NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तर भारत के जंगलों में लगने वाली आग मानव निर्मित आपदा है
पहाड़ी जंगलों से वनवासियों को दूर करने और मोनोकल्चर प्लांटेशन को बढ़ावा देने से आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं जो विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे ख़राब हस्तक्षेप के कारण हो रही हैं और इसलिए इन्हें मानव निर्मित घटनाएं कहना ही सही होगा।
टिकेंदर सिंह पंवार
07 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
उत्तर भारत

अभी अप्रैल का पहला सप्ताह ही है। और उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में जंगल में लगने वाली आग की घटनाओं ने वन भूमि के बड़े हिस्से को लगभग घेरना शुरू कर दिया है। पिछले 24 घंटों में उत्तराखंड के जंगलों में आग की पैंतीस घटनाओं ने राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में सुर्खियां पाई हैं। इसी तरह की खबरें हिमाचल प्रदेश से भी आ रही हैं।

इस हालत में, दोनों राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे स्थिति को बिगड़ने न दें और इससे निपटने के लिए युद्धस्तर पर निर्णय लें। हालांकि, प्रेस में हताशा, आवेग और नौकरशाही के हस्तक्षेप की खबरें बराबर आ रही हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री आग को बुझाने या नियंत्रण में लाने के लिए हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं; जबकि इसके लिए लोगों का साथ लेना चाहिए, जितना जल्दी यह बात समझ में आएगी उतना बेहतर होगा। 

पहाड़ी जंगलों में आग की घटनाएँ कोई नई बात नहीं है, जिसकी मुख्य वजह करीब करीब सभी  सरकारों की मोनोकल्चर रोपण की नीतियां रही है। इसकी एक वजह ये भी है कि विश्व बैंक जंगलों में हरियाली को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने का धन मुहैया कराता है, और इसके लिए पर्वतों में मोनोकल्चर रोपण किया जाता है जोकि ऐसी पौधे या पेड़ लगाए जाते हैं जो हमारे जंगलात के लिए विदेशी है या ठीक नहीं हैं- खैर इस मुद्दे पर हम बाद में लौटेंगे। लेकिन अभी जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह कि आग की शुरुआत काफी जल्दी हो गई है क्योंकि अभी तो गर्मियों का लंबा समय पड़ा है जोकि कम से कम 60 दिनों का विनाशकारी समय हो सकता है।

जंगलों में आग के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से जलवायु परिवर्तन का होना है और उसका पूरे भौगोलिक क्षेत्र पर इसके परिणाम का पड़ना हैं। जिसमें मुख्यत कम बर्फ का गिरना, अपेक्षाकृत सुखी सर्दी का पड़ना, यहाँ तक कि मध्य हिमालय के एरिया यानि 3,000 फीट से लगभग 7,000 फीट तक की ऊँचाई वाले इलाके में कम वर्षा का होना आदि अन्य बड़े कारण हैं। लेकिन यह अभिव्यक्ति की एक उत्कृष्ट शैली है, जिसमें बहाने और जिम्मेदारी न निभाने का बोलबाला है – इसका एक कारण सरकारी एजेंसियों, वन विभाग और आम लोगों, वन अधिकार कार्यकर्ताओं/वनवासियों के बीच जीवंत संपर्क का न होना भी है। 

जंगलात में आग की घटनाएं मानव निर्मित घटनाएं है जो घटनाएँ विभिन्न स्तरों पर खराब हस्तक्षेप के कारण हो सकती हैं, आइए हम इन पर चर्चा करते हैं। उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आपदा के जोखिम को कम करने लिए उपाय करने की जरूरत है और नए हालत को समझने की जरूरत भी है।

