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भारत
राजनीति
एयर इंडिया के शेष सरकारी शेयर को एलआईसी से बेचने की BJP सरकार की योजना एक "ग़लत क़दम"
किसी 'ख़स्ताहाल' सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के शेयरों को ख़रीदने के लिए लाभ अर्जित करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी के पैसा का इस्तेमाल करने से केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को ही लाभ होगा न कि आम लोगों को।
प्रणेता झा
11 Apr 2018
ONGC

क्या होगा जब एक लाभ अर्जित करने वाली और नक़दी संपन्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एलआईसी) को केंद्र सरकार द्वारा एक अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एयर इंडिया (एआई) का शेयर ख़रीदने को लेकर उसके अतिरिक्त धन का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया जाता है? ज्ञात हो कि एयर इंडिया क़र्ज़ में डूबी हुई एक ख़स्ताहाल सरकारी कंपनी है जिसे पहले ही निजी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार एयर इंडिया में केंद्र सरकार के शेष शेयर को एलआईसी तथा अन्य सरकारी बीमा कंपनियों को बेचने की योजना बना रही है। सरकार के अधीन प्रबंधन समेत एयर इंडिया का 76 प्रतिशत इक्विटी शेयर कैपिटल निजी कंपनियों को बेचने की 28 मार्च की घोषणा के बाद इसकी घोषणा की गई।

एयर इंडिया के विनिवेश का कथित कारण 52,000 करोड़ रुपए से ज़्यादा का भारी क़र्ज़ और भारी नुकसान बताया गया है, हालांकि ये सरकारी कंपनी पिछले तीन सालों से लाभ कमा रही है और यहां तक की इसने क़र्ज़ चुकाने में कभी चूक नहीं की।

हालांकि यह अलग घटना है कि कांग्रेस की अगुआई वाली पिछली यूपीए सरकार की विध्वंसकारी नीतिगत फैसलों ने एयर इंडिया को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया है। इस सरकार ने क़र्ज़ लेकर बड़ी संख्या में हवाई जहाज़ ख़रीदा था और साथ ही मुनाफा वाले रूट को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया।

सरकार द्वारा क़र्ज़ के बोझ का 50 फीसदी हिस्सेदारी देने की बात करने के बावजूद कोई निजी कंपनी अभी तक इस प्रस्ताव के लिए आगे नहीं आया है। इसमें एआई की सहायक कंपनी एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड में 100 फीसदी इक्विटी हिस्सेदारी भी शामिल है, साथ ही एआई की 50 फीसदी की इक्विटी हिस्सेदारी संयुक्त उद्यम एआईएसएटीएस में है।

विमानन क्षेत्र की एक भारतीय कंपनी इंडिगो ने सार्वजनिक रूप से ख्वाहिश ज़ाहिर की थी लेकिन इसने भी कथित तौर पर अपना ख़्य़ाल बदल दिया। उसका कहना है कि उसकी दिलचस्पी केवल एआई के अंतरराष्ट्रीय परिचालनों को हासिल करने में है और उसके पास "एयर इंडिया के सभी एयरलाइनों के सफलतापूर्वक परिचालन और अधिग्रहण" की क्षमता नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मुनाफा वाले मार्ग और स्लॉट अभी भी एयर इंडिया के पास है। इसके पास विदेशी सेवाओं के मार्केट शेयर में क़रीब 17 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

लेकिन एनडीए इसके बचे हिस्से को एलआईसी को बेचने की योजना आख़िर क्यों बना रहा है? इसका मतलब क्या है?

इस राष्ट्रीय विमानन कंपनी में सरकार की शेष 24 प्रतिशत हिस्से में 4 प्रतिशत एम्प्लाई स्टॉक ऑनर्शिप प्लान (ईएसओपी) के तहत स्थायी कर्मचारियों को दिया जाएगा जिसके तहत एक कर्मचारी स्टॉक पूल बनाया जाएगा।

ईएसओपी पूल बनाने के बाद ये सरकार शेष 20 फीसदी हिस्सेदारी एलआईसी और अन्य सरकारी स्वामित्व वाली बीमा कंपनियों या वित्तीय संस्थानों को बेचने की कोशिश करेगी, क्योंकि भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) के नियमों के मुताबिक़ कोई बीमा कंपनी किसी अन्य कंपनी में केवल 15फीसदी हिस्सेदारी ही रख सकती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार ये क़दम संभावित निजी निवेशकों की चिंताओं को दूर करने के लिए है क्योंकि "एयर इंडिया में किसी प्रकार की सरकारी हिस्सेदारी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकता है"।

लेकिन यह सरकार के एक अन्य उद्देश्य की पूर्ति करेगा जो कि विनिवेश के दौर में हो रहा है। रक्षा क्षेत्र जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों सहित लाभ अर्जित करने वाली केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम (सीपीएसई) को इस समय बेचा जा रहा है।

सत्ता में आने के महज़ साढ़े तीन साल में ही मोदी सरकार ने 1.25 लाख करोड़ रुपए की सरकारी संपत्तियों को बेच दिया। ज्ञात हो कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपने शासनकाल के एक दशक में 1.14 लाख करोड़ रुपए की राष्ट्रीय संपत्ति को बेचा था।

अगर एलआईसी को एयर इंडिया का 15 प्रतिशत शेयर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है तो यह पैसा केंद्र सरकार के ख़जाने में जाएगा। एक कंपनी जो कि केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली है और जिसका कोई विकल्प नहीं है। बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार अपने घाटे को कम करने के लिए और संभवत: अपने राजस्व व्यय को पूरा करने के लिए इस नक़द का इस्तेमाल करेगी।

