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भारत
राजनीति
घरेलू श्रमिकों के आंदोलन को मिली ताक़त
यह केंद्र सरकार द्वारा निजीकरण के अपने दृष्टिकोण और बड़े पैमाने पर निवेश को आकर्षित करने के लिए ग़रीब श्रमिकों से पैसे हासिल करने के एक और प्रयास की तरह लगता है।
सुमेधा पॉल
08 Aug 2018
domestic workers' in india

2 अगस्त को क़रीब 5000 से अधिक घरेलू श्रमिकों ने राजधानी दिल्ली में एक रैली निकाला। वे अपनी मज़दूरी के विनियमन के लिए व्यापक क़ानून की मांग कर रहे थें साथ ही साल 2017 में सरकार द्वारा प्रस्तावित सामाजिक सुरक्षा कोड को वापस लेने की मांग कर रहे थें।

वर्तमान में देश में 6.4 मिलियन से ज़्यादा घरेलू श्रमिक हैं जो घरों में काम करते हैं। ये श्रमिक खाना बनाने के साथ साथ सफाई और अन्य काम करते हैं। इस क्षेत्र में पहले पुरुष श्रमिक ज़्यादा होते थे लेकिन अब महिलाओं की संख्या अधिक हो गई है। इनकी संख्या क़रीब 71 प्रतिशत है जो लगातार बढ़ा है। अब तक कोई व्यापक राष्ट्रव्यापी क़ानून नहीं है जो उन्हें सुरक्षा देता है।

ये रैली नेशलन प्लेटफॉर्म ऑफ डोमेस्टिक वर्कर्स (एनपीडीडब्ल्यू) द्वारा आयोजित किया गया था जो घरेलू श्रमिकों के लिए क़ानून की मांग करने के प्रयासों की नवीनतम श्रृंखला की कड़ी थी। मौजूदा नीतियों के दायरे में इन श्रमिकों को असंगठित क्षेत्र में रख दिया गया है।

इस मामले पर विस्तार से चर्चा करते हुए दिल्ली श्रमिक संस्थान के संयोजक अनिता जुनेजा ने कहा, "घरेलू श्रमिकों को असंगठित श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008, (यूडब्ल्यूएसएसए) और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध तथा निवारण) अधिनियम, 2013 में शामिल किया गया है। ये अधिनियम घरेलू श्रमिकों को अधिकार प्राप्त श्रमिकों के रूप में नहीं देखती हैं, क्योंकि पहला अधिनियम सामाजिक कल्याण योजना है और दूसरा कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से रक्षा करती हैं।"

इन घरेलू श्रमिकों को इन अधिनियमों के दायरे में अधिकार प्राप्त या 'मान्यता प्राप्त कर्मचारियों' के रूप में शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि घरेलू श्रमिकों का कार्यस्थल व्यक्ति का घर बन जाता है न कि एक प्रतिष्ठान। यह घरेलू श्रमिकों के नियोक्ताओं को अनियमित शक्तियां देता है, क्योंकि मातृत्व लाभ अधिनियम या न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम सहित अन्य श्रम क़ानून भी घरेलू श्रमिकों पर लागू नहीं होते हैं।

उनके अधिकारों के संबंध में चल रहे आंदोलन की कड़ी में मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान चलाया जिसमें देश भर के क़रीब तीन लाख से ज़्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किए। रैली के साथ साथ 37 से अधिक ट्रेड यूनियनों और 22 राज्यों के श्रमिकों ने केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार के साथ-साथ लोकसभा की याचिका समिति को याचिका सौंपी।

नीति स्तर पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा साल 2016 में सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों के कल्याण पर केंद्रित मसौदा विधेयक का प्रस्ताव देने का प्रयास किया था। इसके लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस विधेयक को एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में भी पेश किया गया है।

