनुकूल रहता है, उस दौरान मौसम ग्लेशियर की निगरानी के अनुकूल रहता है। इसलिए जीएलओएफ के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पाना संभव नहीं है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज ऑफ़ माउंटेन एंड हिल एनवायरनमेंट में प्रोफेसर महाराज के पंडित के अनुसार “अन्य पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में हिमालय काफी तेजी से गर्म होता जा रहा है। भवन निर्माण में पारंपरिक लकड़ी और पत्थर की चिनाई के इस्तेमाल की जगह लौहयुक्त सीमेंट-कंक्रीट का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है, जिसके चलते ऊष्मा-द्वीप प्रभाव पैदा होने की संभावना है, और इस प्रकार क्षेत्रीय गर्मी में अभिवृद्धि कर रहा है।” सरकारों के रवैये पर भी सवाल खड़े करते हुए उनका कहना था कि “सरकार भी तभी कोई कदम उठाती है जब कोई आपदा घट जाती है, लेकिन कभी भी खुद से चाक-चौबंद नहीं रहती। हम काफी लंबे समय से हिमालय क्षेत्र में पूर्व चेतावनी प्रणाली को स्थापित करने के बारे में कहते चले आ रहे हैं, जैसा कि 2004 की सुनामी के बाद समुद्र तटीय क्षेत्रों में स्थापित किया गया था, लेकिन हिमालयी क्षेत्रों में अभी भी इस काम को नहीं किया गया है।”

पंडित आगे कहते हैं “हिमालयी क्षेत्र में स्थित देशों में लगभग 8,800 हिमनदी झीलें बिखरी हुई हैं और इनमें से 200 से ज्यादा झीलों को खतरनाक की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। हालिया वैज्ञानिक प्रमाण इस बात का इशारा करते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली बाढ़ अधिकांशतया भू-स्खल की वजहों से होते हैं, जिसके चलते अस्थाई तौर पर पहाड़ी नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।”

आईसीआईएमओडी (इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट) द्वारा मुहैय्या कराई गई द हिन्दू कुश हिमालयन मोनिटरिंग एंड असेसमेंट प्रोग्राम (एचआईएमएपी) रिपोर्ट दर्शाती है कि हिन्द कुश हिमालयी क्षेत्र में तापमान में वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग का कहीं ज्यादा प्रभाव हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है।

इस सबके बावजूद यदि स्थिति का वास्तविक जायजा लिया जाए तो, पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते इंसानी हस्तक्षेपों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इस बारे में विशषज्ञों का मानना है कि, हिमालयी क्षेत्रों में जिस प्रकार के विकासात्मक कार्यों वाली परियोजनाएं चल रही हैं, उनमें पारंपरिक लकड़ी एवं पत्थरों की चिनाई के स्थान पर लौहयुक्त सीमेंट-कंक्रीट के ढांचों के उपयोग से यह पर्वतीय क्षेत्र में ऊष्मा-द्वीप प्रभाव बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है। कई बांधों, राजमार्गों और ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक प्रस्तावित रेलमार्ग का निर्माण कार्य- ये सभी कारक पर्यावरण के लिहाज से अतिसंवेदनशील क्षेत्र में पारिस्थितिकी असुंतलन में अपना योगदान देने जा रहे हैं।

ग्रीनपीस इंडिया के वरिष्ठ जलवायु एवं उर्जा कैंपेनर अविनाश चंचल का कहना था “पर्यावरण के लिहाज से नाजुक इको-सेंसिटिव क्षेत्रों में भारी निर्माण कार्य से बचने की आवश्यकता है।” उन्होंने अपनी बात में आगे कहा कि हिमालयी क्षेत्र में वर्तमान में जारी विकास के मॉडल पर पुनर्विचार की जरूरत है, जो यहाँ के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए चुनौतियों को खड़ा कर रही है।”

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Explainer: Glacial Burst of Uttarakhand That Caused Massive Flood

Chamoli flood
Uttarakhand Flash Flood
Glacial Lake Outburst Flood
Himalayas
climate change
Development in Uttarakhand

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 

आईपीसीसी: 2030 तक दुनिया को उत्सर्जन को कम करना होगा


बाकी खबरें

  • Fab and Ceat
    सोनिया यादव
    विज्ञापनों की बदलती दुनिया और सांप्रदायिकता का चश्मा, आख़िर हम कहां जा रहे हैं?
    23 Oct 2021
    विकासवादी, प्रगतिशील सोच वाले इन विज्ञापनों से कंपनियों को कितना फायदा या नुकसान होगा पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि ये समाज में सालों से चली आ रही दकियानुसी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ-साथ…
  • Georgia
    एम. के. भद्रकुमार
    बाइडेन को रूस से संबंध का पूर्वानुमान
    23 Oct 2021
    रूसी और चीनी रणनीतियों में समानताएं हैं और संभवतः उनमें परस्पर एक समन्वय भी है। 
  • Baghjan Oilfield Fire
    अयस्कांत दास
    तेल एवं प्राकृतिक गैस की निकासी ‘खनन’ नहीं : वन्यजीव संरक्षण पैनल
    23 Oct 2021
    इस कदम से कुछ बेहद घने जंगलों और उसके आस-पास के क्षेत्रों में अनियंत्रित ढंग से हाइड्रोकार्बन के दोहन का मार्ग प्रशस्त होता है, जो तेल एवं प्राकृतिक गैस क्षेत्र में कॉर्पोरेट दिग्गजों के लिए संभावित…
  • Milton Cycle workers
    न्यूज़क्लिक टीम
    वेतन के बग़ैर मिल्टन साइकिल के कर्मचारी सड़क पर
    23 Oct 2021
    सोनीपत के मिल्टन साइकिल कंपनी के कर्मचारी पिछले छह महीने से अपनी तनख़्वाह का इंतज़ार कर रहे है। संपत्ति को लेकर हुए विवाद के बाद मिल्टन के मालिकों ने फ़ैक्ट्री बंद कर दी लेकिन कर्मचारियों का न वेतन…
  • COVID
    उज्जवल के चौधरी
    100 करोड़ वैक्सीन डोज़ : तस्वीर का दूसरा रुख़
    23 Oct 2021
    एक अरब वैक्सीन की ख़ुराक पूरी करने पर मीडिया का उत्सव मनाना बचकाना तो है साथ ही गलत भी है। अब तक भारत की केवल 30 प्रतिशत आबादी को ही पूरी तरह से टीका लगाया गया है, और इस आबादी में से एक बड़ी संख्या ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License