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भारत
राजनीति
गरीबों की एक और जीवन रेखा 'मनरेगा' की स्थिति बदतर
विश्व बैंक ने भले ही इस योजना को विश्व की सबसे बड़ी सरकारी योजना की संज्ञा दी थी लेकिन बजट आवंटन पर अवैध प्रतिबंध के साथ व्यवस्थित तरीके से इसका गला घोंटा जा रहा है।
समर्थ ग्रोवर
08 Jan 2019
MGNREGA

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) देश में बढ़ती बेरोजगारी  को कम करने और ग्रामीण संकट को कम करने के लिए एक आजमाया हुआ नुस्खा है। प्रत्येक ग्रामीण परिवार के कम से कम एक सदस्य को एक वर्ष में 100 दिन काम की गारंटी देने वाला ग्रामीण रोजागर कार्यक्रम 2 फरवरी 2006 को प्रभावी हुआ। हालांकि इस योजना का गला घोंटा जा रहा है जो देश के लिए ख़तरे की घंटी है।

साल पूरा होने में और तीन महीने बचे हुए हैं। प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) के अनुसार इस साल इस योजना पर खर्च की जाने वाली राशि को 99 प्रतिशत आवंटन पहले ही समाप्त हो चुका है और कोई अतिरिक्त राशि स्वीकृत नहीं हुई है।

एक तरफ जहां मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार रोज़गार सृजन करने और रोज़गार देने में विफल रही है। वहीं दूसरी तरफ देश की एकमात्र रोज़गार गारंटी योजना समस्याओं से जूझ रही है और इसके बजट आवंटन पर ग़ैरक़ानूनी प्रतिबंधों के साथ व्यवस्थित रूप से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। उधर भुगतान करने में देरी हो रही है और मज़दूरी भी कम है।

मांग-आधारित कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया ये कार्यक्रम अब संसाधन-आधारित कार्यक्रम में बदल दिया गया है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस से इस योजना के भविष्य के अस्तित्व को लेकर कहा, "मेरी राजनीतिक सूझबूझ मुझे कहती है कि मनरेगा को बंद नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह आपकी विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है।"

मनरेगा पर बजट की अधिकतम सीमा

प्रधानमंत्री के ऐसे बयानों से इस योजना का कमजोर पड़ना आश्चर्य की बात नहीं है। विश्व बैंक ने पहले इस योजना की प्रशंसा की थी और इसे दुनिया के सबसे बड़े सरकारी कार्यक्रम के रूप में स्थान दिया था। इस योजना के सफल होने के लिए आगे कहा था कि इस योजना के सफल होने के लिए भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.7 प्रतिशत आबंटित  करने की आवश्यकता होगी। हालांकि मौजूदा आबंटन वर्ष 2017-18 में सकल घरेलू उत्पाद का 0.26 प्रतिशत ही है जो कि वर्ष 2010-11 के 0.58 प्रतिशत से काफी कम है।

3 जनवरी 2019 को कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार विधानसभाओं के सदस्य और सांसद, प्रमुख अर्थशास्त्री और कार्यकर्ता, पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लायमेंट गारंटी के सदस्य, नरेगा संघर्ष मोर्चा, समृद्ध भारत फाउंडेशन और किसान आंदोलनों के नेताओं ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। उन्होंने मनरेगा के लिए अधिक धन की मांग की और सरकार से मनरेगा के लिए उसके राजनीतिक वादे को पूरा करने की मांग की।

द बिजनेस लाइन को दिए एक साक्षात्कार में पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने मनरेगा योजना के कार्यान्वयन में आने वाली कई समस्याओं पर प्रकाश डाला है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार भौतिक घटक (मैटेरियल कंपोनेंट) पर अधिक और श्रम पर कम खर्च कर रही है। किसानों की मदद के लिए तालाब, सिंचाई सुविधाओं और वर्षा जल संरक्षण मॉडल जैसे किसान-अनुकूल बुनियादी ढाँचे के निर्माण का विचार था।

अर्थशास्त्री जयति घोष ने मनरेगा के महत्वपूर्ण प्रभावों को इस प्रकार बताया:

1. मनरेगा के तहत सक्रियता ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद की।

2. गुणक प्रभाव शहरों (1.5-2 इकाइयां) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक (4-5 इकाइयां) पाया जाता है।

3. कई राज्यों में इस योजना के तहत लगभग 70 प्रतिशत रोज़गार महिलाओं को मिला जिससे लिंग के आधार पर वेतन के अंतर में कमी आई और महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाया।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रचनात्मक रूप से प्रभावित करने वाले कुछ साधनों में से एक अब फंड की कमी से जूझ रहा है जो ग्रामीण श्रमिकों की आजीविका की विफलता के लिए अग्रणी है।

सरकार का यह दावा कि 90 प्रतिशत से अधिक मज़दूरी 15 दिनों के भीतर भुगतान किए गए हैं। इन दावों के विपरीत एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि 2016 में केवल 21 प्रतिशत भुगतान और 2017 की पहली छमाही में 32 प्रतिशत भुगतान 15 दिनों के भीतर किए गए।

