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दुनिया में हर जगह महिलाएँ हाशिए पर हैं!
30 जून और 2 जुलाई 2021 के बीच, संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य बहुपक्षीय संगठनों ने पेरिस (फ़्रांस) में जनरेशन इक्वलिटी फ़ोरम का आयोजन किया। फ़ोरम का आयोजन महिलाओं पर हुए चौथे विश्व सम्मेलन (1995) में निर्धारित बीजिंग घोषणा और प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर एक्शन की 25वीं वर्षगाँठ मनाने के लिए किया गया था। बीजिंग प्लेटफ़ॉर्म को फिर से पढ़ने से पता चलता है कि न्याय और समानता का एजेंडा आगे बढ़ाने के बजाय, कई देश पीछे की ओर गए हैं।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
14 Jul 2021
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प्यारे दोस्तों,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

30 जून और 2 जुलाई 2021 के बीच, संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य बहुपक्षीय संगठनों ने पेरिस (फ़्रांस) में जनरेशन इक्वलिटी फ़ोरम का आयोजन किया। फ़ोरम का आयोजन महिलाओं पर हुए चौथे विश्व सम्मेलन (1995) में निर्धारित बीजिंग घोषणा और प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर एक्शन की 25वीं वर्षगाँठ मनाने के लिए किया गया था। बीजिंग प्लेटफ़ॉर्म को फिर से पढ़ने से पता चलता है कि न्याय और समानता का एजेंडा आगे बढ़ाने के बजाय, कई देश पीछे की ओर गए हैं। जिन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर काम किया जाना चाहिए उनमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:

• महिलाओं पर ग़रीबी का बोझ।
• शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य देखभाल, रोज़गार और निर्णय लेने तक पहुँच में असमानता और अपर्याप्तता।
• सशस्त्र संघर्ष में महिलाओं के लिए गंभीर ख़तरों सहित महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा।
• महिलाओं के सम्मान में कमी के साथ-साथ महिलाओं के मानवाधिकारों का अपर्याप्त प्रचार और संरक्षण।
• बालिकाओं के साथ लगातार भेदभाव और उनके अधिकारों का उल्लंघन।
• महिलाओं की उन्नति को बढ़ावा देने के लिए सभी स्तरों पर अपर्याप्त तंत्र।

पिछले हफ़्ते पेरिस में आयोजित मंच के अवसर पर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सहित एजेंसियों के एक समूह ने पिछले पच्चीस वर्षों में हुए विकास और महामारी के प्रभाव को लेकर बारह लेख जारी किए हैं। इनमें से एक लेख में कहा गया है कि यह 'निराशाजनक है कि अभी भी कोई भी देश लैंगिक समानता हासिल करने का दावा नहीं कर सकता है'। इसके अलावा, 'कोविड-19 महामारी का लैंगिक समानता और महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ा है'। इन बारह लेखों में आगे के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं:

1. 'पहली आवश्यकता यह है कि वैतनिक रोज़गार और अवैतनिक देखभाल कार्य को समान रूप से महत्व दिया जाए, इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि बहुत-सी महिलाएँ नौकरी नहीं करतीं या अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करती हैं और महिलाओं को अवैतनिक देखभाल कार्य का अधिक बोझ उठाना पड़ता है'।
2. स्वास्थ्य देखभाल, जिसमें यौन और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल भी शामिल है, सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध हो।
3. सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा में बच्चों की देखभाल, बुज़ुर्गों के लिए पेंशन तथा बच्चों को पालने के लिए, बीमार होने पर और पारिवारिक देखभाल के लिए वैतनिक अवकाश के प्रावधान शामिल होने चाहिए।
4. महिला आंदोलनों का समर्थन किया जाना चाहिए, और महिलाओं को समाज के सभी क्षेत्रों में नीतियों के निर्माण में पूरी तरह से भाग लेना चाहिए। राजनीति और सरकार में महिलाओं की भूमिका पर बात करते हुए, यूएन विमन की प्रमुख, फुमज़िले म्लाम्बो-न्गकुका से कहा, 'सभी प्रबंधकों में से एक चौथाई महिलाएँ हैं, दुनिया भर के सांसदों में एक चौथाई सांसद वे हैं, जलवायु परिवर्तन पर बातचीत करने वालों में से एक चौथाई वे हैं, शांति समझौतों पर बातचीत करने वालों में से एक चौथाई से थोड़ा कम महिलाएँ हैं। इन सभी निर्णयों का सार्थक जीवन जीने की उनकी क्षमता पर मौलिक प्रभाव पड़ता है’।

