NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कानून
कृषि
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन: इस ग़ुस्से और असंतोष को समझने की ज़रूरत है
मोदी सरकार को यह समझने की ज़रूरत है कि असंतोष और ग़ुस्सा बढ़ रहा है, और पूरे देश में लाखों किसानों के विरोध के रूप में यह ग़ुस्सा सामने आ रहा है।
सुबोध वर्मा
27 Jan 2021
Farmers protest

गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में होने वाली नाटकीय घटनाओं से तो ऐसा ही लगता है कि किसानों के प्रदर्शन से जो बड़ा संदेश लोगों के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार बीच जाना चाहिए था, उसे कम करके आंका जा रहा है। इसकी ख़ास वजह यह है कि 'गोदी' मीडिया ने लाल क़िले के कथित तौर पर 'नापाक' किये जाने और यह बताकर कि 'ट्रैक्टर परेड' के लिए पूर्व-सहमति वाले रास्ते से हज़ारों किसानों ने किनाराकशी की और आख़िरकार लगाये गये बैरिकेड को तोड़ते हुए महानगर के बीचोबीच चले गए, उनकी नाराज़गी को हवा दे दी है।

इसमें कोई शक नहीं कि जिस तरह किसानों के हज़ारों दूसरे साथियों ने तय किए गए तरीक़ों और रूट का अनुसरण किया था, किसानों के इस दस्ते को भी उसी तय रास्ते पर चलना चाहिए था। और बेशक, लाल क़िले में ज़बरदस्ती घुसने या झंडे फहराने की ज़रूरत नहीं थी।

लेकिन, अगर आप ज़रा पीछे मुड़कर देखें और इसके बारे में सोचें,तो सवाल पैदा होता है कि जो कथित "हिंसा" मीडिया और आधिकारिक मशीनरी के ख़िलाफ़ हुई, वह आख़िर थी क्या? यही कि उन्होंने पत्थर-कंक्रीट और धातु से बने बैरिकेड को तोड़ दिया? यही कि उन्होंने कंटेनरों को पलट दिया और डंपरों को हटा दिया? फिर तो यही कहा जा सकता है कि यह सब ज़रूरी नहीं था, और न ही इन हरक़तों पर सहमत हुआ जा सकता है,क्योंकि यह सब हिंसा थी। बाधाओं के तौर पर खड़ी की गयीं कुछ बसें भी क्षतिग्रस्त हो गयीं। झड़पों में पुलिस कर्मी घायल हो गये।

लेकिन, सवाल पैदा होता है कि क्या यह सब करने वाले प्रदर्शनकारी थे।

दरअस्ल, उनमें से एक की आईटीओ क्रॉसिंग पर मौत हो गयी, क्योंकि कथित तौर पर उसका ट्रैक्टर इसलिए पलट गया था कि उसने और कुछ दूसरे लोगों ने क्रॉसिंग से पुलिसकर्मियों को ख़ाली कराने के लिए अपने वाहनों को गोल-गोल घुमाया था।

संयुक्त किसान मोर्चा (दिल्ली विरोध प्रदर्शन में शामिल सभी किसान संगठनों की एक छतरी संस्था) ने इस हिंसा की आलोचना की है और उन समूहों से ख़ुद को अलग कर लिया है,जो मुख्य ‘ट्रैक्टर परेड’ से अलग थे। उन्होंने कहा कि किसानों के कुछ संगठन ऐसे थे, जो पूर्व-व्यवस्थित मार्ग से सहमत नहीं थे और सीधे शहर के बीचोबीच आना चाहते थे।

इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि मौजूदा हालात इसलिए पैदा हुए हैं, क्योंकि मोदी सरकार का उन कृषि क़ानूनों को लेकर सख़्त नज़रिया है,जो स्पष्ट रूप से खेती-किसानी की समस्या समझने इंकार करता है और यही इन क़ानूनों का अलोकप्रिय पहलू भी है। यह मोदी सरकार ही है,जिसने इन काले कानूनों को पहले अध्यादेशों के रूप में और फिर संसद में अपने प्रचंड बहुमत के दम पर बिना किसी चर्चा, बिना किसी प्रक्रिया को अपनाये हुए देश के गले में ज़बरदस्ती डाल दिया है।

मोदी सरकार ने उन ग़ुस्से और नाराज़गी को समझने से इनकार कर दिया है,जो किसान संगठनों के रूप में सामने आये हैं। इन संगठनों ने उन 11 दौर की वार्ताओं से गुज़रते हुए अपना सब्र दिखाया है,जिनमें से आधे का इस्तेमाल तो सरकार की तरफ़ से यह जताने के लिए किया गया है कि ये कानून कितने अच्छे हैं। सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी  के पास अपने प्रधानमंत्री को यह बताने का साहस नहीं है कि ज़मीन पर ज़बरदस्त ग़ुस्सा है। नौकरशाह तो और भी बुज़दिल हैं। लेकिन,दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री को लगता कि देश के लिए यही सबसे अच्छा इसलिए है, क्योंकि पश्चिमी देशों से जुड़े नवउदारवादी अर्थशास्त्रियों ने इसकी सिफ़ारिश की है।

