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गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी: क्या ये उत्तराखंड का “वाटरशेड मोमेंट” है
राज्य आंदोलनकारी समेत ज्यादातर लोग गैरसैंण को पूर्णकालिक राजधानी बनते देखना चाहते हैं। गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी का मतलब हुआ कि देहरादून दूसरी राजधानी होगी। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों में भी दो-दो राजधानियों का मॉडल है। क्या ये सफल मॉडल है?
वर्षा सिंह
05 Mar 2020
गैरसैंण ग्रीष्मकालीन

देहरादून : गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा से उत्तराखंड के अधिकांश लोग इस समय ख़ुश हैं। अलग राज्य और पहाड़ में राजधानी की मांग के साथ राज्य आंदोलन हुआ था। अलग राज्य तो मिला लेकिन बीस वर्षों तक बीजेपी-कांग्रेस की सरकारें एक अदद राजधानी पर फैसला नहीं ले पायीं। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी गैरसैंण को राजधानी बनाने का वादा किया था। हालांकि जिस तरह एक रात अचानक त्रिवेंद्र सिंह रावत के मन में गैरसैंण को लेकर उथल-पुथल हुई और अगले दिन बजट के ठीक बाद उन्होंने इसकी घोषणा की, उनके इस फ़ैसले के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी, न ही बजट में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने को लेकर कोई प्रावधान किया गया है, ये थोड़ा चौंकाता है और सरकार को इस फ़ैसले से जुड़े बहुत से सवालों का जवाब देना होगा।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जब भराड़ीसैंण के विधानभवन में गैरसैंण-भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा की तो सदन के भीतर ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि ये एक बहुत बड़ा फैसला था। वे रात भर सो नहीं पाए। उन्होंने कहा कि वर्ष2017 के घोषणा पत्र में किए गए वादे को उन्होंने पूरा किया है। जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। अब गैरसैंण में आवश्यक सुविधाएं विकसित करने के लिए काम करना है।

त्रिवेंद्र सिंह ने अकेले ही क्यों लिया फ़ैसला

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस घोषणा के साथ कांग्रेस से ही मुद्दा नहीं छीना बल्कि बीजेपी को भी लूट लिया। किसी को भनक नहीं लगने दी कि वे इस तरह का कोई एलान करने जा रहे हैं। ऐसा क्यों? कहीं ये असुरक्षा से उपजा फ़ैसला तो नहीं है? एक तो अब इस सरकार का दो वर्ष का कार्यकाल शेष बचा है। फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की अटकलें भी बीच-बीच में तेज़ हो जाती हैं। अभी कुछ ही दिन पहले त्रिवेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने और निशंक को मुख्यमंत्री बनाए जाने की अफवाह बहुत तेज़ी से राजनीतिक गलियारों में उभरी। जिसके बाद दोनों ही नेताओं को सफाई देनी पड़ी और उन्होंने इसे विरोधियों की साजिश करार दिया।

त्रिवेंद्र सिंह पर तानाशाह रवैया अख्तियार करने के आरोप भी लगते रहते हैं। इस फैसले के साथ मंडल कमीशन की सिफारिशों को एकाएक लागू करने वाले वीपी सिंह भी याद आते हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी राजनीति की पिच पर कुछ ऐसा ही शॉट लगाया है। जिससे कांग्रेस तो क्लीन बोल्ड हो ही गई, बीजेपी में उनके विरोधी भी आउट हो गए।

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गैरसैंण राजधानी होने से हल होंगी पर्वतीय क्षेत्र की समस्याएं!

उत्तराखंड का समूचा पर्वतीय क्षेत्र इस समय हर तरह की बुनियादी मुश्किलों से जूझ रहा है। एक तरफ ऑलवेदर रोड के लिए दिन-दूनी रफ्तार से काम चल रहा है, वहीं सैकड़ों ऐसे गांव हैं जहां के लोगों ने अब तक सड़क नहीं देखी। इस राज्य में स्त्रियां सड़कों पर और खेतों में बच्चे पैदा करने को विवश हैं। नज़दीकी अस्पताल भी उनसे कोसों दूर हैं। चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी के बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए देहरादून आना पड़ता है। श्रीनगर मेडिकल कॉलेज भी रेफरल सेंटर सरीखा है। पहाड़ों में अच्छे स्कूल नहीं हैं। बच्चों की प्राइमरी शिक्षा के लिए लोग देहरादून आ रहे हैं। कुमाऊं की भी यही स्थिति है। वहां सारा भार हल्द्वानी पर टिका है।

लगभग हर विधानसभा सत्र में गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर प्रदर्शन होता रहा है। इस लिहाज से यह फैसला राज्य के लिए “वाटरशेड मोमेंट” सरीखा है। यानी जहां से बड़ा परिवर्तन शुरू होता है।

राज्य आंदोलनकारी सुशीला बलूनी कहती हैं कि देर आए दुरुस्त आए। वह कहती हैं कि आंदोलनकारियों की भावना यही थी कि पहाड़ी राज्य बनेगा तो पहाड़ में राजधानी होगी। वहां लोगों को रोजगार का मौका मिलेगा। यहां के युवाओं का विकास होगा। फिर संभव है कि जिन्होंने पलायन किया है वे अपने घरों की ओर लौटें। सुशीला बलूनी उम्मीद जताती हैं कि 6 महीने के लिए गैरसैंण राजधानी बन गई लेकिन वो समय भी आएगा कि गैरसैंण पूर्णकालिक राजधानी बन जाएगी। वैसे बीजेपी की इस घोषणा के बाद कांग्रेस की त्वरित प्रतिक्रिया यही थी कि वे सत्ता में आए तो गैरसैंण को पूर्णकालिक राजधानी बनाएंगे।

‘गैरसैंण पूर्णकालिक राजधानी बनना चाहिए’

राज्य आंदोलनकारी समेत ज्यादातर लोग गैरसैंण को पूर्णकालिक राजधानी बनते देखना चाहते हैं। गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी का मतलब हुआ कि देहरादून दूसरी राजधानी होगी। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों में भी दो-दो राजधानियों का मॉडल है। क्या ये सफल मॉडल हैं?

