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गुड़गांव की बस में डरे, सहमे, दुबके, सिसकते बच्चों की शक्ल में दस्तक देता ; गणतंत्र दिवस 2018
"न हमसफर न किसी हमनशीं से निकलेगा/हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा ।"
बादल सरोज
25 Jan 2018
republic day

68 सालों में अनेक उथल पुथल और झंझावातों से गुजरने के तजुर्बों के बावजूद 2018 के गणतंत्र दिवस पर जो नजर आ रहा है वह एक ठिठुरा गणतंत्र और सहमा संविधान है ।  जिस शहर में बैठकर ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं उसमे एक दिन पहले जो एक सिनेमाघर पर लाठियां भांज रहे थे, आग लगा रहे थे अगले दिन वे ही तिरंगा (झण्डा) यात्रा निकाल रहे थे । दोनों ही समय झण्डे से ज्यादा नुमायां डण्डा था । आज उन्ही के सहविचारी तिरंगा लहरा कर सलामी लेंगे । झण्डा फिर अनफहारा रह जाएगा - डण्डा ज्यादा मुस्तैदी से लहरायेगा।  आजादी के बाद विडम्बना इतनी मुखरता से इससे पहले कभी नहीं दिखी ।

किसी राष्ट्र के जीवन में इस तरह के दिन ठहर कर सोचने और कड़ाई से आत्ममूल्यांकन करने के होते हैं । मगर इधर इन दिनों जुमलों की बौछारों ने सारे दर्पण धुंधले और सारे कागज गीले करके रख दिए हैं । एक तरफ दावोस के सूखे कुंए से बार बार प्रतिध्वनित होती घनगरज है दूसरी तरफ ऑक्सफैम की रिपोर्ट से निकली कड़वी सचाई । इन दोनों के बीच कहीं अपनी जगह तलाशता लोकतन्त्र अपने अब तक के जीवन की सबसे कठिन चुनौती से दो-चार है । लोक पीछे, आत्महत्या करते किसानों-देश के सारे मेहनतकशों के प्रतिनिधिरूप सलाखें गिनते मारुती के मजदूरों-अनगिनत जख्मो को शुमार करती महिलाओं और भात के लिए बिलख कर दम तोड़ती बच्ची संतोषी के साथ -कहीं बहुत पीछे छूट गया है । बचा है तंत्र  - बिना किसी हया के क्रूर धनपतियों के हाथ में लहराते राजदण्ड की तरह ।

गणतंत्र के साथ यह ठगी अनायास नहीं हुयी है । रातों रात नहीं हुयी है । अन्धेरा दिनदहाड़े बेआवाज़ दाखिल होता रहा और अब पूरी तरह से कपड़े उतार कर झप्प से पसर गया है । गणततंत्र की अर्ध-शताब्दी के समय एक राष्ट्रपति ने दुःखी मन से कहा था कि "संविधान ने हमे नहीं, हमने संविधान को विफल किया है ।"  पिछले 60 साल यही तो किया : जिन निर्देशक सिद्धान्तों के आधार पर नीतियां बनाई जानी थीं उन्हें नकारा गया ; जिस धर्मनिरपेक्षता को विकसित करना था, उससे फ़्लर्ट किया और ; जिस आत्मनिर्भरता ने अपने पाँव खड़े होने का आत्मविश्वास दिया उसे दुत्कारा गया । नतीजा सामने है ।

भारतीय संविधान और उसमे ढला गणतंत्र कोई 100 साल तक लगातार चले स्वतन्त्रता संग्राम की गर्मी में तपा, पका विमर्श था । आधे से भी कम समय में इसे तोड़ने फोड़ने का काम उन्ही हुक्मरानों ने कर दिखाया जिन्हें ठीक ऐसा न होने देने के लिए चुना गया था । संविधान में दर्ज उम्मीदों पर सरासर विफल हुक्मरान मनहूसियत पर सौ फीसद खरे उतरे।  डॉ. बी आर अम्बेडकर ने 26 नवम्बर 1949 को जो आशंका जताई थी उसे उनके अनुमान से भी कहीं ज्यादा सच कर दिखाने में इस मुल्क के शासकों ने कोई लेतलाली नहीं दिखाई । 

2018 की 26 जनवरी के दिन गणतंत्र और संविधान तितरफा हमले की जद में है । एक तरफ अतीत के नरभक्षी भस्मासुर, जिसके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में मनुस्मृति है और जुबान पर अमरीकी श्राप-मन्त्र हैं, की गा-बजा कर हो रही वापसी हो रही है। दूसरी तरफ समता के आभासी सपने तक को तिरोहित कर पूंजी के अकूत भंडारों से लबलबाती दलदल का और गहरा होना है और ऐसा करते में जो भी मानवीय है, उसको हड़प जाना है । वहीं तीसरी तरफ विदेशी पूँजी के उन मगरमच्छों को खुद न्यौता देकर बुलाया जाना है जिन्हें बमुश्किल थोड़ा बहुत बाहर धकेलने में पांच-सात पीढियां होम हो गयी थीं ।

निशाने पर कोई फ़िल्म-विल्म नहीं है, इल्म है । यह "हिन्दू राष्ट्र" का ट्रेलर है । बर्बर सडकों पर हैं राज्याश्रय के चलते छुट्टा और बेपरवाह । निशाने पर मनुष्यता, सोच, सृजन, लोकतन्त्र और संविधान है । कल कुलबुर्गी-दाभोलकर-पानसारे और गौरी लंकेश थीं । यदि पागलपन रुका नहीं तो आगामी कल कबीर, नामदेव, तुकाराम, नानक, भगतसिंह, फुले, अम्बेडकर होंगे । यहां तक कि बख्शे नहीं जायेंगे विवेकानंद और आर्यभट भी ।

2018 के गणतंत्र ने गुड़गांव की बस में डरे, सहमे, दुबके, सिसकते बच्चों की शक्ल में दस्तक दी है । यह समय तय करेगा कि यह आगे का रास्ता कैसे तय करेगा । वह गुरुग्राम की ठीक अगली जली-फूंकी बस की गति को प्राप्त होगा या जोर जोर से राइम गाते खिलखिलाते बच्चों क़े सलामत स्कूल पहुँचने और जो पढ़ा जाना चाहिए उसे पढ़वाने तक पहुंचेगा ।

खतरे का आगाज़ संविधान के पहले चार शब्दों "हम भारत के लोग" को मिटा देने की मंशा के साथ हुआ है तो इसका मुकाबला भी इन हम भारत के लोगों द्वारा ही किया जा सकता है । गुज़री साल देश भर में शानदार लामबन्दियों और तेवरों से इसकी झलक ये भारत के लोग दिखा चुके हैं । कोशिशों को और तेज, संकल्प को और दृढ़, हलचलों को और अधिक परिणाममूलक बनाना होगा। ऐसा करते में ही वे जिस एकता को पूरी तरह विखंडित करना चाहते हैं उसे और मजबूत करना होगा।  

रास्ता यही है - इसका कोई शॉर्ट कट नहीं है । किसी ने कहा है न "न हमसफर न किसी हमनशीं से निकलेगा/हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा ।"

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