लेकिन, मुख्यधारा के मीडिया की तरफ़ से इसे लेकर जिस तरह की अवधारणा बनाने की कोशिश की जा रही है, उसे पढ़ना और समझना ज़रूरी है।

विरोध की अभूतपूर्व लहर

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (सभी राज्यों के 500 से अधिक किसान संगठनों का एक मोर्चा) के आह्वान पर देश के सभी राज्यों में ट्रैक्टर परेड, धरना प्रदर्शन, धरने, आदि का आयोजन किया गया। ये कोई छोटे-मोटे आयोजन नहीं थे- केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के सभी ज़िलों में इस तरह के बड़े विरोध प्रदर्शन किये गये।

महाराष्ट्र के ज़िलों में इस तरह के ज़िलावार विरोध प्रदर्शन गणतंत्र दिवस के पहले ही हो चुके थे और 15,000 से ज़्यादा किसानों ने मुंबई तक मार्च किया था और 25 जनवरी को शहर के बीचोबीच एक रैली का आयोजन किया गया था। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में ट्रैक्टर परेड और अन्य विरोध प्रदर्शन हुए।

गणतंत्र दिवस के विरोध के सिलसिले में पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा के किसान पहले ही राजधानी की सीमाओं पर जुट गये थे। ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों सहित सभी राज्यों के छोटे-बड़े दस्तों के रूप में किसान यहां शामिल हुए थे। पश्चिम बंगाल में 72 घंटे का महापड़ाव का आयोजन पहले ही हो चुका था और बर्दवान, 24-परगना सहित दूसरे ज़िलों में ट्रैक्टर परेड आयोजित किये गये थे। राजधानी से दूर असम में भी विरोध प्रदर्शन हुए। गुजरात में भी छोटे-छोटे विरोध प्रदर्शन किये जा सके, हालांकि भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने नवंबर से ही किसानों के विरोध प्रदर्शन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करना शुरू कर दिया था।

ये सब क्या दिखाते हैं ? निस्संदेह, अगर ये विरोध प्रदर्शन इस तरह से जारी हैं, तो इससे तो यही लगता है कि इन तीनों कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ गुस्से की लहर अभूतपूर्व है। देश का कोई भी हिस्सा इस ग़ुस्से से अछूता नहीं है। चूंकि मुख्यधारा का मीडिया इस सब को नजरअंदाज करता है,और सरकार भी इसकी अनदेखी करती है, ऐसे में ये दोनों ही ग़ुस्से की इस गहराई को नहीं समझ सकते,जो देश में इन कानूनों के ख़िलाफ़ इस समय मौजूद है। इसलिए, कुछ लोग इस तरह की बचकानी अटकलें लगाते रहे हैं कि 26 जनवरी को दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम इस आंदोलन की हवा निकाल देंगे।

बढ़ती भागीदारी का स्तर

हर बीतते दिन के साथ किसानों का समर्थन इसलिए बढ़ रहा है,क्योंकि मोदी सरकार इन क़ानूनों को निरस्त नहीं करने की अपनी सख़्त रुख़ पर क़ायम है। यह कल राजधानी में स्पष्ट रूप से दिखा। किसानों और राजमार्गों पर क़तारों में खड़े उनके प्यारे ट्रैक्टरों की संख्या उम्मीद से कहीं ज़्यादा थी। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के नेतृत्व और पुलिस / गृह मंत्रालय,दोनों ही राजधानी के बीचोबीच दर्जनों किलोमीटर तक क़तारों में लगे ट्रैक्टरों के सैलाब से अचंभित थे। ये हालात इस तथ्य के बावजूद थे कि यूपी की भाजपा सरकार ने किसानों को अपने ट्रैक्टरों के लिए डीज़ल देने से मना कर दिया था,पंजीकरण संख्या की जांच की जा रही थी और बाद में उन्हें परेशान करने के लिए उनकी आवाजाही की रिकॉर्डिंग करके उनमें डर पैदा करने की हर चंद कोशिश की गयी थी। लेकिन, सही बात तो यह है कि हरियाणा और पंजाब के हर एक गांव, और पश्चिमी यूपी में लोग व्यापक तौर पर साज़-ओ-सामान सड़कों पर ले आये, अपने ट्रैक्टरों में भोजन और खाने की दूसरे चीज़ें पैक किये और बाहर निकल गये।

किसानों में ऊर्जा और उत्साह ग़ज़ब का था। इस बात को लेकर किसी तरह की हैरत नहीं थी कि ‘ट्रैक्टर परेड’ के लिए राजधानी के चारों ओर के जिन मार्गों को लेकर एसकेएम ने सहमति जतायी थी, वे रास्ते वास्तव में इस परेड में भाग लेने वालों की ज़बरदस्त तादाद के सामने कम पड़ गये।

