NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन : बुरी तरह फंस गए प्रधानमंत्री मोदी
कृषि में निजी पूंजी किसानों की मौत का ऐलान है, लेकिन अब पीएम फंस गए हैं। अब या तो वे एक 'मज़बूत नेता' की छवि को बचा सकते हैं या फिर इस त्रासदी को रोक सकते हैं।
परमजीत सिंह जज
05 Jan 2021
Translated by महेश कुमार
किसान आंदोलन

आख़िर 26-27 नवंबर 2020 को दिल्ली में हुए दो-दिवसीय विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य था क्या जो यह दिल्ली की सीमाओं पर एक महीने से अधिक के विरोध में तब्दील हो गया। यह न केवल किसानों का बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों का सामूहिक आंदोलन बन गया है और एक राष्ट्रव्यापी विरोध में बदल रहा है, लगता है कि जनता में बढ़ते असंतोष ने इसकी व्यापकता को बढ़ा दिया है- मानो जैसे कि किसी को इसी बेहतर वक़्त की तलाश थी।

शुरू में ही यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि भारत सरकार कृषि क्षेत्र में कानून बनाने की  हकदार नहीं है, लेकिन उसने यह कर तीनों कानून बनाए है कि तीनों अधिनियम व्यापार से जुड़े हैं, जो कि केंद्र सरकार का विषय है। 1960 के दशक से लेकर आज तक भारत सरकार हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करती आई है और फसल की ‘खरीद कृषि उपज विपणन समितियों’ (APMC) के माध्यम से होती है। फिर भी, अगर सरकार तीन नए कृषि-कानूनों को लागू करने के मामले में ईमानदार होती तो वह पहले एमएसपी को अनिवार्य बनाती और अनाज और अन्य फसल की खरीद के लिए एपीएमसी मंडी को अनिवार्य बनाती। इस तरह के कानून सबके डर को दूर कर देते। बिहार के किसानों का असुरक्षित कृषि बाजारों का भयानक अनुभव सरकार को एमएसपी की गारंटी देने और हर जगह एपीएमसी मंडी को अनिवार्य बनाने की जरूरी पृष्ठभूमि प्रदान करता है। लेकिन ऐसा होना नहीं था।

कृषि बाजार को निजी पूंजी के लिए खोलने का अर्थ है किसानों के लिए मौत का ऐलान, भले ही वर्तमान कृषि कानून ये आश्वासन देते हो कि किसानों की जमीन उनसे नहीं ली जाएगी। और,  सत्तारूढ़ पार्टी अभी तक ये दावा कर रही है कि एपीएमसी में भ्रष्टाचार व्याप्त है, तो इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसे रोकने के लिए सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में एक अलग रणनीति की जरूरत है न की एपीएमसी प्रणाली को तबाह करने की।

किसानों का आंदोलन अब पंजाब और हरियाणा तक सीमित नहीं है, क्योंकि हर दिन अधिक से अधिक लोग इसका समर्थन करते जा रहे हैं। यह पंजाब में रेल रोको से शुरू हुआ और फिर राजमार्गों पर टोल बूथों की पिकेटिंग के साथ करीब दो महीने तक जारी रहा। पंजाब में आंदोलन इसलिए तीव्र हो गया था क्योंकि बलबीर सिंह राजेवाल और जोगिंदर सिंह उगरान जैसे कुछ नेता लंबे समय से भारतीय किसान यूनियन (BKU) के सक्रिय नेता हैं। हालांकि पंजाब और अन्य राज्यों में कई किसान संगठन हैं, लेकिन आज उन सब में जो एकता नज़र आ रही वह अभूतपूर्व और काबिल-ए-तारीफ है।