ओल्गा रोज़ानोवा (रूस), गली में, 1915

पिछले साल, एक प्रमुख रिपोर्ट में, यूएन विमन ने लिखा कि पिछले पच्चीस सालों में मिली तरक़्क़ी नष्ट हो गई है। इस उलटफेर के प्रमुख कारण हैं, जलवायु संबंधी आपातकाल, नव-उदारवाद की क्रूर नीतियाँ, संघर्ष, हिंसा, 'बहिष्कार की राजनीति का उदय, स्त्री-द्वेष और विदेशियों से घृणा जिसकी ख़ासियत हैं', महिलाओं पर पूरी देखभाल अर्थव्यवस्था की ज़िम्मेदारी। इन कारणों का प्रभाव महामारी के संदर्भ में और भी जटिल हो गया है, क्योंकि महामारी ने -जैसा कि हमारे अध्ययन कोरोनाशॉक और पितृसत्ता ने दिखाया है- महिलाओं को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है।

निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करना ज़रूरी है:

1. दुनिया भर में 51 करोड़ महिलाएँ -सभी कामकाजी महिलाओं में से लगभग 40%- महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जैसे मनोरंजन, खाद्य सेवा, आतिथ्य, विनिर्माण और पर्यटन।
2. महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में असमान रूप से पाई जाती हैं (60% बनाम 40%), जहाँ उन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है।
3. महामारी के दौरान पुरुषों की तुलना में महिलाओं की नौकरी जाने की संभावना अधिक रही है।
4. महामारी के दौरान, आय में लगभग 800 अरब डॉलर की गिरावट के साथ, कम-से-कम 6.4 करोड़ महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी। इस आँकड़े में अनौपचारिक क्षेत्र की महिलाएँ शामिल नहीं हैं, जिसमें कि दक्षिणी एशिया और अफ़्रीका की महिलाएँ ज़्यादा काम करती हैं।
5. दुनिया भर के अध्ययनों से पता चलता है कि महामारी के दौरान बढ़े देखभाल दायित्वों के कारण महिलाओं को अपने रोज़गार के घंटों में कटौती करनी पड़ी और इन कटौतियों से उनके दीर्घकालिक वेतन और पेंशन पर प्रभाव पड़ेगा। यह महिलाओं के काम पर लौटने की क्षमता को भी प्रभावित करता है और अक्सर लंबे समय में देखभाल कार्यों के बढ़ने का कारण बनता है। इसके अलावा, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बताता है, 'महिलाएँ केवल नौकरियाँ जाने के नुक़सान से ही प्रभावित नहीं होतीं, बल्कि [सरकारी] ख़र्च में कटौती से भी प्रभावित होती हैं, जिससे कि सार्वजनिक सेवा प्रावधान, विशेष रूप से देखभाल सेवाओं में कमी होने लगती है'।
6. यूएनएड्स के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि LGBTQIA+ लोगों में से 47% को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा, 'एक चौथाई अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं, और एक वक़्त का भोजन छोड़ रहे हैं, या भोजन की मात्रा कम कर रहे हैं’।


ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाली महिलाओं की हक़ीक़त इन ख़बरों के साये में छिपी हैं। उदाहरण के लिए, भारत में, ग्रामीण महिलाएँ महिला कार्यबल का 81.29% हिस्सा बनाती हैं, लेकिन केवल 12.9% महिलाओं के पास ही अपने नाम की ज़मीन है। इनमें से अधिकांश महिलाएँ भूमिहीन खेत मज़दूर हैं या अनौपचारिक क्षेत्र की मज़दूर हैं। भारत में महामारी की हालिया लहर के दौरान, अप्रैल 2021, में 57 लाख ग्रामीण महिलाओं की नौकरियाँ चली गईं; इस महीने में जितनों की नौकरियाँ ख़त्म हुईं उनमें से लगभग 80% ये महिलाएँ हैं। मई में हुए सुधार न के बराबर थे। ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से किसानों के विद्रोह पर जारी डोसियर ग्रामीण भारत में संकट को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। दिल्ली स्थित निकोर एसोसिएट्स ने ग्रामीण महिलाओं के द्वारा अनुभव किए जा रहे संकट के चार कारण बताए हैं:

