NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
भारत
गोरख पाण्डेय : रौशनी के औजारों के जीवंत शिल्पी
ऐसा अक्सर नहीं होता है कि किसी कवि की रचनाएँ जेएनयू कैंपस जैसे उच्च शिक्षा संस्थान से लेकर सुदूर गांवों के टोले-चौपालों में एक ही मन मिज़ाज़ से सुनी और सुनाई जाती हों।
अनिल अंशुमन
02 Feb 2019
गोरख पाण्डेय

(विशेष स्मृति संदर्भ  :  बौद्धिक कसरत और छद्म प्रगतिशीलता से परे आमजन के जीवन–संघर्ष के सहगामी रचनाकार गोरख पाण्डेय की बीती 29 जनवरी को 30वीं पुण्यतिथि थी।)

ऐसा अक्सर नहीं होता है कि किसी कवि की रचनाएँ जेएनयू कैंपस जैसे उच्च शिक्षा संस्थान से लेकर सुदूर गांवों के टोले-चौपालों में एक ही मन मिज़ाज़ से सुनी और सुनाई जाती हों। ऐसी व्यापक जन प्रसिद्धि विशेषकर हिन्दी पट्टी में पूर्व के समयों में कबीर सरीखे संत कवियों और भारतेन्दु हरिश्चंद्र को ही मिल सकी थी। जो आगे चलकर मुंशी प्रेमचंद व बाबा नागार्जुन इत्यादि विशिष्ट जन रचनाकारों को ही हासिल हुई। वर्तमान हिन्दी साहित्य रचना जगत में गोरख पाण्डेय ही एकमात्र ऐसे रचनाकार हुए हैं जिनको ये जनप्रसिद्धि मिल सकी है। जिन्हें जड़ियाए शिष्ट-विशिष्ट साहित्यिक व बौद्धिक कुनबे ने भले ही कोई विशेष स्थान नहीं दिया हो लेकिन हक़-हक़ूक के लिए लड़ने वाले मेहनतकश अवाम ने अपने साहित्यकार की सर्वमान्य स्वीकृत दी। वहीं इंसानी ज़िंदगी व समाजी बेहतरी के लिए लड़ने वालों ने तो इनकी कविताओं को अपना परचम ही बना लिया। इसी की मिसाल है पिछले दिनों के चर्चित निर्र्भया इंसाफ के आंदोलन के साथ महिलाओं की बेखौफ़ आज़ादी के अभियानों और जेएनयू और डीयू इत्यादी के छात्र–युवा आंदोलनों में उनकी कविताओं को अपना नारा बना लेना। यह महज किसी कवि की कविता की सफलता या लोकप्रियता मात्र से भी अधिक, एक रचनाकार के मानवीय व व्यापक जन सरोकारों से बेहद संवेदनशील जुड़ाव का परिचायक होना है। यही वजह है- “हमारी स्थिति सिर्फ ऊपर से फैले अंधकार के बीच नहीं है, हम नीचे से उत्पीड़ित लोगों की फूटती हुई रौशनी के बीच में भी जी रहे हैं और कविता सिर्फ अंधकार के बारे में नहीं, अंधकार को रौशनी के औज़ारों के बारे में भी लिखी जा रही है और लिखी जाएगी...” का आत्मविश्वास भरा दावा गोरख पाण्डेय जैसे जनता से जुड़े रचनाकार ही कर सकते हैं।

गोरख पाण्डेय के रचनाकर्म की शुरुआत देश में चर्चित रहे ‘वसंत के वज्रनाद’ (नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह) और उसपर होनेवाले भारी राज्य दमन के दौरान हुई। जिसने उस दौर के कई नामचीन बौद्धिक–साहित्यिक हस्तियों को गहरे रूप से प्रभावित किया। गोरख पाण्डेय को इस क्रांतिकारी वाम धारा में नए सामाजिक बदलाव के आधार सूत्र दिखे और जीवन पर्यंत उन्होंने इससे जुड़कर नेपथ्य में चली गयी साहित्य सृजन और वैचारिकी की प्रगतिशील परंपरा को एक नयी धार दी। सत्ता–संस्कृति व उसके संगठनों से कभी भी सम्झौता नहीं करते हुए समाज की वास्तविक चालक शक्ति मजदूर–किसान को उनके पूरे जीवन संघर्ष के साथ साहित्य सृजन के केंद्र में पुनरास्थापित किए। जमीनी स्तर पर चल रही इन सामाजिक सक्रियताओं को मुखर स्वर देने वाले तीसरी धारा के नए सांस्कृतिक आंदोलन हेतु जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव बने। ‘कला सिर्फ कला के लिए नहीं बल्कि जीवन और बदलाव के लिए हो’, की अपील से अनेकानेक लेखक–कलाकारों और समकालीन साहित्य को आम जन व उनके संघर्षों के साथ खड़ा किया।