किसानों के आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय खासियत यह है कि आंदोलन अहिंसक है, और कई उकसावो के बावजूद, जैसे कि उन्हें खालिस्तानी, नक्सली और पाकिस्तान और चीन के एजेंट कहकर उकसाने की कोशिश की गई फिर भी इसने अपने शांतिपूर्ण चरित्र को बनाए रखा है। पंजाब में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। वर्ष 1920-1925 के दौरान गुरुद्वारों में सुधारों के लिए अकाली आंदोलन चला था जो इसी तरह एक शांतिपूर्ण आंदोलन था और इसने गांधी के अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरणा ली थी। यह आंदोलन 1925 में गुरुद्वारा अधिनियम के पारित होने के बाद समाप्त हुआ था, जिसे एक महान जीत माना गया और आगे के लिए अहिंसक राष्ट्रवादी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ था। असहयोग आंदोलन की गांधीवादी पद्धति को वर्तमान आंदोलन में भी देखा जा सकता है, क्योंकि पंजाब के लोगों ने प्रधानमंत्री के करीबी माने जाने वाले दो कॉर्पोरेट घरानों के उत्पादों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है।

जिस पल किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर रोका गया था, उस समय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या वे लंबे समय तक अपने आंदोलन को चला पाएंगे, खासकर इस तथ्य की रोशनी में कि उनका इरादा तो केवल दो दिन विरोध करने का था, लेकिन पुलिस बैरिकेड्स ने उन्हें अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। आंदोलन को जारी रखना साथ ही लंबे समय तक इसे ज़िंदा रखने का सवाल सामने आया। फिर उसके बाद जो हुआ वह अप्रत्याशित था: उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन मिलना शुरू हो गया और अन्य किसान संगठन उनसे जुड़ने लगे। खाद्य और अन्य रसद के इंतजाम पर काम किया गया और नतीजा ये है कि अब वे काफी समय तक अपने आंदोलन को जारी रखने की स्थिति में हैं।

इस संदर्भ में देखें तो सेवा करने की सिख परंपरा ने उनका काफी साथ दिया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे पहले हूए कई विरोध प्रदर्शनों या आंदोलनों में भी, जिसमें तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन और शहीन बाग में संशोधित नागरिकता अधिनियम का विरोध शामिल था, दिल्ली में गुरुद्वारों ने बढ़-चढ़कर भोजन मुहैया कराया था। इसके अलावा, कोविड़-19 महामारी के दौरान, सिख गुरुद्वारों ने धर्म और जाति की परवाह किए बिना हर जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन की पेशकश की थी। जब दूसरे राज्यों के किसान उनसे जुड़ने लगे, तो दिल्ली जाने वाले राजमार्ग जाम हो गए। कड़ाके की सर्दी में जिन खाद्य पदार्थ और अन्य ज़रूरतें की चीजों की जरूरत होती हैं, वे लगातार विरोध स्थलों पर आने लगी। अब दिल्ली के आस-पास प्रदर्शनकारियों का भारी जमावड़ा है जो भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है।

जाहिर है लंबे समय से केंद्र में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी को इस आंदोलन से घबराहट होने लगी। और इसलिए सरकार ने किसानों के आंदोलन का जवाब देने के लिए एक व्यापक योजना तैयार की और तुरंत इसे लागू भी किया गया। सत्ताधारी दल के नेताओं ने किसानों को ये समझाने के लिए रैलियां की कि नए कानून उनके लिए कितने फायदेमंद हैं। नए कानूनों के लाभकारी प्रभावों का उल्लेख करने का कोई मौका प्रधानमंत्री ने भी नहीं छोड़ा। इस पर, मीडिया का एक वर्ग किसानों के आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार करता रहा है। लेकिन वे दिन बीत गए जब भारतीय किसान की छवि एक पारंपरिक विचारधारा वाले व्यक्ति (या महिला) की थी जो "जातीय" लबादे में होता था। समय बदल गया है और अधिकांश किसान अब शिक्षित हैं, और वे आधुनिकता के उपभोक्ता भी हैं। युवा किसान और पढ़े-लिखे लोगों ने खुद का समाचार पत्र, "ट्रॉली टाइम्स", और एक यूट्यूब चैनल "किसान एकता मोर्चा" शुरू करके मीडिया प्रचार के जवाब पर प्रतिक्रिया दी है, और इनके माध्यम से उन्होंने अपने संघर्ष के बारे में फैलाई जा रही हर फर्जी खबर का जवाब भी दिया है।