ये पैसा भी एयर इंडिया के पास नहीं जाएगा जो इस नक़दी का इस्तेमाल कुछ हद तक खुद को क़र्ज़ से मुक्ति पाने के लिए कर सके।

ये पैसा जो एलआईसी (एलआईसी एक केंद्रीय सरकारी उद्यम है) द्वारा खर्च किया जाएगा वह कंपनी के उत्पादक गतिविधियों से आता है। ये पैसा सरकारी अनुदानों या इसी तरह का कोई उपहार नहीं है। अपनी हालत को बेहतर बनाए रखने के लिए एलआईसी को इस पैसे का इस्तेमाल अपने विस्तार, विकास और आधुनिकीकरण के उद्देश्य के लिए करना चाहिए जो कि स्पष्ट रूप से एक बड़ी राशि होगी।

इसके बजाय इस पैसे को सरकार के समेकित निधियों में रखा जाएगा जो संभवतः कॉर्पोरेट क़र्ज़दारों के 'बैड' लोन की अदायगी और अन्य ऐसे कॉर्पोरेट-फ्रेंडली ख़र्च के लिए इस्तेमाल किया जाएगा जिसका देश के लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होगा।

ये राशि बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार जो कि एक स्वस्थ सार्वजनिक-क्षेत्र की कंपनी के नकद भंडार का इस्तेमाल कर रही है केंद्रीय ख़जाने को समृद्ध करेगा। जबकि एक 'ख़स्ताहाल' कंपनी के शेयर का बोझ स्वस्थ कंपनी पर डाला जा रहा है जिसका कोई ख़रीदार नहीं मिल रहा है।

जीवन बीमा के बाज़ार में एकाधिकार होने के बावजूद एलआईसी के निजीकरण की मांग पहले से की जा रही है। यहां तक की बीमा बाज़ार में साल 1999 -2000 से निजी कंपनियां प्रवेश कर चुकी है।

और जबकि तर्क दिया जा सकता है कि एलआईसी के पास पहले से ही कई ब्लू-चिप कंपनियों की हिस्सेदारी है जिसमें ज़्यादातर सार्वजनिक कंपनियां है, लेकिन निजी भी हैं जो एयर इंडिया में शेयर ख़रीद रहे हैं, जिसे 'सफेद हाथी' के दर्जे तक पहुंचा दिया गया है वह एलआईसी की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने नहीं जा रही है।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अखिल भारतीय बीमा कर्मचारी संघ के महासचिव वी रमेश ने कहा, "सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लगातार निजीकरण के बावजूद ये सरकार एलआईसी से नक़द ऐंठने की कोशिश कर रही है। एलआईसी अपने निवेश के लेकर बहुत ही विवेकपूर्ण है और इसके पास सार्वजनिक-क्षेत्र और निजी-क्षेत्र दोनों कंपनियों की बड़ी संख्या में शेयर है। लेकिन जाहिर है अगर इसे शेयर खरीदने को कहा जाता है तो यह मना नहीं कर सकता है।"

उन्होंने आगे कहा कि "एयर इंडिया का शेयर ख़़रीद कर चूंकि एलआईसी लंबी अवधि के लिए निवेश करने जा रही है जो एलआईसी की स्थिति को तुरंत प्रभावित नहीं कर सकता है क्योंकि यह एयर इंडिया के भविष्य के बदलने तक इंतज़ार कर सकती है। लेकिन किसी ख़स्ताहाल कंपनी का शेयर ख़रीदने से किसी को नहीं लगता इस कंपनी के लिए बेहतर क़दम है। ये सरकार एलआईसी को अपने स्वयं के पैसे से वंचित रखेगी, जिसका इस्तेमाल कंपनी अपने विकास और विस्तार के लिए कर सकती थी। लेकिन ख़स्ताहाल कंपनी में निवेश करने का मतलब साफ है कि इसका पैसा बर्बाद हो जाएगा।"

रमेश ने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार पहले से ही सामान्य बीमा कंपनियों का विनिवेश शुरू कर चुकी थी तो वह दिन अब दूर नहीं था जब एलआईसी का भी निजीकरण किया जाएगा। उन्होंने कहा कि एलआईसी ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में 2,250 करोड़ रुपए का लाभांश चुकाया था।

कुछ इसी तरह का क़दम जनवरी 2018 में उठाया गया था जब ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) को हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड(एचपीसीएल) में सरकार की संपूर्ण 51 फीसदी हिस्सेदारी 36,915 करोड़ रुपए की क़ीमत में खरीदने के लिए कहा गया था। इस फैसले के परिणामस्वरूप ओएनजीसी क़र्ज़दार हो रही है।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीआईटीयू) के महासचिव तपन सेन ने कहा कि "ओएनजीसी पर किसी प्रकार का कोई क़र्ज़ नहीं था। चूंकि ओएनजीसी के पास पर्याप्त अतिरिक्त फंड नहीं था, सरकारी दबाव में एचपीसीएल की ख़रीद के लिए इसे क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर किया गया था। अब ओएनजीसी पर 35,000 करोड़ रुपए से अधिक का क़र्ज़ है। और हालांकि अब तक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में कंपनी की स्थिति में अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि वह पैसा जिसे ओएनजीसी ने लिया था वह केंद्र सरकार के ख़जाने में चला गया।"

रमेश ने कहा, "एलआईसी के कर्मचारी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं। हम एयर इंडिया के निजीकरण की निंदा करते हैं। एलआईसी बहुत ही सशक्त कंपनी है, और हम भविष्य में एलआईसी की रक्षा के लिए हर मुमकिन लड़ेंगे।"

ONGC
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AIR India
निजीकरण
सार्वजनिक क्षेत्र

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