विश्व बैंक के तत्वावधान में हिमाचल प्रदेश में वृक्षारोपण की नीति में एक बड़ा बदलाव लाया गया था, जिसके तहत राज्य में हरित कवर/आवरण या हरियाली को बढ़ाने पर जोर दिया गया था। ऐसे पेड़ों की प्रजातियां लगाना जो जल्दी से बढ़ती हैं, लगाई गई। चिर-चीड़/देवदार उन प्रजातियों में से एक है जो वृक्षारोपण के मामले में उठाए गए युद्धस्तर के कदम है क्योंकि सूखे इलाकों में भी यह तेजी से बढ़ता है। पाइन यानि चीड़ हिमालय की कोई प्राकृतिक प्रजाति नहीं है, अंग्रेजों इसे अपने साथ लाए थे ताकि वे अपनी टीबी (तपेदिक) के इलाज़ के लिए सैनिटोरियम में ताजी हवा का इंतजाम कर सकें।  

उत्तराखंड (तब यूपी) और हिमाचल दोनों की पर्वतीय सरकारों ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाया था और उन्हें मिश्रित वनों और घास के मैदानों में भी लगाया गया था। संजीव पांडे, जाने-माने वन-विशेषज्ञ और हिमाचल कैडर के पूर्व आईएफएस (भारतीय वन सेवा) अधिकारी इसे "चीड़-उपनिवेश" का दर्जा देते हैं।

चीड़ के वृक्षारोपण ने देशी जंगलों को अपना उपनिवेश बना लिया और कुछ वर्षों के बाद इससे कहर बरपा हो गया। क्यों? क्योंकि चीड़/देवदार के पेड़ एक किस्म की सुइयां गिराते हैं जो कि बहुत ही भयावह होती और ये आग को तेजी से पकड़ती हैं। दूसरी बात, चीड़ के पेड़ के नीचे कोई भी हरी वनस्पति नहीं उपज सकती है, एकमात्र अपवाद लैंटाना केमरा है, जो एक अन्य विदेशी प्रजाति है और वे पहाड़ के जंगलों के रास्तों में भरी पड़ी हैं जो कि जंगल की आग बढ़ाने का कारण भी बनती है। तीसरा, चीड़ के पेड़ की जड़ें गहरी होती हैं और ये चट्टानों से भी पानी चूसते हैं और इस तरह आस-पास के इलाके को शुष्क या सूखा बना देते हैं। चीड़/देवदार के जंगल के नीचे कोई जल निकाय/तालाब या झरना ज़िंदा नहीं रह सकता है।

ऐसे कई उदाहरण हैं जिनके बारे में संजीव पांडे बताते हैं, कि कुल्लू जिले के कुछ गांव जंगलों की संरचना से जुड़े हुए थे। इनमें से अधिकांश वन ओक या शाहबलूत के पेड़ की विभिन्न क़िस्मों से जुड़े थे, जो पहाड़ों के लिए पेड़ों की सबसे उपयुक्त प्रजाति है। हालांकि, ईंधन और चारकोल बनाने के लिए ओक को जंगलों से निर्दयता से काटा गया, जिसके बाद इन अधिकांश गांवों में चीड़/देवदार के पेड़ों का कब्जा हो गया था। ओक के पेड़ बेहतरीन कौयगुलांट पदार्थ निकालते है जो जंगलों में पानी की कमी को पूरा करते हैं और इस क्षेत्र में बड़े ओक के जंगलों की भरमार है’, खासकर शिमला शहर के आसपास - तारादेवी और शोघी जैसी जगहों में कुछ बेहतरीन जल निकाय या झरने हैं।

अब वक़्त आ गया है कि दोनों सरकारें अपनी वृक्षारोपण की रणनीतियों पर फिर से विचार करें  और जंगलों में चीड़/देवदार के पेड़ों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाए। 

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण जंगलों से पहाड़ी लोगों का भारी अलगाव है। दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय से पंजीकृत जंगलों में वनवासियों का अधिकार होता था। अंग्रेजों ने 1865 में भारतीय जंगलों पर अपना एकाधिकार जमाते हुए उन्हे नियंत्रण में कर लिया और उसी वर्ष वन अधिकार कानून पेश कर दिया था। 