अब "राजनीति" की श्रेणी में आते हैं जिसे लेकर आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी के नेताओं और विशेष रूप से प्रधानमंत्री ने निरंतर किसानों पर लांछन लगाया है। बड़ा अजीब लगता है, जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि विपक्षी दल किसानों को गुमराह कर रहे हैं और आंदोलन राजनीति में लिप्त हैं, लगता है कि वे भूल जाते हैं कि वे भी एक राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं और उनकी खुद की पार्टी इसी तरह के काम में लगी हुई है। सरकार समर्थक मीडिया के वर्चस्व के कारण, विपक्षी दलों को आवश्यक प्रेस कवरेज नहीं मिलता है, जिसके परिणामस्वरूप बड़े सचेत ढंग से विपक्ष "गायब है" का प्रवचन चलाया जाता है। मामला ऐसा नहीं है। समझने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि चल रहे किसान आंदोलन के नेता जानबूझकर सभी राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए हुए हैं। अब तक, किसी भी राजनीतिक नेता को अपने मंच से किसानों को संबोधित करने की अनुमति नहीं दी गई है।

हर बीतते दिन के साथ, इस आंदोलन का राजनीतिक नतीजा उभरना और स्पष्ट होना शुरू हो गया है: सरकार के प्रचार का मुक़ाबले करने के लिए बनी रणनीति के तहत सोशल मीडिया पर आक्रामक जवाब के साथ-साथ नए तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, 27 दिसंबर को किसानों ने प्रधानमंत्री की "मन की बात" के प्रसारण के समय लोगों को थाली बजाकर विरोध जताने की अपील की थी। पंजाब और हरियाणा में इस अपील का लोगों ने काफी अनुसरण किया। कनाडा के प्रधानमंत्री ने किसानों के शांतिपूर्वक विरोध पर जब बयान दिया तो उससे भारत में काफी हलचल मच गई। यूनाइटेड किंगडम में संसद के कुछ सदस्यों ने आंदोलन के समर्थन में एक बयान भी जारी किया था। कृषि-कानूनों के खिलाफ विरोध अब दुनिया भर में फैल गया है, खासकर उन देशों में जहां भारतीय प्रवासियों की बड़ी संख्या है। यह भी कहा जा रहा है कि भारत में जो कुछ हो रहा है, उस पर संयुक्त राष्ट्र ने चिंता व्यक्त की है।

घरेलू राजनीतिक दंगल में बीजेपी हारती नज़र आ रही है। यहां तक कि अब ऐसा लगने लगा है कि यह आंदोलन पार्टी के लिए भयावह हो सकता है। एक ऐसा आंदोलन जो तीन नए कृषि-कानूनों के विरोध से शुरू हुआ था, उसने अब बिजली बिल के साथ-साथ हाल ही में पारित (अध्यादेश के रूप में) पराली जलाने के कानून को भी वापस लेने की मांग कर दी है। अब, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की रोकथाम के बारे में आवाज उठाई जा रही है और इसमें भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अगर किसान जल्द ही चुनावों में पेपर बैलेट के इस्तेमाल की मांग करने लगे। 

प्रधानमंत्री अब बुरी तरह से फंस चुके हैं क्योंकि अब न तो निगलते बनता है और न ही उगलते बनता है, ऐसा कुछ जो पिछले छह वर्षों के दौरान कभी नहीं हुआ। सामाजिक मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि किसी भी नेता की दो अविभाज्य विशेषताएं होती हैं, जो सभी संस्कृतियों और राष्ट्रीयताओं के लोगों द्वारा पहचानी जाती हैं। जैसी कि यह उम्मीद की जाती है कि किसी भी नेता को मज़बूत या दृढ़ होना चाहिए और यह भी कि वह निष्पक्ष भी होना चाहिए। मोदी खुद को मजबूत दिखाते रहे हैं, उदाहरण के लिए 2019 में पुलवामा की घटना के बाद, उन्हे इसका लाभ मिला था। लेकिन साथ ही, मोदी किसानों को यह भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि  कृषि कानून उनके लिए एक उचित सौदा है और वे चाहते हैं कि उन्हें उनके दावे से रूबरू कराया जाए। और फिर भी वे किसान आंदोलन के जवाब में पुलवामा जैसी दृढ़ता का प्रदर्शन कर रहे हैं। वह इस तथ्य से बेखबर है कि जब फ्रांसिस बेकन ने यह माना था कि एक किसान में सबसे अच्छे सैनिक बनाने की क्षमता हो सकती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह तथ्य भारत के लिए सही नहीं है! यहां, ये भी किसानों के बेटे हैं- गुजरात जैसे कुछ राज्यों के अपवाद को छोडकर, जिनकी सेना में शामिल होने की कोई परंपरा ही नहीं है, ये वे किसान हैं जिनमें से सैनिक और अधिकारी दोनों बनते हैं।