इतनी बड़ी तादाद का अनुमान नहीं लगा पाना भी दरअस्ल सरकार की नाकामी ही थी। सरकार दूर-दूर तक किसी को भी दाखिल नहीं होने देने के सवाल से बहुत ज़्यादा रोमांचित थी। इसलिए, किसानों की किसी बेसब्र लहर के बढ़ने से बैरिकेड के टूटने का इंतज़ार किया जा रहा था। हक़ीक़त तो यही है कि पुलिस ने इस बात को बहुत हल्के से लिया था,यही वजह है कि दिल्ली के बहुत अंदर उन्होंने बैरिकेड लगाये थे। लेकिन,किसी को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि इस पैमाने पर लोगों की भागीदारी होगी।

दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही हुआ है। जैसा कि कई राज्यों से आने वाली न्यूज़क्लिक की रिपोर्ट दिखाती है कि किसानों की अभूतपूर्व संख्या ने विभिन्न राज्यों के विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया और कई अन्य जगहों पर अप्रत्याशित विरोध प्रदर्शन हुए।

इसकी एक और उल्लेखनीय ख़ासियत यह है कि किसानों को अन्य सभी वर्गों के लोगों का समर्थन मिल रहा है। सभी राज्यों और दिल्ली में भी छात्रों, महिलाओं, मध्यम वर्गीय कर्मचारियों, श्रमिकों और अन्य लोगों ने दर्जनों जगहों पर किसानों का स्वागत किया। दिल्ली में तो सिर्फ परेड देखने के लिए लोग बड़ी संख्या में बाहर निकल आये।

मोदी सरकार को इस संदेश को पढ़ने की ज़रूरत

26 जनवरी, 2021 को हुए इन विरोध प्रदर्शनों ने मोदी सरकार को एक मजबूत और स्पष्ट संदेश दे दिया है और वह संदेश यह है कि जब तक आप किसानों की आवाज नहीं सुनते, तबतक यह विरोध आगे बढ़ता ही रहेगा। इस आंदोलन को लेकर फ़ैलाया गया यह मिथक कि यह आंदोलन कुछ राज्यों के किसानों का है या फिर इसे निहित स्वार्थों का समर्थन हासिल है,आज यह मिथक भी चिंदी-चिंदी हो गया है।

मंगलवार का वह पल एक ऐसा पल था, जैसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया था और सरकार इसकी गहराई और व्यापकता को समझने में इसलिए नाकाम रही, क्योंकि वह मुक्त बाज़ार और कॉरपोरेट की अगुवाई वाली आर्थिक विकास की छोड़ी जा चुकी और बदनाम हो चुकी विचारधारा की वफ़ादार बनी हुई है। यह उनके लिए कानूनों को समझने और पूरी तरह निरस्त करने का वक़्त है, अन्यथा देश कभी भी व्यापक विरोध के हवाले हो जायेगा।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करे

 https://www.newsclick.in/republic-day-farmers-storm-capital-big-protests-across-country

farmers protest
farmers

Related Stories

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल


बाकी खबरें

  • kisan
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर हत्याकांड: देशभर में मनाया गया शहीद किसान दिवस, तिकोनिया में हुई ‘अंतिम अरदास’
    12 Oct 2021
    तिकोनिया में शहीद किसानों को याद में ‘अंतिम अरदास’ कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें किसान नेताओं के साथ विभिन्न राज्यों के किसान और भारी संख्या में अन्य आम लोग यहां पहुंचे।
  • covid
    भाषा
    विशेषज्ञ पैनल ने दो साल तक के बच्चों के लिए कोवैक्सीन के आपात इस्तेमाल को मंजूरी देने की सिफारिश की
    12 Oct 2021
    हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने दो से 18 साल तक के बच्चों एवं किशोरों में इस्तेमाल के लिए कोविड-19 रोधी टीके कोवैक्सीन के 2/3 चरण का परीक्षण पूरा कर लिया है।
  • Will Damodar River Again be Bengal’s ‘Sorrow
    रबींद्र नाथ सिन्हा
    क्या दामोदर नदी फिर से बंगाल का 'शोक' बनेगी?
    12 Oct 2021
    5 अक्टूबर को ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को ख़त लिखते हुए बाढ़ की स्थितियों में आपात हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने दामोदर घाटी निगम के अनियोजित और अनियंत्रित पानी छोड़ने की गतिविधि को दक्षिण बंगाल…
  • taliban
    न्यूज़क्लिक टीम
    तालिबान पर अमेरिकी दांव, EU-नेटो-चीन के बीच कूटनीति
    12 Oct 2021
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने तालिबान से अमेरिकी अधिकारियों की बातचीत के कूटनीतिक मायनों पर न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से बातचीत की। साथ ही जर्मनी में सत्ता…
  • Nobel in Economics
    अजय कुमार
    न्यूनतम मज़दूरी बढ़ने से रोजगार कम नहीं होता : जानिए इस साल के अर्थशास्त्र के नोबेल की कहानी
    12 Oct 2021
    न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने पर रोजगार बढ़ेगा या घटेगा? ऐसे सवालों का जवाब देना बहुत कठिन काम है। इस कठिन काम को जिन अर्थशास्त्रियों ने सुलझाया है। उन्हें ही इस बार का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License