सीपीआई-एमएल के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि दो राजधानियों का मॉडल कोलोनियल हैंगओवर है। जिसे अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए बनाया था, क्या हम भी अपने देश में आक्रमणकारियों सरीखा बर्ताव करेंगे। इंद्रेश कहते हैं कि हिमाचल में भी ये बहुत सफल मॉडल नहीं है लेकिन वहां दोनों ही राजधानियां शिमला और धर्मशाला पहाड़ में हैं।

जम्मू-कश्मीर के मॉडल से सबक सीखने की जरूरत है, क्योंकि वो अलार्मिंग मॉडल है। इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि राजधानी शिफ्ट होना भ्रष्टाचार बढ़ाता है और सचिवालयकर्मियों की संपन्नता की वजह बनता है। जब कोई व्यक्ति श्रीनगर जाता है तो उसकी फाइल जम्मू रह जाती है, जम्मू जाता है तो फाइल श्रीनगर में फंस जाती है। इससे लोग परेशान होते हैं।

फिर गैरसैंण की स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि आप सर्दियों में वहां न रह सकें। बर्फ गिरती है लेकिन ऐसी नहीं कि लोग पलायन करें। जब गैरसैंण के लोग उसी जगह रहते हैं तो नेता-अधिकारी क्यों नहीं।

गैरसैंण राजधानी को लेकर दो सरकारी रिपोर्टें

वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड राज्य बना तो राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 में कहीं भी राजधानी का जिक्र नहीं था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अगस्त 2000 में उत्तर प्रदेश सरकार को चिट्ठी भेजी और कहा कि जब तक स्थायी राजधानी की व्यवस्था नहीं होती तब तक अस्थायी राजधानी के तौर पर देहरादून से काम चलाया जाए। इसी चिट्ठी के आधार पर देहरादून अब तक अस्थायी राजधानी के तौर पर कार्य कर रही है।

राज्य बनने के बाद नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री हुए और उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में दीक्षित आयोग बनाया, जिसे राजधानी को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। इस आयोग ने पहले 6 महीने तक काम किया। मगर आयोग को काम करने के लिए दफ्तर-जगह नहीं मिली तो काम ठप हो गया।

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वर्ष 2002 में एनडी तिवारी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इस आयोग को पुनर्जीवित किया गया। अगस्त 2008 में बीसी खंडूड़ी के कार्यकाल में आयोग ने राजधानी को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपी। इंद्रेश मैखुरी ने आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और खर्च को लेकर सितंबर 2008 में आरटीआई लगाई। जिसके जवाब में बताया गया कि दीक्षित आयोग को 11 बार एक्सटेंशन मिला और 65 लाख रुपये खर्च हुए। लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।

करीब साल भर तक रिपोर्ट सार्वजनिक करने की लड़ाई लड़ी गई। सूचना आयोग के आदेश के बाद भी सरकार ने रिपोर्ट नहीं दी, जिस पर आयोग ने 10 हजार रुपये का जुर्माना सरकार पर लगाया। तब जाकर निशंक सरकार ने रिपोर्ट का एक हिस्सा सार्वजनिक किया। ये मामला अब भी हाईकोर्ट में चल रहा है और सूचना आयोग में भी ये मामला अभी जिंदा है।

दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तमाम तर्कों से गैरसैंण को खारिज करने की कोशिश की। जैसे कि वहां भूकंप का खतरा है, बाढ़ का खतरा है, रेल लाइन नहीं है, हवाई अड्डा नहीं है, पीने का पानी नहीं है, दिल्ली से दूरी बहुत ज्यादा है, जैसे तर्क दिए गए। लेकिन ये भी कहा गया कि जनता की राय गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्ष में है।

दीक्षित आयोग से भी पहले वर्ष 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में अलग राज्य उत्तराखंड की राजधानी तय करने को लेकर कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की रिपोर्ट में भी कहा गया कि 60 प्रतिशत से अधिक लोग चाहते हैं कि गैरसैंण को राजधानी बनाया जाए। 5-7 प्रतिशत लोगों ने कहा कि गढ़वाल-कुमाऊं के बीच में कहीं राजधानी होनी चाहिए तो वो भी गैरसैंण के पक्ष में गया।

तो 1994, 2008 की सरकारी रिपोर्टे गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्ष में रहीं।

उत्तराखंड की दो राजधानियों से जुड़ी दूसरी बड़ी चिंता इसके वित्तीय भार की है। राज्य अब भी बड़े कर्ज़ में है और उसका ब्याज़ चुकाने के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ रहा है। लेकिन एक बात तय तौर पर लोग मानते हैं कि पहाड़ में रह कर ही पहाड़ की समस्याएं समझी और सुलझायी जा सकती हैं। तो शायद अगली जंग गैरसैंण को पूर्णकालिक राजधानी बनाने की मांग को लेकर होगी।

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गैरसैंण ग्रीष्मकालीन

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