गोरख पाण्डेय की कवितायें बौद्धिक कसरत और छद्म प्रगतिशीलता के खिलाफ परिवर्तनकामी जनमानस की साफ और तल्ख अभिव्यक्ति हैं। जिनमें कविता को फ़क़त नाज़ुक संवेदनाओं की मिज़ाजपुर्सी का जरिया मात्र बनाने की बजाय उसे आमजन के रोज़मर्रा के जीवनसंघर्ष का सहगामी बनाया गया। जिनमें ‘बेहतर दिन’ के आकांक्षी मानवीय सपने, यथार्थ से पलायन की बजाय उसका विस्तार बनकर व्यापक प्रतिरोध का मैदान बन जाते हैं। संस्कृति के “समझदारों” के कड़वे यथार्थ की जटिलताओं से कतराकर व बचकर निकल जाने की स्थापित धारा के समानान्तर ज़मीनी जन सांस्कृतिक धारा का सूत्रपात किया। जन संघर्षों से गहरे संवेदनात्मक लगाव को विविध लोकरूपों व लोकभाषा के माध्यम से दार्शनिक, वैज्ञानिक और भावनात्मक धरातल पर आला दर्जे का लोकप्रिय जन साहित्य रचा। प्रगतिशील विद्वानों के अनुसार गोरख जी ने समकालीन आधुनिक हिन्दी कविता में, जिस गौरवशाली परंपरा का सूत्रपात महाप्राण निराला ने ‘नए पत्ते’ व ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी कवितायें लिखकर किया और जिसे नागार्जुन, केदार व त्रिलोचन सरीखे श्रेष्ठ जनरचनाकारों ने आगे बढ़ाया– गोरख पाण्डेय उसकी नयी पीढ़ी के सबसे सशक्त हस्ताक्षर बनकर सामने आए। हालांकि उनके समय के जिन ‘समझदारों’ ने सदा रुकावटें डालकर कभी भी उन्हें सम्मानजनक स्थान नहीं दिया, उनके दुर्र्भाग्य पूर्ण निधन पर सबसे अधिक टेसुवे बहाते देखे गए।

गोरख पाण्डेय की रचनाएँ आज भी अंधकार को तोड़नेवाली रौशनी के औजारों के बारे में समकालीन बनी हुईं हैं। विडम्बना है कि जिस प्रगतिशील सांस्कृतिक-साहित्य परंपरा और जन प्रतिरोध की संस्कृति को आगे बढ़ाने में आज कलबुर्गी– दाभोलकर–पनसारे व गौरी लंकेश जैसे जनप्रतिबद्ध बुद्धिजीवि शहीद हो गए। हिन्दी पट्टी में आज उनपर केन्द्रित ‘विशेषांक’ निकालने और बंद कमरों के प्रतिरोध–विमर्श की ‘समझदारी’ ही अधिक हो रही है। बाहर सड़कों और खुले मैदानों में संघर्षरत जनता के बीच जाकर उनका सहभागी बनने वाले सक्रिय सांस्कृतिक – बौद्धिक जन ‘ढूँढने’ पड़ जाएँगे। ऐसे में जबकी जन के साथ और जन की भाषा में उनकी संवेदना व प्रतिरोध को व्यापक मुखर स्वर देनेवाली संगठित सांस्कृतिक धारा का आकार लेना अभी भी बाकी है  ....  नए दौर के जन आंदोलनों ने गोरख जी की कविताओं को अपना कंठहार बना रखा है।  

culture
literature
hindi literature
poem
hindi poet
hindi poetry
gorakh pandey
हिन्दी साहित्य
साहित्य-संस्कृति
जनकवि गोरख पाण्डेय

Related Stories

समीक्षा: तीन किताबों पर संक्षेप में

सोचिए, सब कुछ एक जैसा ही क्यों हो!

रेलवे स्टेशन पर एजेंडा सेटिंग के लिए संस्कृत का इस्तेमाल?

इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में 9 से 11 जनवरी तक अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन

आख़िर भारतीय संस्कृति क्या है?

वीडियो : अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले के ख़िलाफ़ कलाकार हुए एकजुट

चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए...

विशेष : पाब्लो नेरुदा को फिर से पढ़ते हुए

नामवर सिंह : एक युग का अवसान

"खाऊंगा, और खूब खाऊंगा" और डकार भी नहीं लूंगा !


बाकी खबरें

  • निखिल करिअप्पा
    कर्नाटक: वंचित समुदाय के लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों, सूदखोरी और बच्चों के अनिश्चित भविष्य पर अपने बयान दर्ज कराये
    24 Mar 2022
    झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे कई बच्चों ने महामारी की वजह से अपने दो साल गँवा दिए हैं और वे आज भी स्कूल में पढ़ पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। 
  • आज का कार्टून
    कश्मीर फाइल्स की कमाई कश्मीरी पंडितों को देने के सवाल को टाल गए विवेक अग्निहोत्री
    24 Mar 2022
    सच के इर्द गिर्द झूठ की कहानी बुनकर लोगों के बीच फ़ैलाने की कवायद किसी न किसी तरह फायदा हासिल करने से जुडी कवायद होती है। कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म कश्मीर फाइल्स भी यही है।
  • सरोजिनी बिष्ट
    बसपा की करारी हार पर क्या सोचता है दलित समाज?
    24 Mar 2022
    इस चुनाव में दलित वोटरों ने किस सोच के तहत अपना मत दिया? बसपा के विषय में आज उसके विचार किस ओर करवट ले रहे हैं? क्या उन्हें यह लगता है अब बसपा का चरित्र वो नहीं रहा जो तीन दशक पुराना था?
  • भाषा
    दिल्ली दंगे: जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को जमानत देने से अदालत का इनकार
    24 Mar 2022
    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने 3 मार्च को खालिद और अभियोजन पक्ष के वकील की दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान खालिद ने अदालत से कहा था कि अभियोजन पक्ष के पास उसके…
  • अजय कुमार
    सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUCET) सतही नज़र से जितना प्रभावी गहरी नज़र से उतना ही अप्रभावी
    24 Mar 2022
    भारत के शिक्षा क्षेत्र की बड़ी परेशानी यह है कि उच्च शिक्षा की पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या ज़्यादा है और उच्च शिक्षा के नाम पर बढ़िया संस्थान कम हैं। किसी तरह की छंटनी की प्रक्रिया बनाने से ज़्यादा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License