संसद में स्वीकृत बजट केवल एक अनुमान है लेकिन फंड पर अधिकतम सीमा सुनिश्चित करना इस अधिनियम का उल्लंघन है और काम की मांग करने वालों के लिए अनुचित है।

पिछले पांच वर्षों में प्रत्येक वर्ष के लिए उपलब्ध कुल धन का 20 प्रतिशत पिछले वर्षों की लंबित देनदारियों को चुकाने के लिए इस्तेमाल किया गया है और ये कार्यक्रम चलाने के लिए अपर्याप्त राशि बची है। इसके अलावा मनरेगा अधिसूचित मज़दूरी दर को वैधानिक राज्य न्यूनतम मज़दूरी से अवैध रूप से हटा दिया गया है।

हर साल मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए धन का आवंटन समायोजित किया जाता है। विचार करने की बात ये है कि 2017-18 में मुद्रास्फीति-समायोजित आवंटन 2010-11 की तुलना में कम है।

10 राज्यों में 3,500 ग्राम पंचायतों के सैम्पल के साथ चल रहे अध्ययन के अनुसार प्रदान किया गया रोज़गार मांग के मुकाबले 32 प्रतिशत कम है। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को 76, 131 करोड़ रूपए की आवश्यकता है जो वर्तमान आवंटन से 30 प्रतिशत अधिक है।

क्रियान्वयन के प्रदर्शन को दिखाने के लिए जिम्मेदार एमआईएस इस कार्यक्रम का नियंत्रक बन गया है। एक प्रावधान था जिसके तहत अगर किसी ने काम के लिए आवेदन किया तो उस मांग को पंजीकृत करना होगा। उस प्रावधान के साथ छेड़छाड़ की गई है जिसके चलते एमआईएस रिपोर्ट में दिखाए गए आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

यदि काम की मांग की गई है पर उपलब्ध नहीं है तो सरकार बेरोज़गारी मज़दूरी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है जिसका पालन देश में कहीं भी नहीं किया गया है।

भूख से हुई मौत पर सरकार खामोश रही

पिछले चार वर्षों में 74 लोगों की मौत भूख से हो गई जिसमें वर्ष 2017 और 2018 में 81 प्रतिशत (60) से अधिक लोगों की मौत हुई। लंबे समय तक भोजन या पैसे न होने के चलते लोगों की मौत हुई। पीड़ित परिवार की स्थिति और ज्यादा तब बदतर हो गई जब उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत अनाज देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। इसके अलावा कई पीड़ित और उनके परिवार के सदस्यों ने अपने गांवों में मज़दूरी का काम किया या काम की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए। हालांकि, उनमें से अधिकांश को मनरेगा के तहत काम देने से मना कर दिया गया था। स्वतंत्र जांच से खुलासा हुआ कि इन योजनाओं को कुछ गांवों में महीनों तक लागू नहीं किया गया था।

झारखंड ग्रामीण विकास विभाग को निर्देश दिया गया था कि वह भूख से हुई मौत के पीड़ितों को मनरेगा के काम से वंचित करने के मुद्दे की जांच करे। हालांकि 26 दिसंबर 2018 को भेजी गई रिपोर्ट से पता चलता है कि वह किसी भी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही है। इस रिपोर्ट में 18 मौत को शामिल किया गया है और प्रत्येक मामले में यह एक ही वाक्य के साथ समाप्त होता है कि "ये मौत नरेगा से संबंधित नहीं है"।

यह शर्म की बात है कि जॉब कार्ड होने के बावजूद सभी 74 पीड़ितों को काम के अभाव में मरने के लिए मजबूर कर दिया गया जिनके वे क़ानूनी तौर पर हक़दार थें।

मनरेगा गरीबों की जीवनरेखा है। प्रत्येक तीन ग्रामीण परिवारों में से एक परिवार इसमें काम करते हैं। वर्ष 2017-18 में लगभग 8 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत काम किया। भले ही प्रत्येक परिवार ने औसतन 46 दिन काम किया फिर भी इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा।

नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004-05 से मनरेगा से जुड़कर कम से कम 25 प्रतिशत गरीबी में कमी आई है। प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में शामिल मांगों में से एक मांग यह थी,

 "सभी सूखा अधिसूचित ज़िलों में मनरेगा के क़ानूनी अधिकारों को बढ़ाकर 200 दिन कर दिया जाए।" महाराष्ट्र सरकार द्वारा 3 जनवरी को अन्य 931 गांवों को सूखाग्रस्त घोषित करने बाद ये मांग किया गया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा, "मनरेगा के समर्थन में न केवल वामपंथी एकजुट हैं बल्कि हम आगामी जनरल स्ट्राइक में इस योजना को नए सिरे से तैयार करने की मांगों को प्राथमिकता देंगे।"

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