किए जा रहे प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत सरकार ने इस साल की शुरुआत में घरेलू श्रमिकों के लिए मसौदा नीति का प्रस्ताव दिया था। ये नीति मज़दूरों के पंजीकरण पर केंद्रित है और न्यूनतम मज़दूरी और कार्य-समय तय करके उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में शामिल कर रही है। चूंकि यह प्रस्ताव एक नीति मसौदा है, इसलिए इसे दंतहीन होने को लेकर आलोचना की गई थी क्योंकि निर्णय लेने और राज्यों को इसकी सिफारिशों के कार्यान्वयन को छोड़कर यह केवल सिफारिशों का सुझाव दे सकता था। राज्य सरकार पर घरेलू श्रमिकों के पंजीकरण और बोर्ड की स्थापना की ज़िम्मेदारी होगी। प्लेसमेंट एजेंसियों को विनियमित करने के लिए मज़दूरी तय करने और तंत्र स्थापित करने की शक्तियां भी राज्यों के हाथों में केंद्रित थीं, इस तरह ये केंद्रीय क़ानून की आवश्यकता को दरकिनार कर रही है।

देश में श्रम सुधार लाने के नवीनतम प्रयास में ये सरकार 44 से अधिक क़ानूनों को चार संहिता (कोड) में शामिल करने की योजना बना रही है; इसमें सोशल सिक्योरिटी कोड भी शामिल है, जो 15 कानूनों को शामिल करता है। अपनी तरह के पहले क़दम में इस सरकार ने 2017 में प्रस्तावित सामाजिक सुरक्षा संहिता में घरेलू श्रमिकों को शामिल किया था।

केंद्र सरकार ने मार्च 2017 में प्रस्तावित संहिता का मसौदा पेश किया था। यद्यपि इस संहिता में शामिल घरेलू श्रमिकों को देश भर में लागू किया जाना है जो प्रगतिशील लग रहा था लेकिन इस क़दम ने घरेलू श्रमिकों के अधिकारों के प्रति सक्रिय कार्यकर्ताओं को निराश किया है।

कार्यकर्ताओं का तर्क है कि श्रम सुधार संहिता कॉर्पोरेट कंपनियों और सरकार को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है न कि वे श्रमिकों के हित में है। इस तरह दिल्ली में निकाली गई रैली में शामिल श्रमिकों की एक प्रमुख मांग प्रस्तावित संहिता को वापस लेना है। संहिता वापस लेने की मांग के कारणों पर टिप्पणी करते हुए जुनेजा ने कहा, "प्रस्तावित तंत्र घरेलू श्रमिकों की कोई सहायता नहीं करता है।" घरेलू श्रमिकों पर एक व्यापक क़ानून के बजाय कार्य ये परिस्थितियों, मज़दूरी और प्लेसमेंट एजेंसियों के संचालन को नियंत्रित करेगा। सरकार इस विधेयक आगे बढ़ा रही है जो श्रम क़ानूनों को समाप्त करेगा और नियोक्ता के लिए रोज़गार के ठेके को आसान करने के लिए मुख्य संहिता बनाएगा।

प्रस्तावित कोड एम्पलाईज़ स्टेट इंश्योरेंस एक्ट, कर्मचारियों के लिए स्व-वित्त पोषण सामाजिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य बीमा योजना और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम सहित विभिन्न श्रम क़ानूनों को निरस्त करने का सुझाव देता है। सरकार का कोड संगठित तथा असंगठित श्रमिकों के लिए एक कल्याण बोर्ड तैयार करेगा, जहां असंगठित श्रमिकों को निधि (संगठित श्रमिकों के समान) में अपनी मज़दूरी का 12 प्रतिशत भुगतान करना होगा और नियोक्ता को मज़दूरी का 17 प्रतिशत देना होगा। हालांकि कोड स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है कि केंद्र सरकार सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई योगदान नहीं करेगी लेकिन इसका प्रतिनिधित्व अधिक होगा और फंड के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा पर नियंत्रण होगा।

पेंशन, बीमारी लाभ, चिकित्सा लाभ इत्यादि का प्रावधान प्रदान किया जाएगा, लेकिन उनके क्षेत्र को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है और लाभ का हिस्सा नहीं बताया गया है।