जिस तरह से किसानों का आंदोलन चल रहा है, इससे सरकार का घबराना जायज है। यदि प्रधानमंत्री किसानों की मांगों को स्वीकार करने का निर्णय लेते हैं, तो वे "दृढ़ नेता" की छवि को खो देंगे, उनकी जिस छवि को अब तक प्रचारित किया गया है। अगर वे दृढ़ रहते हैं तो फिर वे  निष्पक्ष नहीं रह पाएंगे। इसलिए, मोदी जी या तो दृढ़ रह सकते हैं या फिर निष्पक्ष। यह सरकार को तय करना है कि क्या देश को तबाही के रास्ते पर ले जाया जाएगा या फिर इसे भविष्य में होने वाली बड़ी त्रासदी से रोका जाएगा। इसलिए पासा फेंक दिया गया है।  

लेखक, गुरू नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं, और इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी, नई दिल्ली के अध्यक्ष हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Farmers’ Agitation: A Catch-22 Situation for Prime Minister Modi

farmers protest
Modi government
COVID-19
politics
Shaheen Bagh
Adani-Ambani
Strongmen leaders

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

उप्र चुनाव: उर्वरकों की कमी, एमएसपी पर 'खोखला' वादा घटा सकता है भाजपा का जनाधार

केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल


बाकी खबरें

  • इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    23 Jul 2021
    तीन सदस्यीय जांच आयोग का नेतृत्व नवी पिल्ले करेंगे जो 2008-2014 के बीच यूएनएचआरसी के प्रमुख थे।
  • 400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    पीपल्स डिस्पैच
    400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    23 Jul 2021
    400 से अधिक हस्तियों द्वारा हस्ताक्षरित एक खुला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान क्यूबा पर लगाए गए 243 एकतरफ़ा प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है जिसने इस द्वीप…
  • अध्ययन के मुताबिक भारत में कोरोनावायरस की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद की सबसे भयावह त्रासदी’, सरकार ने किया आंकड़े से इंकार
    दित्सा भट्टाचार्य
    अध्ययन के मुताबिक भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद सबसे बड़ी त्रासदी’, सरकार का आंकड़े से इंकार
    23 Jul 2021
    रिपोर्ट में कहा गया है, “वास्तविक मौतों का आंकड़ा कई लाखों में होने का अनुमान है, न कि कुछ लाख में, जो इसे यकीनन विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से भारत की सबसे भयावह मानवीय त्रासदी बना देता है।” 
  • अयोध्या में बीएसपी के कार्यक्रम का पोस्टर। बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा के ट्विटर हैंडल से साभार
    असद रिज़वी
    दलित+ब्राह्मण: क्या 2007 दोहरा पाएगी बीएसपी?
    23 Jul 2021
    पार्टी अपने 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग को दोहराने की कोशिश कर रही है, लेकिन ये इस बार इतना आसान नहीं होगा। एक विश्लेषण...
  • ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    दमयन्ती धर
    ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    23 Jul 2021
    वलसाड में उमरागाम तालुक के स्थानीय लोग प्रस्तावित बंदरगाह के निर्माण का विरोध 1997 से ही करते आ रहे हैं, जब पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License