1. ग्रामीण भारत में, महामारी से पहले, महिलाएँ प्रतिदिन 5.017 घंटे अवैतनिक देखभाल कार्य करने में बिताती थीं; इसकी तुलना में, पुरुष प्रतिदिन 1.67 घंटे बिताते थे। महामारी के दौरान, जब परिवार के सदस्य बीमार पड़े तो देखभाल के काम की ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आई।
2. लॉकडाउन और अन्य दबावों के कारण, मछली व अन्य व्यापारिक वस्तुओं और कृषि उपज बेचने से अपनी आय पूरा करने वाली महिलाओं के लिए बाज़ारों में जाना मुश्किल हो गया।
3. महिलाएँ सरकार की ग्रामीण कार्य योजना (मनरेगा) की महत्वपूर्ण लाभार्थी थीं, जिसमें सरकार के 2020-21 बजट में लगभग 35% की कमी देखी गई। अप्रैल-मई 2021 में, इस योजना के माध्यम से प्रदान की जाने वाली नौकरियों में 21% की गिरावट आई।
4. हस्तशिल्प और छोटे उद्योग क्षेत्र -जिसमें पीस-रेट और घरेलू उत्पादन शामिल हैं- में काम करने वाली महिलाओं ने महामारी की दूसरी लहर के दौरान इस क्षेत्र को ठप होते देखा और उसके बाद से अभी तक इस क्षेत्र में कोई बेहतरी नहीं हुई है।


पेरिस मीटिंग में यूएन विमन की म्लाम्बो-न्गकुका ने कहा कि, 'दुनिया में हर जगह महिलाएँ हाशिए पर हैं'। लेकिन वे, निश्चित रूप से, लड़ रही हैं। दुनिया भर में, ट्रेड यूनियन और किसान सभाएँ, महिला संगठन और मानवाधिकार समूह  और वामपंथियों के राजनीतिक दल लड़ रहे हैं, हाशिए से उठ कर वे कामकाजी महिलाओं के एजेंडे को मेज़ पर रखने की माँग कर रहे हैं। उनके द्वारा उठाई जा रही माँगें बुनियादी माँगें हैं। उनमें से अठारह कोरोनाशॉक और पितृसत्ता अध्ययन के अंत में शामिल हैं। उन माँगों का एक सारांश, आठ माँगों के रूप में हम यहाँ शामिल कर रहे हैं:

1. नीति बनाने वाले प्रभावशाली निकायों में मज़दूर वर्ग के महिला संगठनों की नेताओं को नामांकित किया जाए।
2. अनौपचारिक महिला कामगारों को राष्ट्रीय खातों में पहचाना और गिना जाए।
3. सुनिश्चित किया जाए कि अनौपचारिक मज़दूरों को कार्यस्थल पर बुनियादी सुरक्षा मिले।
4. महिला कामगारों को तत्काल नक़द राहत और भोजन राहत प्रदान की जाए।
5. सभी कामगारों को तत्काल स्वास्थ्य सेवा प्रदान की जाए।
6. किराए और ज़रूरी सेवाओं के भुगतान पर रोक लगाई जाए।
7. बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल के कार्यक्रमों सहित सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को बढ़ाया जाए।
8. महिला सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।


1995 में, प्रतिनिधियों ने महिलाओं पर संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व सम्मेलन की अध्यक्ष के रूप में चेन मुहुआ (1921-2011) को चुना था। 1938 में, चेन साम्यवादी क्रांति में शामिल होने के लिए यानान गईं थीं, जहाँ उन्होंने कोंगडा में अध्ययन किया और आधार क्षेत्रों की आर्थिक ताक़त बनाने में मदद की। 1949 के बाद, चेन ने कम्युनिस्ट पार्टी में (वो एक वैकल्पिक पोलित ब्यूरो सदस्य बनीं), चीनी सरकार में (वो पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना की गवर्नर बनीं), और महिला आंदोलन में (ऑल-चाइना विमेंस फ़ेडरेशन का नेतृत्व) काम किया। बीजिंग सम्मेलन में, चेन ने महिलाओं की मुक्ति के लिए एक मज़बूत दलील पेश की थी। 'यह स्पष्ट है कि महिलाएँ अपनी स्थिति में सुधार के लिए चिल्ला रही हैं। समय इसकी माँग करता है। मानवता इसकी आकांक्षा करती है'।

स्नेह-सहित,

विजय।

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