प्रशासनिक परेशानियों को लेकर भी चिंताएं हैं। लाभ उठाने के क्रम में इन श्रमिकों को अपने नियोक्ताओं द्वारा प्रमाणित होना होगा और विश्वकर्मा कार्ड के माध्यम से स्वीकृति मिलेगी। इस प्रक्रिया से श्रमिकों के लिए समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उदाहरण के लिए कोई श्रमिक पांच घरों में अपनी सेवाएं देता है तो अब सभी नियोक्ताओं द्वारा स्वीकृति लेनी होगी। यह प्रक्रिया विशेष रूप से कठिन हो सकती है क्योंकि नियोक्ता अनिच्छुक हैं,क्योंकि किसी प्रतिष्ठान पर लागू होने वाले सभी क़ानून अब उनके घरों के लिए लागू किए जाएंगे- जैसे कि उचित कार्य परिस्थितियां, मज़दूरी इत्यादि। प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बाद एक बार जब कोई कर्मचारी अपना योगदान सोशल सिक्योरिटी फंड को दे देता है तो ये कोड प्रस्तावित करता है कि उक्त राशि 'अधिशेष' के रूप में घोषित की जाएगी और इस पैसे के पेशेवर प्रबंधन के लिए राशि को राज्य बोर्डों से केंद्रीय बोर्ड को स्थानांतरित की जाएगी। इसलिए अगर दिल्ली सरकार कल्याण नीति को लागू करना चाहती है, और फंड से पैसे का इस्तेमाल करती है तो उसे पहले प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र से स्वीकृति लेनी होगी।

इस कोड का प्रस्ताव है कि इस फंड में एकत्र की गई राशि का इस्तेमाल सरकार द्वारा 'अधिकतम रिटर्न हासिल करने' के लिए भी किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, श्रमिकों से एकत्रित धन को सरकार द्वारा बाजार में निवेश किया जा सकता है। प्रस्तावित 'निवेश पर अच्छे रिटर्न' के लिए किसी भी नुकसान के मामले में श्रमिकों द्वारा दिए गए पैसे को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

एम्पलाईज़ स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (ईएसआईसी) और एम्पलाईज प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (ईपीएफओ) की मौजूदा योजनाएं कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति यासेवा छोड़ने के समय अपनी आय का दावा करने के लिए सुविधाजनक बनाती हैं। ये प्रस्तावित कोड इस मामले में फंड में पैसा निवेश करने पर रिटर्न का सुझाव नहीं देता है।

चूंकि प्रस्तावित कोड यह भी सुझाव देता है कि श्रमिकों के पंजीकरण, कार्य के प्रबंधन, रिकॉर्ड रखने, सेवाओं और लाभ के प्रावधान जैसे कार्य निजीकरण किया जाएगा। ईपीएफ और एसआईसी के संबंध में चिंताएं अनावश्यक की जा रही हैं।

लेबर राइट दिल्ली से जुड़े एक कार्यकर्ता रामेंद्र कुमार ने कहा "हम घरेलू श्रमिकों के संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे। भविष्य में कई बैठकें करने की योजना तैयार है और हमें कई राजनीतिक क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है।"

सरकार या बीजेपी से संबद्ध बीएमएस के माध्यम से संचार के बारे में पूछे जाने पर जुनेजा ने कहा, "बीएमएस ने हमें समर्थन देने से इनकार कर दिया है, इसलिए हम संघर्ष में शामिल होने के लिए अन्य समूहों को संगठित करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे।"

यद्यपि प्रस्तावित मसौदा घरेलू श्रमिकों को शामिल करता है लेकिन यह व्यापक क़ानून की मांग को पूरा नहीं करता है जो घरेलू श्रमिकों के हितों पर विशेष रूप से केंद्रित हो। वर्तमान स्वरूप में यह केंद्र सरकार द्वारा निजीकरण के अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने और बड़े पैमाने पर निवेश को आकर्षित करने के लिए केंद्र द्वारा ग़रीब श्रमिकों के मेहनत के पैसे को हासिल करने के एक और प्रयास की तरह लगता है, भले ही यह श्रमिकों के कठिन कमाई के नुकसान का जोख़िम हो।

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