बावजूद इस कानून के पारित होने के, पारंपरिक वन समुदायों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए वज़ी वूल उर्ज नामक प्रावधान किया गया था। वन समुदायों के अधिकार सीमित थे लेकिन उनके सभी अधिकार पंजीकृत थे। इन अधिकारों में घरों के निर्माण, पशुओं को चराने और चारा इकट्ठा करने का अधिकार शामिल था। वन “गाँव के जनसाधारण” के जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन आज विभिन्न सरकारों ने बड़े पूँजीपतियों, देशी और विदेशी को खुश करने के लिए इन अधिकारों का भी हनन करने की कोशिश की है, जो कि जंगलों को अपने लाभ को बढ़ाने के मामले में उन्हें सहमत करने के एकमात्र संसाधन के रूप में मानते हैं।

जनसाधारण का मतलब भूमि, जल और जंगलों पर लोगों का अधिकारो से है। विभिन्न सरकारों द्वारा निजी कॉर्पोरेट हितों को साधने के लिए इन अधिकारों का अतिक्रमण किया है। हिमाचल सरकार इस तरह की दखल में काफी आगे निकल है। इसने ग्राम पंचायतों के माध्यम से ग्राम समुदाय द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र देने के प्रावधानों में कुछ संशोधन वापस ले लिए है। ऐसा पनबिजली, सीमेंट से संबंधित कंपनियों को खुश करने के लिए किया गया था। संजीव पांडे कहते हैं कि जंगलों को एक पूरे के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में माना जाना चाहिए और इसलिए न केवल विकास की लप्पेबाजी लोगों को जंगलों से दूर कर देगी, बल्कि सरकार की रणनीति वनों को पूरी तरह से बर्बाद कर देगी। 

इतना ही नहीं जिन लोगों को कभी जंगलों के रक्षक के रूप में माना जाता था उन्हें अब अतिक्रमणकारी माना जाता है। इन पर्वतीय राज्यों में वन अधिकार अधिनियम 2005 का एक भी मामला अभी तक नहीं सुलझा है। दूसरी ओर, सरकार कहती है कि सभी किस्म के जंगलों के अधिकारों के मामलों को बहुत पहले ही सुलझा लिया गया है, जबकि हक़ीक़त ये है कि 1980 के दशक में लोगों को दिए गए कुछ भूमि के पट्टों को अभी भी मान्यता नहीं मिली है और भूमि अधिकारों का अभी भी पालन नहीं किया जाता है। ऐसे वातावरण में लोग जंगलों से अलग-थलग होने पर मजबूर हो जाते हैं जो उनके आवास भी जो बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा थे।

तीसरा कारण शासन में बड़ी गिरावट का है जिसके तहत राज्यों में राजकोषीय घाटे के मानकों को पूरा करने के लिए मानव संसाधनों को सीमित किया जा रहा है। पहले वन विभाग ग्रामीणों के बीच से ही "वन रक्षकों" को नियुक्त करता था। लेकिन अब कई वर्षों से यह योजना बंद पड़ी है और वन विभाग में कार्यरत कुछ लोग अधिकारियों के क्वार्टर में घरेलू मदद के रूप में काम करते हैं।

जंगलों के प्राकृतिक रक्षक उसमें रहने वाले लोग हैं और ये वे लोग हैं जिन्हें वन प्रबंधन की बड़ी रणनीति में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बजाय, सरकारें मुनाफे, खनिज, जल, वन संपदा आदि को निकालने के लिए जंगलों को निजी पूंजी को सौंप रही हैं और इन सबका उपयोग वनवासियों को जंगलों से दूर करने के लिए किया जा रहा है। यह एक स्थायी मॉडल नहीं है, बल्कि यह जंगलों और लोगों के लिए खतरनाक साबित होगा।

न केवल जंगलों का प्रबंधन करने में बल्कि जंगल की आग को नियंत्रित करने के मामले में  किस किस्म के पौधे लगाने हैं उसकी रणनीति भी बड़ी भूमिका निभाएगी।

