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भारत
राजनीति
गुजरात में आदिवासी क्यों भजपा के विरुद्ध वोट कर सकते हैं
हाल के वर्षों में, भाजपा सरकार के विरुद्ध असंतोष उभर रहा है.
पृथ्वीराज रूपावत
20 Nov 2017
Translated by महेश कुमार
आदिवासी

बावजूद इसके कि गुजरात में आदिवासी जनसँख्या 14.8 प्रतिशत है, यह तबका राज्य में एक अपेक्षित सामाजिक हिस्सा के रूप में रहता है. आदिवासी मामलों के मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2016-2017 के अनुसार, भील, चरण, चौधरी, चोधरा, ढोडिया, गमित, गोंड, राबड़ी और अन्य जनजातियों से संबंधित 35% से अधिक अनुसूचित जनजातियां गरीबी रेखा के नीचे हैं. (2011- 12 के अंतिम उपलब्ध आधिकारिक डेटा पर आधारित). आदिवासियों में साक्षरता दर राज्य की औसत दर से 15.5% कम है. राज्य में आदिवासी युवाओं को भीषण बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है. राज्य में हुए  तीन सर्वेक्षणों में पाया गया कि राज्य में आदिवासी क्षेत्रों में से 94 प्रतिशत बच्चे अविकसित या कुपोषित हैं.

दिसंबर में आने वाले आगामी विधानसभा चुनावों का चरित्र पिछले चुनावों के मुकाबले ज्यादा जाति-केंद्रित हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए आज जो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं उसके मुताबिक़ यह जानना जरूरी है कि आखिर आदिवासी किस तरफ जा रहे हैं? क्योंकि राज्य की कुल 182 सीटों में से 27, आदिवासी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा 11 अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से जीतने में सफल रही थी. विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयरों में अंतर कम देखा हुआ है, जबकि 2002 के बाद से भाजपा की सीटों में लगातार गिरावट आई है.

अगर ऐतिहासिक रूप से देखा जाए, तो भाजपा और विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच संबंध हमेशा से टकरावपूर्ण रहे हैं. वास्तव में, गुजरात में भाजपा सरकार में पहली बड़ी सांप्रदायिक हिंसा आदिवासी लोगों के खिलाफ की गयी थी. 1999 में, बीजेपी के सहयोगी संगठनों ने आदिवासियों के विरुद्ध इसलिए हिंसा की क्योंकि डांग जिले के आदिवासियों ने ईसाई धर्म को अपने धर्म के रूप में अपना लिया था, इस हिन्दा के विरुद्ध आवाज़ उठी और भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार की बर्खास्तगी की मांग के लिए आखिरकार राष्ट्रव्यापी विरोध किया गया. यह भी प्रकाश में आया कि गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी व उसकी समर्थक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके द्वारा नियंत्रित सांस्कृतिक सहयोगियों/संगठनों ने पिछले दिसंबर के बाद से आदिवासियों में अपने आधार को बढाने के लिए काम तेज कर दिया है.

हाल के घटनाक्रम में दक्षिणी गुजरात जिलों में आदिवासी आक्रोश बढ़ रहा है और उससे  आंतरायिक विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो गयी हैं, जो एक विपरीत ही समझ पेश करती हैं. बेहद औद्योगिक और समृद्ध तटीय क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों की स्थिति बेहद खराब है. इस क्षेत्र में आदिवासियों और अन्य लोगों के बीच की बड़ी खायी ने भूमि अधिग्रहण, बेरोज़गारी और गरीबी के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं.

हाल ही में, नरेंद्र मोदी द्वारा मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेसवे जैसी प्रस्तावित फ़िजूल ख़र्च वाली परियोजनाओं की घोषणाओं का विरोध आदिवासी और किसानों ने महाराष्ट्र और गुजरात में बड़ी ही मजबूती से किया था. ये प्रस्तावित रेल लाइन गुजरात के नवसारी और वलसाड जिलों के आदिवासी इलाकों से गुजरती है.

आदिवासी संगठनों द्वारा प्रतिरोध की गूँज राज्य में लगातार सुनाई दे रही है. आरक्षण संबंधी अधिसूचनाओं पर मिली सूचनाओं के अनुसार आदिवासी संगठनों ने सरकार-विरोधी विरोध प्रदर्शन किये, जबकि जनता दल (संयुक्त) से संबद्ध भिलिस्तान टाइगर सेना के सदस्य यह मांग कर रहे हैं कि गुजरात की पूर्वी सीमा पर आदिवासी बेल्ट को एक अलग राज्य घोषित किया जाएगा और जिसे भिलस्तान नाम दिया जाए, दूसरी ओर, 26 अक्टूबर को, भाजपा सरकार के विरोध किया गया और पिछले तीन वर्षों से बलसाड जिले में सृसोल फैक्ट्री द्वारा भूजल को दूषित करने के विरोध में  सोसोवाड़ और रोला गांवों के आदिवासी मतदाताओं ने चुनाव के बहिष्कार करने का आह्वान किया है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) की हालिया रिपोर्टों में गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में जारी परियोजनाओं के सम्बन्ध में चौंकाने वाले ब्योरे सामने आये है. जल संसाधन विभाग द्वारा 4 उच्चस्तरीय नहरों (एच.एल.सी.) के निर्माण में, जो कि महियासगर, पंचमहल, सूरत और भरूच जिले के पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं, और आदिवासियों की यहाँ बड़ी तादाद हैं, वहां नहर का निर्माण लक्ष्य से केवल लगभग 4% तक ही पूरा हुआ गए हैं. सी.ए.जी. द्वारा वर्ष 2010 और 2015 के बीच कौशल विकास पर किए गए एक निष्पादन लेखापरीक्षा में, यह पाया गया कि आदिवासी उप-योजना के तहत स्थापित व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र (वी.टी.सी.) जिसे 44, 354 आदिवासी युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करना था, लेकिन वह लक्ष्य का मात्र 35% ही पूरा कर पाया है.

आदिवासी नेताओं ने एक अन्य गंभीर चिंता का विषय उठाया है कि राज्य की जेलों में बंद कैदियों में आदिवासी लोगों की संख्या कितनी है. 2015 के अंत तक, सज़ायाफ्ता कैदियों में से 18% आदिवासी थे, जोकि मुसलामानों से दूसरे नंबर पर हैं और जिनके सज़ायाफ्ता कैदियों की संख्या 22% है लेकिन एन.सी.आर.बी. के अनुसार आदिवासी दोषियों की संख्या 22% है.

विभिन्न संगठनों के नेतृत्व में बीजेपी सरकार के खिलाफ आदिवासियों द्वारा कई प्रतिरोध आंदोलन हुए हैं. 2015 में, जब सनपेंशन वन्यजीव अभ्यारण्य और इसके आस-पास के लगभग सात किलोमीटर के दायरे के क्षेत्र को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया तो, दक्षिण गुजरात के 121 गांवों से हजारों आदिवासियों ने केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ भारी विरोध रैली में भाग लिया.

आने वाले चुनावों के संदर्भ में आदिवासी समुदायों की राजनीतिक कार्रवाइयों पर निर्णय लेने के लिए, तापी जिले के व्यारा में 18 नवंबर को आदिवासी समूहों के एक आदिवासी सम्मेलन का आह्वान किया गया है. आप जिस भी नजरिये से इसे देखें, लेकिन लगता है कि आदिवासी मतदाताओं ने चुनाव के लिए अपना एक अलग रास्ता तय कर लिया है.

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