जंगलों में आग की रोकथाम जनसाधारण करेगा न कि हेलीकॉप्टर। अब वक़्त आ गया है जब हमें इस बात का एहसास हो जाना चाहिए।

(लेखक शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

Forest Fires in India
Forest Fire in Uttarakhand
Monoculture Plantation in Mountains
Forest Rights Act
Forest Dwellers Rights
UTTARAKHAND
Himachal Pradesh
Uttarakhand government

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

उत्तराखंड के ग्राम विकास पर भ्रष्टाचार, सरकारी उदासीनता के बादल

तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 

उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 

रुड़की : डाडा जलालपुर गाँव में धर्म संसद से पहले महंत दिनेशानंद गिरफ़्तार, धारा 144 लागू

कहिए कि ‘धर्म संसद’ में कोई अप्रिय बयान नहीं दिया जाएगा : न्यायालय ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव से कहा

इको-एन्ज़ाइटी: व्यासी बांध की झील में डूबे लोहारी गांव के लोगों की निराशा और तनाव कौन दूर करेगा

उत्तराखंड : चार धाम में रह रहे 'बाहरी' लोगों का होगा ‘वेरीफिकेशन’

हिमाचल प्रदेश के ऊना में 'धर्म संसद', यति नरसिंहानंद सहित हरिद्वार धर्म संसद के मुख्य आरोपी शामिल 

रुड़की : हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा, पुलिस ने मुस्लिम बहुल गांव में खड़े किए बुलडोज़र


बाकी खबरें

  • BJP Manifesto
    रवि शंकर दुबे
    भाजपा ने जारी किया ‘संकल्प पत्र’: पुराने वादे भुलाकर नए वादों की लिस्ट पकड़ाई
    08 Feb 2022
    पहले दौर के मतदान से दो दिन पहले भाजपा ने यूपी में अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया है। साल 2017 में जारी अपने घोषणा पत्र में किए हुए ज्यादातर वादों को पार्टी धरातल पर नहीं उतार सकी, जिनमें कुछ वादे तो…
  • postal ballot
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: बिगड़ते राजनीतिक मौसम को भाजपा पोस्टल बैलट से संभालने के जुगाड़ में
    08 Feb 2022
    इस चुनाव में पोस्टल बैलट में बड़े पैमाने के हेर फेर को लेकर लोग आशंकित हैं। बताते हैं नजदीकी लड़ाई वाली बिहार की कई सीटों पर पोस्टल बैलट के बहाने फैसला बदल दिया गया था और अंततः NDA सरकार बनने में उसकी…
  • bonda tribe
    श्याम सुंदर
    स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व
    08 Feb 2022
    पहाड़ी बोंडाओं की संस्कृति, भाषा और पहचान को बचाने की चिंता में डूबे लोगों को इतिहास और अनुभव से सीखने की ज़रूरत है। भाषा वही बचती है जिसे बोलने वाले लोग बचते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि अगर पहाड़ी…
  • Russia China
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस के लिए गेम चेंजर है चीन का समर्थन 
    08 Feb 2022
    वास्तव में मॉस्को के लिए जो सबसे ज्यादा मायने रखता है, वह यह कि पेइचिंग उसके विरुद्ध लगने वाले पश्चिम के कठोर प्रतिबंधों के दुष्प्रभावों को कई तरीकों से कम कर सकता है। 
  • Bihar Medicine
    एम.ओबैद
    बिहार की लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाः मुंगेर सदर अस्पताल से 50 लाख की दवाईयां सड़ी-गली हालत में मिली
    08 Feb 2022
    मुंगेर के सदर अस्पताल में एक्सपायर दवाईयों को लेकर घोर लापरवाही सामने आई है, जहां अस्पताल परिसर के बगल में स्थित स्टोर रूम में करीब 50 लाख रूपये से अधिक की कीमत की दवा फेंकी हुई पाई गई है, जो सड़ी-…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License